भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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अध्याय ३४ ] भगवान् विष्णुके पूजनका फल १२३ चौंतीसवाँ अध्याय भगवान् विष्णुके पूजनका फल श्रीसहस्रानीक उवाच श्रीसहस्रानीकने पूछा—महामते द्विजवर पुनरेव द्विजश्रेष्ठ मार्कण्डेय महामते। मार्कण्डेयजी! अब पुनः यह बताइये कि भगवान् निर्माल्यापनयाद्विष्णोर्यत्पुण्यं तद्वदस्व मे॥ १ विष्णुके निर्माल्य (चन्दन-पुष्प आदि)-को हटानेसे कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है॥ १ ॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! नृसिंहस्वरूप भगवान् निर्माल्यमपनीयाथ तोयेन स्नाप्य केशवम्। केशवको निर्माल्य हटाकर जलसे स्नान करानेसे मनुष्य नरसिंहाकृतिं राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २ सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण तीर्थोंके सर्वतीर्थफलं प्राप्य यानारूढो दिवं व्रजेत्। सेवनका फल प्राप्तकर, विमानपर आरूढ हो स्वर्गको श्रीविष्णोः सदनं प्राप्य मोदते कालमक्षयम्॥ ३ चला जाता है और वहाँसे श्रीविष्णुधामको प्राप्त होकर आगच्छ नरसिंहेति आवाह्याक्षतपुष्पकैः। अक्षयकालपर्यन्त आनन्दका उपभोग करता है। ‘भगवान् एतावतापि राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ४ नरसिंह! आप यहाँ पधारें’—इस प्रकार अक्षत और दत्त्वाऽऽसनमथार्घ्यं च पाद्यमाचमनीयकम्। पुष्पोंके द्वारा यदि भगवान्‌का आवाहन करे तो राजेन्द्र! देवदेवस्य विधिना सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ५ इतनेसे भी वह मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। स्नाप्य तोयेन पयसा नरसिंहं नराधिप। देवदेव नृसिंहको विधिपूर्वक आसन, पाद्य (पैर धोनेके सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ६ लिये जल), अर्घ्य (हाथ धोनेके लिये जल) और स्नाप्य दध्ना सकृद्यस्तु निर्मलः प्रियदर्शनः। आचमनीय (कुल्ला करनेके लिये जल) अर्पण करनेसे विष्णुलोकमवाप्नोति पूज्यमानः सुरोत्तमैः॥ ७ भी सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। नराधिप! यः करोति हरेरर्चां मधुना स्नापयन्नरः। भगवान् नृसिंहको दूध और जलसे स्नान कराकर मनुष्य अग्निलोके स मोदित्वा पुनर्विष्णुपुरे वसेत्॥ ८ सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो घृतेन स्त्रपनं यस्तु स्नानकाले विशेषतः। एक बार भी भगवान्‌को दहीसे स्नान कराता है, वह नरसिंहाकृतेः कुर्याच्छङ्खभेरीनिनादितम्॥ ९ निर्मल एवं सुन्दर शरीर धारणकर सुरवरोंसे पूजित होता पापकञ्चुकमुन्मुच्य यथा जीर्णामहिस्त्वचम्। हुआ विष्णुलोकको जाता है। जो मनुष्य मधुसे भगवान्‌को दिव्यं विमानमास्थाय विष्णुलोके महीयते॥ १० नहलाता हुआ उनकी पूजा करता है,वह अग्निलोकमें पञ्चगव्येन देवेशं यः स्नापयति भक्तितः। आनन्दोपभोग करके पुनः विष्णुपुर (वैकुण्ठधाम)-में मन्त्रपूर्वं महाराज तस्य पुण्यमनन्तकम्॥ ११ निवास करता है। जो स्नानकालमें श्रीनरसिंहके विग्रहको यश्च गोधूमकैश्चूर्णैरूद्वर्त्योष्णेन वारिणा। शङ्ख और नगारेका शब्द कराते हुए विशेषरूपसे घीसे प्रक्षाल्य देवदेवेशं वारुणं लोकमाप्नुयात्॥ १२ स्नान कराता है, वह पुरुष पुरानी केंचुलको छोड़नेवाले साँपकी भाँति पाप-कञ्चुकको त्यागकर दिव्य विमानपर आरूढ हो, विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ २-१०॥ महाराज! जो देवेश्वर भगवान्‌को भक्तिपूर्वक मन्त्रपाठ करते हुए पञ्चगव्यसे स्नान कराता है, उसका पुण्य अक्षय होता है। जो गेहूँके आटेसे देवदेवेश्वर भगवान्‌को उबटन लगाकर गरम जलसे उन्हें In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth