संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४७
अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४७ शुक्र उवाच शुक्राचार्यजी बोले—देवदेव! मैंने पहले (बलिके देवदेव मया पूर्वमपराधो महान् कृतः। यज्ञमें) आपका बहुत बड़ा अपराध किया है; उसी तद्दोषस्यापनुत्त्यर्थं स्तुतवानस्मि साम्प्रतम्॥ १५ दोषको दूर करनेके लिये इस समय आपका स्तवन किया है॥ १५॥ श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान् बोले- मुने! मेरे प्रति किये गये ममापराधान्नयनं नष्टमेकं तवाधुना। अपराधसे ही तुम्हारा एक नेत्र नष्ट हो गया था। शुक्र ! संतुष्टोऽस्मि ततः शुक्र स्तोत्रेणानेन ते मुने॥ १६ इस समय तुम्हारे इस स्तवनसे मैं तुमपर संतुष्ट हूँ ॥ १६ ॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तं मुनिं प्रहसन्निव । यह कहकर देवदेवेश्वर जनार्दनने हँसते हुए-से अपने पाञ्चजन्येन तच्चक्षुः पस्पर्श च जनार्दनः ॥ १७ पाञ्चजन्य शङ्खसे शुक्राचार्यके फूटे हुए नेत्रका स्पर्श किया। नृपश्रेष्ठ ! शार्ङ्गधन्वा देवदेव विष्णुके द्वारा शङ्खका स्पर्श स्पृष्टमात्रे तु शङ्खेन देवदेवेन शार्ङ्गिणा । कराये जाते ही शुक्राचार्यका वह नेत्र पहलेकी भाँति ही बभूव निर्मलं चक्षुः पूर्ववन्नृपसत्तम ॥ १८ निर्मल हो गया। इस प्रकार शुक्राचार्यको नेत्र देकर और एवं दत्त्वा मुनेश्चक्षुः पूजितस्तेन माधवः । उनसे पूजित होकर भगवान् लक्ष्मीपति तुरंत अन्तर्धान हो जगामादर्शनं सद्यः शुक्रोऽपि स्वाश्रमं ययौ ॥ १९ गये और शुक्राचार्य भी अपने आश्रमको चले गये। राजन् ! इस प्रकार पूर्वकालमें मुनिवर महात्मा शुक्राचार्यने देवेश्वर इत्येतदुक्तं मुनिना महात्मना भगवान् विष्णुकी कृपासे अपना नेत्र प्राप्त कर लिया- प्राप्तं पुरा देववरप्रसादात्। यह प्रसङ्ग तुम्हारे प्रश्नानुसार मैंने सुना दिया। अब तुम्हें शुक्रेण किं ते कथयामि राजन् मैं और क्या सुनाऊँ? तुम्हारे मनमें और भी यदि कुछ पुनश्च मां पृच्छ मनोरथान्तः ॥ २० पूछनेकी इच्छा हो तो मुझसे प्रश्न करो ॥ १७-२० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे शुक्रवरप्रदानो नाम पञ्चपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'शुक्राचार्यको वरप्रदान' नामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥ छप्पनवाँ अध्याय विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि राजोवाच राजा बोले- ब्रह्मन् ! अब मैं शार्ङ्गधनुषधारी देवदेव साम्प्रतं देवदेवस्य नरसिंहस्य शार्ङ्गिणः । नरसिंहके स्थापनकी समस्त उत्तम विधिको सुनना श्रोतुमिच्छामि सकलं प्रतिष्ठायाः परं विधिम् ॥ १ चाहता हूँ ॥ १ ॥ श्रीमार्कण्डेय उवाच श्रीमार्कण्डेयजी बोले- भूपाल ! देवदेवेश्वर प्रतिष्ठाया विधिं विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः । चक्रपाणि भगवान् विष्णुके स्थापनकी पुण्यदायिनी प्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रं शृणु भूपाल पुण्यदम् ॥ २ विधि सुनो; मैं शास्त्रके अनुसार उसका वर्णन कर कर्तुं प्रतिष्ठां यश्चात्र विष्णोरिच्छति पार्थिव । रहा हूँ। पृथिवीपते ! जो भी इस लोकमें भगवान् स पूर्वं स्थिरनक्षत्रे भूमिशोधनमारभेत् ॥ ३ विष्णुकी स्थापना करना चाहे, उसको चाहिये कि वह पहले स्थिर-संज्ञक * नक्षत्रोंमें भूमिशोधनका कार्य प्रारम्भ
- तीनों उत्तरा और रोहिणी - वे 'स्थिर' नक्षत्र कहलाते हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६
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२४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६
खात्वा पुरुषमात्रं तु बाहुद्वयमथापि वा। | करे। एक पुरुषके बराबर अर्थात् साढ़े तीन हाथ अथवा पूरयेच्छुद्धमृद्भिस्तु जलाक्तैः शर्करान्वितैः॥ ४ | दो हाथ नीचेतक नींव खोदकर उसमें जलसे भीगी हुई | कंकड़ और बालूसहित शुद्ध मिट्टी भर दे। राजन्! फिर अधिष्ठानं ततो बुद्ध्वा पाषाणेष्टकमृण्मयम्। | उसे ही आधार समझकर उसके ऊपर अपनी शक्तिके प्रासादं कारयेत्तत्र वास्तुविद्याविदा नृप॥ ५ | अनुसार पत्थर, ईंट अथवा मिट्टीसे गृहनिर्माण-विद्यामें | कुशल कारीगरोंके द्वारा मन्दिर तैयार कराये। वह मन्दिर चतुरस्रं सूत्रमार्गे चतुःकोणं समन्ततः। | चारों ओरसे बराबर और चौकोर हो। उसकी दीवार शिलाभित्तिकमुत्कृष्टं तदलाभेष्टकामयम्॥ ६ | पत्थरकी हो तो बहुत उत्तम; पत्थर न मिलनेपर ईंटोंकी | ही दीवार बनवा ले। यदि ईंटें भी न मिल सकें तो तदलाभे तु मृत्कुड्यं पूर्वद्वारं सुशोभनम्। | मिट्टीकी ही भींत उठा ले। मन्दिर बहुत ही सुन्दर हो और जातिकाष्ठमयैः स्तम्भैस्तल्लग्नैः फलदान्वितैः॥ ७ | उसका दरवाजा पूर्वकी ओर होना चाहिये। उस मन्दिरमें | अच्छी जातिवाले काठके खंभे लगे हों और उनमें चित्रकला उत्पलैः पद्मपत्रैश्च पातितैश्चित्रशिल्पिभिः। | जाननेवाले शिल्पियोंके द्वारा फलयुक्त वृक्ष, कुमुद तथा इत्थं तु कारयित्वा हि हरेर्वेश्म सुशोभनम्॥ ८ | कमलदल चित्रित कराने चाहिये॥ २—७१/२॥ | नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार जिसमें सुन्दर किवाड़ लगे हों और पूर्वद्वारं नृपश्रेष्ठ सुकपाटं सुचित्रितम्। | जिसका द्वार पूर्व दिशाकी ओर हो—ऐसा बेल-बूटोंसे अतिवृद्धातिबालैस्तु कारयेन्नाकृतिं हरेः॥ ९ | भलीभाँति चित्रित भगवान्का परम सुहावना मन्दिर बनवाकर | बुद्धिमान् एवं हृष्टपुष्ट शरीरवाले पुरुषके द्वारा विश्वकर्माकी कुष्ठाद्युपहतैर्वापि अन्यैर्वा दीर्घरोगिभिः। | बतायी हुई पद्धतिके अनुसार पुराणोक्त दिव्य प्रतिमाका विश्वकर्मोक्तमार्गेण पुराणोक्तां नृपोत्तम॥ १० | निर्माण कराये। जो कारीगर अत्यन्त बूढ़ा या बालक अथवा | कोढ़ आदि रोगोंसे दूषित या पुराना रोगी हो, उससे कारयेत् प्रतिमां दिव्यां पुष्टाङ्गेन तु धीमता। | भगवत्प्रतिमाका निर्माण नहीं कराना चाहिये। प्रतिमाका मुख सौम्याननां सुश्रवणां सुनासां च सुलोचनाम्॥ ११ | सौम्य (प्रसन्न) तथा कान, नाक और नेत्र आदि अङ्ग सुढार | होने चाहिये। उसकी दृष्टि न तो बहुत नीची हो, न बहुत नाधोदृष्टिं नोर्ध्वदृष्टिं तिर्यग्दृष्टिं न कारयेत्। | ऊँची हो और न तिरछी ही हो। विद्वान् पुरुष ऐसी प्रतिमा कारयेत् समदृष्टिं तु पद्मपत्रायतेक्षणाम्॥ १२ | बनवाये, जिसकी दृष्टि सम हो और जिसके नेत्र कमलदलके | समान विशाल हों। भौंहें, ललाट और कपोल सुन्दर हों, सुभ्रुवं सुललाटां च सुकपोलां समां शुभाम्। | उसका समस्त विग्रह सुडौल और सौम्य हो। उसके दोनों बिम्बोष्ठीं सुष्ठुचिबुकां सुग्रीवां कारयेद्बुधः॥ १३ | ओठ लाल हों, ठोढ़ी (अधरके नीचेका भाग) मनोहर तथा | कण्ठ सुन्दर हो। प्रतिमाकी भुजाएँ चार होनी चाहिये—दो उपबाहुकरे देयं दक्षिणे चक्रमर्कवत्। | भुजाएँ और दो उपभुजाएँ। उनमेंसे दाहिनी उपभुजाके हाथमें नाभिसंलग्नदिव्यारं परितो नेमिसंयुतम्॥ १४ | सूर्यके समान आकारवाला चक्र धारण कराना चाहिये। | चक्रकी नाभिके चारों ओर दिव्य अरे हों और उनके भी वामपार्श्वेत्युपभुजे देयं शङ्खं शशिप्रभम्। | ऊपर सब ओरसे नेमि (हाल) लगी हो। बायीं उपभुजाके पाञ्चजन्यमिति ख्यातं दैत्यदर्पहरं शुभम्॥ १५ | हाथमें चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिमय पाञ्चजन्य नामक | शंख देना चाहिये, जो दैत्योंके मदको चूर्ण करनेवाला और | कल्याणप्रद है॥ ८—१५॥
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अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४९
अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४९ हारार्पितवरां दिव्यां कण्ठे त्रिवलिसंयुताम्। | उस दिव्य भगवत्प्रतिमाके कण्ठमें सुन्दर हार पहनाया सुस्तनीं चारुहृदयां सुजठरां समां शुभाम् ॥ १६ | गया हो, गलेमें त्रिवली-चिह्न हो, स्तनभाग सुन्दर, वक्षःस्थल रुचिर और उदर मनोहर होना चाहिये। कटिलग्नवामकरां पद्मलग्नां च दक्षिणाम्। | सम्पूर्ण अङ्ग बराबर और सुन्दर हों। वह प्रतिमा अपना केयूरबाहुकां दिव्यां सुनाभिवलिभङ्गिकाम् ॥ १७ | बायाँ हाथ कमरपर रखे हो और दाहिनेमें कमल धारण किये हो। बाहुओंमें भुजबन्ध पहने हो और सुन्दर नाभि सुकटीं च सुजङ्घोरूं वस्त्रमेखलभूषिताम्। | तथा त्रिवलीसे सुशोभित एवं दिव्य जान पड़ती हो। एवं तां कारयित्वा तु प्रतिमां राजसत्तम ॥ १८ | उसका कटिभाग (नितम्ब), जाँघें और पिंडलियाँ मनोहर हों, वह कमरमें मेखला और पीतवस्त्रसे विभूषित हो। सुवर्णवस्त्रदानेन तत्कर्तृन् पूज्य सत्तम। | नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवत्प्रतिमाका निर्माण कराकर पूर्वपक्षे शुभे काले प्रतिमां स्थापयेद्बुधः ॥ १९ | उसके बनानेवाले शिल्पियोंको सुवर्ण-दान एवं वस्त्र-दानके द्वारा सम्मानित करके विद्वान् पुरुष पूर्व पक्षमें शुभ समयपर उस प्रतिमाकी स्थापना करे ॥ १६–१९ ॥ प्रासादस्याग्रतः कृत्वा यागमण्डपमुत्तमम्। | चतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु चतुर्भिस्तोरणैर्युतम् ॥ २० | मन्दिरके सामने एक उत्तम यज्ञमण्डप बनवाये। समधान्याङ्कुरैर्युक्तं शङ्खभेरीनिनादितम्। | उसमें चारों ओर एक-एकके क्रमसे चार दरवाजे हों और सारा मण्डप चार तोरणों (बड़े-बड़े फाटकों)- प्रतिमां क्षाल्य विद्वद्भिः षट्त्रिंशद्भिर्घटोदकैः ॥ २१ | से घिरा हो। उसमें सप्तधान्यके अङ्कुर उगे हों तथा शंख और भेरी आदि बाजे बजते हों। विद्वानोंके द्वारा छत्तीस प्रविश्य मण्डपे तस्मिन् ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । | घड़े जलसे उस प्रतिमाका अभिषेक कराकर उसके तत्रापि स्नापयेत्पश्चात् पञ्चगव्यैः पृथक् पृथक् ॥ २२ | साथ वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको साथमें लिये उक्त मण्डपमें प्रवेश करे और फिर पञ्चगव्योंसे पृथक्-पृथक् तथोष्णवारिणा स्नाप्य पुनः शीतोदकेन च। | स्नान कराये। इसी प्रकार गर्म जलसे नहलाकर फिर ठंडे हरिद्राकुङ्कुमाद्यैस्तु चन्दनैश्चोपलेपयेत् ॥ २३ | जलसे स्नान कराये। तत्पश्चात्, हल्दी और कुङ्कुम आदिका तथा चन्दनोंका उसपर लेप करे, फिर फूलोंकी मालाओंसे पुष्पमाल्यैरलङ्कृत्य वस्त्रैराच्छाद्य तां पुनः। | विभूषितकर उसे वस्त्र धारण करा दे और पुण्याहवाचन पुण्याहं तत्र कृत्वा तु ऋग्भिस्तां प्रोक्ष्य वारिभिः ॥ २४ | करके वैदिक ऋचाओंसे उच्चारणपूर्वक जलसे प्रोक्षित कर भक्त ब्राह्मणोंद्वारा उस भगवद्विग्रहको नहलाये। स्नात्वा तां ब्राह्मणैर्भक्तैः शंखभेरीस्वनैर्युतम्। | तत्पश्चात् शंख, भेरी आदि बाजे बजाते हुए उसे नदीके वासयेत्सप्तरात्रं तु त्रिरात्रं वा नदीजले ॥ २५ | जलमें रखकर सात या तीन दिनोंतक उसे वहाँ रहने दे। ह्रदे तु विमले शुद्धे तडागे वापि रक्षयेत् । | अथवा किसी निर्मल जलाशय या शुद्ध सरोवरमें ही अधिवास्य जले देवमेवं पार्थिवपुङ्गव ॥ २६ | रखकर उसकी रक्षा करे। नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान्का जलाधिवास कराके ब्राह्मणोंद्वारा उनको उठवाये और तत उत्थाप्य विप्रैस्तु स्थाप्या्वलङ्कृत्य पूर्ववत्। | पालकी आदिमें चढ़ाकर पूर्ववत् उन्हें माला आदिसे ततो भेरीनिनादैस्तु वेदघोषैश्च केशवम् ॥ २७ | विभूषित करे। तदनन्तर नगारोंकी ध्वनि और वेदमन्त्रोंके गम्भीर घोषके साथ भगवान्को वहाँसे ले आये और आनीय मण्डपे शुद्धे पद्माकारविनिर्मिते । | कमलाकार बने हुए शुद्ध मण्डपमें रखे। वहाँ पुनः स्नान कृत्वा पुनस्ततः स्नाप्य विष्णुभक्तैरलङ्क्रियात् ॥ २८ | कराके विष्णुभक्तोंद्वारा उसका शृङ्गार कराये ॥ २०-२८॥
२५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६
२५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६ [संस्कृत श्लोक] ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु विधिवत् षोडशर्त्विजः। चतुर्भिरध्ययनं कार्यं चतुर्भिः पालनं तथा ॥ २९ चतुर्भिस्तु चतुर्दिक्षु होमः कार्यो विचक्षणैः । पुष्पाक्षतान्नमिश्रेण दद्यादिक्षु बलीन् नृप ॥ ३० एकेन दापयेत्तेषामिन्द्राद्याः प्रीयन्तामिति । प्रत्येकं सायंसंध्यायां मध्यरात्रे तथोषसि ॥ ३१ उदिते च ततो दद्यान्मातृविप्रगणाय वा। जपन् पुरुषसूक्तं तु एकतस्तु पुनः पुनः ॥ ३२ एकतो मनसा राजन् विष्णोर्मन्दिरमध्यगः । अहोरात्रोषितो भूत्वा यजमानो द्विजैः सह ॥ ३३ प्रविश्य प्रतिमाद्वारं शुभलग्ने विचक्षणः । देवसूक्तं द्विजैः सार्धमुपस्थाप्य च तां दृढम् ॥ ३४ संस्थाप्य विष्णुसूक्तेन पवमानेन वा पुनः । प्रोक्षयेद्देवदेवेशमाचार्यः कुशवारिणा ॥ ३५ तदग्रे चाग्निमाधाय सम्परिस्तीर्य यत्नतः । जुहुयाज्जातकर्मादि गायत्र्या वैष्णवेन तु ॥ ३६ चतुर्भिराज्याहुतिभिरेकामेकां क्रियां प्रति। आचार्यस्तु स्वयं कुर्यादस्त्रैर्बन्धं च कारयेत् ॥ ३७ त्रातारमिति चैन्द्रयां तु कुर्यादाज्यप्रणुन्नकम् । परोदिवेति याम्यायां वारुण्यां निषसेति च ॥ ३८ या ते रुद्रेति सौम्यां तु हुवेदाज्याहुतीर्नृप। परोमात्रेति सूक्ताभ्यां सर्वत्राज्याहुतीर्नृप ॥ ३९ [हिन्दी अनुवाद] इसके बाद सोलह ऋत्विज् ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक भोजन कराये। उनमेंसे चार ब्राह्मणोंको तो वहाँ वेद-पुराणादिका स्वाध्याय (पाठ) करना चाहिये, चार विप्रोंको उस भगवद्विग्रहकी रक्षामें संलग्न रहना चाहिये तथा चार विद्वानोंको यज्ञमण्डपके भीतर चारों दिशाओंमें हवन करना चाहिये। राजन्! फिर एक ब्राह्मणके द्वारा फूल, अक्षत और अन्नसे समस्त दिशाओंमें बलि अर्पित कराये। यह बलि इन्द्रादि देवताओंकी प्रसन्नताके लिये होती है। प्रत्येक दिशाके अधिपतिको 'इन्द्रः प्रीयताम्' इत्यादि रूपसे उसके नामोच्चारणपूर्वक ही बलि दे। सायंकाल, आधी रात, उषःकाल तथा सूर्योदयके समय प्रत्येक दिक्पालको बलि अर्पित करनी चाहिये। इसके बाद मातृकागणोंको बलि और ब्राह्मणोंको उपहार दे। राजन्! इसके पश्चात् यजमानको चाहिये कि भगवान् विष्णुके मन्दिरमें एक ओर बैठकर एकाग्रचित्तसे बार-बार पुरुषसूक्तका जप करे। फिर पूरे एक दिन-रात उपवास करके शुभ लग्नमें वह बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मणोंको साथ ले मण्डपमें, जहाँ प्रतिमा रखी गयी हो, उस द्वारसे मण्डपके भीतर प्रवेश करे और ब्राह्मणोंके साथ देवसूक्तका पाठ करते हुए भगवत्प्रतिमाका उपस्थान करके उसे मन्दिरमें लाये और विष्णुसूक्त अथवा पवमानसूक्तका पाठ करते हुए उसे वहाँ दृढ़तापूर्वक स्थापित करे। तत्पश्चात् आचार्य कुशयुक्त जलसे उन देवदेवेश्वर भगवान्का अभिषेक करे॥ २९-३५॥ फिर भगवान्के सम्मुख अग्निस्थापन करे। अग्निके चारों ओर यत्नपूर्वक कुशास्तरण करके गायत्री और विष्णुमन्त्रोंद्वारा जातकर्मादि संस्कारकी सिद्धिके निमित्त हवन करे। आचार्यको चाहिये कि प्रत्येक क्रियामें चार-चार बार घीकी आहुति दे तथा अस्त्रमन्त्र (अस्त्राय फट्) बोलकर दिग्बन्ध कराये। 'ॐ त्रातारमिन्द्रम्०' इत्यादि मन्त्र (शु० यजु० २०। ५०)-से अग्निवेदीपर पूर्वकी ओर घीकी आहुति दे। 'परो दिवा०' इत्यादि मन्त्र (शु० यजु० १७। २९)-से दक्षिण दिशामें और 'निषसाद०' इत्यादि मन्त्र (शु० यजु० १०। २७)-से पश्चिममें घृतका हवन करे। हे नृप! 'या ते रुद्र०' (शु० यजु० १६। २)-इस मन्त्रसे उत्तर दिशामें और 'परो मात्रया०' (ऋग्वेद ७। ६। ९९) इत्यादि दो सूक्तोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंमें घीकी आहुति दे। इस प्रकार विधिवत् हवन करके 'यदस्या०' (शु० यजु० २३। २८) इस In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २५१
अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २५१ हुत्वा जपेच्च विधिवद्यदस्येति च स्विष्टकृत् । मन्त्रका जप करे और घीसे 'स्विष्टकृत्' संज्ञक होम ततः स दक्षिणां दद्यादृृत्विग्भ्यश्च यथार्हतः ॥ ४० करे। तदनन्तर ऋत्विजोंको उनके सम्मानके अनुकूल सादर दक्षिणा दे। इसके बाद यजमान आचार्यको दो वस्त्रे द्वे कुण्डले चैव गुरवे चाङ्गुलीयकम्। वस्त्र, दो सुवर्णमय कुण्डल और सोनेकी अंगूठी दे यजमानस्ततो दद्याद्विभवे सति काञ्चनम् ॥ ४१ तथा यदि सामर्थ्य हो तो इसके अतिरिक्त भी सुवर्णदान करे ॥ ३६-४१ ॥ कलशाष्टसहस्रेण कलशाष्टशतेन वा। फिर विद्वान् पुरुष यथासम्भव एक हजार आठ या एकविंशतिना वापि स्नपनं कारयेद् बुधः ॥ ४२ एक सौ आठ अथवा इक्कीस घड़े जलसे भगवान्को स्नान कराये। उस समय शंख और दुन्दुभि आदि बाजे शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्वेदघोषैश्च मङ्गलैः। बजते रहें, वेदमन्त्रोंका घोष और मङ्गलपाठ होता रहे। यवव्रीहियुतैः पात्रैरूद्धतैरूच्छिताङ्कुरैः ॥ ४३ अपनी शक्तिके अनुसार जिनपर जौ आदिके अङ्कुर निकले हों, ऐसे जौ और व्रीहि (चावल)-से भरे पात्रोंद्वारा तथा दीपयष्टिपताकाभिश्च्छत्रचामरतोरणैः । दीप, यष्टि (छड़ी), पताका, छत्र, चँवर, तोरण आदि स्नपनं कारयित्वा तु यथाविभवविस्तरम् ॥ ४४ सामग्रियोंके साथ स्नान-विधि पूर्ण कराके वहाँ भी ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। राजन्! इस प्रकार जो तत्रापि दद्याद्विप्रेभ्यो यथाशक्त्या तु दक्षिणाम्। भगवान् विष्णुकी प्रतिष्ठा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त एवं यः कुरुते राजन् प्रतिष्ठां देवचक्रिणः ॥ ४५ हो जाता है और मृत्युके पश्चात् अपनेसहित इक्कीस सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वभूषणभूषितः । पीढ़ीके पितरोंको साथ ले, सब प्रकारके आभूषणोंसे विमानेन विचित्रेण त्रिःसप्तकुलजैर्वृतः ॥ ४६ भूषित एवं विचित्र विमानपर आरूढ हो, क्रमशः इन्द्रादि लोकोंमें विशेष सम्मान प्राप्त करता है तथा अपने बन्धुजनोंको पूजां सम्प्राप्य महतीमिन्द्रलोकादिषु क्रमात्। उन लोकोंमें रखकर स्वयं विष्णुलोकमें जाकर प्रतिष्ठित बान्धवांस्तेषु संस्थाप्य विष्णुलोके महीयते ॥ ४७ होता है। फिर वहाँ ही भगवत्तत्त्वका ज्ञान प्राप्तकर वह तत्रैव ज्ञानमासाद्य वैष्णवं पदमाप्नुयात्। विष्णुस्वरूपमें लीन हो जाता है ॥ ४२-४७ १/२ ॥ प्रतिष्ठाविधिरयं विष्णोर्मयैवं ते प्रकीर्तितः ॥ ४८ राजन्! इस प्रकार तुमसे मैंने यह प्रतिष्ठा-विधि पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनः ॥ ४९ बतायी। इसका पाठ और श्रवण करनेवाले लोगोंके सब पाप दूर हो जाते हैं। नरनाथ! जब मनुष्य इस पूर्वोक्त यदा नृसिंहं नरनाथ भूमौ विधिसे पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहकी स्थापना कर लेता संस्थाप्य विष्णुं विधिना ह्यनेन । है, तब मृत्युके बाद वह भगवान् विष्णुके उस नित्यधामको तदा ह्यसौ याति हरेः पदं तु प्राप्त होता है, जहाँ रहकर वह पुनः संसारमें नहीं यत्र स्थितोऽयं न निवर्तते पुनः ॥ ५० लौटता ॥ ४८-५० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे प्रतिष्ठाविधिर्नाम षट्पञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'प्रतिष्ठाविधि' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५७
२५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५७ सत्तावनवाँ अध्याय * भक्तके लक्षण; हारीत-स्मृतिका आरम्भ; ब्राह्मणधर्मका वर्णन
राजोवाच भक्तानां लक्षणं ब्रूहि नरसिंहस्य मे द्विज। येषां संगतिमात्रेण विष्णुलोको न दूरतः॥ १
राजा बोले—ब्रह्मन्! आप मुझसे भगवान् नृसिंहके भक्तोंका लक्षण बतलाइये, जिनका सङ्ग करनेमात्रसे विष्णुलोक दूर नहीं रह जाता॥ १॥
श्रीमार्कण्डेय उवाच विष्णुभक्ता महोत्साहा विष्ण्वर्चनविधौ सदा। संयता धर्मसम्पन्नाः सर्वार्थान् साधयन्ति ते॥ २ परोपकारनिरता गुरुशुश्रूषणे रताः। वर्णाश्रमाचारयुताः सर्वेषां सुप्रियंवदाः॥ ३ वेदवेदार्थतत्त्वज्ञा गतरोषा गतस्पृहाः। शान्ताश्च सौम्यवदना नित्यं धर्मपरायणाः॥ ३ हितं मितं च वक्तारः काले शक्त्यातिथिप्रियाः। दम्भमायाविनिर्मुक्ताः कामक्रोधविवर्जिताः॥ ५ ईदृग्विधा नरा धीराः क्षमावन्तो बहुश्रुताः। विष्णुकीर्तनसंजातहर्षा रोमाञ्चिता जनाः॥ ६ विष्ण्वर्चापूजने यत्तास्तत्कथायां कृतादराः। ईदृग्विधा महात्मानो विष्णुभक्ताः प्रकीर्तिताः॥ ७
श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! भगवान् विष्णुके भक्त उनकी पूजा-अर्चा करनेमें महान् उत्साह रखते हैं। वे अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए धर्ममें तत्पर रहकर सारे मनोरथोंको सिद्ध कर लेते हैं। भगवद्भक्त जन सदा परोपकार और गुरु-सेवामें लगे रहते हैं, सबसे मीठे वचन बोलते और अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके सदाचारोंका पालन करते हैं। वे वेद और वेदार्थका तत्त्व जाननेवाले होते हैं, उनमें क्रोध और कामनाओंका अभाव होता है। वे सदा शान्त रहते हैं, उनके मुखपर सौम्यभाव लक्षित होता है तथा वे निरन्तर धर्माचरणमें लगे रहते हैं। थोड़ा किंतु हितकारी वचन बोलते हैं, समयपर अपनी शक्तिके अनुसार सदा अतिथिकी सेवा करनेमें उनका प्रेम बना रहता है। वे दम्भ, कपट, काम और क्रोधसे रहित होते हैं। जो मनुष्य इन पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त एवं धीर हैं, बहुश्रुत और क्षमावान् हैं तथा विष्णुभगवान्के नामोंका कीर्तन अथवा श्रवण करते समय हर्षसे रोमाञ्चित हो जाते हैं, इसी तरह जो विष्णुपूजनमें तत्पर और भगवत्कथामें आदर रखनेवाले हैं, ऐसे महात्मा पुरुष भगवान् विष्णुके भक्त कहे गये हैं॥ २-७॥
राजोवाच ये वर्णाश्रमधर्मस्थास्ते भक्ताः केशवं प्रति। इति प्रोक्तं त्वया विद्वन् भृगुवर्य गुरो मम॥ ८ वर्णानामाश्रमाणां च धर्मं मे वक्तुमर्हसि। यैः कृतैस्तुष्यते देवो नरसिंहः सनातनः॥ ९
राजा बोले—विद्वन्! भृगुवर्य! मेरे गुरुदेव! आपने अभी कहा है कि जो अपने वर्ण और आश्रमके धर्ममें लगे रहते हैं, वे भगवान् विष्णुके भक्त हैं; अतः आप कृपा करके वर्णों और आश्रमोंके धर्म बताइये, जिनके पालन करनेसे सनातन भगवान् नृसिंह संतुष्ट होते हैं॥ ८-९॥
श्रीमार्कण्डेय उवाच अत्र ते वर्णयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम्। मुनिभिः सह संवादं हारीतस्य महात्मनः॥ १० हारीतं धर्मतत्त्वज्ञमासीनं बहुपाठकम्। प्रणिपत्याब्रुवन् सर्वे मुनयो धर्मकाङ्क्षिणः॥ ११
श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—इस विषयमें मुनियोंके साथ महात्मा हारीत ऋषिका संवाद हुआ था; उसी प्राचीन एवं उत्तम इतिहासका आज मैं तुम्हारे समक्ष वर्णन करूँगा॥ १०॥ एक समयकी बात है, धर्मका तत्त्व जाननेकी इच्छावाले समस्त मुनियोंने एक जगह आसनपर आसीन, धर्म- तत्त्ववेत्ता एवं बहुपाठी महात्मा हारीत ऋषिके पास जाकर
- यहाँसे 'हारीत-स्मृति' का प्रारम्भ है। अधुना उपलब्ध 'लघु हारीत स्मृति'के पाठ इसके पाठसे प्रायः मिलते हैं। कुछ-कुछ पाठान्तर भी उपलब्ध होते हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५७ ] भक्तके लक्षण; हारीत-स्मृतिका आरम्भ; ब्राह्मणधर्मका वर्णन २५३
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक। वर्णानामाश्रमाणां च धर्मं प्रब्रूहि शाश्वतम्॥ १२ हारीत उवाच नारायणः पुरा देवो जगत्स्रष्टा जलोपरि। सुष्वाप भोगिपर्यङ्के शयने तु श्रिया सह॥ १३ तस्य सुप्तस्य नाभौ तु दिव्यं पद्ममभूत् किल। तन्मध्ये चाभवद्ब्रह्मा वेदवेदाङ्गभूषणः॥ १४ स चोक्तस्तेन देवेन ब्राह्मणान् मुखतोऽसृजत्। असृजत्क्षत्रियान् बाह्रोर्वैश्यांस्तु ऊरुतोऽसृजत्॥ १५ शूद्रांस्तु पादतः सृष्टास्तेषां चैवानुपूर्वशः। धर्मशास्त्रं च मर्यादां प्रोवाच कमलोद्भवः॥ १६ तद्वत्सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुत द्विजसत्तमाः। धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्॥ १७
उन्हें प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! आप समस्त धर्मोंके ज्ञाता और प्रवर्तक हैं; अतः आप हमलोगोंसे वर्ण और आश्रमोंसे सम्बन्ध रखनेवाले सनातन धर्मका वर्णन कीजिये'॥ ११-१२॥ श्रीहारीतजी बोले—पूर्वकालमें जगत्स्रष्टा भगवान् नारायण जलके ऊपर शेषनागकी शय्यापर श्रीलक्ष्मीजीके साथ शयन करते थे। कहते हैं, शयन-कालमें ही उन भगवान्की नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ और उस कमल-कोषमेंसे वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञानसे विभूषित श्रीब्रह्माजी प्रकट हुए। उन ब्रह्माजीने सृष्टिके लिये भगवान् नारायणकी आज्ञा होनेपर सर्वप्रथम ब्राह्मणोंको अपने मुखसे प्रकट किया। फिर क्षत्रियोंको बाहुओंसे और वैश्योंको जाँघोंसे उत्पन्न किया। अन्तमें उन्होंने चरणोंसे शूद्रोंकी सृष्टि की। फिर कमलोद्भव ब्रह्माजीने क्रमशः उन्हीं ब्राह्मणादि वर्णोंके धर्मका उपदेश करनेवाले शास्त्र और वर्णोंकी मर्यादाका वर्णन किया। द्विजवरो! ब्रह्माजीने जो कुछ उपदेश किया, वह सब मैं आप लोगोंसे कह रहा हूँ; आप सुनें। यह धर्मशास्त्र धन, यश और आयुको बढ़ानेवाला तथा स्वर्ग और मोक्षरूपी फलको देनेवाला है॥ १३-१७॥
ब्राह्मण्यां ब्राह्मणेनैव चोत्पन्नो ब्राह्मणः स्मृतः। तस्य धर्मं प्रवक्ष्यामि तद्योग्यं देशमेव च॥ १८ कृष्णसारो मृगो यत्र स्वभावात्तु प्रवर्तते। तस्मिन् देशे वसेद्धर्मं कुरु ब्राह्मणपुंगव॥ १९ षट्कर्माणि च यान्याहुर्ब्राह्मणस्य मनीषिणः। तैरेव सततं यस्तु प्रवृत्तः सुखमेधते॥ २० अध्ययनमध्यापनं च यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहश्चेति कर्मषट्कमिहोच्यते॥ २१ अध्यापनं च त्रिविधं धर्मस्यार्थस्य कारणम्। शुश्रूषाकारणं चैव त्रिविधं परिकीर्तितम्॥ २२ योग्यानध्यापयेच्छिष्यान् याज्यानपि च याजयेत्। विधिना प्रतिगृह्णींश्च गृहधर्मप्रसिद्धये॥ २३ वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं शुभे देशे समाहितः। नित्यं नैमित्तिकं काम्यं कर्म कुर्यात् प्रयत्नतः॥ २४ गुरुशुश्रूषणं चैव यथान्यायमतन्द्रितः। सायं प्रातरुपासीत विधिनाग्निं द्विजोत्तमः॥ २५
जो ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुई स्त्रीके गर्भ और ब्राह्मणके ही वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, वह 'ब्राह्मण' कहा गया है। अब मैं ब्राह्मणके धर्म और निवास-योग्य देशको बता रहा हूँ। ब्रह्माजीने ब्राह्मणको उत्पन्न करके उनसे कहा—'ब्राह्मणश्रेष्ठ! जिस देशमें कृष्णसार मृग स्वभावतः निवास करता हो, उसी देशमें रहकर तुम धर्मका पालन करो।' मनीषियोंने जो ब्राह्मणके छः कर्म बतलाये हैं, उन्हींके अनुसार जो सदा व्यवहार करता है, वह सुखपूर्वक अभ्युदयशील होता है। अध्ययन (पढ़ना), अध्यापन (पढ़ाना), यजन (यज्ञ करना), याजन (यज्ञ कराना), दान करना और दान लेना—ये ही ब्राह्मणके छः कर्म कहे जाते हैं। इनमेंसे अध्ययन तीन प्रकारका बताया जाता है—पहला धर्मके लिये, दूसरा धनके लिये और तीसरा अपनी सेवा करानेके लिये होता है। ब्राह्मणको चाहिये कि योग्य शिष्योंको पढ़ाये, योग्य यजमानोंका यज्ञ कराये और गृहस्थधर्मकी सिद्धि (जीविका चलाने आदि)-के लिये विधिपूर्वक दूसरेका दान भी ग्रहण करे। शुभ स्थानपर रहकर, एकाग्रचित्त हो, प्रतिदिन वेदका ही अभ्यास करे तथा यत्नपूर्वक नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्मोंका अनुष्ठान करे। श्रेष्ठ ब्राह्मणको चाहिये कि आलस्य त्यागकर उचितरूपसे गुरुजनोंकी सेवा करे और प्रतिदिन प्रातःकाल तथा सायंकाल विधिपूर्वक अग्निकी सेवा किया करे॥ १८-२५॥
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२५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
२५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८ कृतस्नानस्तु कुर्वीत वैश्वदेवं दिने दिने। अतिथिं चागतं भक्त्या पूजयेच्छक्तितो गृही॥ २६ अन्यांश्चागतान् दृष्ट्वा पूजयेदविरोधतः। स्वदारनिरतो नित्यं परदारविवर्जितः॥ २७ सत्यवादी जितक्रोधः स्वधर्मनिरतो भवेत्। स्वकर्मणि च सम्प्राप्ते प्रमादं नैव कारयेत्॥ २८ प्रियां हितां वदेद्वाचं परलोकाविरोधिनीम्। एवं धर्मः समुद्दिष्टो ब्राह्मणस्य समासतः। धर्ममेवं तु यः कुर्यात्स याति ब्रह्मणः पदम्॥ २९ इत्येष धर्मः कथितो मया वै विप्रस्य विप्रा अखिलाघहारी। वदामि राजादिजनस्य धर्मं पृथक्पृथग्बोधत विप्रवर्याः॥ ३० गृहस्थ ब्राह्मण स्नान आदिके बाद प्रतिदिन बलिवैश्वदेव करे और घरपर आये हुए अतिथिका अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक सम्मान करे। एक अतिथिके आ जानेपर यदि दूसरे भी आ जायँ तो उन्हें भी देखकर विरोध न माने, उनका भी यथाशक्ति सम्मान करे। सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखे, दूसरेकी स्त्रीके सम्पर्कसे सदा दूर रहे। सदा सत्य बोले, क्रोध न करे, अपने धर्मका पालन करता रहे। अपने नैतिक आदि कर्मका समय प्राप्त होनेपर प्रमाद न करे। जिससे परलोक न बिगड़े—ऐसी सत्य, प्रिय और हितकारिणी वाणी बोले। इस प्रकार मैंने ब्राह्मण-धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया। जो ब्राह्मण इस प्रकार अपने धर्मका पालन करता है, वह नित्य ब्रह्मधाम (सत्यलोक)-को प्राप्त होता है। विप्रगण! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे यह ब्राह्मण-धर्म कहा है, यह समस्त पापोंको दूर करनेवाला है। विप्रवरो! अब क्षत्रियादि जातियोंका पृथक्-पृथक् धर्म बताता हूँ, आप लोग सुनें॥ २६—३०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे ब्राह्मणधर्मकथनं नाम सप्तपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'ब्राह्मणधर्मका वर्णन' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५७॥ अठ्ठावनवाँ अध्याय क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन हारीत उवाच क्षत्रादीनां प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः। येन येन प्रवर्तन्ते विधिना क्षत्रियादयः॥ १ राज्यस्थः क्षत्रियश्चैव प्रजा धर्मेण पालयेत्। कुर्यादध्ययनं सम्यग्यजेद्यज्ञान् यथाविधि॥ २ दद्याद्दानं द्विजाग्र्येभ्यो धर्मबुद्धिसमन्वितः। स्वदारनिरतो नित्यं परदारविवर्जितः॥ ३ नीतिशास्त्रार्थकुशलः संधिविग्रहतत्त्ववित्। देवब्राह्मणभक्तश्च पितृकार्यपरस्तथा॥ ४ धर्मेणैव जयं काङ्क्षेद्धर्मं परिवर्जयेत्। उत्तमां गतिमाप्नोति क्षत्रियोऽथैवमाचरन्॥ ५ श्रीहारीत मुनि बोले—अब मैं क्रमशः क्षत्रियादि वर्णोंके लिये विहित नियमोंका यथावत् वर्णन करूँगा, जिनके अनुसार क्षत्रियादिको अपना व्यवहार निभाना चाहिये। राजपदपर स्थित क्षत्रियको उचित है कि वह धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करे। उसे भलीभाँति वेदाध्ययन और विधिपूर्वक यज्ञ भी करने चाहिये। धर्मबुद्धिसे युक्त हो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान दे, सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहकर परस्त्रीका त्याग करे, नीतिशास्त्रका अर्थ समझनेमें निपुण हो, संधि और विग्रहका तत्त्व समझे। देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखे, पितरोंका पूजन-श्राद्धादि कर्म करे। धर्मपूर्वक ही विजयकी इच्छा करे, अधर्मको भलीभाँति त्याग दे। इस प्रकार आचरण करनेवाला क्षत्रिय उत्तम गतिको प्राप्त होता है॥ १-५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५५ गोरक्षाकृषिवाणिज्यं कुर्याद्वैश्यो यथाविधि। वैश्यको चाहिये कि वह विधिपूर्वक गोरक्षा, कृषि दानधर्मं यथाशक्त्या गुरुशुश्रूषणं तथा॥ ६ और व्यापार करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दानधर्म और गुरुसेवा भी करे। लोभ और दम्भसे सर्वथा दूर रहे, लोभदम्भर्विनिर्मुक्तः सत्यवागनसूयकः। सत्यवादी हो, किसीके दोष न देखे, मन और इन्द्रियोंको स्वदारनिरतो दान्तः परदारविवर्जितः॥ ७ संयममें रखकर परस्त्रीका त्याग करे और अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहे। यज्ञ-कालमें शीघ्रतापूर्वक ब्राह्मणोंका धनैर्विप्रान् समर्चेत यज्ञकाले त्वरान्वितः। धनसे सम्मान करे तथा आलस्य छोड़कर प्रतिदिन यज्ञाध्ययनदानानि कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः॥ ८ यज्ञ, अध्ययन और दान करता रहे। श्राद्ध-काल प्राप्त पितृकार्यं च तत्काले नरसिंहार्चनं तथा। होनेपर पितृ-श्राद्ध अवश्य करे और नित्यप्रति भगवान् एतद्वैश्यस्य कर्मोक्तं स्वधर्ममनुतिष्ठतः॥ ९ श्रीनृसिंहदेवका पूजन करे। अपने धर्मका पालन करनेवाले वैश्यके लिये यही कर्तव्य कर्म बतलाया गया है। पूर्वोक्त एतदासेवमानस्तु स स्वर्गी स्यान्न संशयः। कर्मका पालन करनेवाला वैश्य निःसंदेह स्वर्गलोकका वर्णत्रयस्य शुश्रूषां कुर्याच्छूद्रः प्रयत्नतः॥१० अधिकारी होता है॥ ६-९ १/२ ॥ दासद्वद्ब्राह्मणानां च विशेषेण समाचरेत्। शूद्रको चाहिये कि वह यत्नपूर्वक इन तीनों अयाचितं प्रदातव्यं कृषिं वृत्त्यर्थमाचरेत्॥ ११ वर्णोंकी सेवा करे और ब्राह्मणोंकी तो दासकी भाँति विशेषरूपसे शुश्रूषा करे। किसीसे माँगकर नहीं, अपनी ग्रहाणां मासिकं कार्यं पूजनं न्यायधर्मतः। ही कमाईका दान करे। जीविकाके लिये कृषि-कर्म धारणं जीर्णवस्त्रस्य विप्रस्योच्छिष्टमार्जनम्॥ १२ करे। प्रत्येक मासमें न्याय और धर्मके अनुसार ग्रहोंका पूजन करे, पुराना वस्त्र धारण करे। ब्राह्मणका जूठा स्वदारेषु रतिं कुर्यात् परदारविवर्जितः। बर्तन माँजे। अपनी स्त्रीमें अनुराग रखे। परस्त्रियोंको पुराणश्रवणं विप्रान्नृसिंहस्य पूजनम्॥ १३ दूरसे ही त्याग दे। ब्राह्मणके मुखसे पुराणकथा श्रवण तथा विप्रनमस्कारं कार्यं श्रद्धासमन्वितम्। करे, भगवान् नरसिंहका पूजन करे। इसी प्रकार सत्यसम्भाषणं चैव रागद्वेषविवर्जनम्॥ १४ ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक नमस्कार करे। राग-द्वेष त्याग दे और सत्यभाषण करे। इस प्रकार मन, वाणी, शरीर इत्थं कुर्वन् सदा शूद्रो मनोवाक्कायकर्मभिः। और कर्मसे आचरण करनेवाला शूद्र पापरहित हो स्थानमैन्द्रमवाप्नोति नष्टपापस्तु पुण्यभाक्॥ १५ पुण्यका भागी होता है और मृत्युके पश्चात् इन्द्रलोकको वर्णेषु धर्मा विविधा मयोक्ता प्राप्त होता है॥ १०-१५ ॥ यथाक्रमं ब्राह्मणवर्यसाधिताः। मुनीन्द्रगण! वर्णोंके ये नाना प्रकारके धर्म मैंने आप शृणुध्वमत्राश्रमधर्ममाद्यं लोगोंसे क्रमशः कहे हैं। इन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने बतलाया मयोच्यमानं क्रमशॊ मुनीन्द्राः॥ १६ है। अब मैं क्रमसे प्रथम ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्म बता रहा हूँ, आप लोग सुनें॥ १६ ॥ हारीत उवाच श्रीहारीत मुनि बोले—उपनयन-संस्कार हो जानेके उपनीतो माणवको वसेद्गुरुकुले सदा। बाद ब्रह्मचारी बालक सदा गुरुकुलमें निवास करे। उसको गुरोः प्रियहितं कार्यं कर्मणा मनसा गिरा॥ १७ चाहिये कि मन, वाणी और कर्मसे गुरुका प्रिय और हित In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
२५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८ ब्रह्मचर्यमधःशय्या तथा वह्नेरुपासनम्। उदकुम्भं गुरोर्दद्यात्तथा चेन्धनमाहरेत् ॥ १८ कुर्यादध्ययनं पूर्वं ब्रह्मचारी यथाविधि। विधिं हित्वा प्रकुर्वाणो न स्वाध्यायफलं लभेत् ॥ १९ यत्किंचित् कुरुते कर्म विधिं हित्वा निरात्मकः। न तत्फलमवाप्नोति कुर्वाणो विधिविच्युतः ॥ २० तस्मादेवं व्रतानीह चरेत् स्वाध्यायसिद्धये । शौचाचारमशेषं तु शिक्षयेद्गुरुसंनिधौ ॥ २१ अजिनं दण्डकाष्ठं च मेखलां चोपवीतकम्। धारयेदप्रमत्तस्तु ब्रह्मचारी समाहितः ॥ २२ सायं प्रातश्चरेद्भैक्षं भोजनं संयतेन्द्रियः। गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु ॥ २३ अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वपूर्वं च वर्जयेत्। आचम्य प्रयतो नित्यमश्नीयाद्गुर्वनुज्ञया ॥ २४ शयनात् पूर्वमुत्थाय दर्भमृद्दन्तशोधनम्। वस्त्रादिकमथान्यच्च गुरवे प्रतिपादयेत् ॥ २५ स्नाने कृते गुरौ पश्चात् स्नानं कुर्वीत यत्नवान्। ब्रह्मचारी व्रती नित्यं न कुर्याद्दन्तशोधनम् ॥ २६ छत्रोपानहमभ्यङ्गं गन्धमाल्यानि वर्जयेत्। नृत्यगीतकथालापं मैथुनं च विशेषतः ॥ २७ वर्जयेन्मधु मांसं च रसास्वादं तथा स्त्रियः । कामं क्रोधं च लोभं च परिवादं तथा नृणाम् ॥ २८ स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भमुपघातं परस्य च। एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत् क्वचित् ॥ २९ स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः । स्नात्वार्कमर्चयित्वाग्निं पुनर्मामित्यृचं जपेत् ॥ ३० --- [हिन्दी अनुवाद] --- करे। वह ब्रह्मचर्यका पालन, भूमिपर शयन और अग्निकी उपासना करे। गुरुके लिये जलका घड़ा भरकर लाये और हवनके निमित्त समिधा ले आये। इस प्रकार सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहकर विधिपूर्वक अध्ययन करना चाहिये। जो विधिको त्याग करके अध्ययन करता है, उसे उस अध्ययनका फल नहीं प्राप्त होता (उसकी विद्या सफल नहीं होती)। विधिकी अवहेलना करके वह जो कुछ भी कर्म करता है, विधिभ्रष्ट एवं नास्तिक होनेके कारण उसे उसका फल नहीं मिलता। इसलिये गुरुकुलमें रहकर अपने अध्ययनकी सफलताके लिये उपर्युक्त व्रतोंका आचरण करना चाहिये और गुरुके निकट समस्त शौचाचारोंको सीखना चाहिये। ब्रह्मचारी सावधान और एकाग्रचित्त रहकर मृगचर्म, पलाशदण्ड, मेखला और उपवीत (जनेऊ) धारण करे। अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर सायंकाल और प्रातःकाल भिक्षासे मिला हुआ अन्न भोजन करे। गुरुके कुलमें और उनके कुटुम्बी बन्धु-बान्धवोंके घरमें भिक्षा न माँगे। दूसरेके घर न मिले तो पूर्वोक्त घरोंमेंसे भी भिक्षा ले सकता है; किंतु यथासाध्य पूर्व-पूर्व गृहोंका त्याग करे। अर्थात् पहले कहे हुए गुरुगृह या गुरुकुलका त्यागकर अन्यत्र भिक्षा ले। नित्य आचमन करके शुद्धचित्त होकर गुरुकी आज्ञासे भोजन करे। रात्रि बीतनेपर गुरुसे पहले ही अपने आसनसे उठ जाय और गुरुके लिये कुश, मिट्टी, दाँतुन और वस्त्र आदि अन्य सामान एकत्र करके उनको दे। गुरुजीके स्नान कर लेनेपर स्वयं यत्नपूर्वक स्नान करे। ब्रह्मचारी सदा व्रत रखे और काठ आदिसे दन्तधावन न करे॥ १७-२६॥ छाता, जूता, उबटन, गन्धयुक्त इत्र आदि और फूल-माला आदिको त्याग दे। विशेषतः नाच, गान और ग्राम्य कथा-वार्ता एवं मैथुनका सर्वथा त्याग करे। मधु, मांस और रसास्वाद (जिह्वाके स्वाद)-को त्याग दे। स्त्रियोंसे अलग रहे। काम, क्रोध, लोभ तथा दूसरे मनुष्योंके अपवाद (निन्दा)-का परित्याग करे। स्त्रियोंकी ओर देखने, उनका स्पर्श करने और दूसरे जीवोंकी हिंसा करने आदिसे बचकर रहे। सब जगह अकेले ही शयन करे, कभी कहीं भी वीर्यपात न करे। यदि कामभाव न होनेपर भी स्वप्नमें वीर्य-स्खलन हो जाय तो ब्रह्मचारी द्विजको चाहिये, वह स्नान करके सूर्य और अग्निकी आराधना करे तथा 'पुनर्मामेत्विन्द्रियम्' इस In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५७
आस्तिकोऽहरहः संध्यां त्रिकालं संयतेन्द्रियः । उपासीत यथान्यायं ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ॥ ३१
अभिवाद्य गुरोः पादौ संध्याकर्मावसानतः । यथायोग्यं प्रकुर्वीत मातापित्रोस्तु भक्तितः ॥ ३२
एतेषु त्रिषु तुष्टेषु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः । तदेषां शासने तिष्ठेद्ब्रह्मचारी विमत्सरः ॥ ३३
अधीत्य चतुरो वेदान् वेदौ वेदमथापि वा। गुरवे दक्षिणां दत्त्वा तदा स्वस्वेच्छया वसेत् ॥ ३४
विरक्तः प्रव्रजेद्विद्वान् संरक्तस्तु गृही भवेत् । सरागो नरकं याति प्रव्रजन् हि ध्रुवं द्विजः ॥ ३५
यस्यैतानि सुशुद्धानि जिह्वोपस्थोदरं गिरः । संन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ॥ ३६
एवं यो विधिमास्थाय नयेत् कालमतन्द्रितः । तेन भूयः प्रजायेत ब्रह्मचारी दृढव्रतः ॥ ३७
यो ब्रह्मचारी विधिमेतमास्थित- श्ररेत् पृथिव्यां गुरुसेवने रतः । सम्प्राप्य विद्यामपि दुर्लभां तां फलं हि तस्याः सकलं हि विन्दति ॥ ३८
ऋचाका जप करे। ईश्वर और परलोकके अस्तित्वपर विश्वास करता हुआ, ब्रह्मचारियोंके लिये उचित व्रतके पालनमें तत्पर रहकर, जितेन्द्रिय हो, प्रतिदिन न्यायतः प्राप्त त्रिकालसंध्याकी उपासना करे। संध्या-कर्म समाप्त होनेपर गुरुके चरणोंमें प्रणाम करे और यदि सुयोग प्राप्त हो तो माता-पिताके चरणोंमें भी भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न रहते हैं; इसलिये ब्रह्मचारीको चाहिये कि डाह छोड़कर इन तीनोंके शासनमें रहे। यथासम्भव चार, दो अथवा एक ही वेदका अध्ययन पूर्ण करके गुरुको दक्षिणा दे। फिर अपने इच्छानुसार कहीं भी निवास करे। यदि वह विद्वान् ब्रह्मचारी विरक्त हो, तब तो संन्यासी हो जाय; किंतु यदि उसका विषय-भोगोंके प्रति अनुराग हो तो गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे। द्विजो! रागी पुरुष यदि संन्यासी हो जाय तो वह निश्चय ही नरकमें जाता है। जिसकी जिह्वा, उपस्थ (जननेन्द्रिय), उदर और वाणी शुद्ध हों, अर्थात् जो स्वाद, काम और बुभुक्षाको जीत चुका हो और सत्यवादी या मौन रहता हो, वह पुरुष यदि ब्रह्मचर्यवान् ब्राह्मण हो तो वह विवाह न करके संन्यास ले सकता है॥ २७-३६॥
इस प्रकार जो आलस्य त्यागकर विधिका पालन करते हुए ही समय-यापन करता है, वह ब्रह्मचारी अधिकाधिक दृढ़ व्रतवाला होता है। जो ब्रह्मचारी पूर्वोक्त विधिका सहारा लेकर गुरु-सेवापरायण हो पृथ्वीपर भ्रमण करता है, वह दुर्लभ विद्याको भी सीखकर उसके सम्पूर्ण फलोंको प्राप्त कर लेता है* ॥ ३७-३८ ॥
हारीत उवाच
गृहीतवेदाध्ययनः श्रुतिशास्त्रार्थतत्त्ववित् । गुरोर्दत्तवरः सम्यक् समावर्तनमारभेत् ॥ ३९
असमाननामगोत्रां कन्यां भ्रातृयुतां शुभाम् । सर्वावयवसंयुक्तां सद्वृत्तामुद्वहेत्ततः ॥ ४०
नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् । वाचालामसतिलोमां च न व्यङ्गां भीमदर्शनाम् ॥ ४१
श्रीहारीत मुनि कहते हैं—पूर्वोक्त रीतिसे वेदाध्ययन समाप्तकर श्रुति तथा अन्यान्य शास्त्रोंके अर्थ एवं तत्त्वका ज्ञान रखनेवाला ब्रह्मचारी विद्वान् गुरुसे आशीर्वाद प्राप्तकर विधिपूर्वक समावर्तन-संस्कार आरम्भ करे। फिर, जिसके नाम और गोत्र अपनेसे भिन्न हों, जिसके भाई भी हो, जो सुन्दरी एवं शुभ लक्षणोंवाली हो, जिसके शरीरके सभी अवयव अविकल हों और जिसका आचरण उत्तम हो, ऐसी कन्याके साथ विवाह करे। जिसके शरीरका रंग कपिल हो, जो अधिकाङ्गी या रोगिणी हो, बहुत बोलनेवाली और अधिक रोमवाली हो, जिसका कोई अङ्ग विकृत या
- इससे आगे 'हारीत उवाच' पुनः दिया गया है। इससे जान पड़ता है, यह अध्याय यहाँ पूर्ण हो गया है।
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२५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
२५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८ नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्तपर्वतनामिकाम्। हीन हो और जिसकी सूरत डरावनी हो, ऐसी कन्यासे न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्॥ ४२ विवाह न करे। जिसका नाम नक्षत्र, वृक्ष या नदीके नामपर रखा गया हो, अथवा जिसके नामके अन्तमें पर्वतवाचक अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम्। शब्द हो, अथवा जो पक्षी, साँप और दास आदि अर्थवाले तन्वोष्ठकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत् स्त्रियम्॥ ४३ नामोंसे युक्त हो, या जिसका भयंकर नाम हो, ऐसी कन्यासे भी विवाह न करे। जिसके शरीरके सभी अवयव ब्राह्मेण विधिना कुर्यात् प्रशस्तेन द्विजोत्तमः। सुडौल हों, नाम कोमल और मधुर हो, जो हंस या गजराजके समान मन्द एवं लीलायुक्त गतिसे चलनेवाली यथायोगं तथा ह्येवं विवाहं वर्णधर्मतः॥ ४४ हो, जिसके अधर, दाँत और केश पतले हों एवं जिसका शरीर कोमल हो, ऐसी कन्यासे विवाह करे। श्रेष्ठ द्विजातिको उषःकाले समुत्थाय कृतशौचो द्विजोत्तमः। चाहिये कि यथासम्भव सर्वोत्तम ब्राह्मविधिसे विवाह करे। कुर्यात् स्नानं ततो विद्वान्दन्तधावनपूर्वकम्॥ ४५ इस प्रकार वर्णधर्मके अनुसार विवाह-संस्कार पूर्ण करना चाहिये॥ ३९-४४॥ मुखे पर्युषिते नित्यं यतोऽपूतो भवेन्नरः। इसके बाद विद्वान् द्विजको चाहिये कि प्रतिदिन तस्माच्छुष्कमथार्द्रं वा भक्षयेद्दन्तधावनम्॥ ४६ सूर्योदयसे पूर्व उठकर शौचादिके अनन्तर दन्तधावन करके तुरंत स्नान कर ले। प्रतिदिन रातमें सोकर उठनेके खदिरं च कदम्बं च करञ्जं च वटं तथा। बाद मुख पर्युषित होनेके कारण मनुष्य अपवित्र रहता है, अपामार्गं च बिल्वं च अर्कश्चोदुम्बरस्तथा॥ ४७ अतः शुद्धि के लिये सूखा या गीला दन्तधावन अवश्य चबाना चाहिये। दाँतुनके लिये खदिर, कदम्ब, करञ्ज, एते प्रशस्ताः कथिता दन्तधावनकर्मणि। वट, अपामार्ग, बिल्व, मदार और गूलर—ये वृक्ष उत्तम दन्तधावनकाष्ठं च वक्ष्यामि तत्प्रशस्तताम्॥ ४८ माने गये हैं। दन्तधावनके लिये उपयुक्त काष्ठ और उसकी उत्तमताका लक्षण बता रहा हूँ॥ ४५-४८॥ सर्वे कण्टकिनः पुण्याः क्षीरिणस्तु यशस्विनः। जितने काँटेवाले वृक्ष हैं, वे सभी पवित्र हैं। जितने अष्टाङ्गुलेन मानेन तत्प्रमाणमिहोच्यते॥ ४९ दूधवाले वृक्ष हैं, वे सभी यश देनेवाले हैं। दाँतुनकी लकड़ीकी लम्बाई आठ अंगुलकी बतायी जाती है। अथवा बित्तामात्र प्रादेशमात्रमथवा तेन दन्तान् विशोधयेत्। उसकी लम्बाई होनी चाहिये। ऐसी दाँतुनसे दाँतोंको स्वच्छ प्रतिपद्दर्शषष्ठीषु नवम्यां चैव सत्तमाः॥ ५० करना चाहिये। परंतु साधुशिरोमणियो! प्रतिपदा, अमावास्या, षष्ठी और नवमीको काठकी दाँतुन नहीं करनी चाहिये; दन्तानां काष्ठसंयोगाद् दहत्यासप्तमं कुलम्। क्योंकि उक्त तिथियोंको यदि दाँतसे काठका संयोग हो अलाभे दन्तकाष्ठस्य प्रतिषिद्धे च तद्दिने॥ ५१ जाय तो वह सात पीढ़ीत्तकके कुलको दग्ध कर डालता है। जिस दिन दाँतुन न मिले या जिस दिन दाँतुन करना अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखशुद्धिर्विधीयते। निषिद्ध है, उस दिन बारह बार जलका कुल्ला करके मुखकी शुद्धि कर लेनेकी विधि है॥ ४९-५१ १/२॥ स्नात्वा मन्त्रवदाचम्य पुनराचमनं चरेत्॥ ५२ दाँतुनके बाद स्नान करे। फिर मन्त्रपाठपूर्वक आचमन करके पुनः आचमन करना चाहिये। मन्त्रपाठपूर्वक अपने मन्त्रवान् प्रोक्ष्य चात्मानं प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिम्। ऊपर भी जल छिड़के और सूर्यके लिये अर्घ्यके तौरपर आदित्येन सह प्रातर्मन्देहा नाम राक्षसाः॥ ५३ जलाञ्जलि भरकर उछाले। अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके वरदानसे In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 13 Narsingpuran_Section_10__Back
अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५९ युध्यन्ति वरदानेन ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । प्रबल हुए 'मन्देह' नामक राक्षस प्रतिदिन प्रातःकाल उदकाञ्जलिविक्षेपो गायत्र्या चाभिमन्त्रितः ॥ ५४ आकर सूर्यके साथ युद्ध करते हैं; किंतु जब गायत्रीसे अभिमन्त्रित जलाञ्जलि सूर्यदेवके सामने उछाली जाती है, तान् हन्ति राक्षसान् सर्वान् मन्देहान् रविवैरिणः । तब वह उन समस्त सूर्य-वैरी मन्देह नामके राक्षसोंको ततः प्रयाति सविता ब्राह्मणै रक्षितो दिवि ॥ ५५ मार भगाती है।* तत्पश्चात् महाभाग मरीचि आदि ब्राह्मणों और सनकादिक योगियोंद्वारा रक्षित हो, भगवान् सूर्यदेव मरीच्याद्यैर्महाभागैः सनकाद्यैश्च योगिभिः । आकाशमें आगे बढ़ते हैं। इसलिये द्विजको चाहिये कि तस्मान्न लङ्घयेत्संध्यां सायं प्रातःर्द्विजः सदा ॥ ५६ सायं और प्रातःकालकी संध्याका कभी उल्लङ्घन न करे। जो मोहवश संध्याका उल्लङ्घन करता है, वह अवश्य उल्लङ्घयति यो मोहात्स याति नरकं ध्रुवम् । ही नरकमें पड़ता है। यदि सायंकालमें मन्त्रपाठपूर्वक सायं मन्त्रवदाचम्य प्रोक्ष्य सूर्यस्य चाञ्जलिम् ॥ ५७ आचमन करके अपने ऊपर जल छिड़ककर फिर भगवान् सूर्यको जलाञ्जलि अर्पित की जाय और उनकी परिक्रमा दत्त्वा प्रदक्षिणं कृत्वा जलं स्पृष्ट्वा विशुध्यति । करके पुनः जलका स्पर्श किया जाय तो वह द्विज शुद्ध पूर्वा संध्यां सनक्षत्रामुपक्रम्य यथाविधि ॥ ५८ हो जाता है। प्रातःकालकी संध्या तारोंके रहते-रहते विधिपूर्वक आरम्भ करे और जबतक तारोंका दर्शन हो, गायत्रीमभ्यसेत्तावद्यावदृक्षाणि पश्यति । तबतक गायत्रीका जप करता रहे। तत्पश्चात् घरमें आकर ततस्त्वावसथं प्राप्य होमं कुर्यात्स्वयं बुधः ॥ ५९ विद्वान् पुरुषको स्वयं हवन करना चाहिये। फिर जो भृत्य-पालनीय कुटुम्बीजन तथा दास आदि हों, उनके संचिन्त्य भृत्यवर्गस्य भरणार्थं विचक्षणः । भरण-पोषणके लिये विद्वान् गृहस्थ चिन्ता (आवश्यक ततः शिष्यहितार्थाय स्वाध्यायं किंचिदाचरेत् ॥ ६० प्रबन्ध) करे। उसके बाद शिष्योंके हितके लिये कुछ देरतक स्वाध्याय करे। उत्तम द्विजको चाहिये कि अपनी ईश्वरं चैव रक्षार्थमभिगच्छेद्द्विजोत्तमः । रक्षाके लिये ईश्वरका सहारा ले। फिर दूर जाकर पूजाके कुशपुष्पेन्धनादीनि गत्वा दूरात्समाहरेत् ॥ ६१ लिये कुश, फूल और हवनके लिये समिधा आदि ले आये और पवित्र स्थानमें एकाग्रचित्तसे बैठकर मध्याह्नकालिक माध्याह्निकीं क्रियां कुर्याच्छुचौ देशे समाहितः । क्रिया (संध्योपासना आदि) करे ॥ ५२-६११/२ ॥ विधिं स्नानस्य वक्ष्यामि समासात् पापनाशनम् ॥ ६२ अब हम थोड़ेमें स्नानकी विधि बतला रहे हैं जो स्नात्वा येन विधानेन सद्यो मुच्येत किल्बिषात् । समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली है। उस विधिसे स्नान सुधीः स्नानार्थमादाय शुक्लां कुशतिलैः सह ॥ ६३ करके मनुष्य तत्काल पापोंसे मुक्त हो जाता है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि स्नानके लिये कुश और तिलोंके साथ सुमनाश्च ततो गच्छेन्नदीं शुद्धां मनोरमाम् । शुद्ध मिट्टी ले ले तथा प्रसन्नचित्त होकर शुद्ध और मनोहर नद्यां तु विद्यमानायां न स्नायादल्पवारिषु ॥ ६४ नदीके तटपर जाय। नदीके होते हुए छोटे जलाशयोंमें स्नान न करे। वहाँ पवित्र स्थानपर उसे छिड़ककर कुश और शुचौ देशे समभ्युक्ष्य स्थापयेत्कुशमृत्तिकाम् । मृत्तिका आदि रख दे। फिर विद्वान् पुरुष मिट्टी और जलसे मृत्तोयेन स्वकं देहमभिप्रक्षाल्य यत्नतः ॥ ६५
- यहाँ 'मन्देह' राक्षस आलस्यके प्रतीक हैं। जिस देशमें जब रात बीतकर प्रातःकाल होता है, वहाँके लोगोंको उसी समय आलस्य दबाये रहता है। 'सूर्य आत्मा जगतः' के अनुसार सूर्य सबके आत्मा हैं, अतः किसी भी प्राणीपर आलस्यका आक्रमण सूर्यपर मन्देहका आक्रमण है। स्नान और सूर्यार्घ्यसे इस मन्देह या आलस्यका निवारण सबके प्रत्यक्ष अनुभवमें आता है।
२६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
२६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
स्नानाच्छरीरं संशोध्य कुर्यादाचमनं बुधः। शुभे जले प्रविश्याथ नमेद्वरुणामप्पतिम् ॥ ६६
हरिमेव स्मरंश्चित्ते निमज्जेच्च बहूदके । ततः स्नानं समासाद्य अप आचम्य मन्त्रतः ॥ ६७
प्रोक्षयेद्वरुणं देवं तैर्मन्त्रैः पावमानिभिः । कुशाग्रस्थेन तोयेन प्रोक्ष्यात्मानं प्रयत्नतः ॥ ६८
आलभेन्मृत्तिकां गात्रे इदं विष्णुरिति त्रिधा । ततो नारायणं देवं संस्मरन् प्रविशेज्जलम् ॥ ६९
निमज्यान्तर्जले सम्यक्त्रिः पठेद्घमर्षणम्। स्नात्वा कुशतलैस्तद्वद्देवर्षीन् पितृभिः सह ॥ ७०
तर्पयित्वा जलात्तस्मान्निष्क्रम्य च समाहितः । जलतीरं समासाद्य धौते शुक्ले च वाससी ॥ ७१
परिधायोत्तरीयं च न कुर्यात्केशधूननम् । न रक्तमुल्बणं वासो न नीलं तत्प्रशस्यते ॥ ७२
मलाक्तं तु दशाहीनं वर्जयेदम्बरं बुधः । ततः प्रक्षालयेत्पादौ मृत्तोयेन विचक्षणः ॥ ७३
त्रिः पिबेद्वीक्षितं तोयमास्यं द्विः परिमार्जयेत् । पादौ शिरसि चाभ्युक्ष्येत्रिराचम्य तु संस्पृशेत् ॥ ७४
अङ्गुष्ठेन प्रदेशिन्या नासिकां समुपस्पृशेत् । अङ्गुष्ठकनिष्ठिकाभ्यां नाभौ हृदि तलेन च ॥ ७५
शिरश्चाङ्गुलिभिः सर्वैर्बाहुं चैव ततः स्पृशेत् । अनेन विधिनाऽऽचम्य ब्राह्मणः शुद्धमानसः ॥ ७६
दर्भे तु दर्भपाणिः स्यात् प्राङ्मुखः सुसमाहितः । प्राणायामांस्तु कुर्वीत यथाशास्त्रमतन्द्रितः ॥ ७७
अपने शरीरको यत्नपूर्वक लिप्त करके, शुद्ध स्नानके द्वारा उसे धोकर पुनः आचमन करे। तदनन्तर स्वच्छ जलमें प्रवेश करके जलेश वरुणको नमस्कार करे। फिर मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए जहाँ कुछ अधिक जल हो, वहाँ डुबकी लगाये। इसके बाद स्नान समाप्तकर, मन्त्रपाठपूर्वक आचमन करके, वरुणसम्बन्धी पवमान-मन्त्रोंद्वारा वरुणदेवका अभिषेक करे। फिर कुशके अग्रभागपर स्थित जलसे अपना यत्नपूर्वक मार्जन करे और 'इदं विष्णुर्विचक्रमे' इस मन्त्रका पाठ करते हुए अपने शरीरके तीन भागोंमें क्रमशः मृत्तिकाका लेप करे। तत्पश्चात् भगवान् नारायणका स्मरण करते हुए जलमें प्रवेश करे। जलके भीतर भली प्रकार डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण पाठ करे। इस प्रकार स्नान करके कुश और तिलोंद्वारा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करे। इसके बाद समाहितचित्त हो, जलसे बाहर निकल, तटपर आकर धुले हुए दो श्वेत वस्त्रोंको धारण करे। इस प्रकार धोती और उत्तरीय धारणकर अपने केशोंको न फटकारे। अत्यधिक लाल और नील वस्त्र धारण करना भी उत्तम नहीं माना गया है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जिस वस्त्रमें मल या दाग लगा हो, अथवा जिसमें किनारी न हो, उसका भी त्याग करे॥ ६२-७२१/२॥
इसके पश्चात् विज्ञ पुरुष मिट्टी और जलसे अपने चरणोंको धोये। फिर खूब देख-भालकर शुद्ध जलसे तीन बार आचमन करे। दो बार जल लेकर मुँह धोये। पैर और सिरपर जल छिड़के। फिर तीन बार आचमन करके क्रमशः अङ्गोंका स्पर्श करे। अँगूठे और तर्जनीसे नासिकाका स्पर्श करे। अङ्गुष्ठ और कनिष्ठिकासे नाभिका स्पर्श करे। हृदयका करतलसे स्पर्श करे। तदनन्तर समस्त अँगुलियोंसे पहले सिरका, फिर बाहुओंका स्पर्श करे। इस प्रकार आचमन करके ब्राह्मण शुद्धहृदय हो, हाथमें कुश ले, पूर्वकी ओर मुख करके एकाग्रतापूर्वक कुशासनपर बैठ जाय और आलस्यको त्यागकर शास्त्रोक्त विधिसे तीन बार प्राणायाम करे॥ ७३-७७॥
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अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २६१ जपयज्ञं ततः कुर्याद्गायत्रीं वेदमातरम्। त्रिविधो जपयज्ञः स्यात्तस्य भेदं निबोधत ॥ ७८ वाचिकश्च उपांशुश्च मानसस्त्रिविधः स्मृतः। त्रयाणां जपयज्ञानां श्रेयः स्यादुत्तरोत्तरम् ॥ ७९ यदुच्चनीचस्वरितैः स्पष्टशब्दवदक्षरैः। शब्दमुच्चारयेद्वाचा जपयज्ञः स वाचिकः ॥ ८० शनैरुच्चारयेन्मन्त्रमीषदोष्ठौ प्रचालयेत्। किंचिन्मन्त्रं स्वयं विन्द्यादुपांशुः स जपः स्मृतः ॥ ८१ धिया यदक्षरश्रेण्या वर्णाद्वर्णं पदात्पदम्। शब्दार्थचिन्तनं ध्यानं तदुक्तं मानसं जपः ॥ ८२ जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति। प्रसन्ना विपुलान् भोगान्दद्यान्मुक्तिं च शाश्वतीम् ॥ ८३ यक्षरक्षःपिशाचाश्च ग्रहाः सूर्यादिदूषणाः। जापिनं नोपसर्पन्ति दूरादेवापयान्ति ते ॥ ८४ ऋक्षादिकं परिज्ञाय जपयज्ञमतन्द्रितः। जपेदहरहः स्नात्वा सावित्रीं तन्मना द्विजः ॥ ८५ सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्। गायत्रीं यो जपेन्नित्यं न स पापैर्हि लिप्यते ॥ ८६ अथ पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा भानवे चोर्ध्वबाहुकः। उदुत्यं च जपेन्मन्त्रं चित्रं तच्चक्षुरित्यपि ॥ ८७ प्रदक्षिणमुपावृत्य नमस्कुर्याद्दिवाकरम्। स्वेन तीर्थेन देवाद्दीनद्भिः संतर्पयेद्बुधः ॥ ८८ देवान् देवगणांश्चैव ऋषीन्ऋषिगणांस्तथा। पितॄन् पितृगणांश्चैव नित्यं संतर्पयेद्बुधः ॥ ८९ स्नानवस्त्रं ततः पीड्य पुनराचमनं चरेत्। दर्भेषु दर्भपाणिः स्याद्ब्रह्मयज्ञविधानतः ॥ ९० प्राङ्मुखो ब्रह्मयज्ञं तु कुर्याद्बुद्धिसमन्वितः। ततोऽर्धं भानवे दद्यात्तिलपुष्पजलान्वितम् ॥ ९१ तत्पश्चात् वेदमाता गायत्रीका जप करते हुए जपयज्ञ करे। जपयज्ञ तीन प्रकारका होता है; उसका भेद बताते हैं, आप लोग सुनें। वाचिक, उपांशु और मानस—तीन प्रकारका जप कहा गया है। इन तीनों जपयज्ञोंमें उत्तरोत्तर जप श्रेष्ठ है, अर्थात् वाचिक जपकी अपेक्षा उपांशु और उसकी अपेक्षा मानस जप श्रेष्ठ है। अब इनके लक्षण बताते हैं। जप करनेवाला पुरुष आवश्यकतानुसार ऊँचे, नीचे और समान स्वरोंमें बोले जानेवाले स्पष्ट शब्दयुक्त अक्षरोंद्वारा जो वाणीसे सुस्पष्ट शब्दोच्चारण करता है, वह 'वाचिक जप' कहलाता है। इसी प्रकार जो तनिक-सा ओठोंको हिलाकर धीरे-धीरे मन्त्रका उच्चारण करता है और मन्त्रको स्वयं ही कुछ-कुछ सुनता या समझता है, उसका वह जप 'उपांशु' कहलाता है। बुद्धिके द्वारा मन्त्राक्षरसमूहके प्रत्येक वर्ण, प्रत्येक पद और शब्दार्थका जो चिन्तन एवं ध्यान किया जाता है, वह 'मानस जप' कहा गया है। जपके द्वारा प्रतिदिन जिसका स्तवन किया जाता है, वह देवता प्रसन्न होता है और प्रसन्न होनेपर वह विपुल भोग तथा नित्य मोक्ष-सुखको भी देता है। यक्ष-राक्षस-पिशाच आदि और सूर्यादि देवताओंको दूषित करने-वाले अन्य (राहु-केतु आदि) ग्रह भी जप करनेवाले पुरुषके निकट नहीं जाते, दूरसे ही भाग जाते हैं॥ ७८-८४॥ द्विजको चाहिये कि वह आलस्यका त्याग करके प्रतिदिन तारोंको देखकर अर्थात् तारोंके रहते-रहते स्नान करके, गायत्रीके अर्थमें मन लगा गायत्री-मन्त्रका जप करे। जो द्विज अधिक-से-अधिक एक हजार, साधारणतया एक सौ अथवा कम-से-कम दस बार प्रतिदिन गायत्रीका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता ॥ ८५-८६ ॥ इसके बाद सूर्यदेवको पुष्पाञ्जलि अर्पित करके अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर 'ॐ उदुत्यं जातवेदसम्....' तथा 'ॐ तच्चक्षुर्देवहितम्....' इन मन्त्रोंका जप करे। फिर प्रदक्षिणा करके सूर्यदेवको प्रणाम करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष प्रतिदिन देवतीर्थसे (उँगलियोंद्वारा) देवताओंका तर्पण करे। विज्ञ पुरुषको देवताओं और उनके गणोंका, ऋषियों और उनके गणोंका तथा पितरों और पितृगणोंका प्रतिदिन तर्पण करना चाहिये। तदनन्तर स्नानके बाद उतारे हुए वस्त्रको निचोड़कर पुनः आचमन करे। फिर हाथमें कुश लेकर कुशासनपर बैठ जाय और ब्रह्मयज्ञकी विधिके अनुसार पूर्वाभिमुख हो बुद्धिपूर्वक ब्रह्मयज्ञ (वेदका स्वाध्याय) करे। तदनन्तर खड़ा होकर तिल, फूल और जलसे युक्त अर्घ्यपात्रको अपने मस्तक तक In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
२६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
[संस्कृत श्लोक]
उत्थाय मूर्धपर्यन्तं हंसः शुचिषदित्यृचा। जले देवं नमस्कृत्य ततो गृहगतः पुनः॥ ९२ विधिना पुरुषसूक्तेन तत्र विष्णुं समर्चयेत्। वैश्वदेवं ततः कुर्याद्वलिकर्म यथाविधि॥ ९३ गोदोहमात्रमतिथिं प्रतीवीक्षेत वै गृही। अदृष्टपूर्वमतिथिमागतं प्राक् समर्चयेत्॥ ९४ आगत्य च पुनर्द्वारं प्रत्युत्थानेन साधुना। स्वागतेनाग्नयस्तुष्टा भवन्ति गृहमेधिनाम्॥ ९५ आसनेन तु दत्तेन प्रीतो भवति देवराट्। पादशौचेन पितरः प्रीतिमायान्ति तस्य च॥ ९६ अन्नाद्येन च दत्तेन तृप्यतीह प्रजापतिः। तस्मादतिथये कार्यं पूजनं गृहमेधिना॥ ९७ भक्त्या च भक्तिमान्नित्यं विष्णुमभ्यर्च्य चिन्तयेत्। भिक्षां च भिक्षवे दद्यात्परिव्राड्ब्रह्मचारिणे॥ ९८ आकल्पितान्नादुद्धृत्य सर्वव्यञ्जनसंयुतम्। दद्याच्च मनसा नित्यं भिक्षां भिक्षोः प्रयत्नतः॥ ९९ अकृते वैश्वदेवे तु भिक्षौ भिक्षार्थमागते। अवश्यमेव दातव्यं स्वर्गसोपानकारकम्॥ १०० उद्धृत्य वैश्वदेवान्नं भिक्षां दत्त्वा विसर्जयेत्। वैश्वदेवाकृतं दोषं शक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम्॥ १०१ सुवासिनीः कुमारीश्च भोजयित्वाऽऽतुरानपि। बालवृद्धांस्ततः शेषं स्वयं भुञ्जीत वै गृही॥ १०२ प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि मौनी च मितभाषणः। अन्नं पूर्वं नमस्कृत्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ १०३ पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात्समन्त्रेण पृथक् पृथक्। ततः स्वादुकरं चान्नं भुञ्जीत सुसमाहितः॥ १०४
[हिन्दी अनुवाद]
ऊँचे उठा ‘हंसः शुचिषत्·····’ इस ऋचाका पाठ करते हुए सूर्यदेवके लिये अर्घ्य दे। फिर जलमें स्थित वरुणदेवको नमस्कार कर पुनः घरपर आ जाय और वहाँ पुरुषसूक्तसे भगवान् विष्णुका विधिवत् पूजन करे। तदनन्तर विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव कर्म करे॥ ८७—९३॥ इसके बाद जितनी देरमें गौ दुही जाती है, उतनी देरतक द्वारपर अतिथिके आनेकी प्रतीक्षा करे। यदि कई अतिथि आ जायँ तो उनमेंसे जिसे पहले कभी न देखा हो, उसका सम्मान सबसे पहले करना चाहिये। द्वारपर आकर अतिथिकी खड़े होकर भलीभाँति अगवानी करनेसे गृहस्थके ऊपर दक्षिण, गार्हपत्य और आहवनीय—तीनों अग्नि प्रसन्न होते हैं; आसन देनेसे देवराज इन्द्रको प्रसन्नता होती है, अतिथिके पैर धोनेसे उस गृहस्थके पितृगण तृप्त होते हैं, अन्न आदि भोज्य पदार्थ अर्पण करनेसे प्रजापति प्रसन्न होते हैं। इसलिये गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि वह अतिथिका पूजन करे॥ ९४—९७॥ इसके पश्चात् भक्तिमान् पुरुष प्रतिदिन भगवान् विष्णुकी भक्तिपूर्वक पूजा करके उनका चिन्तन करे। फिर संन्यासी, विरक्त एवं ब्रह्मचारीको भिक्षा दे। सब प्रकारसे तैयार किये हुए अन्नमेंसे समस्त व्यञ्जनोंसे युक्त कुछ अन्न निकालकर प्रतिदिन यत्नपूर्वक भिक्षु (संन्यासी)-को देना चाहिये। बलिवैश्वदेव करनेके पहले भी यदि भिक्षु भिक्षाके लिये आ जाय तो उसे अवश्य भिक्षा देनी चाहिये; क्योंकि यह दान स्वर्गमें जानेके लिये सीढ़ीका काम देता है। विश्वेदेवसम्बन्धी अन्नमेंसे लेकर भिक्षुको भिक्षा देकर उसे विदा करे। वैश्वदेव कर्म न करनेके दोषको वह भिक्षु दूर कर सकता है। फिर सुवासिनी (सुहागिन) और कुमारी कन्याओं तथा रोगी व्यक्तियोंको और बालकों एवं वृद्धोंको पहले भोजन कराके उनसे बचे हुए अन्नको गृहस्थ पुरुष स्वयं भोजन करे॥ ९८—१०२॥ भोजन करते समय पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके बैठे और मौन रहे अथवा कम बोले। भोजनसे पहले प्रसन्नचित्तसे अन्नको नमस्कार करके पृथक्-पृथक् पाँच प्राणवायुओंके नाम-मन्त्रसे अर्थात् ‘ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा’—इस प्रकार उच्चारण करते हुए पाँच बार प्राणाग्निहोत्र करे। इसके बाद एकाग्रचित्त होकर उस स्वादिष्ट अन्नको स्वयं भोजन करे। भोजनके
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अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २६३ आचम्य देवतामिष्टां संस्मरेदुदरं स्पृशन्। बाद मुँह-हाथ धो, आचमन (कुल्ला) करके, अपने इतिहासपुराणाभ्यां कंचित्कालं नयेद्बुधः ॥ १०५ उदरका स्पर्श करते हुए इष्टदेवका स्मरण करे। फिर विद्वान् पुरुष इतिहास-पुराणोंके अध्ययनमें कुछ समय ततः संध्यामुपासीत बहिर्गत्वा विधानतः। व्यतीत करे। तदनन्तर सायंकाल आनेपर बाहर (नदी कृतहोमश्च भुञ्जीत रात्रावतिथिमार्चयेत् ॥ १०६ या जलाशयके तटपर) जाकर विधिपूर्वक संध्योपासन करे। पुनः रात्रिकालमें हवन करके अतिथि-सत्कारके सायं प्रातर्द्विजातीनामशनं श्रुतिचोदितम्। पश्चात् भोजन करे। द्विजातियोंके लिये प्रातः और सायं— नान्तरा भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः ॥ १०७ दो ही समय भोजन करना वेदविहित है; इसके बीचमें भोजन नहीं करना चाहिये। जैसे अग्निहोत्र प्रातः और शिष्यानध्यापयेत्तद्वदनध्यायं विवर्जयेत् । सायंकालमें किया जाता है, वैसे ही दो ही समय भोजनकी स्मृत्युक्तान् सकलान् पूर्वपुराणोक्तानपि द्विजः ॥ १०८ भी विधि है ॥ १०३–१०७॥ इसके अतिरिक्त विद्वान् द्विजको चाहिये कि वह महानवम्यां द्वादश्यां भरण्यामपि चैव हि। प्रतिदिन शिष्योंको पढ़ाये, परंतु अध्ययनके लिये वर्जित तथाक्षय्यतृतीयायां शिष्यान्नाध्यापयेद्बुधः ॥ १०९ समयका त्याग करे। स्मृतिमें बताये हुए तथा पहलेके पुराणोंमें वर्णित सम्पूर्ण अनध्याय-कालको त्याग दे। माघमासे तु सप्तम्यां रथ्यामध्ययनं त्यजेत् । महानवमी (आश्विन शुक्ला नवमी) और द्वादशी तिथि, अध्यापनमथाभ्यज्य स्नानकाले विवर्जयेत् ॥ ११० भरणी नक्षत्र और अक्षयतृतीयामें विद्वान् पुरुष शिष्योंको न पढ़ाये। माघ मासकी सप्तमीको अध्ययन न करे, दानं च विधिना देयं गृहस्थेन हितैषिणा । सड़कपर चलते समय और उबटन लगाकर स्नान करते हिरण्यदानं गोदानं भूमिदानं विशेषतः ॥ १११ समय भी अध्ययनका त्याग करे ॥ १०८–११० ॥ एतानि यः प्रयच्छेत श्रोत्रियेभ्यो द्विजोत्तमः । अपना हित चाहनेवाले गृहस्थको चाहिये कि विधिपूर्वक सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते ॥ ११२ दान करे। विशेषतः सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान करे। जो द्विजश्रेष्ठ सुवर्ण आदि पूर्वोक्त वस्तुएँ श्रोत्रिय मङ्गलाचारयुक्तश्च शुचिः श्रद्धापरो गृही। ब्राह्मणोंको दानमें देता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर श्राद्धं च श्रद्धया कुर्यात्स याति ब्रह्मणः पदम् ॥ ११३ स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। जो गृहस्थ शुभाचरणोंसे युक्त, पवित्र और श्रद्धालु रहकर श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता जातावुत्कर्षमायाति नरसिंहप्रसादतः । है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। वह भगवान् नरसिंहकी स तस्मान्मुक्तिमाप्नोति ब्रह्मणा सह सत्तमाः ॥ ११४ कृपासे जातिमें उत्कर्ष प्राप्त करता है और सत्तमो ! ब्रह्माजीके साथ ही वह मुक्त हो जाता है। विप्रगण ! इस प्रकार मैंने एवं हि विप्राः कथितो मया वः आप लोगोंसे यह सनातन धर्मसमूहका संक्षेपसे वर्णन समासतः शाश्वतधर्मराशिः । किया। जो पुरुष सद्गृहस्थके उक्त धर्मका भलीभाँति सम्यग्गृहस्थस्य सतो हि धर्मं प्रयत्नपूर्वक पालन करता है, वह मुक्त होकर भगवान् कुर्वन् प्रयत्नाद्धरिमेति मुक्तः ॥ ११५ श्रीहरिको प्राप्त करता है ॥ १११–११५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे गृहस्थधर्मो नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'गृहस्थधर्म' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
२६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५९
२६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५९ उनसठवाँ अध्याय वानप्रस्थ-धर्म हारीत उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि वानप्रस्थस्य लक्षणम्। धर्ममग्र्यं महाभागाः कथ्यमानं निबोधत॥ १ गृहस्थः पुत्रपौत्रादीन् दृष्ट्वा पलितमात्मनः। स्वभार्यां तनये स्थाप्य स्वशिष्यैः प्रविशेद्वनम्॥ २ जटाकलापचीराणि नखगात्ररुहाणि वा। धारयञ्जुहुयादग्नौ वैतानविधिना स्थितः॥ ३ भृतपर्णैर्मृत्सम्भूतैर्नीवाराद्यैरतन्द्रितः । कंदमूलफलैर्वापि कुर्यान्नित्यक्रियां बुधः॥ ४ त्रिकालं स्नानयुक्तस्तु कुर्यात्तीव्रं तपः सदा। पक्षे गते वा अश्नीयान्मासान्ते वा पराककृत्॥ ५ चतुःकालेऽपि चाश्नीयात्कालेऽप्युत तथाष्टमे। षष्ठाह्निकाले ह्यथवा अथवा वायुभक्षकः॥ ६ घर्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो धारावर्षामु वै नयेत्। हैमन्तिके जले स्थित्वा नयेत्कालं तपश्चरन्॥ ७ एवं स्वकर्मभोगेन कृत्वा शुद्धिमथात्मनः। अग्निं चात्मनि वै कृत्वा व्रजेद्धाथोत्तरां दिशम्॥ ८ आदेहपाताद्वनगो मौनमास्थाय तापसः। स्मरन्नतीन्द्रियं ब्रह्म ब्रह्मलोके महीयते॥ ९ तपो हि यः सेवति काननस्थो वसेन्महत्सत्त्वसमाधियुक्तः । विमुक्तपापो हि मनःप्रशान्तः प्रयाति विष्णोः सदनं द्विजेन्द्रः॥ १० श्रीहारीत मुनि बोले—महाभागगण! इसके बाद मैं वानप्रस्थका लक्षण और श्रेष्ठ धर्म बताऊँगा; आप लोग मेरे द्वारा बताये जानेवाले उस धर्मको सुनें॥ १॥ गृहस्थ पुरुष जब यह देख ले कि मेरे पुत्र-पौत्र हो गये हैं तथा बाल भी पक गये हैं, तब वह अपनी भार्याको पुत्रोंकी देख-रेखमें सौंपकर स्वयं अपने शिष्योंके साथ वनमें प्रवेश करे। जटा, चीर (वल्कल) वस्त्र, नख, लोम आदि धारण किये हुए ही यज्ञोक्त विधिसे अग्निमें हवन करे। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पत्तोंवाले साग आदिसे या धरतीसे स्वयं उत्पन्न हुए नीवार आदिसे अथवा कंद-मूल-फल आदिसे प्रतिदिन आहारक्रियाका निर्वाह करे। प्रातः, मध्याह्न और सायं—तीनों कालोंमें स्नान करके सदा कठोर तपस्या करे। ‘पराक’ आदि व्रतोंका पालन करता हुआ वानप्रस्थ पुरुष एक पक्ष या एक मासके बाद भोजन करे अथवा दिन-रातके चौथे या आठवें भागमें एक बार भोजन करे। अथवा छठे दिन कुछ भोजन करे या वायु पीकर ही रहे॥ २-६॥ ग्रीष्म-कालमें पञ्चाग्निके मध्य बैठे, वर्षाकालमें धारावृष्टि होनेपर बाहर आकाशके ही नीचे समय व्यतीत करे और हेमन्त-ऋतुमें तप करते हुए वह जलमें खड़ा रहकर समय बिताये। इस प्रकार कर्मभोगद्वारा आत्मशुद्धि करके, अग्निको भावनाद्वारा अन्तःकरणमें स्थापितकर उत्तरदिशाको चला जाय। वह तपस्वी देहपात होनेतक वनमें मौन रहकर इन्द्रियातीत ब्रह्मका स्मरण करता हुआ देह त्यागकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो द्विजश्रेष्ठ वनवासी (वानप्रस्थ) होकर महान् सत्त्वगुण और समाधिसे युक्त हो तपका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित और प्रशान्तचित्त होकर विष्णुधामको प्राप्त होता है॥ ७-१०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे वानप्रस्थधर्मो नाम एकोनषष्टितमोऽध्यायः॥ ५९॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'वानप्रस्थधर्म' नामक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५९॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ६० ] यतिधर्म २६५
अध्याय ६० ] यतिधर्म २६५
साठवाँ अध्याय
यतिधर्म
हारीत उवाच
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यतिधर्ममनुत्तमम्। श्रद्धया यदनुष्ठाय यतिर्मुच्येत बन्धनात्॥ १
एवं वनाश्रमे तिष्ठंस्तपसा दग्धकिल्बिषः। चतुर्थमाश्रमं गच्छेत् संन्यस्य विधिना द्विजः॥ २
दिव्यं ऋषिभ्यो देवेभ्यः स्वपितृभ्यश्च यत्नतः। दत्त्वा श्राद्धमृषिभ्यश्च मनुजेभ्यस्तथाऽऽत्मने॥ ३
इष्टिं वैश्वानरीं कृत्वा प्राजापत्यमथापि वा। अग्निं स्वात्मनि संस्थाप्य मन्त्रवत्प्रव्रजेत् पुनः॥ ४
ततः प्रभृति पुत्रादौ सुखलोभादि वर्जयेत्। दद्याच्च भूमावुदकं सर्वभूताभयंकरम्॥ ५
त्रिदण्डं वैणवं सौम्यं सत्वचं समपर्वकम्। वेष्टितं कृष्णगोवालरज्ज्वा च चतुरङ्गुलम्॥ ६
ग्रन्थिभिर्वा त्रिभिर्युक्तं जलपूतं च धारयेत्। गृह्णीयाद्दक्षिणे हस्ते मन्त्रेणैव तु मन्त्रवित्॥ ७
कौपीनाच्छादनं वासः कुथां शीतनिवारिणीम्। पादुके चापि गृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्य संग्रहम्॥ ८
एतानि तस्य लिङ्गानि यतेः प्रोक्तानि धर्मतः। संगृह्य कृतसंन्यासो गत्वा तीर्थमनुत्तमम्॥ ९
स्नात्वा ह्याचम्य विधिवज्जलयुक्तांशुकेन वै। वारिणा तर्पयित्वा तु मन्त्रवद्भास्करं नमेत्॥ १०
आसीनः प्राङ्मुखो मौनी प्राणायामत्रयं चरेत्। गायत्रीं च यथाशक्ति जप्त्वा ध्यायेत्परं पदम्॥ ११
स्थित्यर्थमात्मनो नित्यं भिक्षाटनमथाचरेत्। सायाह्नकाले विप्राणां गृहाणि विचरेद्यतिः॥ १२
हिन्दी अनुवाद
श्रीहारीत मुनि कहते हैं—इसके बाद अब मैं संन्यासियोंका सर्वोत्तम धर्म बताऊँगा, जिसका श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करके संन्यासी भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है। द्विजको चाहिये कि पूर्वोक्त रीतिसे वानप्रस्थ-आश्रममें रहते हुए तपस्याद्वारा पापोंको भस्म करके, विधिपूर्वक संन्यास ले चौथे आश्रममें प्रवेश करे। पहले यत्नपूर्वक देवताओं, ऋषियों और अपने पितरोंके लिये दिव्य श्राद्ध-सामग्रीका दान करे; इसी प्रकार ऋषियों, मनुष्यों तथा अपने लिये भी श्राद्धीय वस्तुका दान करे। फिर वैश्वानर अथवा प्राजापत्य याग करके, मन्त्रपाठपूर्वक अपने अन्तःकरणमें अग्निस्थापन करके संन्यासी हो, वहाँसे चला जाय। उस दिनसे पुत्र आदिके प्रति आसक्तिको और सुख-लोभ आदिको त्याग दे। पृथ्वीपर समस्त प्राणियोंको अभय देनेके निमित्त जलकी अञ्जलि दे। वेणु (बाँस)-का बना हुआ त्रिदण्ड धारण करे, जो सुन्दर और त्वचायुक्त हो, उसके पोर बराबर हों, काली गौके बालोंकी रस्सीसे वह चार अंगुलतक लपेटा गया हो। अथवा वह दण्ड तीन गाँठोंसे युक्त हो, उसे जलसे पवित्र करके धारण करे। मन्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि वह मन्त्रपाठपूर्वक ही उस दण्डको दायें हाथमें ग्रहण करे॥ १–७॥
कौपीन (लँगोटी), चादर, जाड़ा दूर करनेवाली एक गुदड़ी तथा खड़ाऊँ—इन्हीं वस्तुओंको अपने पास रखे, अन्य वस्तुओंका संग्रह न करे। संन्यासीके ये ही चिह्न बताये गये हैं। इन वस्तुओंका धर्मतः संग्रह करके संन्यासी पुरुष उत्तम तीर्थमें जा, स्नान करके विधिवत् आचमन करे। स्नानके बाद भीगे वस्त्रके जलसे सूर्यदेवका मन्त्रपाठपूर्वक तर्पण करके उन्हें प्रणाम करे। फिर पूर्वाभिमुख बैठकर, मौन हो, तीन प्राणायाम—पूरक, कुम्भक और रेचक करे तथा यथाशक्ति गायत्रीका जप करके परब्रह्मका ध्यान करे। शरीरकी स्थिति (रक्षा)-के लिये प्रतिदिन भिक्षाटन करे। यतिको चाहिये कि संध्याके समय ब्राह्मणोंके घरोंपर भिक्षाके लिये भ्रमण करे॥ ८–१२॥
२६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६१
२६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६१ स्यादर्थी यावतान्नेन तावद्भैक्षं समाचरेत्। ततो निवृत्य तत्पात्रमभ्युक्ष्याचम्य संयमी ॥ १३ सूर्यादिदैवतेभ्यो हि दत्त्वान्नं प्रोक्ष्य वारिणा। भुञ्जीत पर्णपुटके पात्रे वा वाग्यतो यतिः ॥ १४ वटकाश्वत्थपत्रेषु कुम्भीतिन्दुकपत्रयोः। कोविदारकरञ्जेषु न भुञ्जीत कदाचन ॥ १५ भुक्त्वाऽऽचम्य निरुद्धासुरुपतिष्ठेत भास्करम्। जपध्यानेतिहासैस्तु दिनशेषं नयेद्यतिः ॥ १६ पलाशाः सर्व उच्यन्ते यतयः कांस्यभोजिनः। कांस्यस्येव तु यत्पात्रं गृहस्थस्य तथैव च। कांस्यभोजी यतिः सर्वं प्राप्नुयात्किल्बिषं पुनः। भुक्तपात्रे यतिर्नित्यं भक्षयेन्मन्त्रपूर्वकम्। न दुष्येत्तस्य तत्पात्रं यज्ञेषु चमसा इव। कृतसंध्यस्ततो रात्रिं नयेद्देवगृहादिषु। हृत्पुण्डरीकनिलये ध्यायन्नारायणं हरिम्। तत्पदं समवाप्नोति यत्प्राप्य न निवर्तते ॥ १७ जितने अन्नकी उसे उस समय आवश्यकता हो, उतनी ही भिक्षा माँगे। फिर लौटकर उस भिक्षापात्रपर जलके छींटे देकर संयमी यति स्वयं भी आचमन करे। इसके बाद उस अन्नपर भी जलके छींटे देकर, उसे सूर्य आदि देवताओंको निवेदन कर, पत्तेके दोने या पत्तलमें रखकर, वह संन्यासी पुरुष मौनभावसे भोजन करे। वट, पीपल, जलकुम्भी और तिन्दुकके पत्तोंपर तथा कोविदार और करंजके पत्तोंपर भी कभी भोजन न करे। भोजन समाप्त करके मुँह-हाथ धो, आचमन करके, प्राणवायुको रोक, सूर्यदेवको प्रणाम करे। नैत्यिक नियमोंके बाद जितना दिन शेष रहे, उसे संन्यासी पुरुष जप, ध्यान और इतिहास-पाठ आदिके द्वारा व्यतीत करे। काँसेके पात्रमें भोजन करनेवाले सभी यति 'पलाश' कहलाते हैं। यदि संन्यासी काँसेका पात्र रखे तो वह गृहस्थके ही समान है; क्योंकि गृहस्थका भी तो वैसा ही पात्र होता है। काँसेके पात्रमें भोजन करनेवाला यति समस्त पापोंका भागी होता है। यति जिस काष्ठ या मिट्टी आदिके पात्रमें एक बार भोजन कर चुका है, उसे धोकर पुनः उसमें मन्त्रपाठपूर्वक भोजन कर सकता है; उसका वह पात्र यज्ञ-पात्रोंके समान कभी दूषित नहीं होता। इसके बाद यथासमय संध्याकालिक नियमोंका पालन करके देवमन्दिर आदिमें रात्रि व्यतीत करे और अपने हृदय-कमलके आसनपर भगवान् नारायणका ध्यान करे। यों करनेसे वह यति उस परमपदको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर पुनः लौटना नहीं पड़ता ॥ १३–१७ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे यतिधर्मो नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यतिधर्मका वर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥ इकसठवाँ अध्याय योगसार हारीत उवाच वर्णानामाश्रमाणां च कथितं धर्मलक्षणम्। यतः स्वर्गापवर्गौ तु प्राप्नुयुस्ते द्विजादयः ॥ १ योगशास्त्रस्य वक्ष्यामि संक्षेपात्सारमुत्तमम्। यस्याभ्यासबलाद्यान्ति मोक्षं चेह मुमुक्षवः ॥ २ ॥ श्रीहारीत मुनि कहते हैं—मुनियो! मैंने चारों वर्णों और चारों आश्रमोंके धर्मका स्वरूप बतलाया, जिसके पालनसे उपर्युक्त ब्राह्मणादि वर्णके लोग स्वर्ग और मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। अब मैं संक्षेपमें योगशास्त्रका उत्तम सारांश वर्णन करूँगा, जिसके अभ्याससे मुमुक्षु पुरुष इसी जन्ममें मोक्षको प्राप्त हो जाते हैं ॥ १-२ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth