भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 318 में से

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पृष्ठ 277

२६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६१ स्यादर्थी यावतान्नेन तावद्भैक्षं समाचरेत्। ततो निवृत्य तत्पात्रमभ्युक्ष्याचम्य संयमी ॥ १३ सूर्यादिदैवतेभ्यो हि दत्त्वान्नं प्रोक्ष्य वारिणा। भुञ्जीत पर्णपुटके पात्रे वा वाग्यतो यतिः ॥ १४ वटकाश्वत्थपत्रेषु कुम्भीतिन्दुकपत्रयोः। कोविदारकरञ्जेषु न भुञ्जीत कदाचन ॥ १५ भुक्त्वाऽऽचम्य निरुद्धासुरुपतिष्ठेत भास्करम्। जपध्यानेतिहासैस्तु दिनशेषं नयेद्यतिः ॥ १६ पलाशाः सर्व उच्यन्ते यतयः कांस्यभोजिनः। कांस्यस्येव तु यत्पात्रं गृहस्थस्य तथैव च। कांस्यभोजी यतिः सर्वं प्राप्नुयात्किल्बिषं पुनः। भुक्तपात्रे यतिर्नित्यं भक्षयेन्मन्त्रपूर्वकम्। न दुष्येत्तस्य तत्पात्रं यज्ञेषु चमसा इव। कृतसंध्यस्ततो रात्रिं नयेद्देवगृहादिषु। हृत्पुण्डरीकनिलये ध्यायन्नारायणं हरिम्। तत्पदं समवाप्नोति यत्प्राप्य न निवर्तते ॥ १७ जितने अन्नकी उसे उस समय आवश्यकता हो, उतनी ही भिक्षा माँगे। फिर लौटकर उस भिक्षापात्रपर जलके छींटे देकर संयमी यति स्वयं भी आचमन करे। इसके बाद उस अन्नपर भी जलके छींटे देकर, उसे सूर्य आदि देवताओंको निवेदन कर, पत्तेके दोने या पत्तलमें रखकर, वह संन्यासी पुरुष मौनभावसे भोजन करे। वट, पीपल, जलकुम्भी और तिन्दुकके पत्तोंपर तथा कोविदार और करंजके पत्तोंपर भी कभी भोजन न करे। भोजन समाप्त करके मुँह-हाथ धो, आचमन करके, प्राणवायुको रोक, सूर्यदेवको प्रणाम करे। नैत्यिक नियमोंके बाद जितना दिन शेष रहे, उसे संन्यासी पुरुष जप, ध्यान और इतिहास-पाठ आदिके द्वारा व्यतीत करे। काँसेके पात्रमें भोजन करनेवाले सभी यति 'पलाश' कहलाते हैं। यदि संन्यासी काँसेका पात्र रखे तो वह गृहस्थके ही समान है; क्योंकि गृहस्थका भी तो वैसा ही पात्र होता है। काँसेके पात्रमें भोजन करनेवाला यति समस्त पापोंका भागी होता है। यति जिस काष्ठ या मिट्टी आदिके पात्रमें एक बार भोजन कर चुका है, उसे धोकर पुनः उसमें मन्त्रपाठपूर्वक भोजन कर सकता है; उसका वह पात्र यज्ञ-पात्रोंके समान कभी दूषित नहीं होता। इसके बाद यथासमय संध्याकालिक नियमोंका पालन करके देवमन्दिर आदिमें रात्रि व्यतीत करे और अपने हृदय-कमलके आसनपर भगवान् नारायणका ध्यान करे। यों करनेसे वह यति उस परमपदको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर पुनः लौटना नहीं पड़ता ॥ १३–१७ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे यतिधर्मो नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यतिधर्मका वर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥ इकसठवाँ अध्याय योगसार हारीत उवाच वर्णानामाश्रमाणां च कथितं धर्मलक्षणम्। यतः स्वर्गापवर्गौ तु प्राप्नुयुस्ते द्विजादयः ॥ १ योगशास्त्रस्य वक्ष्यामि संक्षेपात्सारमुत्तमम्। यस्याभ्यासबलाद्यान्ति मोक्षं चेह मुमुक्षवः ॥ २ ॥ श्रीहारीत मुनि कहते हैं—मुनियो! मैंने चारों वर्णों और चारों आश्रमोंके धर्मका स्वरूप बतलाया, जिसके पालनसे उपर्युक्त ब्राह्मणादि वर्णके लोग स्वर्ग और मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। अब मैं संक्षेपमें योगशास्त्रका उत्तम सारांश वर्णन करूँगा, जिसके अभ्याससे मुमुक्षु पुरुष इसी जन्ममें मोक्षको प्राप्त हो जाते हैं ॥ १-२ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth