भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 133

१२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३ चतुर्भुज उवाच चतुर्भुज बोला—इस प्रकार मैंने दिव्यरूप धारणकर, तत्र स्थित्वा ब्रह्मकल्पं शतं साग्रं द्विजोत्तमाः। दिव्य भोगोंसे सम्पन्न होकर स्वर्गलोकमें सौ कल्पोंसे भी दिव्यभोगसमायुक्तो दिव्यरूपसमन्वितः॥ ७२ अधिक कालतक निवास किया। फिर उसी पुण्यके जातोऽहं पुण्ययोगाद्धि सोमवंशसमुद्भवः। भोगसे चन्द्रवंशमें उत्पन्न जयध्वज नामसे विख्यात जयध्वज इति ख्यातो राजा राजीवलोचनः॥ ७३ कमलके समान नेत्रोंवाला राजा हुआ। उस जन्ममें भी तत्रापि कालवशतो मृतः स्वर्गमवाप्तवान्। कालवश मृत्युको प्राप्त होनेपर मैं स्वर्गलोकमें आया। इन्द्रलोकमनुप्राप्य रुद्रलोकं ततो गतः॥ ७४ फिर यहाँसे रुद्रलोकको प्राप्त हुआ। एक बार रुद्रलोकसे रुद्रलोकाद्ब्रह्मलोकं गच्छता नारदो मुनिः। ब्रह्मलोकको जाते समय मैंने नारदमुनिको देखा, परंतु दृष्टश्च नमितो नैव गर्वान्मे हसितश्च सः॥ ७५ देखनेपर भी उन्हें प्रणाम नहीं किया और उनकी हँसी कुपितः शप्तवान् मां स राक्षसो भव भूपते। उड़ाने लगा। इससे कुपित होकर उन्होंने शाप दिया— इति शापं समाकर्ण्य दत्तं तेन द्विजन्मना॥ ७६ 'राजन्! तू राक्षस हो जा।' उन ब्राह्मणके दिये हुए इस प्रसादितो मया भूप प्रसादं कृतवान् मुनिः। शापको सुनकर मैंने क्षमा माँगकर (किसी तरह) उन्हें यदा रेवामठे राजन् धर्मपुत्रस्य धीमतः॥ ७७ प्रसन्न किया। तब मुनिने मुझपर शापानुग्रहके रूपमें कृपा भार्यापहारं नयतः शापमोक्षो भविष्यति। की। [उन्होंने कहा—] राजन्! जिस समय बुद्धिमान् सोऽहमर्जुन भूपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिर॥ ७८ धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी भार्याका हरण करके तुम रेवा- विष्णोः सारूप्यमगमं यामि वैकुण्ठमद्य वै। तटवर्ती मठमें चले जाओगे, उस समय तुम्हें शापसे मुक्ति मिल जायगी।' भूपाल! धर्मपुत्र युधिष्ठिर! अर्जुन! मैं वही राजा जयध्वज हूँ। इस समय भगवान् विष्णुके मार्कण्डेय उवाच सारूप्यको प्राप्त हुआ हूँ। अब मैं निश्चय ही वैकुण्ठधामको जाऊँगा॥ ७२-७८१/२ ॥ इत्युक्त्वा गरुडारूढो धर्मपुत्रस्य पश्यतः॥ ७९ मार्कण्डेयजी बोले—यह कहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरके गतवान् विष्णुभवनं यत्र विष्णुः श्रिया सह। देखते-ही-देखते वे राजा जयध्वज गरुडपर आरूढ हो सम्मार्जनोपलेपाभ्यां महिमा तेन वर्णितः॥ ८० विष्णुधामको चले गये, जहाँ लक्ष्मीजीके साथ भगवान् अवशेनापि यत्कर्म कृत्वेमां श्रियमागतः। विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। इसीसे विष्णुमन्दिरके भक्तिमद्भिः प्रशान्तैश्च किं पुनः सम्यगर्चनातू॥ ८१ बुहारने और लीपनेसे बड़ी महत्ता प्राप्त होनेका वर्णन किया गया है। [राजा जयध्वजने पूर्वजन्ममें] कामके सूत उवाच वशीभूत होकर भी जिस कर्मको करनेसे ऐसी दिव्य सम्पत्ति मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा पाण्डुवंशसमुद्भवः। प्राप्त कर ली, उसीको यदि भक्तिमान् और शान्त पुरुष सहस्रानीकभूपालो हरिपूजारतोऽभवत्॥ ८२ करे तथा भलीभाँति भगवान्का पूजन करे तो उनको प्राप्त तस्माच्छृणुत विप्रेन्द्रा देवो नारायणोऽव्ययः। होनेवाले फलके विषयमें क्या कहना है?॥ ७९-८१॥ ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि पूजकानां विमुक्तिदः॥ ८३ सूतजी बोले—मार्कण्डेयजीके उपर्युक्त वचन सुनकर अर्चयध्वं जगन्नाथं भूयो भूयो वदाम्यहम्। पाण्डुवंशमें उत्पन्न राजा सहस्रानीक भगवान्के पूजनमें तर्तुं यदीच्छथ द्विजा दुस्तरं भवसागरम्॥ ८४ संलग्न हो गये। इसलिये विप्रवृन्द! आपलोग यह सुन येऽर्चयन्ति हरिं भक्ताः प्रणतार्तिहरं हरिम्। लें कि अविनाशी भगवान् नारायण जानकर अथवा अनजानमें ते वन्द्यास्ते प्रपूज्याश्च नमस्याश्च विशेषतः॥ ८५ भी पूजा करनेवाले अपने भक्तोंको मुक्ति प्रदान करते हैं। द्विजो! मैं यह बारंबार कहता हूँ कि यदि आपलोग दुस्तर भवसागरके पार जाना चाहते हैं तो भगवान् जगन्नाथकी पूजा करें। जो भक्त प्रणतजनोंका कष्ट दूर करनेवाले भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं, वे वन्दनीय, पूजनीय और विशेषरूपसे नमस्कार करनेयोग्य हैं॥ ८२-८५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते मार्कण्डेयेनोपदिष्टसम्मार्जनोपफल नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके प्रसङ्गमें मार्कण्डेयमुनिद्वारा उपदिष्ट 'मन्दिरमें झाडू देने और उसके लीपनेकी महिमाका वर्णन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३॥

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth