संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन ११३ --- [संस्कृत श्लोक] --- श्रीभगवानुवाच आराध्य विष्णुं किमनेन लब्धं मा भूज्जनेऽपीत्थमसाधुवादः । स्थानं परं प्राप्नुहि यन्मतं ते कालेन मां प्राप्स्यसि शुद्धभावः ॥ ९५ आधारभूतः सकलग्रहाणां कल्पद्रुमः सर्वजनैश्च वन्द्यः । मम प्रसादात्तव सा च माता ममान्तिके या च सुनीतिरार्या ॥ ९६ श्रीसूत उवाच तं साधयित्वेति वरैर्मुकुन्दः स्वमालयं दृश्यवपुर्जगाम । त्यक्त्वा शनैर्दिव्यवपुः स्वभक्तं मुहुः परावृत्य समीक्षमाणः ॥ ९७ तावच्च सद्यः सुरसिद्धसंघः श्रीविष्णुत्तद्भक्तसमागमं तम् । दृष्ट्वाथ वर्षन् सुरपुष्पवृष्टिं तुष्टाव हर्षाद् ध्रुवमव्ययं च ॥ ९८ श्रियाभिमत्य च सुनीतिसूनु- र्विभाति देवैरपि वन्द्यमानः । योऽयं नृणां कीर्तनदर्शनाभ्या- मायुर्यशो वर्धयति श्रियं च ॥ ९९ इत्थं ध्रुवः प्राप पदं दुरापं हरेः प्रसादान्न च चित्रमेतत् । तस्मिन् प्रसन्ने द्विजराजपत्रे न दुर्लभं भक्तजनेषु किंचित् ॥ १०० सूर्यमण्डलमानात्तु द्विगुणं सोममण्डलम्। पूर्णे शतसहस्रे द्वे तस्मान्नक्षत्रमण्डलम् ॥ १०१ द्वे लक्षेऽपि बुधस्यापि स्थानं नक्षत्रमण्डलात् । तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशना स्थितः ॥ १०२ अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तावन्माने व्यवस्थितः । लक्षद्वयं तु भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः ॥ १०३ सौरिर्बृहस्पतेश्चोर्ध्वं द्विलक्षे तु व्यवस्थितः । तस्माच्छनैश्चरादूर्ध्वं लक्षे सप्तर्षिमण्डलम् ॥ १०४ सप्तर्षिमण्डलादूर्ध्वमेकं लक्षं ध्रुवः स्थितः । मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिष्चक्रस्य सत्तम ॥ १०५ --- [हिन्दी अनुवाद] --- श्रीभगवान् बोले—'ध्रुवने विष्णुकी आराधना करके क्या पा लिया?' इस तरहका अपवाद लोगोंमें न फैल जाय। इसके लिये तुम अपने अभीष्ट सर्वोत्तम स्थानको ग्रहण करो, पुनः समय आनेपर शुद्धभाव हो तुम मुझे प्राप्त कर लोगे। मेरे प्रसादसे समस्त ग्रहोंके आधारभूत, कल्पवृक्ष और सब लोगोंके वन्दनीय होकर तुम और तुम्हारी माता आर्या सुनीति मेरे निकट निवास करोगे ॥ ९५-९६ ॥ श्रीसूतजी कहते हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रकट हो, उपर्युक्त वरदानोंसे ध्रुवका मनोरथ पूर्ण करके, भगवान् मुकुन्द धीरेसे अपना वह दिव्य रूप छिपा, बारंबार घूमकर उस भक्तकी ओर देखते हुए अपने वैकुण्ठधामको चले गये। इसी बीचमें देवताओंका समुदाय भगवान् विष्णु और उनके भक्तके उस समागमको देख हर्षके मारे तत्काल दिव्य पुष्प बरसाने और उस अविनाशी ध्रुवका स्तवन भी करने लगा। सुनीतिकुमार ध्रुव आज श्री और सम्मान—दोनोंसे सम्पन्न होकर देवताओंका भी वन्दनीय हो, शोभा पा रहा है। यह अपने दर्शन तथा गुणकीर्तनसे मनुष्योंकी आयु, यश तथा लक्ष्मीकी भी वृद्धि करता रहेगा ॥ ९७–९९ ॥ इस प्रकार ध्रुव भगवान् विष्णुके प्रसादसे दुर्लभ पद पा गया—यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। उन गरुडवाहन भगवान्के प्रसन्न हो जानेपर भक्तोंके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। सूर्यमण्डलका जितना मान है, उससे दूना चन्द्रमण्डलका मान है। चन्द्रमण्डलसे पूरे दो लाख योजन दूर ऊपर नक्षत्रमण्डल है, नक्षत्रमण्डलसे भी दो लाख योजन ऊँचे बुधका स्थान है और बुधके भी स्थानसे उतनी ही दूरीपर शुक्रकी स्थिति है। शुक्रसे भी दो लाख योजन दूर मङ्गल है और मङ्गलसे दो लाख योजनपर देवपुरोहित बृहस्पतिका निवास है। बृहस्पतिसे भी दो लाख योजन ऊपर शनैश्चरका स्थान है। उन शनैश्चरसे दो लाख योजन ऊपर सप्तर्षियोंका मण्डल है। सप्तर्षि-मण्डलसे एक लाख योजन ऊपर ध्रुव स्थित है। साधुशिरोमणे ! वह समस्त ज्योतिर्मण्डलका केन्द्र है ॥ १००–१०५ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth