संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन ११३ --- [संस्कृत श्लोक] --- श्रीभगवानुवाच आराध्य विष्णुं किमनेन लब्धं मा भूज्जनेऽपीत्थमसाधुवादः । स्थानं परं प्राप्नुहि यन्मतं ते कालेन मां प्राप्स्यसि शुद्धभावः ॥ ९५ आधारभूतः सकलग्रहाणां कल्पद्रुमः सर्वजनैश्च वन्द्यः । मम प्रसादात्तव सा च माता ममान्तिके या च सुनीतिरार्या ॥ ९६ श्रीसूत उवाच तं साधयित्वेति वरैर्मुकुन्दः स्वमालयं दृश्यवपुर्जगाम । त्यक्त्वा शनैर्दिव्यवपुः स्वभक्तं मुहुः परावृत्य समीक्षमाणः ॥ ९७ तावच्च सद्यः सुरसिद्धसंघः श्रीविष्णुत्तद्भक्तसमागमं तम् । दृष्ट्वाथ वर्षन् सुरपुष्पवृष्टिं तुष्टाव हर्षाद् ध्रुवमव्ययं च ॥ ९८ श्रियाभिमत्य च सुनीतिसूनु- र्विभाति देवैरपि वन्द्यमानः । योऽयं नृणां कीर्तनदर्शनाभ्या- मायुर्यशो वर्धयति श्रियं च ॥ ९९ इत्थं ध्रुवः प्राप पदं दुरापं हरेः प्रसादान्न च चित्रमेतत् । तस्मिन् प्रसन्ने द्विजराजपत्रे न दुर्लभं भक्तजनेषु किंचित् ॥ १०० सूर्यमण्डलमानात्तु द्विगुणं सोममण्डलम्। पूर्णे शतसहस्रे द्वे तस्मान्नक्षत्रमण्डलम् ॥ १०१ द्वे लक्षेऽपि बुधस्यापि स्थानं नक्षत्रमण्डलात् । तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशना स्थितः ॥ १०२ अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तावन्माने व्यवस्थितः । लक्षद्वयं तु भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः ॥ १०३ सौरिर्बृहस्पतेश्चोर्ध्वं द्विलक्षे तु व्यवस्थितः । तस्माच्छनैश्चरादूर्ध्वं लक्षे सप्तर्षिमण्डलम् ॥ १०४ सप्तर्षिमण्डलादूर्ध्वमेकं लक्षं ध्रुवः स्थितः । मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिष्चक्रस्य सत्तम ॥ १०५ --- [हिन्दी अनुवाद] --- श्रीभगवान् बोले—'ध्रुवने विष्णुकी आराधना करके क्या पा लिया?' इस तरहका अपवाद लोगोंमें न फैल जाय। इसके लिये तुम अपने अभीष्ट सर्वोत्तम स्थानको ग्रहण करो, पुनः समय आनेपर शुद्धभाव हो तुम मुझे प्राप्त कर लोगे। मेरे प्रसादसे समस्त ग्रहोंके आधारभूत, कल्पवृक्ष और सब लोगोंके वन्दनीय होकर तुम और तुम्हारी माता आर्या सुनीति मेरे निकट निवास करोगे ॥ ९५-९६ ॥ श्रीसूतजी कहते हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रकट हो, उपर्युक्त वरदानोंसे ध्रुवका मनोरथ पूर्ण करके, भगवान् मुकुन्द धीरेसे अपना वह दिव्य रूप छिपा, बारंबार घूमकर उस भक्तकी ओर देखते हुए अपने वैकुण्ठधामको चले गये। इसी बीचमें देवताओंका समुदाय भगवान् विष्णु और उनके भक्तके उस समागमको देख हर्षके मारे तत्काल दिव्य पुष्प बरसाने और उस अविनाशी ध्रुवका स्तवन भी करने लगा। सुनीतिकुमार ध्रुव आज श्री और सम्मान—दोनोंसे सम्पन्न होकर देवताओंका भी वन्दनीय हो, शोभा पा रहा है। यह अपने दर्शन तथा गुणकीर्तनसे मनुष्योंकी आयु, यश तथा लक्ष्मीकी भी वृद्धि करता रहेगा ॥ ९७–९९ ॥ इस प्रकार ध्रुव भगवान् विष्णुके प्रसादसे दुर्लभ पद पा गया—यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। उन गरुडवाहन भगवान्के प्रसन्न हो जानेपर भक्तोंके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। सूर्यमण्डलका जितना मान है, उससे दूना चन्द्रमण्डलका मान है। चन्द्रमण्डलसे पूरे दो लाख योजन दूर ऊपर नक्षत्रमण्डल है, नक्षत्रमण्डलसे भी दो लाख योजन ऊँचे बुधका स्थान है और बुधके भी स्थानसे उतनी ही दूरीपर शुक्रकी स्थिति है। शुक्रसे भी दो लाख योजन दूर मङ्गल है और मङ्गलसे दो लाख योजनपर देवपुरोहित बृहस्पतिका निवास है। बृहस्पतिसे भी दो लाख योजन ऊपर शनैश्चरका स्थान है। उन शनैश्चरसे दो लाख योजन ऊपर सप्तर्षियोंका मण्डल है। सप्तर्षि-मण्डलसे एक लाख योजन ऊपर ध्रुव स्थित है। साधुशिरोमणे ! वह समस्त ज्योतिर्मण्डलका केन्द्र है ॥ १००–१०५ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
१९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
स्वभावात् तपति विप्रेन्द्र अधश्चोर्ध्वं च रश्मिभिः। | विप्रवर ! सूर्यदेव स्वभावतः अपनी किरणोंद्वारा नीचे कालसंख्यां त्रिलोकस्य स करोति युगे युगे ॥ १०६ | तथा ऊपरके लोकोंमें ताप पहुँचाते हैं। वे ही प्रत्येक युगमें जनस्तपस्तथा सत्यमेतांल्लोकान् द्विजोत्तम। | त्रिभुवनकी कालसंख्या निश्चित करते हैं। द्विजोत्तम ! ब्रह्मणा मुनिशार्दूल विष्णुभक्तिविवर्धितः ॥ १०७ | मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्माजीके द्वारा विष्णुभक्तिसे अभ्युदयको प्राप्त ऊर्ध्वगतैर्द्विजश्रेष्ठ रश्मिभिस्तपते रविः। | होकर सूर्य अपनी ऊर्ध्वगत किरणोंसे ऊपरके जन, तप अधोगतैश्च भूर्लोकं द्योतते दीर्घदीधितिः ॥ १०८ | तथा सत्य लोकोंमें गर्मी पहुँचाते हैं और अधोगत किरणोंसे सर्वपापहरः सूर्यः कर्ता त्रिभुवनस्य च। | भूलोकको प्रकाशित करते हैं ॥ १०६-१०८ ॥ छत्रवत् प्रतिपश्येत मण्डलान्मण्डलं परम् ॥ १०९ | समस्त पापोंको हरनेवाले सूर्यदेव त्रिभुवनकी सृष्टि आदित्यमण्डलाधस्ताद् भुवर्लोकं प्रतिष्ठितम्। | करते हैं। वे छत्रकी भाँति स्थित हो एक मण्डलसे दूसरे त्रैलोक्यस्येश्वरत्वं च विष्णुदत्तं शतक्रतोः ॥ ११० | मण्डलको दर्शन देते और प्रकाशित करते हैं। सूर्यमण्डलके लोकपालैः स सहितो लोकान् रक्षति धर्मतः। | नीचे भुवर्लोक प्रतिष्ठित है। तीनों भुवनोंका आधिपत्य वसेत् स्वर्गे महाभाग देवेन्द्रः स तु कीर्तिमान् ॥ १११ | भगवान् विष्णुने शतक्रतु इन्द्रको दे रखा है। वे समस्त ततोऽधस्तान्मुने चेदं पातालं विद्धि सप्रभम्। | लोकपालोंके साथ धर्मपूर्वक लोकोंकी रक्षा करते हैं। न तत्र तपते सूर्यो न रात्रिर्न निशाकरः ॥ ११२ | महाभाग ! वे यशस्वी देवेन्द्र स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। दिव्यस्वरूपमास्थाय तपन्ति सततं जनाः। | मुने ! इन सात लोकोंसे नीचे यह प्रभापूर्ण पाताललोक स्थित पातालस्था द्विजश्रेष्ठ दीप्यमानाः स्वतेजसा ॥ ११३ | है, ऐसा आप जानें। वहाँ न सूर्यका ताप है, न चन्द्रमाका स्वर्लोकात्तु महर्लोकः कोटिमात्रे व्यवस्थितः। | प्रकाश, [न दिन है] न रात। द्विजश्रेष्ठ ! पातालवासी जन ततो योजनमात्रेण द्विगुणो मण्डलेन तु ॥ ११४ | दिव्यरूप धारण करके सदा अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए जनलोकः स्थितो विप्र पञ्चमो मुनिसेवितः। | तपते हैं। स्वर्गलोकसे करोड़ योजन ऊपर महर्लोक स्थित तत्रोपरि तपोलोकश्चतुर्भिः कोटिभिः स्थितः ॥ ११५ | है। हे विप्र ! उससे दूने दो करोड़ योजनपर मुनिसेवित सत्यलोकोऽष्टकोटीभिस्तपोलोकोपरिस्थितः। | जनलोक, जो पाँचवाँ लोक है, स्थित है। उससे चार करोड़ सर्वे छात्राकृतिज्ञेया भुवनोपरिसंस्थिताः ॥ ११६ | योजन ऊपर तपोलोककी स्थिति है। तपोलोकसे ऊपर ब्रह्मलोकाद्विगुलोको द्विगुणश्च व्यवस्थितः। | आठ करोड़ योजनपर सत्यलोक (ब्रह्मलोक) स्थित है। ये वाराहे तस्य माहात्म्यं कथितं लोकचिन्तकैः ॥ ११७ | सभी भुवन एक-दूसरेके ऊपर छत्रकी भाँति स्थित हैं। ततः परं द्विजश्रेष्ठ स्थितः परमपूरुषः। | ब्रह्मलोकसे सोलह करोड़ योजनपर विष्णुलोककी स्थिति ब्रह्माण्डात् परमः साक्षान्निर्लेपः पुरुषः स्थितः ॥ ११८ | है। लोकचिन्तकोंने वाराहपुराणमें उसके माहात्म्यका वर्णन पशुपाशैर्विमुच्येत तपोज्ञानसमन्वितः। | किया है। द्विजश्रेष्ठ ! इसके आगे परम पुरुषकी स्थिति है, इति ते संस्थितिः प्रोक्ता भूगोलस्य मयानघ। | जो ब्रह्माण्डसे विलक्षण साक्षात् परमात्मा हैं। इस प्रकार यस्तु सम्यगिमां वेत्ति स याति परमां गतिम् ॥ ११९ | जाननेवाला मनुष्य तप और ज्ञानसे युक्त होकर पशुपाश लोकस्य संस्थानकरोऽप्रमेयो | (अविद्या-बन्धन)-से मुक्त हो जाता है॥ १०९-११८१/२॥ विष्णुर्नृसिंहो नरदेवपूजितः। | अनघ ! इस प्रकार मैंने तुम्हें भूगोलकी स्थिति बतलायी। युगे युगे विष्णुरनादिमूर्तिमा- | जो पुरुष सम्यक् प्रकारसे इसका ज्ञान रखता है, वह परम नास्थाय विश्वं परिपाति दुष्टहा ॥ १२० | गतिको प्राप्त होता है। मनुष्यों और देवताओंसे पूजित | नृसिंहस्वरूप अप्रमेय भगवान् विष्णु लोककी रक्षा करनेवाले | हैं। वे अनादि मूर्तिमान् परमेश्वर प्रत्येक युगमें शरीर धारणकर | दुष्टोंका वध करके विश्वका पालन करते हैं॥ ११९-१२०॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे एकत्रिशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
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बत्तीसवाँ अध्याय
अध्याय ३२ ] सहस्रानीक-चरित्र; श्रीनृसिंह-पूजनका माहात्म्य ११५ बत्तीसवाँ अध्याय सहस्रानीक-चरित्र; श्रीनृसिंह-पूजनका माहात्म्य भरद्वाज उवाच सहस्रानीकस्य हरेरवतारांश्च शार्ङ्गिणः। साम्प्रतं श्रोतुमिच्छामि तन्मे वद महामते॥ १ सूत उवाच हन्त ते कथयिष्यामि चरितं तस्य धीमतः। सहस्रानीकस्य हरेरवतारांश्च मे शृणु॥ २ सहस्रानीकोऽभिषिक्तो निजराज्ये द्विजोत्तमैः। पालयामास धर्मेण राज्यं स तु नृपात्मजः॥ ३ तस्य पालयतो राज्यं राजपुत्रस्य धीमतः। भक्तिर्बभूव देवेशे नरसिंहे सुरोत्तमे॥ ४ तं द्रष्टुमागतः साक्षाद्विष्णुभक्तं भृगुः पुरा। अर्घ्यपाद्यासनै राजा तमभ्यर्च्यब्रवीदिदम्॥ ५ पावितोऽहं मुनिश्रेष्ठ साम्प्रतं तव दर्शनात्। त्वद्दर्शनमपुण्यानां कलावस्मिन् सुदुर्लभम्॥ ६ नरसिंहं प्रतिष्ठाप्य देवदेवं सनातनम्। आराधयितुमिच्छामि विधानं तत्र मे वद॥ ७ अवतारांनशेषांश्च देवदेवस्य चक्रिणः। श्रोतुमिच्छामि सकलांस्तान् पुण्यानपि मे वद॥ ८ भृगुरुवाच शृणु भूपालपुत्र त्वं न हि कश्चित् कलौ युगे। हरौ भक्तिं करोत्यत्र नृसिंहे चातिभक्तिमान्॥ ९ स्वभावाद्यस्य भक्तिः स्यान्नरसिंहे सुरोत्तमे। तस्यारयः प्रणश्यन्ति कार्यसिद्धिश्च जायते॥ १० त्वमतीव हरेर्भक्तः पाण्डुवंशेऽपि सत्तमः। तेन ते निखिलं वक्ष्ये शृणुष्वैकाग्रमानसः॥ ११ यः कुर्याच्छोभनं वेश्म नरसिंहस्य भक्तिमान्। स सर्वपापनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात्॥ १२ प्रतिमां लक्षणोपेतां नरसिंहस्य कारयेत्। स सर्वपापनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात्॥ १३ भरद्वाजजी बोले—सूतजी! अब मैं सहस्रानीकका चरित्र और भगवान् विष्णुके अवतारोंकी कथा सुनना चाहता हूँ; महामते! कृपा करके वह मुझसे कहिये॥ १॥ सूतजीने कहा—ब्रह्मन्! बहुत अच्छा, अब मैं बुद्धिमान् सहस्रानीकके चरित्रका और भगवान्के अवतारोंका वर्णन करूँगा, सुनिये॥ २॥ राजकुमार सहस्रानीकको जब उत्तम ब्राह्मणोंने उसके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया, तब वे धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगे। राज्यके पालनमें लगे हुए बुद्धिमान् राजकुमारकी देवेश्वर, देवश्रेष्ठ भगवान् नृसिंहमें भक्ति हो गयी। पूर्वकालमें एक बार उन विष्णुभक्त नरेशका दर्शन करनेके लिये स्वयं भृगुजी आये। राजाने अर्घ्य, पाद्य और आसनादिके द्वारा भृगुजीका सम्मान करके उनसे यह कहा—'मुनिश्रेष्ठ! इस समय मैं आपके दर्शनसे पवित्र हो गया। जिन्होंने पुण्य नहीं किया है, ऐसे मनुष्योंके लिये इस कलियुगमें आपका दर्शन परम दुर्लभ है। मैं सनातन देवदेव नरसिंहकी स्थापना करके उनकी आराधना करना चाहता हूँ, आप कृपया मुझे इसका विधान बतायें। तथा मैं देवदेव श्रीहरिके सम्पूर्ण अवतारोंको भी सुनना चाहता हूँ; अतः आप उन सभी पुण्यावतारोंकी कथा मुझसे कहिये'॥ ३—८॥ भृगुजी बोले—राजकुमार! सुनो; इस कलियुगमें कोई भी भगवान् नृसिंहके प्रति अत्यन्त भक्तिभाव रखकर उनकी आराधना नहीं कर रहा है। देववर भगवान् नृसिंहमें जिसकी स्वभावतः भक्ति हो जाती है, उसके सारे शत्रु नष्ट हो जाते हैं और उसे प्रत्येक कार्यमें सिद्धि प्राप्त होती है। इस पाण्डुवंशमें तुम ही श्रेष्ठ पुरुष और भगवान्के अत्यन्त भक्त हो; अतः तुमसे मैं तुम्हारी पूछी हुई सब बातें बताऊँगा; एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ ९—११॥ जो भक्तिपूर्वक नृसिंहदेवका सुन्दर मन्दिर निर्माण कराता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें स्थान पाता है। जो भगवान् नृसिंहकी सुन्दर लक्षणोंसे युक्त प्रतिमा बनवाता है, वह सब पापोंसे छुटकारा पाकर विष्णुलोकको जाता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
११६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
११६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३ प्रतिष्ठां नरसिंहस्य यः करोति यथाविधि । नरश्रेष्ठ! जो निष्कामभावसे नृसिंहदेवकी विधिवत् प्रतिष्ठा निष्कामो नरशार्दूल देहबाधात् प्रमुच्यते ॥ १४ करता है, वह दैहिक दुःखोंसे मुक्त हो जाता है। जो नरसिंहं प्रतिष्ठाप्य यः पूजामाचरेन्नरः । भगवान् नृसिंहकी स्थापना करके सदा उनकी पूजा तस्य कामाः प्रसिध्यन्ति परमं पदमाप्नुयात् ॥ १५ करता है, उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं तथा वह परम ब्रह्मादयः सुराः सर्वे विष्णुमाराध्य ते पुरा। पदको प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मादि सभी देवता पूर्वकालमें स्वं स्वं पदमनुप्राप्ताः केशवस्य प्रसादतः ॥ १६ भगवान् विष्णुकी आराधना करके उनके प्रसादसे अपने- ये ये नृपवरा राजन् मान्धातृप्रमुखा नृपाः । अपने लोकको प्राप्त हुए थे। राजन्! मांधाता आदि जो- ते ते विष्णुं समाराध्य स्वर्गलोकमितो गताः ॥ १७ जो प्रधान नरेश हो गये हैं, वे सभी भगवान् विष्णुकी यस्तु पूजयते नित्यं नरसिंहं सुरेश्वरम् । आराधना करके यहाँसे स्वर्गलोकको चले गये। जो स स्वर्गमोक्षभागी स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ १८ सुरेश्वर नृसिंहका प्रतिदिन पूजन करता है, वह स्वर्ग तस्मादेकमना भूत्वा यावज्जीवं प्रतिज्ञया। और मोक्षका भागी होता है—इसमें अन्यथा विचार अर्चनान्नरसिंहस्य प्राप्स्यसे स्वाभिवाञ्छितम् ॥ १९ करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये तुम भी प्रतिज्ञापूर्वक विधिवत्स्थापयेद्यस्तु कारयित्वा जनार्दनम् । एकचित्त होकर जीवनपर्यन्त भगवान् नृसिंहकी पूजा न तु निर्गमनं तस्य विष्णुलोकाद् भवेन्नृप ॥ २० करते हुए अपना मनोरथ प्राप्त करोगे। नृप! जो भगवान् नरो नृसिंहं तमनन्तविक्रमं जनार्दनकी प्रतिमा बनवाकर विधिवत् उसकी स्थापना सुरासुरैरर्चितपादपङ्कजम् । करता है, उसका विष्णुलोकसे कभी निष्क्रमण नहीं संस्थाप्य भक्त्या विधिवच्च पूजयेत् होता। यदि मनुष्य उन अनन्त विक्रमशाली भगवान् प्रयाति साक्षात् परमेश्वरं हरिम् ॥ २१ नरसिंहकी, जिनके चरण-कमलोंकी देवता तथा असुर, दोनों ही पूजा करते हैं, विधिवत् स्थापना करके भक्तिपूर्वक पूजा करे तो वह साक्षात् परमेश्वर भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है ॥ १२–२१ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें सहस्रानीक-चरित्रके अन्तर्गत बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥ तैंतीसवाँ अध्याय भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल—राजा जयध्वजकी कथा राजोवाच राजा बोले—भगवान्! मैं आपके प्रसादसे भगवान्के हरेरर्चाविधिं पुण्यां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । पूजनकी पावन विधिको विशेषरूपसे यथावत् सुनना त्वत्प्रसादाद्विशेषेण भगवन् प्रब्रवीहि मे ॥ १ चाहता हूँ; कृपया आप मुझे विस्तारसे बतायें। भगवान् सम्मार्जनकरो यश्च नरसिंहस्य मन्दिरे । नृसिंहके मन्दिरमें जो झाडू देता है वह तथा जो उसे यत्पुण्यं लभते तद्वदुपलेपनकृन्नरः ॥ २ लीपता-पोतता है, वह पुरुष किस पुण्यको प्राप्त करता शुद्धोदकेन यत्पुण्यं स्नापिते केशवे भवेत् । है? केशवको शुद्ध जलसे स्नान करानेपर कौन-सा पुण्य In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३३ ] भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल ११७ क्षीरस्नानेन यत्पुण्यं दध्ना च मधुना तथा। प्राप्त होता है तथा दूध, दही, मधु, घी एवं पञ्चगव्यद्वारा घृतस्नानेन यत्पुण्यं पञ्चगव्येन यद्भवेत् ॥ ३ स्नान करानेसे क्या पुण्य होता है ? भगवान्की प्रतिमाको क्षालिते चोष्णतोयेन प्रतिमायां च भक्तितः। गर्म जलसे भक्तिपूर्वक स्नान करानेपर तथा कर्पूर और कर्पूरागुरुतोयेन मिश्रेण स्नापितेन च ॥ ४ अगुरु मिले हुए जलसे स्नान करानेपर कौन-सा पुण्य अर्घ्यदानेन यत्पुण्यं पाद्याचमनदानके। प्राप्त होता है ? भगवान्को अर्घ्य देनेसे, पाद्य और मन्त्रेण स्नापिते यच्च वस्त्रदानेन यद्भवेत् ॥ ५ आचमन अर्पण करनेसे, मन्त्रोच्चारणपूर्वक नहलानेसे श्रीखण्डकुङ्कुमाभ्यां तु अर्चिते किं फलं भवेत्। और वस्त्र-दान करनेसे क्या पुण्य होता है ? ॥ १—५ ॥ पुष्पैर्अभ्यर्चिते यच्च यत्फलं धूपदीपयोः ॥ ६ चन्दन और केसरद्वारा पूजा करनेपर तथा फूलोंसे नैवेद्यैर्यत्फलं प्रोक्तं प्रदक्षिणकृते तु यत्। पूजा करनेपर क्या फल होता है ? तथा धूप और दीप नमस्कारकृते यच्च फलं यत्स्तोत्रगीतयोः ॥ ७ देनेका क्या फल है ? नैवेद्य निवेदन करनेका और तालवृन्तप्रदानेन चामरस्य च यद्भवेत्। प्रदक्षिणा करनेका क्या फल है ? इसी प्रकार नमस्कार ध्वजप्रदाने यद्विष्णोः शङ्खदानेन यद्भवेत् ॥ ८ करनेसे एवं स्तुति और यशोगान करनेसे कौन-सा फल एतच्चान्यच्च यत्किंचिदज्ञानान्न प्रचोदितम्। प्राप्त होता है ? भगवान् विष्णुके लिये पंखा दान करने, तत्सर्वं कथय ब्रह्मन् भक्तस्य मम केशवे ॥ ९ चँवर प्रदान करने, ध्वजाका दान करने और शङ्ख-दान सूत उवाच करनेसे क्या फल होता है ? ब्रह्मन् ! मैंने जो कुछ पूछा इति सम्प्रेरितो विप्रस्तेन राज्ञा भृगुस्तदा। है, वह तथा अज्ञानवश मैंने जो नहीं पूछा है, वह सब मार्कण्डेयं नियुज्याथ कथने स गतो मुनिः ॥ १० भी मुझसे कहिये; क्योंकि भगवान् केशवके प्रति मेरी सोऽपि तस्मिन् मुदायुक्तो हरिभक्त्या विशेषतः। हार्दिक भक्ति है ॥ ६—९ ॥ राज्ञे प्रवक्तुमारेभे भृगुणा चोदितो मुनिः ॥ ११ सूतजी बोले—राजाके इस प्रकार पूछनेपर वे ब्रह्मर्षि मार्कण्डेय उवाच भृगु मुनि मार्कण्डेयजीको उत्तर देनेके लिये नियुक्त करके राजपुत्र शृणुष्वेदं हरिपूजाविधिं क्रमात्। स्वयं चले गये। भृगुजीकी प्रेरणासे मुनिवर मार्कण्डेयजीने विष्णुभक्तस्य वक्ष्यामि तवाहं पाण्डुवंशज ॥ १२ राजापर उनकी हरिभक्तिसे विशेष प्रसन्न होकर उनके प्रति नरसिंहस्य नित्यं च यः सम्मार्जनमारभेत्। इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ १०-११ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके स मोदते ॥ १३ मार्कण्डेयजी बोले—पाण्डुकुलनन्दन राजकुमार ! गोमयेन मृदा तोयैर्यः करोत्युपलेपनम्। भगवान् विष्णुकी इस पूजा-विधिको क्रमशः सुनो; तुम स चाक्षयफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते ॥ १४ विष्णुके भक्त हो, अतः मैं तुम्हें यह सब बताऊँगा। जो अत्रार्थे यत्पुरावृत्तमितिहासं पुरातनम्। भगवान् नरसिंहके मन्दिरमें नित्य झाडू लगाता है, वह सब यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुक्तिर्भवति सत्तम ॥ १५ पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें आनन्दित होता है। जो पुरा युधिष्ठिरो राजा पञ्चभिर्भ्रातृभिर्युतः। गोबर, मिट्टी तथा जलसे वहाँकी भूमि लीपता है, वह द्रौपद्या सह राजेन्द्र काननं विचचार ह ॥ १६ अक्षय फल प्राप्त करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। सत्तम ! इस विषयमें एक प्राचीन सत्य इतिहास है, जिसे सुनकर सब पापोंसे मुक्ति मिल जाती है ॥ १२-१५ ॥ राजेन्द्र ! पूर्वकालमें राजा युधिष्ठिर द्रौपदी तथा अपने पाँच भाइयोंके साथ वनमें विचरते थे। घूमते- In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
१९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३ शूलकण्टकनिष्क्रान्तास्ततस्ते पञ्च पाण्डवाः। नारदोऽपि गतो नाकं जुष्टेदं तीर्थमुत्तमम्॥ १७ ततो युधिष्ठिरो राजा प्रस्थितस्तीर्थमुत्तमम्। दर्शनं मुनिमुख्यस्य तीर्थधर्मोपदेशिनः॥ १८ चिन्तयति च धर्मात्मा क्रोधपैशुन्यवर्जितः। दानवो बहुरोमा च तथा स्थूलशिरा नृप॥ १९ पाण्डवान् गच्छतो वीक्ष्य दानवो द्रौपदीच्छया। कृत्वा भूप मुने रूपं बहुरोमाऽऽगतस्तदा॥ २० प्रणिधानं विधायाथ आसीनः कुशविष्टरे। बिभ्रत् कमण्डलुं पार्श्वे दर्भसूचीं तथा करे॥ २१ अक्षमालां जपन्मन्त्रं स्वनासाग्रं निरीक्षयन्। स दृष्टः पाण्डवैस्तत्र रेवायां वनचारिभिः॥ २२ ततो युधिष्ठिरो राजा तं प्रणम्य सहानुजः। जगाद वचनं दृष्ट्वा भाग्येनासि महामुने॥ २३ तीर्थानि रुद्रदेहायाः सुगोप्यानि निवेदय। मुनीनां दर्शनं नाथ श्रुतं धर्मोपदेशकम्॥ २४ यावन्मुनिमुवाचेदं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः। तावत्स्थूलशिराः प्राप्तो मुनिरूपधरोऽपरः॥ २५ जल्पन्नित्यातुंर वाक्यं को नामास्त्यत्र रक्षकः। भयातुरं नरो जीवं यो रक्षेच्छरणागतम्॥ २६ तस्यानन्तफलं स्याद्वै किं पुनर्मां द्विजोत्तमम्। एकतो मेदिनीदानं मेरुभूधरदक्षिणम्॥ २७ अन्यतो ह्यार्तजीवानां प्राणसंशयवारणम्। द्विजं धेनुं स्त्रियं बालं पीड्यमानं च दुर्जनैः॥ २८ उपेक्षेत नरो यस्तु स च गच्छति रौरवम्। अथ मां हतसर्वस्वं प्राणत्यागपरायणम्॥ २९ को रक्षति नरो वीरः पराभूतं हि दानवैः। गृहीत्वा चाक्षमालां मे तथा शुभकमण्डलुम्॥ ३० निहतोऽहं कराघातैस्तथा खाटो मनोहरम्। गृहीतं मम सर्वस्वं दानवेन दुरात्मना॥ ३१ घूमते वे पाँचों पाण्डव शूल और कण्टकमय मार्गको पार करके एक उत्तम तीर्थकी ओर प्रस्थित हुए। उसके पहले भगवान् नारदजी भी उस उत्तम तीर्थका सेवन करके स्वर्गलोकको लौट गये थे। क्रोध और पिशुनतासे रहित धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर उस उत्तम तीर्थकी ओर प्रस्थान करके तीर्थधर्मका उपदेश करनेवाले किसी मुनिवरके दर्शनकी बात सोच रहे थे, इसी बीचमें बहुरोमा तथा स्थूलशिरा नामक दानव वहाँ आये। भूपाल! पाण्डवोंको जाते देख द्रौपदीका अपहरण करनेकी इच्छासे बहुरोमा नामक दानव मुनिका रूप धारण करके वहाँ आया। वह कुशके आसनपर बैठकर ध्यानमग्न हो गया। उसके पार्श्वमें कमण्डलु था और हाथमें उसने कुशकी पवित्री पहन रखी थी। वह नासिकाके अग्रभागका अवलोकन करता हुआ रुद्राक्षकी मालासे मन्त्र-जप कर रहा था। नर्मदा-तटवर्ती वनमें भ्रमण करते हुए पाण्डवोंने वहाँ उसे देखा॥ १६–२२॥ तदनन्तर उसे देखकर राजा युधिष्ठिरने भाइयोंसहित प्रणाम करके उससे यह बात कही—महामुने! भाग्यसे आप यहाँ विद्यमान हैं। इस रुद्रदेहा (रेवा)-के समीपवर्ती परम गोपनीय तीर्थोंको हमें बताइये। नाथ! हमने सुना है कि मुनियोंका दर्शन धर्मका उपदेश करनेवाला होता है॥ २३–२४॥ धर्मपुत्र युधिष्ठिर जबतक उस मायावी मुनिसे बात कर ही रहे थे, तबतक ही स्थूलशिरा नामक दूसरा दानव मुनिरूप धारण किये वहाँ आ पहुँचा। वह बड़े ही आतुरभावसे इस प्रकार पुकार रहा था—अहो! यहाँ कौन हमारी रक्षा करनेवाला है? जो मनुष्य शरणमें आये हुए किसी भी भयपीड़ितकी रक्षा करता है, वह अनन्त पुण्यफलका भागी होता है; फिर जो मुझ उत्तम ब्राह्मणकी रक्षा करेगा, उसके पुण्यफलका तो कहना ही क्या है। एक ओर मेरु पर्वतकी दक्षिणापूर्वक सम्पूर्ण पृथिवीका दान और दूसरी ओर पीड़ित प्राणियोंके प्राण-संकटका निवारण—दोनों बराबर हैं। जो पुरुष दुष्टोंद्वारा सताये जाते हुए ब्राह्मण, गौ, स्त्री और बालकोंकी उपेक्षा करता है, वह रौरव नरकमें पड़ता है। मेरा सर्वस्व लूट लिया गया है। मैं दानवोंसे अपमानित होकर प्राण त्याग देनेको उद्यत हूँ। इस समय कौन ऐसा वीर पुरुष है, जो मेरी रक्षा कर सके? दुष्ट दानवने मेरी स्फटिककी माला, सुन्दर कमण्डलु और मनोहर खाट छीनकर मुझे थप्पड़से मारा है और सर्वस्व लूट लिया है॥ २५–३१॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३३ ] भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल ११९ इत्याकर्ण्य वचः क्लीबं पाण्डवा जातसम्भ्रमाः । | इस प्रकारके कातर वचन सुनकर पाण्डव हड़बड़ा यान्ति रोमाञ्चिता भूयो विधायौग्निं च तं मुनिम् ॥ ३२ | गये। वे रोमाञ्चित हो, आग जलाकर उस मुनिके पीछे चले। द्रौपदीको उन लोगोंने पहलेवाले महात्मा मुनिके विमुच्य द्रौपदीं तत्र मुनेः पार्श्वे महात्मनः । | पास ही छोड़ दिया और स्वयं रोषसे भरकर वहाँसे ततो दूरतरं प्राप्ताः संरम्भात्ते च पाण्डवाः ॥ ३३ | बहुत दूर निकल गये॥ ३२-३३॥ तदनन्तर युधिष्ठिरने कहा—हमें तो यहाँ कुछ भी ततो युधिष्ठिरोऽवोचत् किं च नो नात्र दृश्यते । | दिखायी नहीं देता। अर्जुन ! तुम द्रौपदीकी रक्षाके लिये कृष्णासंरक्षणार्थाय व्रज व्यावृत्य चार्जुन ॥ ३४ | यहाँसे लौट जाओ। तब भाईके वचनसे प्रेरित होकर अर्जुन वहाँसे चल दिये। राजन् ! फिर राजा युधिष्ठिरने ततोऽर्जुनो विनिष्क्रान्तो बन्धुवाक्यप्रणोदितः । | उस गहन वनके भीतर सूर्यमण्डलकी ओर देखकर यह ततो युधिष्ठिरो राजा सत्यां वाचमकल्पयत् ॥ ३५ | सत्य वचन कहा—मेरी सत्यवादिता, पुण्यकर्म तथा धर्मपूर्वक भाषण करनेसे संतुष्ट होकर देवगण संशयमें निरीक्ष्य मण्डलं भानोस्तदा सुगहने वने । | पड़े हुए मुझको सत्य बात बतला दें॥ ३४-३६१/२॥ मम सत्याच्च सुकृताद् धर्मसम्भाषणात् प्रभो ॥ ३६ राजन् ! युधिष्ठिरके यों कहनेपर आकाशमें इस तथ्यं शंसन्तु त्रिदशा मम संशयभाजिनः । | प्रकारका शब्द हुआ, यद्यपि वहाँ बोलनेवाला कोई ततोऽम्बरेऽभवद्वाणी तदा भूपाशरीरिणी ॥ ३७ | व्यक्ति नहीं था—महाराज ! यह (जो आपके पास खड़ा है, वह मुनि नहीं) दानव है। स्थूलशिरा नामक मुनि दानवोऽयं महाराज मुनिः स्थूलशिराः स्थितः । | तो सुखपूर्वक हैं, उनपर किसीके द्वारा कोई उपद्रव नहीं नासावुपद्रुतः केन मायैषास्य दुरात्मनः ॥ ३८ | है। यह तो इस दुष्टकी माया है॥ ३७-३८॥ ततो भीमः कराघातैर्नश्यमानं हि दानवम् । | तब भीमने अत्यन्त क्रोधसे युक्त हो उस भागते हुए संरम्भात्कुपितोऽत्यर्थं मौलिदेशे जघान तम् ॥ ३९ | दानवके मस्तकपर बड़े वेगसे मुष्टिप्रहार किया। फिर तो दानवने भी अपना रौद्ररूप धारण किया और भीमको सोऽपि रूपं निजं प्राप्य रौद्रं भीममताडयत् । | मुक्का मारा। इस प्रकार भीम और दानवमें वहाँ दारुण तत्र युद्धं प्रवृत्तं दारुणं भीमदैत्ययोः ॥ ४० | संग्राम छिड़ गया। भीमने उस वनमें बड़े कष्टसे उसके स्थूल मस्तकका छेदन किया॥ ३९-४०१/२॥ कष्टाद्बभञ्ज भीमोऽपि तस्य स्थूलं शिरो वने । | इधर अर्जुन भी जब मुनिके आश्रमपर पहुँचे, तब अर्जुनोऽपि समायातो नैव पश्यति तं मुनिम् ॥ ४१ | वहाँ उन्हें न तो वह मुनि दिखायी दिया और न प्राणप्रिया साध्वी भार्या द्रौपदी ही दीख पड़ी। तब तथा च द्रौपदीं भूयः साध्वीं कान्तां च वल्लभाम् । | अर्जुनने वृक्षपर चढ़कर ज्यों ही इधर-उधर दृष्टि ततो वृक्षं समारुह्य यावत्पश्यति चार्जुनः ॥ ४२ | डाली, त्यों ही देखा कि एक दानव द्रौपदीको अपने कंधेपर बिठाकर बड़ी शीघ्रतासे भागा जा रहा है और तावद्विधाय तां स्कन्धे शीघ्रं धावति दानवः । | उस दुष्टके द्वारा हरी गयी द्रौपदी कुररीकी भाँति संहृता याति दुष्टेन रुदती कुररी यथा ॥ ४३ | ‘हा धर्मपुत्र! हा भीम!’ इत्यादि रटती हुई विलाप कर रही है। द्रौपदीको उस अवस्थामें देखकर वीर कुर्वती भीमभीमेति धर्मपुत्रेति वादिनी । | अर्जुन अपनी आवाजसे दिशाओंको गुँजाते हुए चले। तां दृष्ट्वा स ययौ वीरः शब्दैः संनादयन् दिशः ॥ ४४ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
१२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
पादन्यासोुरुवेगेन प्रभग्नाः पादपा भृशम्। ततो दैत्योऽपि तां तन्वीं विहायाशु पलायितः ॥ ४५ तथापि चार्जुनो तस्य कोपान्मुञ्चति नासुरम्। पतितो मेदिनीपृष्ठे तावदेव चतुर्भुजः ॥ ४६ पीते च वाससी बिभ्रत् शङ्खचक्रायुधानि च। ततः स विस्मयाक्रान्तो नत्वा पार्थो वचोऽवदत् ॥ ४७
अर्जुन उवाच कथं कृतेषा भगवंस्त्वया मायात्र वैष्णवी। मयाप्यपकृतं नाथ तत् क्षमस्व नमोऽस्तु ते ॥ ४८ नूनमज्ञानभावेन कर्मैतद्दारुणं मया। तत्क्षन्तव्यं जगन्नाथ चैतन्यं मानवे कुतः ॥ ४९
चतुर्भुज उवाच नाहं कृष्णो महाबाहो बहुरोमास्मि दानवः। उपयातो हरेर्देहं पूर्वकर्मप्रभावतः ॥ ५०
अर्जुन उवाच बहुरोमन् पूर्वजातिं कर्म मे शंस तत्त्वतः। केन कर्मविपाकेन विष्णोः सारूप्यमाप्तवान् ॥ ५१
चतुर्भुज उवाच शृण्वर्जुन महाभाग सहितो भ्रातृभिर्मम। चरितं चित्रमत्यर्थं शृण्वतां मुदवर्धनम् ॥ ५२ अहमासं पुरा राजा सोमवंशसमुद्भवः। जयध्वज इति ख्यातो नारायणपरायणः ॥ ५३ विष्णोर्देवालये नित्यं सम्मार्जनपरायणः। उपलेपरतश्चैव दीपदाने समुद्यतः ॥ ५४ वीतिहोत्र इति ख्यात आसीत् साधुपुरोहितः। मम तच्चरितं दृष्ट्वा विप्रो विस्मयमागतः ॥ ५५
मार्कण्डेय उवाच कदाचिदुपविष्टं तं राजानं विष्णुतत्परम्। अपृच्छद्वीतिहोत्रस्तं वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ५६ राजन् परमधर्मज्ञ हरिभक्तिपरायण। विष्णुभक्तिमतां पुंसां श्रेष्ठोऽसि पुरुषर्षभ ॥ ५७ सम्मार्जनपरो नित्यं उपलेपरतस्तथा। तन्मे वद महाभाग त्वया किं विदितं फलम् ॥ ५८
हिन्दी अनुवाद
उस समय उनके बड़े वेगसे पैर रखनेके कारण अनेकानेक वृक्ष गिर गये। तब वह दैत्य भी उस तन्वङ्गीको छोड़कर अकेला ही वेगसे भागा; तथापि अर्जुनने क्रोधके कारण उस असुरका पीछा न छोड़ा। भागते-भागते वह दानव एक जगह पृथ्वीपर गिर पड़ा और गिरते ही चार भुजाओंसे युक्त हो, शङ्ख तथा चक्र आदि धारण किये पीताम्बरधारी विष्णुके रूपमें दीख पड़ा। तब कुन्तीनन्दन अर्जुन बड़े ही विस्मित हुए और प्रणाम करके बोले ॥ ४१-४७॥
अर्जुनने कहा— भगवन्! आपने यहाँ वैष्णवी माया क्यों फैला रखी थी? मैंने भी जो आपका अपकार किया है, उसके लिये हे नाथ! मेरे अपराधको क्षमा करें; आपको नमस्कार है। हे जगन्नाथ! अज्ञानके कारण ही मैंने यह दारुण कर्म किया है; इसलिये इसे क्षमा कर दें। भला, एक साधारण मनुष्यमें इतनी समझ कहाँ हो सकती है, जिससे आपको अन्य वेषमें भी पहचान ले ॥ ४८-४९॥
चतुर्भुज बोला— महाबाहो! मैं विष्णु नहीं, बहुरोमा नामक दानव हूँ। मैंने अपने पूर्वकर्मके प्रभावसे भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त किया है ॥ ५० ॥
अर्जुन बोले— बहुरोमन्! तुम अपने पूर्वजन्म और कर्मका ठीक-ठीक वर्णन करो। तुमने किस कर्मके परिणामसे विष्णुका सारूप्य प्राप्त किया है? ॥ ५१ ॥
चतुर्भुज बोला— महाभाग अर्जुन! आप अपने भाइयोंके साथ मेरे अत्यन्त विचित्र चरित्रको सुनिये; यह श्रोताओंके आनन्दको बढ़ानेवाला है। मैं पूर्वजन्ममें चन्द्रवंशमें उत्पन्न जयध्वज नामसे विख्यात राजा था। उस समय सदा ही मैं भगवान् नारायणके भजनमें लगा रहता और उनके मन्दिरमें झाडू लगाया करता था। प्रतिदिन उस मन्दिरको लीपता और [रात्रिमें] वहाँ दीप जलाया करता था। उन दिनों वीतिहोत्र नामक एक साधु ब्राह्मण मेरे यहाँ पुरोहित थे। प्रभो! वे मेरे इस कार्यको देखकर बहुत विस्मित हुए ॥ ५२-५५॥
मार्कण्डेयजी बोले— एक दिन वेद-वेदाङ्गोंके पूर्ण विद्वान् पुरोहित वीतिहोत्रजीने बैठे हुए उन विष्णुभक्त राजासे इस प्रकार प्रश्न किया— परम धर्मज्ञ भूपाल! हरिभक्तिपरायण नरश्रेष्ठ! आप विष्णुभक्त पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; क्योंकि आप भगवान्के मन्दिरमें प्रतिदिन झाडू तथा लेप दिया करते हैं। अतः महाभाग! आप मुझे बताइये कि भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और वहाँ लीपने-पोतनेका कौन-सा उत्तम फल आप जानते हैं।
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अध्याय ३३ ] भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल १२१ कर्माण्यान्यानि सन्त्येव विष्णोः प्रियतराणि वै। | यद्यपि भगवान्को अत्यन्त प्रिय लगनेवाले अन्य कर्म भी तथापि त्वं महाभाग एतयोः सततोद्यतः ॥ ५९ | हैं ही, तथापि महाभाग ! आप इन्हीं दो कर्मोंमें सदा सर्वथा | लगे रहते हैं। नरेश! यदि आपको इनसे होनेवाला महान् सर्वात्मना महापुण्यं जनेश विदितं तव। | पुण्यरूप फल ज्ञात हो और वह छिपानेयोग्य न हो तथा यदि तद्ब्रूहि यद्यगुह्यं च प्रीतिर्मयि तवास्ति चेत् ॥ ६० | आपका मुझपर प्रेम हो तो अवश्य ही उस फलको मुझे | बताइये ॥ ५६—६०॥ जयध्वज उवाच | जयध्वज बोले- विप्रवर ! इस विषयमें आप मेरा | ही पूर्वजन्मका चरित्र सुनें। मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका शृणुष्व विप्रशार्दूल ममैव चरितं पुरा ॥ ६१ | स्मरण है, इसीसे मैं सब जानता हूँ। मेरा चरित्र श्रोताओंको | आश्चर्यमें डालनेवाला है। विप्रेन्द्र ! पूर्वजन्ममें मैं रैवत जातिस्मरत्वाज्जानामि श्रोतृणां विस्मयावहम्। | नामका ब्राह्मण था। जिनको यज्ञ करनेका अधिकार नहीं पूर्वजन्मनि विप्रेन्द्र रैवतो नाम वाडवः ॥ ६२ | है, उनसे भी मैं सदा ही यज्ञ कराता था और अनेकों | गाँवोंका पुरोहित था। इतना ही नहीं, मैं दूसरोंकी चुगली अयाज्ययाजकोऽहं वै सदैव ग्रामयाजकः। | खानेवाला, निर्दय और नहीं बेचने योग्य वस्तुओंका पिशुनो निष्ठुरश्चैव अपण्यानां च विक्रयी ॥ ६३ | विक्रय करनेवाला था। निषिद्ध कर्मोंका आचरण करनेके | कारण मेरे बान्धवोंने मुझे त्याग दिया था। मैं महान् पापी निषिद्धकर्माचरणात् परित्यक्तः स्वबन्धुभिः। | और सदा ही ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाला था। परायी स्त्री महापापरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषरतस्तथा ॥ ६४ | और पराये धनका लोभी था, प्राणियोंकी हिंसा किया | करता था। सदा ही मद्य पीता और ब्राह्मणोंसे द्वेष रखता परदारपरद्रव्यलोलुपो जन्तुहिंसकः। | था। इस प्रकार मैं प्रतिदिन पापमें लगा रहता और बहुधा मद्यपानरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषरतस्तथा ॥ ६५ | लूटपाट भी करता था ॥ ६१-६५ १/२ ॥ | एक दिन रातमें स्वेच्छाचारिताके कारण मैं कुछ एवं पापरतो नित्यं बहुशो मार्गरोधकृत्। | ब्राह्मण-पत्नियोंको पकड़कर एक सूने ठाकुर-मन्दिरमें कदाचित् कामचारोऽहं गृहीत्वा ब्राह्मणस्त्रियः ॥ ६६ | ले गया। उस मन्दिरमें कभी पूजा नहीं होती थी। [यों | ही खण्डहर-सा पड़ा रहता था।] वहाँ स्त्रियोंके साथ शून्यं पूजादिभिर्विष्णोर्मन्दिरं प्रामवान्निशि। | रमण करनेकी इच्छासे मैंने अपने वस्त्रके किनारेसे उस स्ववस्त्रप्रान्ततो ब्रह्मन् कियदंशः स मार्जितः ॥ ६७ | मन्दिरका कुछ भाग बुहारकर साफ किया और हे | द्विजोत्तम! [प्रकाशके लिये] दीप जलाकर रख दिया। प्रदीपः स्थापितस्तत्र सुरतार्थाय द्विजोत्तम। | [यद्यपि मैंने अपनी पाप-वासना पूर्ण करनेके लिये ही तेनापि मम दुष्कर्म निःशेषं क्षयमागतम् ॥ ६८ | मन्दिरमें झाडू लगायी और दीप जलाया था, तथापि] | उससे भी मेरा सारा पापकर्म नष्ट हो गया। ब्राह्मण ! इस एवं स्थितं विष्णुगृहे मया भोगेच्छया द्विज। | प्रकार जब मैं उस विष्णुमन्दिरमें भोगकी इच्छासे ठहरा तदैव दीपकं दृष्ट्वा आगताः पुरपालकाः ॥ ६९ | हुआ था, उसी समय वहाँ दीपक देखकर नगरके रक्षक | आ पहुँचे और यह कहकर कि 'यह किसी शत्रु का दूत चौर्यार्थं परदूतोऽयमित्युक्त्वा मामपातयन्। | है, यहाँ चोरी करने आया है,' उन्होंने मुझे पृथ्वीपर गिरा खड्गेन तीक्ष्णधारेण शिरश्छित्त्वा च ते गताः ॥ ७० | दिया तथा तीखी धारवाली तलवारसे मेरा मस्तक काटकर | वे चले गये। तब मैं भगवान्के पार्षदोंसे युक्त दिव्य दिव्यं विमानमारुह्य प्रभुदाससमन्वितम्। | विमानपर आरूढ़ हो, गन्धर्वोंद्वारा अपना यशोगान सुनता गन्धर्वैर्गीयमानोऽहं स्वर्गलोकं तदा गतः ॥ ७१ | हुआ स्वर्गलोकको चला गया ॥ ६६-७१ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३ चतुर्भुज उवाच चतुर्भुज बोला—इस प्रकार मैंने दिव्यरूप धारणकर, तत्र स्थित्वा ब्रह्मकल्पं शतं साग्रं द्विजोत्तमाः। दिव्य भोगोंसे सम्पन्न होकर स्वर्गलोकमें सौ कल्पोंसे भी दिव्यभोगसमायुक्तो दिव्यरूपसमन्वितः॥ ७२ अधिक कालतक निवास किया। फिर उसी पुण्यके जातोऽहं पुण्ययोगाद्धि सोमवंशसमुद्भवः। भोगसे चन्द्रवंशमें उत्पन्न जयध्वज नामसे विख्यात जयध्वज इति ख्यातो राजा राजीवलोचनः॥ ७३ कमलके समान नेत्रोंवाला राजा हुआ। उस जन्ममें भी तत्रापि कालवशतो मृतः स्वर्गमवाप्तवान्। कालवश मृत्युको प्राप्त होनेपर मैं स्वर्गलोकमें आया। इन्द्रलोकमनुप्राप्य रुद्रलोकं ततो गतः॥ ७४ फिर यहाँसे रुद्रलोकको प्राप्त हुआ। एक बार रुद्रलोकसे रुद्रलोकाद्ब्रह्मलोकं गच्छता नारदो मुनिः। ब्रह्मलोकको जाते समय मैंने नारदमुनिको देखा, परंतु दृष्टश्च नमितो नैव गर्वान्मे हसितश्च सः॥ ७५ देखनेपर भी उन्हें प्रणाम नहीं किया और उनकी हँसी कुपितः शप्तवान् मां स राक्षसो भव भूपते। उड़ाने लगा। इससे कुपित होकर उन्होंने शाप दिया— इति शापं समाकर्ण्य दत्तं तेन द्विजन्मना॥ ७६ 'राजन्! तू राक्षस हो जा।' उन ब्राह्मणके दिये हुए इस प्रसादितो मया भूप प्रसादं कृतवान् मुनिः। शापको सुनकर मैंने क्षमा माँगकर (किसी तरह) उन्हें यदा रेवामठे राजन् धर्मपुत्रस्य धीमतः॥ ७७ प्रसन्न किया। तब मुनिने मुझपर शापानुग्रहके रूपमें कृपा भार्यापहारं नयतः शापमोक्षो भविष्यति। की। [उन्होंने कहा—] राजन्! जिस समय बुद्धिमान् सोऽहमर्जुन भूपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिर॥ ७८ धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी भार्याका हरण करके तुम रेवा- विष्णोः सारूप्यमगमं यामि वैकुण्ठमद्य वै। तटवर्ती मठमें चले जाओगे, उस समय तुम्हें शापसे मुक्ति मिल जायगी।' भूपाल! धर्मपुत्र युधिष्ठिर! अर्जुन! मैं वही राजा जयध्वज हूँ। इस समय भगवान् विष्णुके मार्कण्डेय उवाच सारूप्यको प्राप्त हुआ हूँ। अब मैं निश्चय ही वैकुण्ठधामको जाऊँगा॥ ७२-७८१/२ ॥ इत्युक्त्वा गरुडारूढो धर्मपुत्रस्य पश्यतः॥ ७९ मार्कण्डेयजी बोले—यह कहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरके गतवान् विष्णुभवनं यत्र विष्णुः श्रिया सह। देखते-ही-देखते वे राजा जयध्वज गरुडपर आरूढ हो सम्मार्जनोपलेपाभ्यां महिमा तेन वर्णितः॥ ८० विष्णुधामको चले गये, जहाँ लक्ष्मीजीके साथ भगवान् अवशेनापि यत्कर्म कृत्वेमां श्रियमागतः। विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। इसीसे विष्णुमन्दिरके भक्तिमद्भिः प्रशान्तैश्च किं पुनः सम्यगर्चनातू॥ ८१ बुहारने और लीपनेसे बड़ी महत्ता प्राप्त होनेका वर्णन किया गया है। [राजा जयध्वजने पूर्वजन्ममें] कामके सूत उवाच वशीभूत होकर भी जिस कर्मको करनेसे ऐसी दिव्य सम्पत्ति मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा पाण्डुवंशसमुद्भवः। प्राप्त कर ली, उसीको यदि भक्तिमान् और शान्त पुरुष सहस्रानीकभूपालो हरिपूजारतोऽभवत्॥ ८२ करे तथा भलीभाँति भगवान्का पूजन करे तो उनको प्राप्त तस्माच्छृणुत विप्रेन्द्रा देवो नारायणोऽव्ययः। होनेवाले फलके विषयमें क्या कहना है?॥ ७९-८१॥ ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि पूजकानां विमुक्तिदः॥ ८३ सूतजी बोले—मार्कण्डेयजीके उपर्युक्त वचन सुनकर अर्चयध्वं जगन्नाथं भूयो भूयो वदाम्यहम्। पाण्डुवंशमें उत्पन्न राजा सहस्रानीक भगवान्के पूजनमें तर्तुं यदीच्छथ द्विजा दुस्तरं भवसागरम्॥ ८४ संलग्न हो गये। इसलिये विप्रवृन्द! आपलोग यह सुन येऽर्चयन्ति हरिं भक्ताः प्रणतार्तिहरं हरिम्। लें कि अविनाशी भगवान् नारायण जानकर अथवा अनजानमें ते वन्द्यास्ते प्रपूज्याश्च नमस्याश्च विशेषतः॥ ८५ भी पूजा करनेवाले अपने भक्तोंको मुक्ति प्रदान करते हैं। द्विजो! मैं यह बारंबार कहता हूँ कि यदि आपलोग दुस्तर भवसागरके पार जाना चाहते हैं तो भगवान् जगन्नाथकी पूजा करें। जो भक्त प्रणतजनोंका कष्ट दूर करनेवाले भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं, वे वन्दनीय, पूजनीय और विशेषरूपसे नमस्कार करनेयोग्य हैं॥ ८२-८५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते मार्कण्डेयेनोपदिष्टसम्मार्जनोपफल नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके प्रसङ्गमें मार्कण्डेयमुनिद्वारा उपदिष्ट 'मन्दिरमें झाडू देने और उसके लीपनेकी महिमाका वर्णन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३॥
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चौंतीसवाँ अध्याय
अध्याय ३४ ] भगवान् विष्णुके पूजनका फल १२३ चौंतीसवाँ अध्याय भगवान् विष्णुके पूजनका फल श्रीसहस्रानीक उवाच श्रीसहस्रानीकने पूछा—महामते द्विजवर पुनरेव द्विजश्रेष्ठ मार्कण्डेय महामते। मार्कण्डेयजी! अब पुनः यह बताइये कि भगवान् निर्माल्यापनयाद्विष्णोर्यत्पुण्यं तद्वदस्व मे॥ १ विष्णुके निर्माल्य (चन्दन-पुष्प आदि)-को हटानेसे कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है॥ १ ॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! नृसिंहस्वरूप भगवान् निर्माल्यमपनीयाथ तोयेन स्नाप्य केशवम्। केशवको निर्माल्य हटाकर जलसे स्नान करानेसे मनुष्य नरसिंहाकृतिं राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २ सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण तीर्थोंके सर्वतीर्थफलं प्राप्य यानारूढो दिवं व्रजेत्। सेवनका फल प्राप्तकर, विमानपर आरूढ हो स्वर्गको श्रीविष्णोः सदनं प्राप्य मोदते कालमक्षयम्॥ ३ चला जाता है और वहाँसे श्रीविष्णुधामको प्राप्त होकर आगच्छ नरसिंहेति आवाह्याक्षतपुष्पकैः। अक्षयकालपर्यन्त आनन्दका उपभोग करता है। ‘भगवान् एतावतापि राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ४ नरसिंह! आप यहाँ पधारें’—इस प्रकार अक्षत और दत्त्वाऽऽसनमथार्घ्यं च पाद्यमाचमनीयकम्। पुष्पोंके द्वारा यदि भगवान्का आवाहन करे तो राजेन्द्र! देवदेवस्य विधिना सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ५ इतनेसे भी वह मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। स्नाप्य तोयेन पयसा नरसिंहं नराधिप। देवदेव नृसिंहको विधिपूर्वक आसन, पाद्य (पैर धोनेके सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ६ लिये जल), अर्घ्य (हाथ धोनेके लिये जल) और स्नाप्य दध्ना सकृद्यस्तु निर्मलः प्रियदर्शनः। आचमनीय (कुल्ला करनेके लिये जल) अर्पण करनेसे विष्णुलोकमवाप्नोति पूज्यमानः सुरोत्तमैः॥ ७ भी सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। नराधिप! यः करोति हरेरर्चां मधुना स्नापयन्नरः। भगवान् नृसिंहको दूध और जलसे स्नान कराकर मनुष्य अग्निलोके स मोदित्वा पुनर्विष्णुपुरे वसेत्॥ ८ सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो घृतेन स्त्रपनं यस्तु स्नानकाले विशेषतः। एक बार भी भगवान्को दहीसे स्नान कराता है, वह नरसिंहाकृतेः कुर्याच्छङ्खभेरीनिनादितम्॥ ९ निर्मल एवं सुन्दर शरीर धारणकर सुरवरोंसे पूजित होता पापकञ्चुकमुन्मुच्य यथा जीर्णामहिस्त्वचम्। हुआ विष्णुलोकको जाता है। जो मनुष्य मधुसे भगवान्को दिव्यं विमानमास्थाय विष्णुलोके महीयते॥ १० नहलाता हुआ उनकी पूजा करता है,वह अग्निलोकमें पञ्चगव्येन देवेशं यः स्नापयति भक्तितः। आनन्दोपभोग करके पुनः विष्णुपुर (वैकुण्ठधाम)-में मन्त्रपूर्वं महाराज तस्य पुण्यमनन्तकम्॥ ११ निवास करता है। जो स्नानकालमें श्रीनरसिंहके विग्रहको यश्च गोधूमकैश्चूर्णैरूद्वर्त्योष्णेन वारिणा। शङ्ख और नगारेका शब्द कराते हुए विशेषरूपसे घीसे प्रक्षाल्य देवदेवेशं वारुणं लोकमाप्नुयात्॥ १२ स्नान कराता है, वह पुरुष पुरानी केंचुलको छोड़नेवाले साँपकी भाँति पाप-कञ्चुकको त्यागकर दिव्य विमानपर आरूढ हो, विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ २-१०॥ महाराज! जो देवेश्वर भगवान्को भक्तिपूर्वक मन्त्रपाठ करते हुए पञ्चगव्यसे स्नान कराता है, उसका पुण्य अक्षय होता है। जो गेहूँके आटेसे देवदेवेश्वर भगवान्को उबटन लगाकर गरम जलसे उन्हें In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
१२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४
१२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४ पादपीठं तु यो भक्त्या बिल्वपत्रैर्निघर्षितम्। नहलाता है, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है। जो भगवान्के उष्णाम्बुना च प्रक्षाल्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १३ पादपीठ (पैर रखनेके पीढ़े, चौकी या चरणपादुका)- कुशपुष्पोदकैः स्नात्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्। को भक्तिपूर्वक बिल्वपत्रसे रगड़कर गरम जलसे धोता रत्नोदकेन सावित्रं कौबेरं हेमवारिणा। है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुश और पुष्पमिश्रित नरसिंहं तु संस्त्राप्य कर्पूरागुरुवारिणा ॥ १४ जलसे भगवान्को स्नान कराकर मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, रत्नयुक्त जलसे स्नान करानेपर सूर्यलोकको और इन्द्रलोके स मोदित्वा पश्चाद्विष्णुपुरे वसेत्। सुवर्णयुक्त जलसे नहलानेपर कुबेरलोकको प्राप्त करता पुण्योदकेन गोविन्दं स्नाप्य भक्त्या नरोत्तम ॥ १५ है। जो कपूर और अगुरुमिश्रित जलसे भगवान् नृसिंहको नहलाता है, वह पहले इन्द्रलोकमें सुखोपभोग करके सावित्रं लोकमासाद्य विष्णुलोके महीयते। फिर विष्णुधाममें निवास करता है। जो पुरुषश्रेष्ठ तीर्थोंके वस्त्राभ्यामर्चनं भक्त्या परिधाप्य हरिं हरेः ॥ १६ पवित्र जलसे गोविन्दको भक्तिपूर्वक स्नान कराता है, वह आदित्यलोकको प्राप्त करके पुनः विष्णुलोकमें पूजित सोमलोके रमित्वा च विष्णुलोके महीयते। होता है। जो भक्तिपूर्वक भगवान्को युगल वस्त्र पहनाकर कुङ्कुमागुरुश्रीखण्डकर्दमैरच्युताकृतिम् ॥ १७ उनकी पूजा करता है, वह चन्द्रलोकमें सुखभोग करके आलिप्य भक्त्या राजेन्द्र कल्पकोटिं वसेद्दिवि। पुनः विष्णुधाममें सम्मानित होता है॥ ११-१६१/२॥ मल्लिकामालतीजातिकेतक्यशोकचम्पकैः ॥ १८ राजेन्द्र! जो कुङ्कुम (केसर), अगुरु और चन्दनके पुंनागनागबकुलैः पद्मैरुत्पलजातिभिः। अनुलेपनसे भगवान्के विग्रहको भक्तिपूर्वक अनुलिप्त तुलसीकरवीरैश्च पालाशैः सानुकुम्बकैः ॥ १९ करता है, वह करोड़ों कल्पोंतक स्वर्गलोकमें निवास एतैरन्यैश्च कुसुमैः प्रशस्तैरच्युतं नरः। करता है। जो मनुष्य मल्लिका, मालती, जाती, केतकी, अशोक, चम्पा, पुंनाग, नागकेसर, बकुल (मौलसिरी), अर्चयेद्दशसुवर्णस्य प्रत्येकं फलमाप्नुयात् ॥ २० उत्पल जातिके कमल, तुलसी, कनेर, पलाश-इनसे मालां कृत्वा यथालाभमेतेषां विष्णुमर्चयेत्। तथा अन्य उत्तम पुष्पोंसे भगवान्की पूजा करता है, वह कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च ॥ २१ प्रत्येक पुष्पके बदले दस सुवर्ण मुद्रा दान करनेका फल प्राप्त करता है। जो यथाप्राप्त उपर्युक्त पुष्पोंकी माला दिव्यं विमानमास्थाय विष्णुलोके स मोदते। बनाकर उससे भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह नरसिंहं तु यो भक्त्या बिल्वपत्रैरखण्डितैः ॥ २२ सैकड़ों और हजारों करोड़ कल्पोंतक दिव्य विमानपर आरूढ हो विष्णुलोकमें आनन्दित होता है। जो छिद्ररहित निश्छिद्रैः पूजयेद्यस्तु तुलसीभिः समन्वितम्। अखण्डित बिल्वपत्रों और तुलसीदलोंसे भक्तिपूर्वक सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वभूषणभूषितः ॥ २३ श्रीनृसिंहका पूजन करता है, वह सब पापोंसे सर्वथा मुक्त काञ्चनेन विमानेन विष्णुलोके महीयते। हो, सब प्रकारके भूषणोंसे भूषित होकर सोनेके विमानपर माहिषाख्यं गुग्गुलं च आज्ययुक्तं सशर्करम् ॥ २४ आरूढ हो विष्णुलोकमें सम्मान पाता है॥ १७-२३१/२॥ धूपं ददाति राजेन्द्र नरसिंहस्य भक्तिमान्। राजेन्द्र! जो माहिष गुग्गुल, घी और शक्करसे तैयार की धूपितैः सर्वदिग्भ्यस्तु सर्वपापविवर्जितः ॥ २५ हुई धूपको भगवान् नरसिंहके लिये भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, वह सब दिशाओंमें धूप करनेसे सब पापोंसे रहित अप्सरोगणसंकीर्णविमानेन विराजते। हो अप्सराओंसे पूर्ण विमानद्वारा वायुलोकमें विराजमान होता वायुलोके स मोदित्वा पश्चाद्विष्णुपुरं व्रजेत् ॥ २६ है और वहाँ आनन्दोपभोगके पश्चात् पुनः विष्णुधाममें जाता In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३४ ] भगवान् विष्णुके पूजनका फल १२५
अध्याय ३४ ] भगवान् विष्णुके पूजनका फल १२५ घृतेन वाथ तैलेन दीपं प्रज्वालयेन्नरः । | है। जो मनुष्य विधिपूर्वक भक्तिके साथ घी अथवा तेलसे विष्णवे विधिवद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २७ | भगवान् विष्णुके लिये दीप प्रज्वलित करता है, उस विहाय पापकलिलं सहस्रादित्यसप्रभः । | पुण्यका फल सुनिये। वह पाप-पङ्कसे मुक्त होकर हजारों ज्योतिष्मता विमानेन विष्णुलोकं स गच्छति ॥ २८ | सूर्यके समान कान्ति धारणकर ज्योतिर्मय विमानसे हविः शाल्योदनं विद्वानाज्ययुक्तं सशर्करम् । | विष्णुलोकको जाता है। जो विद्वान् हविष्य, घी-शक्करसे निवेद्य नरसिंहाय यावकं पायसं तथा ॥ २९ | युक्त अगहनीका चावल, जौकी लपसी और खीर भगवान् समास्तन्दुलसंख्याया यावतीस्तावतीर्नृप । | नरसिंहको निवेदन करता है, वह वैष्णव चावलोंकी विष्णुलोके महाभोगान् भुञ्जन्त्रास्ते स वैष्णवः ॥ ३० | संख्याके बराबर वर्षोतक विष्णुलोकमें महान् भोगोंका बलिना वैष्णवेनाथ तृप्ताः सन्तो दिवौकसः । | उपभोग करता है। भगवान् विष्णुसम्बन्धी बलिसे सम्पूर्ण शान्तिं तस्य प्रयच्छन्ति श्रियमरोग्यमेव च ॥ ३१ | देवता तृप्त होकर पूजा करनेवालेको शान्ति, लक्ष्मी तथा प्रदक्षिणेन चैकेन देवदेवस्य भक्तितः । | आरोग्य प्रदान करते हैं ॥ २४-३१ ॥ कृतेन यत्फलं नृणां तच्छृणुष्व नृपात्मज ॥ ३२ | राजकुमार! भक्तिपूर्वक देवदेव विष्णुकी एक बार पृथ्वीप्रदक्षिणफलं प्राप्य विष्णुपुरे वसेत् । | प्रदक्षिणा करनेसे मनुष्योंको जो फल मिलता है, उसे नमस्कारः कृतो येन भक्त्या वै माधवस्य च ॥ ३३ | सुनिये। वह सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करनेका फल प्राप्त धर्मार्थकाममोक्षाख्यं फलं तेनासमञ्जसा । | करके वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जिसने कभी स्तोत्रैर्जपैश्च देवाग्रे यः स्तौति मधुसूदनम् ॥ ३४ | भक्तिभावसे भगवान् लक्ष्मीपतिको नमस्कार किया है, सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते । | उसने अनायास ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप फल गीतवाद्यादिकं नाट्यं शङ्खतूर्यादिनिःस्वनैः ॥ ३५ | प्राप्त कर लिया। जो स्तोत्र और जपके द्वारा मधुसूदनकी यः कारयति वै विष्णोः स याति मन्दिरं नरः । | उनके समक्ष होकर स्तुति करता है, वह समस्त पापोंसे पर्वकाले विशेषेण कामगः कामरूपवान् ॥ ३६ | मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। जो भगवान्के सुसंगीतविदैश्चैव सेव्यमानोऽप्सरोगणैः । | मन्दिरमें शङ्ख, तुरही आदि बाजोंके शब्दसे युक्त गाना- महार्हमणिचित्रेण विमानेन विराजता ॥ ३७ | बजाना और नाटक कराता है, वह मनुष्य विष्णुधामको स्वर्गात् स्वर्गमनुप्राप्य विष्णुलोके महीयते । | प्राप्त होता है। विशेषतः पर्वके समय उक्त उत्सव करनेसे ध्वजं तु विष्णवे यस्तु गरुडेन समन्वितम् ॥ ३८ | मनुष्य कामरूप होकर सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त होता है दद्यात्सोऽपि ध्वजाकीर्णाविमानेन विराजता । | और सुन्दर संगीत जाननेवाली अप्सराओंसे शोभायमान विष्णुलोकमवाप्नोति सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ॥ ३९ | बहुमूल्य मणियोंसे जड़े हुए देदीप्यमान विमानके द्वारा सुवर्णाभरणैर्दिव्यैर्हारकेयूरकुण्डलैः । | एक स्वर्गसे दूसरे स्वर्गको प्राप्त होकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित मुकुटाभरणाद्यैश्च यो विष्णुं पूजयेन्नृप ॥ ४० | होता है। जो भगवान् विष्णुके लिये गरुडचिह्नसे युक्त सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वभूषणभूषितः । | ध्वजा अर्पण करता है, वह भी ध्वजामण्डित जगमगाते इन्द्रलोके वसेद्धीमान् यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ ४१ | हुए विमानपर आरूढ़ हो, अप्सराओंसे सेवित होकर | विष्णुलोकको प्राप्त होता है ॥ ३२-३९ ॥ | नरेश्वर! जो सुवर्णके बने हुए दिव्य हार, केयूर, कुण्डल | और मुकुट आदि आभूषणोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करता | है, वह बुद्धिमान् सब पापोंसे मुक्त और सब आभूषणोंसे | भूषित होकर जबतक चौदह इन्द्र राज्य करते हैं, तबतक | (अर्थात् पूरे एक कल्पतक) इन्द्रलोकमें निवास करता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४
१२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४ यो गां पयस्विनीं विष्णोः कपिलां सम्प्रयच्छति । जो विष्णुकी आराधना करके उनके लिये दुधार कपिला आराध्य तमथाग्रे तु यत्किंचिद्दुग्धमुत्तमम् ॥ ४२ गौ दान करता है और उन भगवान् नृसिंहके समक्ष तद्दत्त्वा नरसिंहाय विष्णुलोके महीयते । उसका उत्तम दूध थोड़ा-सा भी अर्पण करता है, वह पितरस्तस्य मोदन्ते श्वेतद्वीपे चिरं नृप ॥ ४३ विष्णुलोकमें सम्मानित होता है तथा राजन्! उसके एवं यः पूजयेद्राजन् नरसिंहं नरोत्तमः । पितर चिरकालतक श्वेतद्वीपमें आनन्द भोगते हैं। भूपाल! तस्य स्वर्गापवर्गौ तु भवतो नात्र संशयः ॥ ४४ इस प्रकार जो नरश्रेष्ठ नरसिंहस्वरूप भगवान् विष्णुका यत्रैवं पूज्यते विष्णुर्नरसिंहो नरैर्नृप । पूजन करता है, उसे स्वर्ग और मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते न तत्र व्याधिदुर्भिक्षराजचौरादिकं भयम् ॥ ४५ हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४०-४४ ॥ नरसिंहं समाराध्य विधिनानेन माधवम् । नृप! जहाँ मनुष्योंद्वारा इस प्रकार भगवान् नरसिंहका पूजन नानास्वर्गसुखं भुक्त्वा न भूयः स्तनपो भवेत् ॥ ४६ होता है, वहाँ रोग, अकाल और राजा तथा चोर आदिका भय नित्यं सर्पिस्तिलैर्होमो ग्रामे यस्मिन् प्रवर्तते । नहीं होता। इस विधिसे लक्ष्मीपति नरसिंहकी आराधना करके न भवेत्तस्य ग्रामस्य भयं वा तत्र कुत्रचित् ॥ ४७ मनुष्य नाना प्रकारके स्वर्ग-सुख भोगता है और पुनः उसे अनावृष्टिर्महामारी दोषा नो दाहका नृप । [संसारमें जन्म लेकर] माताका दूध नहीं पीना पड़ता [वह नरसिंहं समाराध्य ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ ४८ मुक्त हो जाता है]। जिस गाँवमें [भगवान्के मन्दिरके निकट] कारयेल्लक्षहोमं तु ग्रामे यत्र पुराधिपः । प्रतिदिन घी और तिलसे होम होता है, उस गाँवमें अनावृष्टि, कृते तस्मिन्मयोक्ते तु आगच्छति न तद्भयम् ॥ ४९ महामारी आदि दोष तथा अग्निदाह आदि किसी प्रकारका भय दृष्टोपसर्गमरणं प्रजानामात्मनश्च हि । नहीं होता। जिस गाँवमें गाँवका मालिक वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा सम्यगाराधनीयं तु नरसिंहस्य मन्दिरे ॥ ५० नरसिंहकी आराधना कराकर एक लक्ष होम कराता है, वहाँ शङ्करायतने चापि कोटिहोमं नराधिप । मेरे कथनानुसार यह कार्य सम्पन्न होनेपर महामारी कारयेत् संयतैर्विप्रैः सभोजनसदक्षिणैः ॥ ५१ आदि प्रत्यक्ष उपद्रवसे कर्ताका तथा उस गाँवमें रहनेवाली कृते तस्मिन्नृपश्रेष्ठ नरसिंहप्रसादतः । प्रजाका अकालमरण नहीं होता। इसलिये भगवान् नरसिंहके उपसर्गादिमरणं प्रजानामुपशाम्यति ॥ ५२ मन्दिरमें भली प्रकारसे आराधना करनी चाहिये ॥ ४५-५० ॥ दुःस्वप्नदर्शने घोरे ग्रहपीडासु चात्मनः । नरेश! इसी प्रकार शङ्करजीके मन्दिरमें भी संयमशील होमं च भोजनं चैव तस्य दोषः प्रणश्यति ॥ ५३ ब्राह्मणोंके द्वारा उन्हें भोजन और दक्षिणा देकर एक अयने विषुवे चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा । करोड़की संख्यामें हवन कराना चाहिये। नृपश्रेष्ठ ! उसके नरसिंहं समाराध्य लक्षहोमं तु कारयेत् ॥ ५४ करनेपर भगवान् नरसिंहके प्रसादसे प्रजावर्गका आकस्मिक शान्तिर्भवति राजेन्द्र तस्य तत्स्थानवासिनाम् । उपद्रव तथा मृत्युभय शान्त हो जाता है। घोर दुःस्वप्न एवमादिफलोपेतं नरसिंहार्चनं नृप ॥ ५५ देखनेपर और अपने ऊपर ग्रहजन्य कष्ट आनेपर होम कुरु त्वं भूपतेः पुत्र यदि वाञ्छसि सद्गतिम् । और ब्राह्मणभोजन करानेसे उसका दोष मिट जाता है। अतः परतरं नास्ति स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ॥ ५६ दक्षिणायन या उत्तरायण आरम्भ होनेपर, विषुवकालमें*, अथवा चन्द्रमा तथा सूर्यका ग्रहण होनेपर भगवान् नरसिंहकी आराधना करके लक्षहोम कराना चाहिये। राजेन्द्र ! यों करनेसे उस स्थानके निवासियोंके विघ्नकी शान्ति हो जाती है। नरेश्वर ! भगवान् नरसिंहकी पूजाके ऐसे अनेकों फल हैं। भूपालनन्दन ! यदि तुम सद्गति चाहते हो तो नृसिंहका पूजन करो। इससे बढ़कर कोई भी कार्य ऐसा नहीं है, जो स्वर्ग और मोक्षरूप फल देनेवाला हो ।
- जिस दिन दिन-रात बराबर हों, वह विषुवकाल कहा गया है। ऐसा समय सालमें दो बार आता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३५ ] लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि तथा फल १२७
नरेन्द्रैः सुकरं कर्तुं देवदेवस्य पूजनम्। | देवदेव नृसिंहका पूजन राजाओंके लिये तो बहुत ही सन्त्यरण्ये ह्यमूल्यानि पत्रपुष्पाणि शाखिनाम्॥ ५७ | सुकर है। परंतु जो अरण्यमें रहते हैं, उन्हें भी | भगवान्की पूजाके लिये वृक्षोंके पत्र-पुष्प बिना मूल्य तोयं नदीतडागेषु देवः साधारणः स्थितः। | प्राप्त हो सकते हैं। जल नदी और तडाग आदिमें सुलभ मनो नियमयेदेकं विद्यासाधनकर्मणि॥ ५८ | है ही और भगवान् नृसिंह भी सबके लिये समान हैं; | केवल उन उपासनाके साधनभूत कर्ममें मनकी एकाग्रता मनो नियमितं येन मुक्तिस्तस्य करे स्थिता॥ ५९ | चाहिये। जिसने मनका नियमन कर लिया है, मुक्ति | उसके हाथमें ही है॥ ५१—५९॥ मार्कण्डेय उवाच | इत्येवमुक्तं भृगुचोदितेन | मार्कण्डेयजी बोले—इस प्रकार भृगुजीकी आज्ञासे मया तवेहार्चनमच्युतस्य। | मैंने तुमसे यहाँ भगवान् विष्णुके पूजनका वर्णन किया दिने दिने त्वं कुरु विष्णुपूजां | है। तुम प्रतिदिन भगवान् विष्णुका पूजन करो और वदस्व चान्यत्कथयामि किं ते॥ ६० | बोलो, अब मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?॥ ६०॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते श्रीविष्णोः पूजाविधिर्नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके प्रसङ्गमें 'श्रीविष्णुके पूजनकी विधि' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि तथा फल
राजोवाच | राजा बोले—अहो! आपने श्रीविष्णुकी आराधनासे अहो महत्त्वया प्रोक्तं विष्ण्वाराधनजं फलम्। | होनेवाले बहुत बड़े फलका वर्णन किया। मुनिश्रेष्ठ! जो सुप्तास्ते मुनिशार्दूल ये विष्णुं नार्चयन्ति वै॥ १ | भगवान् विष्णुकी पूजा नहीं करते, वे अवश्य ही | [मोहनिद्रामें] सोये हुए हैं। मैंने आपकी कृपासे भगवान् त्वत्प्रसादाच्च्युतं ह्येतन्नरसिंहार्चनक्रमम्। | नृसिंहके पूजनका यह क्रम सुना; अब मैं भक्तिपूर्वक भक्त्या तं पूजयिष्यामि कोटिहोमफलं वद॥ २ | उनकी पूजा करूँगा। आप कृपा करके (लक्षहोम तथा) | कोटिहोमका फल बताइये॥ १-२॥ मार्कण्डेय उवाच | इममर्थं पुरा पृष्टः शौनको गुरुणा नृप। | मार्कण्डेयजी बोले—नृप! पूर्वकालमें इसी विषयको यत्तस्मै कथयामास शौनकस्तद्वदामि ते॥ ३ | बृहस्पतिजीने शौनक ऋषिसे पूछा था, इसके उत्तरमें | उनसे शौनकजीने जो कुछ बताया, वही मैं तुमसे कह शौनकं तु सुखासीनं पर्यपृच्छद् बृहस्पतिः। | रहा हूँ। सुखपूर्वक बैठे हुए शौनकजीसे बृहस्पतिजीने | इस प्रकार प्रश्न किया॥ ३½॥ बृहस्पतिरुवाच | लक्षहोमस्य या भूमिः कोटिहोमस्य या शुभा॥ ४ | बृहस्पतिजी बोले—विप्रेन्द्र! लक्षहोम और कोटिहोम- तां मे कथय विप्रेन्द्र होमस्य चरिते विधिम्। | के लिये जो भूमि प्रशस्त हो, उसको मुझे बताइये और | होमकर्मकी विधिका भी वर्णन कीजिये॥ ४½॥ मार्कण्डेय उवाच | इत्युक्तो गुरुणा सोऽथ लक्षहोमादिकं विधिम्॥ ५ | मार्कण्डेयजी बोले—नृपवर! बृहस्पतिजीके इस शौनको वक्तुमारेभे यथावन्नृपसत्तम। | प्रकार कहनेपर शौनकजीने लक्षहोम आदिकी विधिका | यथावत् वर्णन आरम्भ किया॥ ५½॥
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१२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३५
१२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३५ शौनक उवाच प्रवक्ष्यामि यथावत्ते शृणु देवपुरोहित ॥ ६ लक्षहोममहाभूमिं तद्विशुद्धिं विशेषतः। यज्ञकर्मणि शस्ताया भूमेर्लक्षणमुत्तमम् ॥ ७ सुसंस्कृतां समां स्निग्धां पूर्वपूर्वमथोत्तमाम्। ऊरुमात्रं खनित्वा च शोधयेत्तां विशेषतः ॥ ८ बहिरच्छतया तत्र मृदाच्छाद्य प्रलेपयेत्। प्रमाणं बाहुमात्रं तु सर्वतः कुण्डलक्षणम् ॥ ९ चतुरस्रं चतुष्कोणं तुल्यसूत्रेण कारयेत्। उपरि मेखलां कुर्याच्चतुरस्त्रां सुविस्तराम् ॥ १० चतुरङ्गुलमात्रं तु उच्छ्रितां सूत्रसूत्रिताम्। ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् ब्रह्मकर्मसमन्वितान् ॥ ११ आमन्त्रयेद् यथान्यायं यजमानो विशेषतः। ब्रह्मचर्यव्रतं कुर्युस्त्रिरात्रं ते द्विजातयः ॥ १२ अहोरात्रमुपोष्यथ गायत्रीमयुतं जपेत्। ते शुक्लवाससः स्नाता गन्धस्रक्पुष्पधारिणः ॥ १३ शुचयश्च निराहाराः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः। कौशमासनमासीना एकाग्रमनसः पुनः ॥ १४ आरभेयुश्च ते यत्नात्ततो होममतन्द्रिताः। भूमिमालिख्य चाभ्युक्ष्य यत्नादग्निं निधापयेत् ॥ १५ गृह्योक्तेन विधानेन होमं तत्र च होमयेत्। आघारावाज्यभागौ च जुहुयात्पूर्वमेव तु ॥ १६ यवधान्यतिलैर्मिश्रां गायत्र्या प्रथमाहुतिम्। जुहुयादेकचित्तेन स्वाहाकारान्वितां बुधः ॥ १७ गायत्री छन्दसां माता ब्रह्मयोनिः प्रतिष्ठिता। सविता देवता तस्या विश्वामित्रस्तथा ऋषिः ॥ १८
शौनकजी बोले—देवपुरोहित! मैं लक्षहोमके उपयुक्त विस्तृत भूमि और उसकी शुद्धिका विशेषरूपसे यथावत् वर्णन करूँगा, आप सुनें। यज्ञकर्मके लिये प्रशस्त भूमिका उत्तम लक्षण (संस्कार) इस प्रकार है ॥ ६-७ ॥ जो भूमि अच्छी तरह संस्कार की हुई हो, बराबर हो और चिकनी हो [ये सभी बातें हों तो परम उत्तम भूमि है; सभी बातें न संघटित हों तो] पूर्व-पूर्वकी भूमि उत्तम है। [अर्थात् चिकनीकी अपेक्षा बराबर भूमि अच्छी है और उससे भी सुसंस्कृत भूमि उत्तम है।] ऐसी उत्तम भूमिको ऊरु (कमर)-पर्यन्त खोदकर उसका विशेषरूपसे [गङ्गाजल एवं पञ्चगव्यादि छिड़ककर] शोधन करे और कुण्डके बाहर स्वच्छताके लिये मिट्टी [तथा गोबर] डालकर लिपाये। कुण्ड सब ओरसे एक हाथ लम्बा और उतना ही चौड़ा होना चाहिये—यही कुण्डका लक्षण है। एक हाथका सूत लेकर उसीसे माप करके चारों ओरसे बराबर और चौकोरा कुण्ड बनाना चाहिये। कुण्डके ऊपर सब ओरसे बराबर और खूब विस्तृत मेखला बनवाये। उसकी ऊँचाई भी चार अंगुलकी ही हो और वह सूतसे परिवेष्टित हो ॥ ८-१०१/२ ॥ इसके बाद यजमानको चाहिये कि वह ब्राह्मणोचित कर्मका पालन करनेवाले वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको शास्त्रोक्त रीतिसे आमन्त्रित करे। यजमान और उन ब्राह्मणोंको तीन रात्रितक विशेषरूपसे ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करना चाहिये ॥ ११-१२ ॥ यजमान एक दिन और एक रात्रि उपवास करके दस हजार गायत्रीका जप करे। [हवन आरम्भ होनेके दिन] विप्रगण भी स्नान करके शुद्ध एवं श्वेत वस्त्र धारण करें। फिर गन्ध, पुष्प और माला धारण करके पवित्र, संतुष्ट और जितेन्द्रिय होकर, भोजन किये बिना ही कुशके बने हुए आसनपर एकाग्रचित्तसे बैठें। तदनन्तर वे यत्नपूर्वक निरालस्यभावसे हवन आरम्भ करें। पहले गृह्यसूत्रोक्त विधिसे भूमिपर [कुशोंसे] रेखा करके उसे सींचे और वहाँ यत्नसे अग्नि-स्थापन करे। फिर उस अग्निमें हवनीय पदार्थोंका होम करे। सर्वप्रथम आघार और आज्यभाग—ये दो होम करने चाहिये। विद्वान् पुरुष जौ, चावल और तिल [एवं घृत आदिसे] मिश्रित प्रथम आहुतिका गायत्री-मन्त्रद्वारा [अन्तमें] स्वाहाके उच्चारणपूर्वक एकाग्रचित्तसे हवन करे। गायत्री छन्दोंकी माता और ब्रह्म (वेद)-की योनिरूपसे प्रतिष्ठित है। उसके देवता सविता हैं और ऋषि विश्वामित्रजी हैं। (इस प्रकार गायत्रीका विनियोग बताया गया।) ॥ १३-१८ ॥
अध्याय ३६ ] अवतार-कथाका उपक्रम १२९
अध्याय ३६ ] अवतार-कथाका उपक्रम १२९ ततो व्याहृतिभिः पश्चाज्जुहुयाच्च तिलान्वितम्। केवल गायत्रीसे हवन कर लेनेके पश्चात् ['भूर्भुवः यावत्प्रपूर्यते संख्या लक्षं वा कोटिरेव वा ॥ १९ स्वः'-इन ] तीन व्याहृतियोंसहित गायत्री-मन्त्रसे केवल तिलका हवन करे। जबतक हवनकी संख्या एक लाख तावद्धोमं तिलैः कुर्यादच्युतार्चनपूर्वकम्। या एक करोड़ न हो जाय, तबतक भगवान् विष्णुके दीनानाथजनेभ्यस्तु यजमानः प्रयत्नतः ॥ २० पूजनपूर्वक तिलद्वारा हवन करते रहना चाहिये और तावच्च भोजनं दद्याद् यावद्धोमं समाचरेत्। जबतक हवन करे, तबतक यजमानको चाहिये कि वह समाप्ते दक्षिणां दद्याद् ऋत्विग्भ्यः श्रद्धयान्वितः ॥ २१ यत्नपूर्वक दीनों और अनाथोंको भोजन दे। हवन समाप्त होनेपर ऋत्विजोंको श्रद्धापूर्वक लोभ त्यागकर यथोचित यथार्हता न लोभेन ततः शान्त्युदकेन च। दक्षिणा दे। तत्पश्चात् [प्रथम स्थापित किये हुए] शान्ति- प्रोक्षयेद् ग्राममध्ये तु व्याधितांस्तु विशेषतः ॥ २२ कलशके जलसे उस ग्राममें रहनेवाले सभी मनुष्यों- एवं कृते तु होमस्य पुरस्य नगरस्य च। विशेषतः रोगियोंको अभिषेक करे। महाभाग ! इस प्रकार विधिवत् होमका अनुष्ठान करनेपर पुर (गाँव), नगर, राष्ट्रस्य च महाभाग राज्ञो जनपदस्य च। जनपद (प्रान्त) और समस्त राष्ट्रकी सारी बाधाको दूर सर्वबाधाप्रशमनी शान्तिर्भवति सर्वदा ॥ २३ करनेवाली शान्ति निरन्तर बनी रहती है ॥ १९-२३ ॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले- नृपनन्दन ! इस प्रकार शौनक इत्येतच्छौनकोक्तं कथितं नृपनन्दन। मुनिका बताया हुआ लक्षहोम-विधिका अनुष्ठान जो लक्षहोमादिकविधिं कार्यं राष्ट्रे सुशान्तिदम् ॥ २४ समस्त राष्ट्रमें शुभ शान्ति प्रदान करनेवाला है, मैंने तुम्हें ग्रामे गृहे वा पुरबाह्यदेशे बताया। यदि ब्राह्मणोंद्वारा यह पूर्वोक्त होम-विधि ग्राममें, द्विजैरयं यत्नकृतः पुरोविधिः। घरमें अथवा पुरके बाहर प्रयत्नपूर्वक करायी जाय तो तत्रापि शान्तिर्भविता नराणां वहाँ भी मनुष्योंको, गौओंको और अनुचरोंसहित राजाको गवां च भृत्यैः सह भूपतेश्च ॥ २५ पूर्णतया शान्ति प्राप्त हो सकती है ॥ २४-२५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे लक्षहोमविधिर्नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'लक्षहोमविधिका वर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥ छतीसवाँ अध्याय अवतार-कथाका उपक्रम मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले-महीपाल! अब मैं देवदेव अवतारानहं वक्ष्ये देवदेवस्य चक्रिणः। भगवान् विष्णुके पवित्र एवं पापनाशक अवतारोंका ताञ्शृणुष्व महीपाल पवित्रान् पापनाशनान् ॥ १ वर्णन करूँगा; उन्हें सुनो ॥ १ ॥ महात्मा भगवान् विष्णुने जिस प्रकार मत्स्यरूप यथा मत्स्येन रूपेण दत्ता वेदाः स्वयम्भुवे। धारणकर [प्रलयकालीन समुद्रमें खोये हुए] वेद लाकर मधुकैटभौ च निधनं प्रापितौ च महात्मना ॥ २ ब्रह्माजीको अर्पित किये और मधु तथा कैटभ नामक यथा कौर्मेण रूपेण विष्णुना मन्दरो धृतः। दैत्योंको मौतके घाट उतारा; फिर उन भगवान् विष्णुने तथा पृथ्वी धृता राजन् वाराहेण महात्मना ॥ ३ जिस प्रकार कूर्मरूपसे मन्दराचल पर्वत धारण किया और 1113 Narsingpuran_Section_6_1_Front In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३७
१३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३७ तेनैव निधनं प्राप्तो यथा राजन् महाबलः। महाकाय वराह-अवतार लेकर [अपनी दाढ़ोंपर] इस हिरण्याक्षो महावीर्यो दितिपुत्रो महातनुः॥ ४ पृथ्वीको उठाया तथा राजन्! उन्हींके हाथसे जिस प्रकार महाबली, महापराक्रमी और महाकाय दितिकुमार हिरण्याक्ष यथा हिरण्यकशिपुस्त्रिदशानामरिः पुरा। मारा गया; राजन्! फिर उन भगवान्ने नृसिंहरूप धारणकर नरसिंहेन देवेन प्रापितो निधनं नृप॥ ५ पूर्वकालमें जिस प्रकार देवताओंके शत्रु हिरण्यकशिपुका वध किया; और राजकुमार! जिस प्रकार उन महात्माने यथा बद्धो बलिः पूर्वं वामनेन महात्मना। वामनरूप होकर पूर्वकालमें राजा बलिको बाँधा तथा इन्द्रस्त्रिभुवनाध्यक्षः कृतस्तेन नृपात्मज॥ ६ इन्द्रको (फिरसे) त्रिभुवनका अधीश्वर बना दिया; और राजन्! भगवान् विष्णुने श्रीरामचन्द्रका अवतार धारणकर रामेण भूत्वा च यथा विष्णुना रावणो हतः। जिस प्रकार रावणको मारा एवं देवताओंके लिये कण्टकरूप सगणाश्चाद्भुता राजन् राक्षसा देवकण्टकाः॥ ७ अद्भुत राक्षसोंका उनके गणोंसहित संहार कर दिया; फिर पूर्वकालमें परशुराम-अवतार ले, जिस प्रकार क्षत्रियकुलका यथा परशुरामेण क्षत्रमुत्सादितं पुरा। उच्छेद किया तथा बलभद्ररूपसे जिस प्रकार प्रलम्बादि बलभद्रेण रामेण यथा दैत्यः पुरा हतः॥ ८ दैत्योंका वध किया; कृष्णरूप होकर कंस आदि देवशत्रु दैत्योंका जिस तरह संहार किया; इसी प्रकार कलियुग यथा कृष्णेन कंसाद्या हता दैत्याः सुरद्विषः। प्राप्त होनेपर जिस प्रकार भगवान् नारायण बुद्धरूप धारण कलौ प्राप्ते यथा बुद्धो भवेन्नारायणः प्रभुः॥ ९ करेंगे; फिर कलियुग समाप्त होनेपर जिस प्रकार वे कल्किरूप धारणकर म्लेच्छोंका नाश करेंगे, वह सब कल्किरूपं समास्थाय यथा म्लेच्छा निपातिताः। वृत्तान्त उसी प्रकार मैं तुमसे कहूँगा॥ २-१०॥ समाप्ते तु कलौ भूयस्तथा ते कथयाम्यहम्॥ १० हरेरनन्तस्य पराक्रमं यः भूपाल! जो एकाग्रचित्त होकर मेरे द्वारा बताये शृणोति भूपाल समाहितात्मा। जानेवाले अनन्त भगवान् विष्णुके इन पराक्रमोंका श्रवण मयोच्यमानं स विमुच्य पापं करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान्के अत्यन्त प्रयाति विष्णोः पदमत्युदारम्॥ ११ उदार परमपदको प्राप्त होगा॥ ११॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे हरेः प्रादुर्भावानुक्रमणे षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीहरिके अवतारोंकी अनुक्रमणिका' (गणना) विषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६॥ सैंतीसवाँ अध्याय मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले—महात्मा भगवान् अच्युतके बहुत- नानात्वादवताराणामच्युतस्य महात्मनः। से अवतार हैं, सुतरां उनका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं न शक्यं विस्तराद् वक्तुं तान् ब्रवीमि समासतः॥ १ किया जा सकता; इसलिये मैं उन्हें संक्षेपसे ही कहता हूँ। पुरा किल जगत्स्रष्टा भगवान् पुरुषोत्तमः। यह प्रसिद्ध है कि पूर्वकालमें जगत्की सृष्टि करनेवाले अनन्तभोगशयने योगनिद्रां समागतः॥ २ भगवान् पुरुषोत्तम 'अनन्त' नामक शेषनागके शरीरकी 1113 Narsingpuran_Section_6_1_Back In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३७ ] मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध १३१
अध्याय ३७ ] मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध १३१ अथ तस्य प्रसुप्तस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः। | शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर सोये हुए थे। नृप! श्रोत्राभ्यामपतत् तोये स्वेदबिन्दुद्वयं नृप॥ ३ | कुछ कालके बाद उन गहरी नींदमें सोये हुए देवदेव मधुकैटभनामानौ तस्माज्जातौ महाबलौ। | शार्ङ्गधन्वा विष्णुके कानोंसे पसीनेकी दो बूँदें निकलकर महाकायौ महावीर्यौ महाबलपराक्रमौ॥ ४ | जलमें गिरीं। उन दोनों बूँदोंसे मधु और कैटभ नामके अच्युतस्य प्रसुप्तस्य महत्पद्ममजायत। | दो दैत्य उत्पन्न हुए, जो महाबली, महान् शक्तिशाली, नाभिमध्ये नृपश्रेष्ठ तस्मिन् ब्रह्माभ्यजायत॥ ५ | महापराक्रमी और महाकाय थे। नृपश्रेष्ठ! इसी समय उन स चोक्तो विष्णुना राजन् प्रजाः सृज महामते। | सोये हुए भगवान्की नाभिके बीचमें महान् कमल प्रकट तथेत्युक्त्वा जगन्नाथं ब्रह्मापि कमलोद्भवः॥ ६ | हुआ और उससे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए॥ १-५॥ वेदशास्त्रावशाद्यावत् प्रजाः स्रष्टुं समुद्यतः। | राजन्! भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे कहा—'महामते ! तावत्तत्र समायातौ तावुभौ मधुकैटभौ॥ ७ | तुम प्रजाजनोंकी सृष्टि करो।' यह सुन उन कमलोद्भव आगत्य वेदशास्त्रार्थविज्ञानं ब्रह्मणः क्षणात्। | ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर भगवान् जगन्नाथकी आज्ञा अपहृत्य गतौ घोरौ दानवौ बलदर्पितौ॥ ८ | स्वीकार कर ली तथा वेदों और शास्त्रोंकी सहायतासे ततः पद्मोद्भवो राजन् ज्ञानहीनोऽभवत् क्षणात्। | वे ज्यों ही सृष्टि-रचनाके लिये उद्यत हुए, त्यों ही उनके दुःखितश्चिन्तयामास कथं स्रक्ष्यामि वै प्रजाः॥ ९ | पास वे दोनों दैत्य—मधु और कैटभ आये। आते ही चोदितस्त्वं सृजस्वेति प्रजा देवेन तत्कथम्। | वे बलाभिमानी घोर दानव क्षणभरमें ब्रह्माजीके वेद और स्रक्ष्येऽहं ज्ञानहीनस्तु अहो कष्टमुपस्थितम्॥ १० | शास्त्र-ज्ञानको लेकर चले गये। राजन्! तब ब्रह्माजी एक इति संचिन्त्य दुःखार्तो ब्रह्मा लोकपितामहः। | ही क्षणमें ज्ञानशून्य हो दुःखी हो गये और सोचने यत्नतो वेदशास्त्राणि स्मरन्नपि न दृष्टवान्॥ ११ | लगे—"हाय! अब मैं कैसे प्रजाकी सृष्टि करूँगा? ततो विषण्णचित्तस्तु तं देवं पुरुषोत्तमम्। | भगवान्ने मुझे आज्ञा दी कि 'तुम प्रजाकी सृष्टि करो।' एकाग्रमनसा सम्यक् शास्त्रेण स्तोतुमारभत्॥ १२ | परंतु अब तो मैं सृष्टिविज्ञानसे रहित हो गया, अतः ब्रह्मोवाच | किस प्रकार सृष्टिरचना करूँगा? अहो! मुझपर यह ॐ नमो वेदनिधये शास्त्राणां निधये नमः। | बहुत बड़ा कष्ट आ पहुँचा।" लोकपितामह ब्रह्माजी इस विज्ञाननिधये नित्यं कर्मणां निधये नमः॥ १३ | प्रकार चिन्ता करते-करते शोकसे कातर हो गये। वे विद्याधराय देवाय वागीशाय नमो नमः। | प्रयत्नपूर्वक वेद-शास्त्रोंका स्मरण करने लगे, तथापि अचिन्त्याय नमो नित्यं सर्वज्ञाय नमो नमः॥ १४ | उन्हें उनकी स्मृति नहीं हुई। तब वे मन-ही-मन अमूर्तिस्त्वं महाबाहो यज्ञमूर्तिरधोक्षज। | अत्यन्त दुःखी हो, एकाग्रचित्तसे भगवान् पुरुषोत्तमकी साम्नां मूर्तिस्त्वमेवाद्य सर्वदा सर्वरूपवान्॥ १५ | शास्त्रानुकूल विधिसे स्तुति करने लगे॥ ६-१२॥ सर्वज्ञानमयोऽसि त्वं हृदि ज्ञानमयोऽच्युत। | ब्रह्माजी बोले—जो वेद, शास्त्र, विज्ञान और कर्मोंकी देहि मे त्वं सर्वज्ञानं देवदेव नमो नमः॥ १६ | निधि हैं, उन ॐकार-प्रतिपाद्य परमेश्वरको मेरा बार- | बार नमस्कार है। समस्त विद्याओंको धारण करनेवाले | वाणीपति भगवान्को प्रणाम है। अचिन्त्य एवं सर्वज्ञ | परमेश्वरको नित्य बारंबार नमस्कार है। महाबाहो! | अधोक्षज! आप निराकार एवं यज्ञस्वरूप हैं। आप ही | साममूर्ति एवं सदा सर्वरूपधारी हैं। अच्युत! आप | सर्वज्ञानमय हैं; आप सबके हृदयमें ज्ञानरूपसे विराजमान | हैं। देवदेव! आप मुझे सब प्रकारका ज्ञान दीजिये; | आपको बारंबार नमस्कार है॥ १३-१६॥ 1113 Narsingpuran_Section_6_2_Front In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३७
[संस्कृत मूल पाठ]
मार्कण्डेय उवाच इत्थं स्तुतस्तदा तेन शङ्खचक्रगदाधरः। ब्रह्माणमाह देवेशो दास्ये ते ज्ञानमुत्तमम् ॥ १७ इत्युक्त्वा तु तदा विष्णुश्चिन्तयामास पार्थिव । केनास्य नीतं विज्ञानं केन रूपेण चादधे ॥ १८ मधुकैटभकृतं सर्वमिति ज्ञात्वा जनार्दनः । मात्स्यं रूपं समास्थाय बहुयोजनमायतम्। बहुयोजनविस्तीर्णं सर्वज्ञानमयं नृप ॥ १९ स प्रविश्य जलं तूर्णं क्षोभयामास तद्धरिः । प्रविश्य च स पातालं दृष्टवान्मधुकैटभौ ॥ २० तौ मोहयित्वा तुमुलं तज्ज्ञानं जगृहे हरिः । वेदशास्त्राणि मुनिभिः संस्तुतो मधुसूदनः ॥ २१ आनीय ब्रह्मणे दत्त्वा त्यक्त्वा तन्मात्स्यकं नृप। जगद्धिताय स पुनर्योगनिद्रावशं गतः ॥ २२ ततः प्रबुद्धौ संक्रुद्धौ तावुभौ मधुकैटभौ । आगत्य ददृशाते तु शयानं देवमव्ययम् ॥ २३ अयं स पुरुषो धूर्त्त आवां सम्मोह्य मायया । आनीय वेदशास्त्राणि दत्त्वा शेतेऽत्र साधुवत् ॥ २४ इत्युक्त्वा तौ महाघोरौ दानवौ मधुकैटभौ । बोधयामासतुस्तूर्णं शयानं केशवं नृप ॥ २५ युद्धार्थमागतावत्र त्वया सह महामते। आवयोर्देहि संग्रामं युध्यस्वोत्थाय साम्प्रतम् ॥ २६ इत्युक्तो भगवांस्ताभ्यां देवदेवो नृपोत्तम। तथेति चोक्त्वा तौ देवः शाङ्गं सज्यमथाकरोत् ॥ २७ ज्याघोषतलघोषेण शङ्खशब्देन माधवः । खं दिशः प्रदिशश्चैव पूरयामास लीलया ॥ २८ तौ च राजन् महावीर्यौ ज्याघोषं चक्रतुस्तदा । युयुधाते महाघोरौ हरिणा मधुकैटभौ ॥ २९ कृष्णश्च युयुधे ताभ्यां लीलया जगतः पतिः। समं युद्धमभूद्देवं तेषामस्त्राणि मुञ्चताम् ॥ ३०
[हिन्दी अनुवाद]
**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवेश्वर विष्णुने उनसे कहा—'मैं तुम्हें उत्तम ज्ञान प्रदान करूँगा।' राजन्! भगवान् विष्णु यों कहकर तब सोचने लगे— 'कौन इसका विज्ञान हर ले गया और किस रूपसे उसने उसे धारण कर रखा है?' भूपाल! अन्तमें यह जानकर कि यह सब मधु और कैटभकी करतूत है, भगवान् जनार्दनने अनेकों योजन लंबा-चौड़ा पूर्णज्ञानमय मत्स्यरूप धारण किया। फिर मत्स्यरूपधारी हरिने तुरंत ही जलमें प्रविष्ट होकर उसे क्षुब्ध कर डाला और भीतर-ही-भीतर पाताललोकमें पहुँचकर मधु तथा कैटभको देखा। तब मुनियोंद्वारा स्तवन किये जानेपर भगवान् मधुसूदनने मधु और कैटभ—दोनोंको मोहितकर वह वेदशास्त्रमय ज्ञान ले लिया और उसे ले आकर ब्रह्माजीको दे दिया। राजन् ! तत्पश्चात् वे भगवान् उस मत्स्यरूपको त्यागकर जगत्के हितके लिये पुनः योगनिद्रामें स्थित हो गये॥ १७—२२ ॥
तदनन्तर मोह निवृत्त होनेपर [वेद-शास्त्रको न देख] मधु तथा कैटभ—दोनों ही बहुत कुपित हुए और वहाँसे आकर उन्होंने अविनाशी भगवान् विष्णुको सोते देखा। तब वे परस्पर कहने लगे—'यह वही धूर्त पुरुष है, जिसने हम दोनोंको मायासे मोहित करके वेद-शास्त्रोंको ले आकर ब्रह्माको दे दिया और अब यहाँ साधुकी भाँति सो रहा है।' राजन्! यों कहकर उन महाघोर दानव मधु और कैटभने वहाँ सोये हुए भगवान् केशवको तत्काल जगाया और कहा—'महामते! हम दोनों यहाँ तुम्हारे साथ युद्ध करने आये हैं; तुम हमें संग्रामकी भिक्षा दो और अभी उठकर हमसे युद्ध करो'॥ २३—२६ ॥
नृपवर ! उनके इस प्रकार कहनेपर देवदेव भगवान्ने 'बहुत अच्छा' कहकर अपने शार्ङ्ग धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी। उस समय भगवान् माधवने लीलापूर्वक धनुषकी टंकार और शङ्खनादसे आकाश, दिशाओं और अवान्तर-दिशाओं (कोणों)-को भर दिया ॥ २७-२८ ॥
राजन्! फिर उन महापराक्रमी महाभयानक मधु और कैटभने भी उस समय अपनी प्रत्यञ्चाको टंकार दी और वे भगवान् विष्णुके साथ युद्ध करने लगे। जगत्पति भगवान् विष्णु भी लीलासे ही उनके साथ युद्ध करने
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