संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६० ] यतिधर्म २६५
साठवाँ अध्याय
यतिधर्म
हारीत उवाच
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यतिधर्ममनुत्तमम्। श्रद्धया यदनुष्ठाय यतिर्मुच्येत बन्धनात्॥ १
एवं वनाश्रमे तिष्ठंस्तपसा दग्धकिल्बिषः। चतुर्थमाश्रमं गच्छेत् संन्यस्य विधिना द्विजः॥ २
दिव्यं ऋषिभ्यो देवेभ्यः स्वपितृभ्यश्च यत्नतः। दत्त्वा श्राद्धमृषिभ्यश्च मनुजेभ्यस्तथाऽऽत्मने॥ ३
इष्टिं वैश्वानरीं कृत्वा प्राजापत्यमथापि वा। अग्निं स्वात्मनि संस्थाप्य मन्त्रवत्प्रव्रजेत् पुनः॥ ४
ततः प्रभृति पुत्रादौ सुखलोभादि वर्जयेत्। दद्याच्च भूमावुदकं सर्वभूताभयंकरम्॥ ५
त्रिदण्डं वैणवं सौम्यं सत्वचं समपर्वकम्। वेष्टितं कृष्णगोवालरज्ज्वा च चतुरङ्गुलम्॥ ६
ग्रन्थिभिर्वा त्रिभिर्युक्तं जलपूतं च धारयेत्। गृह्णीयाद्दक्षिणे हस्ते मन्त्रेणैव तु मन्त्रवित्॥ ७
कौपीनाच्छादनं वासः कुथां शीतनिवारिणीम्। पादुके चापि गृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्य संग्रहम्॥ ८
एतानि तस्य लिङ्गानि यतेः प्रोक्तानि धर्मतः। संगृह्य कृतसंन्यासो गत्वा तीर्थमनुत्तमम्॥ ९
स्नात्वा ह्याचम्य विधिवज्जलयुक्तांशुकेन वै। वारिणा तर्पयित्वा तु मन्त्रवद्भास्करं नमेत्॥ १०
आसीनः प्राङ्मुखो मौनी प्राणायामत्रयं चरेत्। गायत्रीं च यथाशक्ति जप्त्वा ध्यायेत्परं पदम्॥ ११
स्थित्यर्थमात्मनो नित्यं भिक्षाटनमथाचरेत्। सायाह्नकाले विप्राणां गृहाणि विचरेद्यतिः॥ १२
हिन्दी अनुवाद
श्रीहारीत मुनि कहते हैं—इसके बाद अब मैं संन्यासियोंका सर्वोत्तम धर्म बताऊँगा, जिसका श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करके संन्यासी भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है। द्विजको चाहिये कि पूर्वोक्त रीतिसे वानप्रस्थ-आश्रममें रहते हुए तपस्याद्वारा पापोंको भस्म करके, विधिपूर्वक संन्यास ले चौथे आश्रममें प्रवेश करे। पहले यत्नपूर्वक देवताओं, ऋषियों और अपने पितरोंके लिये दिव्य श्राद्ध-सामग्रीका दान करे; इसी प्रकार ऋषियों, मनुष्यों तथा अपने लिये भी श्राद्धीय वस्तुका दान करे। फिर वैश्वानर अथवा प्राजापत्य याग करके, मन्त्रपाठपूर्वक अपने अन्तःकरणमें अग्निस्थापन करके संन्यासी हो, वहाँसे चला जाय। उस दिनसे पुत्र आदिके प्रति आसक्तिको और सुख-लोभ आदिको त्याग दे। पृथ्वीपर समस्त प्राणियोंको अभय देनेके निमित्त जलकी अञ्जलि दे। वेणु (बाँस)-का बना हुआ त्रिदण्ड धारण करे, जो सुन्दर और त्वचायुक्त हो, उसके पोर बराबर हों, काली गौके बालोंकी रस्सीसे वह चार अंगुलतक लपेटा गया हो। अथवा वह दण्ड तीन गाँठोंसे युक्त हो, उसे जलसे पवित्र करके धारण करे। मन्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि वह मन्त्रपाठपूर्वक ही उस दण्डको दायें हाथमें ग्रहण करे॥ १–७॥
कौपीन (लँगोटी), चादर, जाड़ा दूर करनेवाली एक गुदड़ी तथा खड़ाऊँ—इन्हीं वस्तुओंको अपने पास रखे, अन्य वस्तुओंका संग्रह न करे। संन्यासीके ये ही चिह्न बताये गये हैं। इन वस्तुओंका धर्मतः संग्रह करके संन्यासी पुरुष उत्तम तीर्थमें जा, स्नान करके विधिवत् आचमन करे। स्नानके बाद भीगे वस्त्रके जलसे सूर्यदेवका मन्त्रपाठपूर्वक तर्पण करके उन्हें प्रणाम करे। फिर पूर्वाभिमुख बैठकर, मौन हो, तीन प्राणायाम—पूरक, कुम्भक और रेचक करे तथा यथाशक्ति गायत्रीका जप करके परब्रह्मका ध्यान करे। शरीरकी स्थिति (रक्षा)-के लिये प्रतिदिन भिक्षाटन करे। यतिको चाहिये कि संध्याके समय ब्राह्मणोंके घरोंपर भिक्षाके लिये भ्रमण करे॥ ८–१२॥