संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५९ उनसठवाँ अध्याय वानप्रस्थ-धर्म हारीत उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि वानप्रस्थस्य लक्षणम्। धर्ममग्र्यं महाभागाः कथ्यमानं निबोधत॥ १ गृहस्थः पुत्रपौत्रादीन् दृष्ट्वा पलितमात्मनः। स्वभार्यां तनये स्थाप्य स्वशिष्यैः प्रविशेद्वनम्॥ २ जटाकलापचीराणि नखगात्ररुहाणि वा। धारयञ्जुहुयादग्नौ वैतानविधिना स्थितः॥ ३ भृतपर्णैर्मृत्सम्भूतैर्नीवाराद्यैरतन्द्रितः । कंदमूलफलैर्वापि कुर्यान्नित्यक्रियां बुधः॥ ४ त्रिकालं स्नानयुक्तस्तु कुर्यात्तीव्रं तपः सदा। पक्षे गते वा अश्नीयान्मासान्ते वा पराककृत्॥ ५ चतुःकालेऽपि चाश्नीयात्कालेऽप्युत तथाष्टमे। षष्ठाह्निकाले ह्यथवा अथवा वायुभक्षकः॥ ६ घर्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो धारावर्षामु वै नयेत्। हैमन्तिके जले स्थित्वा नयेत्कालं तपश्चरन्॥ ७ एवं स्वकर्मभोगेन कृत्वा शुद्धिमथात्मनः। अग्निं चात्मनि वै कृत्वा व्रजेद्धाथोत्तरां दिशम्॥ ८ आदेहपाताद्वनगो मौनमास्थाय तापसः। स्मरन्नतीन्द्रियं ब्रह्म ब्रह्मलोके महीयते॥ ९ तपो हि यः सेवति काननस्थो वसेन्महत्सत्त्वसमाधियुक्तः । विमुक्तपापो हि मनःप्रशान्तः प्रयाति विष्णोः सदनं द्विजेन्द्रः॥ १० श्रीहारीत मुनि बोले—महाभागगण! इसके बाद मैं वानप्रस्थका लक्षण और श्रेष्ठ धर्म बताऊँगा; आप लोग मेरे द्वारा बताये जानेवाले उस धर्मको सुनें॥ १॥ गृहस्थ पुरुष जब यह देख ले कि मेरे पुत्र-पौत्र हो गये हैं तथा बाल भी पक गये हैं, तब वह अपनी भार्याको पुत्रोंकी देख-रेखमें सौंपकर स्वयं अपने शिष्योंके साथ वनमें प्रवेश करे। जटा, चीर (वल्कल) वस्त्र, नख, लोम आदि धारण किये हुए ही यज्ञोक्त विधिसे अग्निमें हवन करे। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पत्तोंवाले साग आदिसे या धरतीसे स्वयं उत्पन्न हुए नीवार आदिसे अथवा कंद-मूल-फल आदिसे प्रतिदिन आहारक्रियाका निर्वाह करे। प्रातः, मध्याह्न और सायं—तीनों कालोंमें स्नान करके सदा कठोर तपस्या करे। ‘पराक’ आदि व्रतोंका पालन करता हुआ वानप्रस्थ पुरुष एक पक्ष या एक मासके बाद भोजन करे अथवा दिन-रातके चौथे या आठवें भागमें एक बार भोजन करे। अथवा छठे दिन कुछ भोजन करे या वायु पीकर ही रहे॥ २-६॥ ग्रीष्म-कालमें पञ्चाग्निके मध्य बैठे, वर्षाकालमें धारावृष्टि होनेपर बाहर आकाशके ही नीचे समय व्यतीत करे और हेमन्त-ऋतुमें तप करते हुए वह जलमें खड़ा रहकर समय बिताये। इस प्रकार कर्मभोगद्वारा आत्मशुद्धि करके, अग्निको भावनाद्वारा अन्तःकरणमें स्थापितकर उत्तरदिशाको चला जाय। वह तपस्वी देहपात होनेतक वनमें मौन रहकर इन्द्रियातीत ब्रह्मका स्मरण करता हुआ देह त्यागकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो द्विजश्रेष्ठ वनवासी (वानप्रस्थ) होकर महान् सत्त्वगुण और समाधिसे युक्त हो तपका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित और प्रशान्तचित्त होकर विष्णुधामको प्राप्त होता है॥ ७-१०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे वानप्रस्थधर्मो नाम एकोनषष्टितमोऽध्यायः॥ ५९॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'वानप्रस्थधर्म' नामक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५९॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth