भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

अध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३९

अध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३९ मृतस्य मल्लस्य च मुष्टिकस्य पहलवानका, जो अपने बल और पराक्रमके कारण मित्रं पुनः पुष्करकं स रामः। बहुत ही प्रसिद्ध था, कचूमर निकाल दिया। भगवान् युद्धार्थमुत्थाय कृतक्षणं तं श्रीकृष्णने उस जन-समाजमें दैत्य मल्ल चाणूरके साथ मुष्टिप्रहारेण जघान वीरः॥५० देरतक युद्ध करनेके बाद उसका वध किया था। फिर वीरवर बलरामजीने युद्धके लिये उत्साहपूर्वक उठे हुए कृष्णः पुनस्तान् सकलान्निहत्य पुष्करको, जो 'मृत मुष्टिक' नामक मल्लका मित्र था, निगृह्य कंसं विनिपात्य भूमौ। मुक्केसे ही मार डाला। इसके बाद श्रीकृष्णने वहाँ स्वयं च देहे विनिपत्य तस्य उपस्थित समस्त दैत्योंका संहार करके कंसको पकड़ हत्वा तथोर्व्यां निचकर्ष कृष्णः॥५१ लिया और उसे मञ्चके नीचे भूमिपर पटककर वे स्वयं भी उसके शरीरपर कूद पड़े। इस प्रकार कंसका वध हते तु कंसे हरिणातिक्रुद्धो करके श्रीकृष्णने उसके मृत देहको भूमिपर घसीटा। भ्रातापि तस्यातिरुषेण चोत्थितः। श्रीकृष्णद्वारा कंसके मारे जानेपर उसका बलवान् एवं सुनाभसंज्ञो बलवीर्ययुक्तो पराक्रमी भ्राता सुनाभ अत्यन्त क्रोधपूर्वक युद्धके लिये रामेण नीतो यमसादनं क्षणात्॥५२ उठा; किंतु उसे भी बलरामजीने तुरंत ही मारकर यमलोक भेज दिया॥४८-५२॥ तौ वन्द्य मातापितरौ सुहृष्टौ तदनन्तर समस्त यदुवंशियोंसे घिरे हुए उन दोनों जनैः समस्तैर्यदुभिः सुसंवृतौ। भाइयोंने अत्यन्त प्रसन्न हुए माता-पिताकी वन्दना करके कृत्वा नृपं चोग्रसेनं यदूनां श्रीउग्रसेनको ही यदुवंशियोंका राजा बनाया और उन्हें सभां सुधर्मां ददतुर्महेन्द्रीम्॥५३ इन्द्रकी 'सुधर्मा' नामक दिव्य सभा प्रदान की॥५३॥ सर्वज्ञभावावपि रामकृष्णौ यद्यपि बलराम और श्रीकृष्ण सर्वज्ञ थे, तो भी सम्प्राप्य सांदीपनितोऽस्त्रविद्याम्। उन्होंने सांदीपनिसे अस्त्र-विद्याकी शिक्षा पायी। फिर गुरोः कृते पञ्चजनं निहत्य गुरुको दक्षिणा देनेके लिये उद्यत हो, 'पञ्चजन' दैत्यको यमं च जित्वा गुरवे सुतं ददौ॥५४ मारा और यमराजको जीतकर वे दीर्घकालके मरे हुए गुरुपुत्रको वहाँसे ले आये। वही पुत्र उन्होंने गुरुजीको निहत्य रामो मगधेश्वरस्य दक्षिणाके रूपमें अर्पित किया॥५४॥ बलं समस्तं बहुशः समागतम्। फिर बलरामजीने अपने ऊपर अनेकों बार चढ़ाई दिव्यास्त्रपूरैरमराविमावुभौ करनेवाले मगधराज जरासंधके समस्त सैनिकोंको शुभां पुरीं चक्रतुः सागरान्ते॥५५ दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करके मार डाला। इसके बाद उन दोनों देवेश्वरोंने समुद्रके भीतर एक सुन्दर पुरी द्वारकाका तस्यां विधायाथ जनस्य वासं निर्माण कराया। उसमें मथुरावासी कुटुम्बीजनोंको बसाकर हत्वा शृगालं हरिरव्ययात्मा। अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णने राजा शृगालका वध दग्ध्वा महान्तं यवनं ह्युपाया- किया। फिर एक उपाय करके महान् योद्धा यवनराजको द्दूरं च दत्त्वा नृपतेर्जगाम॥५६ भस्म कर, राजा मुचुकुन्दको वरदान दे, वे द्वारकामें लौट गये॥५५-५६॥ रामोऽथ संशान्तसमस्तविग्रहः तत्पश्चात् सारा बखेड़ा समाप्त हो जानेपर सम्प्राप्य नन्दस्य पुनः स गोकुलम्। बलरामजी एक बार फिर नन्दके गोकुल (नन्दगाँव)- वृन्दावने गोपजनैः सुभाषितः में गये और वहाँ वृन्दावनमें गोपजनोंसे भलीभाँति सीरेण रामो यमुनां चकर्ष॥५७ प्रेमालाप आदिके द्वारा सम्मानित हुए। वहाँ उन्होंने अपने हलसे यमुनाजीका आकर्षण किया था। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३

२४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३


[संस्कृत श्लोक]

सम्प्राप्य भार्यामथ रेवतीं च रेमे तया द्वारवतीं स लाङ्गली। क्षात्रेण सम्प्राप्य तदा स रुक्मिणीं कृष्णोऽपि रेमे पुरुषः पुराणः॥ ५८

द्यूते कलिङ्गराजस्य दन्तानुत्पाट्य लाङ्गली। जघानाष्टपदेनैव रुक्मिणं चानृतान्वितम्॥ ५९

कृष्णः प्राग्ज्योतिषो दैत्यान् हयग्रीवादिकान् बहून्। हत्वा तु नरकं चापि जग्राह च महद्धनम्॥ ६०

अदित्यै कुण्डले दत्त्वा जित्वेन्द्रं दैवतैः सह। गृहीत्वा पारिजातं तु ततो द्वारावतीं पुरीम्॥ ६१

कुरुभिश्च धृतं साम्बं राम एको महाबलः। कुरूणां भयमुत्पाद्य मोचयामास वीर्यवान्॥ ६२

बाणबाहुवनं छिन्नं कृष्णेन युधि धीमता। रामेण तद्बलं नीतं क्षयं कोटिगुणं क्षणात्॥ ६३

देवापकारी रामेण निहतो वानरो महान्। ततोऽर्जुनस्य साहाय्यं कुर्वता कंसशत्रुणा॥ ६४

सर्वभूतवधाद्राजन् भुवो भारोऽवरोपितः। तीर्थयात्रा कृता तद्वद्रामेण जगतः कृते॥ ६५

रामेण निहता ये तु तान्न संख्यातुमुत्सहे। एवं तौ रामकृष्णौ तु कृत्वा दुष्टवधं नृप॥ ६६

अवतार्य भुवो भारं जग्मतुः स्वेच्छया दिवम्। इत्येतौ कथितौ दिव्यौ प्रादुर्भावौ मया तव। संक्षेपाद्रामकृष्णस्य काल्क्यं शृणु ममाधुना॥ ६७

इत्थं हि शक्ती सितकृष्णरूपे हरेरनन्तस्य महाबलाढ्ये। कृत्वा तु भूमेर्नृप भारहानिं पुनश्च विष्णुं प्रतिजग्मतुस्ते॥ ६८


[हिन्दी अनुवाद]

तदनन्तर द्वारकामें 'रेवती' नामकी भार्याको पाकर बलरामजी उनके साथ सुखपूर्वक रहने लगे और पुराणपुरुष श्रीकृष्णचन्द्र भी क्षत्रियधर्मके अनुसार 'रुक्मिणी' नामक भार्याको हस्तगत करके उसके साथ सानन्द विहार करने लगे। तदनन्तर एक बार जूआ खेलते समय हलधरने कलिङ्गराजके दाँतोंको उखाड़ लिया और असत्यका आश्रय लेनेवाले रुक्मीको भी पासेसे ही मार गिराया। इसी प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रने भी प्राग्ज्योतिषपुरके हयग्रीव आदि बहुत-से दैत्योंको यमलोक पहुँचाया तथा नरकासुरका भी संहार करके वे उसके यहाँसे बहुत धन ले आये। वहाँसे श्रीकृष्ण इन्द्रलोकमें गये। वहाँ उन्होंने अदितिको उनके वे दोनों दिव्य कुण्डल दिये, जो नरकासुरने हड़प लिये थे। फिर देवताओंसहित इन्द्रको जीतकर पारिजात वृक्ष साथ ले, वे अपनी पुरी द्वारकाको लौट आये॥ ५७-६१॥

तदनन्तर महाबली एवं महापराक्रमी बलरामजीने अकेले ही हस्तिनापुरमें जा कौरवोंको भय दिखाया और उनके द्वारा बंदी बनाये गये [श्रीकृष्णपुत्र] साम्बको छुड़ाया। फिर बुद्धिमान् श्रीकृष्णचन्द्रने युद्धमें बाणासुरकी भुजाओंको काट डाला और बलरामजीने उसके करोड़ों सैनिकोंका क्षणभरमें ही संहार कर दिया। इसके बाद बलरामजीने देववैरी 'द्विविद' नामक महान् वानरका वध किया। इसी तरह भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी सहायता करके उनके द्वारा समस्त दुष्ट क्षत्रियोंका वध कराया और पृथ्वीका सारा भार उतार दिया। उन दिनों बलरामजी लोकहितके लिये तीर्थयात्रा कर रहे थे॥ ६२-६५॥

राजन्! बलराम और श्रीकृष्णचन्द्रने जितने दुष्टोंका वध किया था, उनकी गणना हम नहीं कर सकते। इस प्रकार दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने दुष्टोंका संहार करके भूमिकका भार दूर किया। फिर वे स्वेच्छानुसार वैकुण्ठधामको पधार गये। इस तरह राम और श्रीकृष्णके इन दिव्य अवतारोंको मैंने तुम्हें संक्षेपसे कह सुनाया। अब मुझसे 'कल्कि-अवतार' का वर्णन सुनो। नरेश्वर! इस प्रकार अनन्त भगवान् विष्णुकी वे दोनों महाबलवती गौर और कृष्ण शक्तियाँ पृथ्वीका भार उतारकर पुनः अपने विष्णुस्वरूपमें लीन हो गयीं॥ ६६-६८॥


इति श्रीनरसिंहपुराणे कृष्णप्रादुर्भावो नाम त्रिपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥

अध्याय ५४ ] कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म २४१

अध्याय ५४ ] कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म २४१ चौवनवाँ अध्याय कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म

मार्कण्डेय उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि शृणु राजन् समाहितः। प्रादुर्भावं हरेः पुण्यं कल्क्याख्यं पापनाशनम्॥ १ कलिकालने राजेन्द्र नष्टे धर्मे महीतले। वृद्धिंगते तथा पापे व्याधिसम्पीडिते जने॥ २ देवैःसम्प्रार्थितो विष्णुः क्षीराब्धौ स्तुतिपूर्वकम्। साम्भलाख्ये महाग्रामे नानाजनसमाकुले॥ ३ नाम्ना विष्णुयशःपुत्रः कल्की राजा भविष्यति। अश्वमारुह्य खड्गेन म्लेच्छानुत्सादयिष्यति॥ ४ म्लेच्छान् समस्तान् क्षितिनाशभूतान् हत्वा स कल्की पुरुषोत्तमांशः। कृत्वा च यागं बहुकाञ्चनाख्यं संस्थाप्य धर्मे दिवमारुरोह॥ ५ दशावताराः कथितास्तवैव हरेर्मया पार्थिव पापहन्तुः। इमं सदा यस्तु नृसिंहभक्तः शृणोति नित्यं स तु याति विष्णुम्॥ ६

मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! इसके बाद मैं तुमसे भगवान् विष्णुके ‘कल्कि’ नामक पावन अवतारका वर्णन करता हूँ, जो समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला है; तुम सावधान होकर सुनो। राजेन्द्र! जब कलिकालद्वारा पृथ्वीपर धर्मका नाश हो जायगा, पाप बढ़ जायगा और सभी लोग नाना प्रकारके रोगोंसे पीड़ित होने लगेंगे, तब देवतालोग क्षीरसागरके तटपर जाकर वहाँ भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए उनसे प्रार्थना करेंगे। तदनन्तर भगवान् ‘साम्भल’ नामक महान् ग्राममें, जो बहुसंख्यक मनुष्योंसे परिपूर्ण होगा, विष्णुयशाके पुत्ररूपसे अवतार ले, ‘कल्कि’ नामसे विख्यात राजा होंगे। फिर वे घोड़ेपर चढ़कर, हाथमें तलवार ले, म्लेच्छोंका नाश करेंगे। इस प्रकार भगवान् विष्णुके अंशभूत ‘कल्कि’ भूमण्डलका ध्वंस करनेवाले समस्त म्लेच्छोंका संहार कर, ‘बहुकाञ्चन’ नामक यज्ञ करके, धर्मकी स्थापना कर स्वर्गारूढ हो जायँगे। राजेन्द्र! पापोंका नाश करनेवाले भगवान् विष्णुके इन दस अवतारोंका मैंने वर्णन किया। जो भगवद्भक्त पुरुष इन अवतार-चरित्रोंका नित्य श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है॥ १-६॥

राजोवाच तव प्रसादाद्विप्रेन्द्र प्रादुर्भावाः श्रुता मया। नारायणस्य देवस्य शृण्वतां कल्मषापहाः॥ ७ कलिं विस्तरतो ब्रूहि त्वं हि सर्वविदां वरः। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च मुनिसत्तम॥ ८ किमाहाराः किमाचारा भविष्यन्ति कलौ युगे।

राजा बोले—विप्रेन्द्र! आपके प्रसादसे मैंने भगवान् नारायणके अवतारोंका, जो श्रोताओंके पापोंका नाश करनेवाले हैं, श्रवण कर लिया। मुनिसत्तम! अब आप कलिको विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि आप सर्वज्ञ महात्माओंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। कृपया बताइये कि कलियुगमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कैसे आहार और आचरणवाले होंगे॥ ७-८१/२॥

सूत उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे भरद्वाजेन संयुताः॥ ९ सर्वे धर्मा विनश्यन्ति कृष्णे कृष्णत्वमागते। तस्मात् कलिर्महाघोरः सर्वपापस्य साधकः॥ १०

सूतजी बोले—भरद्वाजसहित आप सभी ऋषिगण सुनें। राजाके यों प्रेरणा करनेपर मार्कण्डेयजीने कलि-धर्मका इस प्रकार निरूपण किया। भगवान् कृष्णचन्द्रके परमधाम पधार जानेपर उनके अन्तर्धानके फलस्वरूप समस्त पापोंका साधक महाघोर कलियुग प्रकट होगा;

२४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४

२४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४ [संस्कृत मूल पाठ] ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा धर्मपराङ्मुखाः। घोरे कलियुगे प्राप्ते द्विजदेवपराङ्मुखाः॥ ११ व्याजधर्मरताः सर्वे दम्भाचारपरायणाः। असूयानिरताश्चैव वृथाहंकारदूषिताः॥ १२ सर्वैः संक्षिप्यते सत्यं नरैः पण्डितगर्वितैः। अहमेवाधिक इति सर्व एव वदन्ति वै॥ १३ अधर्मलोलुपाः सर्वे तथान्येषां च निन्दकाः। अतः स्वल्पायुषः सर्वे भविष्यन्ति कलौ युगे॥ १४ अल्पायुष्ट्वान्मनुष्याणां न विद्याग्रहणं द्विजाः। विद्याग्रहणशून्यत्वादधर्मो वर्तते पुनः॥ १५ ब्राह्मणाद्यास्तथा वर्णाः संकीर्यन्ते परस्परम्। कामक्रोधपरा मूढा वृथा संतापपीडिताः॥ १६ बद्धवैरा भविष्यन्ति परस्परवधेप्सवः। ब्राह्मणाःक्षत्रिया वैश्याः सर्वे धर्मपराङ्मुखाः॥ १७ शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः। उत्तमा नीचतां यान्ति नीचाश्चोत्तमतां तथा॥ १८ राजानो द्रव्यनिरतास्तथा लोभपरायणाः। धर्मकञ्चुकसंवीता धर्मविध्वंसकारिणः॥ १९ घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वाधर्मसमन्विते। यो योऽश्वरथनागाढ्यः स स राजा भविष्यति॥ २० पितॄन् पुत्रा नियोक्ष्यन्ति वध्वःश्वश्रूश्च कर्मसु। पतीन्पुत्रान्वञ्चयित्वा गमिष्यन्ति स्त्रियोऽन्यतः॥ २१ पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं श्वबाहुल्यं गवां क्षयः। धनानि श्लाघनीयानि सतां वृत्तमपूजितम्। खण्डवर्षी च पर्जन्यः पन्थानस्तस्करावृताः। सर्वः सर्वं च जानाति वृद्धाननुपसेव्य च॥ २२ न कश्चिदकविर्नाम सुरापा ब्रह्मवादिनः। किंकराश्च भविष्यन्ति शूद्राणां च द्विजातयः॥ २३ [हिन्दी अनुवाद] उस समय सभी धर्म नष्ट हो जायँगे। घोर कलियुग प्राप्त होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी लोग धर्म, ब्राह्मण तथा देवताओंसे विमुख हो जायँगे। सभी किसी-न-किसी व्याजसे (स्वार्थसिद्धिके लिये) ही धर्ममें प्रवृत्त होंगे; दम्भ—ढोंगका आचरण करेंगे। एक- दूसरेमें दोष ढूँढ़नेवाले और व्यर्थ अभिमानसे दूषित विचारवाले होंगे। पाण्डित्यका गर्व रखनेवाले सभी मनुष्य सत्यका अपलाप करेंगे और सब लोग यही कहेंगे कि 'मैं ही सबसे बड़ा हूँ'। कलियुगमें सभी अधर्मलोलुप तथा दूसरोंकी निन्दा करनेवाले होंगे, अतः सबकी आयु बहुत थोड़ी होगी। द्विजगण! मनुष्योंकी आयु अल्प होनेसे ब्राह्मणलोग अधिक विद्याध्ययन नहीं कर सकेंगे। विद्याध्ययनसे शून्य होनेके कारण उनके द्वारा पुनः अधर्मकी ही प्रवृत्ति होगी॥ ९—१५॥ ब्राह्मण आदि वर्णोंमें परस्पर संकरता आ जायगी। वे कामी, क्रोधी, मूर्ख और व्यर्थ संतापसे पीड़ित होंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आपसमें वैर बाँधकर एक- दूसरेका वध कर देनेकी इच्छावाले होंगे। वे सभी अपने- अपने धर्मसे विमुख होंगे। तप एवं सत्यभाषणादिसे रहित होकर शूद्रके समान हो जायँगे। उत्तम वर्णवाले नीचे गिरेंगे और नीच वर्णवाले उत्तम बनेंगे। राजालोग लोभी तथा केवल धनोपार्जनमें ही प्रवृत्त रहेंगे। वे धर्मका चोला पहनकर उसीकी ओटमें धर्मका विध्वंस करनेवाले होंगे। समस्त अधर्मोंसे युक्त घोर कलियुगके आ जानेपर जो- जो घोड़े, रथ और हाथीसे सम्पन्न होंगे, वे-वे ही राजा कहे जायँगे। पुत्र अपने पितासे काम करायेंगे और बहुएँ साससे काम लेंगी। स्त्रियाँ पति और पुत्रको धोखा देकर अन्य पुरुषोंके पास जाया करेंगी॥ १६—२१॥ पुरुषोंकी संख्या कम और स्त्रियोंकी अधिक होगी। कुत्तोंकी अधिकता होगी और गौओंका ह्रास। सबके मनमें धनका ही महत्त्व रहेगा। सत्पुरुषोंके सदाचारका सम्मान नहीं होगा। मेघ कहीं वर्षा करेंगे, कहीं नहीं करेंगे। समस्त मार्ग चोरोंसे घिरे रहेंगे। गुरुजनोंकी सेवामें रहे बिना ही सभी लोग सब कुछ जाननेका अभिमान करेंगे। कोई भी ऐसा न होगा जो अपनेको कवि न मानता हो। शराब पीनेवाले लोग ब्रह्मज्ञानका उपदेश करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५४ ] कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म २४३

अध्याय ५४ ] कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म २४३

द्विषन्ति पितरं पुत्रा गुरुं शिष्या द्विषन्ति च। | और वैश्य शूद्रोंके सेवक होंगे। घोर कलिकाल आनेपर पतिं च वनिता द्वेष्टि कलौ घोरे समागते ॥ २४ | पुत्र पितासे, शिष्य गुरुसे और स्त्रियाँ अपने पतियोंसे लोभाभिभूतमनसः सर्वे दुष्कर्मशीलिनः। | द्वेष करेंगी। सबका चित्त लोभसे आक्रान्त होगा, अतएव परान्नलोलुपा नित्यं भविष्यन्ति द्विजातयः ॥ २५ | सभी लोग दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त होंगे। ब्राह्मण सदा दूसरोंके परस्त्रीनिरताः सर्वे परद्रव्यपरायणाः। | ही अन्नके लोभी होंगे। सभी परस्त्रीसेवी और परधनका घोरे कलियुगे प्राप्ते नरं धर्मपरायणम् ॥ २६ | अपहरण करनेवाले होंगे। घोर कलियुग आ जानेपर असूयानिरताः सर्वे उपहासं प्रकुर्वते । | दूसरोंमें दोषदृष्टि रखनेवाले सभी लोग धर्मपरायण पुरुषोंका न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा वेदनिन्दकाः ॥ २७ | उपहास करेंगे। ब्राह्मणलोग वेदकी निन्दामें प्रवृत्त होकर न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति हेतुवादैर्विकुत्सिताः। | व्रतोंका आचरण नहीं करेंगे। तर्कवादसे कुत्सित विचार द्विजाः कुर्वन्ति दम्भार्थं पितृयज्ञादिकाः क्रियाः ॥ २८ | हो जानेके कारण वे न तो यज्ञ करेंगे और न हवनमें न पात्रेष्वेव दानानि कुर्वन्ति च नरास्तथा। | ही प्रवृत्त होंगे। द्विजलोग दम्भके लिये ही पितृयज्ञ आदि क्षीरोपाधिनिमित्तेन गोषु प्रीतिं प्रकुर्वते ॥ २९ | क्रियाएँ करेंगे। मनुष्य प्रायः सत्पात्रको दान नहीं देंगे। बध्नन्ति च द्विजानेव धनार्थं राजकिंकराः। | लोग दूध आदिके लिये ही गौओंमें प्रेम रखेंगे। राजाके दानयज्ञजपादीनां विक्रीणन्ते फलं द्विजाः ॥ ३० | सिपाही धनके लिये ब्राह्मणोंको ही बाँधेंगे। द्विजलोग प्रतिग्रहं प्रकुर्वन्ति चण्डालादेरपि द्विजाः। | दान, यज्ञ और जप आदिका फल प्रायः बेचा करेंगे। कलेः प्रथमपादेऽपि विनिन्दन्ति हरिं नराः ॥ ३१ | ब्राह्मणलोग चण्डाल आदि अस्पृश्य जातियोंसे भी दान युगान्ते च हरेर्नाम नैव कश्चित् स्मरिष्यति। | लेंगे। कलियुगके प्रथम चरणमें भी लोग भगवान्‌की शूद्रस्त्रीसङ्गनिरता विधवाप्रंगलोलुपाः ॥ ३२ | निन्दा करनेवाले हो जायेंगे॥ २२—३१॥ शूद्रान्नभोगनिरता भविष्यन्ति कलौ द्विजाः। | न च द्विजातिशुश्रूषां न स्वधर्मप्रवर्त्तनम् ॥ ३३ | कलियुगके अन्तिम समयमें तो कोई भगवान्‌के करिष्यन्ति तदा शूद्राः प्रव्रज्यालिङ्गिनोऽधमाः । | नामका स्मरणतक न करेगा। कलियुगके द्विज शूद्रोंकी सुखाय परिवीताश्च जटिला भस्मधूर्धराः ॥ ३४ | स्त्रियोंके साथ सहवास करेंगे और विधवा-संगमके शूद्रा धर्मान् प्रवक्ष्यन्ति कूटबुद्धिविशारदाः । | लिये लालायित रहेंगे तथा वे शूद्रोंका भी अन्न भक्षण एते चान्ये च बहवः पाषण्डा विप्रसत्तमाः ॥ ३५ | करनेवाले होंगे। उस समय अधम शूद्र संन्यासका चिह्न ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या भविष्यन्ति कलौ युगे । | धारणकर न तो द्विजातियोंकी सेवा करेंगे और न उनकी गीतवाद्यरता विप्रा वेदवादपराङ्मुखाः ॥ ३६ | स्वधर्ममें ही प्रवृत्ति होगी। वे अपने सुखके लिये जनेऊ भविष्यन्ति कलौ प्राप्ते शूद्रमार्गप्रवर्तिनः । | पहनेंगे, जटा रखायेंगे और शरीरमें खाक-भभूत लपेटे अल्पद्रव्या वृथालिङ्गा वृथाहंकारदूषिताः ॥ ३७ | फिरेंगे। विप्रवरो! कूटबुद्धिमें निपुण शूद्रगण धर्मका हर्त्तारो न च दातारो भविष्यन्ति कलौ युगे । | उपदेश करेंगे। ऊपर कहे अनुसार तथा और भी तरहके प्रतिग्रहपरा नित्यं द्विजाः सन्मार्गशीलिनः ॥ ३८ | बहुत-से पाखण्डी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कलियुगमें आत्मस्तुतिपराः सर्वे परनिन्दापरास्तथा । | उत्पन्न होंगे। कलियुग आनेपर विप्रगण वेदके स्वाध्यायसे विश्वासहीनाः पुरुषा देववेदद्विजातिषु ॥ ३९ | विमुख हो गाने-बजानेमें मन लगायेंगे और शूद्रोंके | मार्गका अनुसरण करेंगे। कलियुगमें लोग थोड़े धनवाले, | झूठा वेष धारण करनेवाले और मिथ्याभिमानसे दूषित | होंगे। वे दूसरोंका धन हरण कर लेंगे, पर अपना | किसीको नहीं देंगे। उस समय अच्छे पथपर चलनेवाले | ब्राह्मण सदा दान लेते फिरेंगे। सभी लोग आत्मप्रशंसक | और दूसरोंकी निन्दा करनेवाले होंगे। देवता, वेद और | ब्राह्मणोंपरसे सबका विश्वास उठ जायगा॥ ३२-३९॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२४४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४

Here is the complete transcribed text from the image, preserving the original Devanagari text, verses, and column layout:

२४४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४ असंश्रुतोक्तिवक्तारो द्विजद्वेषरतास्तथा। स्वधर्मत्यागिनः सर्वे कृतघ्ना भिन्नवृत्तयः ॥ ४० याचकाः पिशुनाश्चैव भविष्यन्ति कलौ युगे। पDefaultापवादनिरता आत्मस्तुतिपरायणाः ॥ ४१ परस्वहरणोपायचिन्तकाः सर्वदा जनाः। अत्याह्लादपरास्तत्र भुञ्जानाः परवेश्मनि ॥ ४२ तस्मिन्नेव दिने प्रायो देवतार्चनतत्पराः। तत्रैव निन्दानिरता भुक्त्वा चैकत्र संस्थिताः ॥ ४३ द्विजाश्च क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये च जातयः। अत्यन्तकामिनश्चैव संकीर्यन्ते परस्परम् ॥ ४४ न शिष्यो न गुरुः कश्चिन्न पुत्रो न पिता तथा। न भार्या न पतिश्चैव भविता तत्र संकरे ॥ ४५ शूद्रवृत्त्यैव जीवन्ति द्विजा नरकभोगिनः। अनावृष्टिभयप्राया गगनासक्तदृष्टयः ॥ ४६ भविष्यन्ति जनाः सर्वे तदा क्षुद्भयकातराः। अन्नोपाधिनिमित्तेन शिष्यान् गृह्णन्ति भिक्षवः ॥ ४७ उभाभ्यामपि पाणिभ्यां शिरःकण्डूयनं स्त्रियः। कुर्वन्त्यो गुरुभर्तृणामाज्ञा भेत्स्यन्ति ता हिताः ॥ ४८ यदा यदा न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति द्विजातयः। तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः ॥ ४९ सर्वधर्मेषु नष्टेषु याति निःश्रीकतां जगत्। सूत उवाच एवं कलेः स्वरूपं तत्कथितं विप्रसत्तमाः ॥ ५० हरिभक्तिपरानेव न कलिर्बाधते द्विजाः। तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ध्यानमेव हि ॥ ५१


(Right Column Translation / व्याख्या)

सब लोग वेदविरुद्ध वचन बोलनेवाले और ब्राह्मणोंके द्वेषी होंगे। सभी स्वधर्मके त्यागनेवाले, कृतघ्न और अपने वर्णधर्मके विरुद्ध वृत्तिसे आजीविका चलानेवाले होंगे। कलियुगमें लोग भिखमंगे, चुगलखोर, दूसरोंकी निन्दा करनेवाले और अपनी ही प्रशंसामें तत्पर होंगे। मनुष्य सदा दूसरोंके धनका अपहरण करनेके उपायको ही सोचते रहेंगे। यदि उन्हें दूसरोंके घरमें भोजन करनेका अवसर मिल जाय तो वे बड़े ही आनन्दित होंगे और प्रायः उसी दिन वे दूसरोंको दिखानेके लिये देवताकी पूजामें प्रवृत्त होंगे। दूसरोंकी निन्दामें तत्पर रहनेवाले वे ब्राह्मण वहाँ ही सबके साथ एक आसनपर बैठकर भोजन करेंगे ॥ ४०-४३ ॥ उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-सभी जातियोंके लोग अत्यन्त कामी होंगे और एक-दूसरेसे सम्पर्क स्थापित करके वर्ण-संकर हो जायँगे। वर्ण-संकरताकी दशामें गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र और पति-पत्नीका विचार नहीं रहेगा। नरकभोगी ब्राह्मणादि वर्ण प्रायः शूद्रवृत्तिसे ही जीविका चलायेंगे और नरकभोगी होंगे। लोगोंको प्रायः सदा अनावृष्टिका भय बना रहेगा और वे सदा आकाशकी ओर दृष्टि लगाये वृष्टिकी ही प्रतीक्षा करते रहेंगे। उस समयके सभी लोग सदा भूखकी पीड़ासे कातर रहेंगे। संन्यासी लोग अन्न-प्राप्तिके उद्देश्यसे ही लोगोंको शिष्य बनाते फिरेंगे। स्त्रियाँ दोनों ही हाथोंसे सिर खुजलाती हुई अपने पति तथा गुरुजनोंकी हितभरी आज्ञाओंका तिरस्कार करेंगी। द्विजातिलोग ज्यों-ज्यों यज्ञ और हवन आदि कर्म छोड़ते जायँगे, त्यों-ही-त्यों बुद्धिमानोंको कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये। उस समय सम्पूर्ण धर्मोंके नष्ट हो जानेसे यह सारा जगत् श्रीहीन हो जायगा ॥ ४४-४९¹/₂ ॥ सूतजी कहते हैं- विप्रवरो ! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे कलियुगके स्वरूपका वर्णन किया। द्विजगण! जो लोग भगवान्‌के भजनमें तत्पर रहेंगे, उन्हींको कलियुग बाधा नहीं दे सकता। सत्ययुगमें तपस्या प्रधान है और त्रेतामें ध्यान।

अध्याय ५५ ] शुक्राचार्यको भगवान्‌की स्तुतिसे पुनः नेत्रकी प्राप्ति २४५

द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे। यतते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तत्॥ ५२ द्वापरे तच्च मासेन अहोरात्रेण तत्कलौ। ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् ॥ ५३ यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्। समस्तजगदाधारं परमार्थस्वरूपिणम् ॥ ५४ घोरे कलियुगे प्राप्ते विष्णुं ध्यायन् न सीदति। अहोऽतीव महाभाग्याः सकृच्चे केशवार्चकाः ॥ ५५ घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वकर्मबहिष्कृते। न्यूनातिरिक्कता न स्यात्कलौ वेदोक्तकर्मणाम् ॥ ५६ हरिस्मरणमेवात्र सम्पूर्णफलदायकम्। हरे केशव गोविन्द वासुदेव जगन्मय ॥ ५७ जनार्दन जगद्धाम पीताम्बरधराच्युत। इतीरयन्ति ये नित्यं न हि तान् बाधते कलिः ॥ ५८ अहो हरिपरा ये तु कलौ सर्वभयंकरे। ते सभा्ग्या महात्मानस्तत्सङ्गतिरता अपि ॥ ५९ हरिनामपरा ये च हरिकीर्तनतत्पराः। हरिपूजारता ये च ते कृतार्था न संशयः ॥ ६० इत्येतद्वः समाख्यातं सर्वदुःखनिवारणम्। समस्तपुण्यफलदं कलौ विष्णोः प्रकीर्तनम् ॥ ६१

द्वापरमें यज्ञको महान् बताया गया है और कलियुगमें एकमात्र दानको। सत्ययुगमें दस वर्षोंतक तप आदिके लिये प्रयत्न करनेसे जो फल मिलता है, वही त्रेतायुगमें एक ही वर्षके प्रयत्नसे सिद्ध होता है, द्वापरमें एक ही मासकी साधनासे सुलभ होता है और कलियुगमें केवल एक दिन-रात यत्न करनेसे प्राप्त हो जाता है। सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन और द्वापरमें पूजन करनेसे, जो फल मिलता है, उसे ही कलियुगमें केवल भगवान्‌का कीर्तन करनेसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। घोर कलियुग प्राप्त होनेपर समस्त जगत्‌के आधारभूत परमार्थस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान करनेवाले मनुष्यको कलिसे बाधा नहीं पहुँचती। अहो! जिन्होंने एक बार भी भगवान् विष्णुका पूजन किया है, वे बड़े सौभाग्यशाली हैं॥ ५०–५५॥ सम्पूर्ण कर्मोंका बहिष्कार करनेवाले कलियुगके प्राप्त होनेपर किये जानेवाले वेदोक्त कर्मोंमें न्यूनता या अधिकताका दोष नहीं होता। उसमें भगवान्‌का स्मरण ही पूर्ण फलदायक होता है। जो लोग हरे, केशव, गोविन्द, वासुदेव, जगन्मय, जनार्दन, जगद्धाम, पीताम्बरधर, अच्युत इत्यादि नामोंका उच्चारण करते रहते हैं, उन्हें कलियुग कभी बाधा नहीं पहुँचाता। अहो! सबको भय देनेवाले इस कलिकालमें जो लोग भगवान् विष्णुकी आराधनामें लगे रहते हैं, अथवा जो उनके आराधकोंका संग ही करते हैं, वे महात्माजन बड़े ही भाग्यशाली हैं। जो हरिनामका जप करते हैं, हरिकीर्तनमें लगे रहते हैं और सदा हरिकी पूजा ही किया करते हैं, वे मनुष्य कृतकृत्य हो गये हैं—इसमें संदेह नहीं है। इस प्रकार यह कलिका वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। कलियुगमें भगवान् विष्णुका नामकीर्तन समस्त दुःखोंको दूर करनेवाला और सम्पूर्ण पुण्यफलोंको देनेवाला है॥ ५६–६१॥

इति श्रीनरसिंहपुराणे कलिलक्षणकीर्तनं नाम चतुःपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'कलियुगके लक्षणोंका वर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५४ ॥

पचपनवाँ अध्याय शुक्राचार्यको भगवान्‌की स्तुतिसे पुनः नेत्रकी प्राप्ति

राजोवाच मार्कण्डेय कथं शुक्रः पुरा बलिमखे गुरुः। वामनेन स विद्धाक्षः स्तुत्वा तल्लब्धवान् कथम् ॥ १

राजा बोले—मार्कण्डेयजी ! पूर्वकालमें राजा बलिके यज्ञमें भगवान् वामनने जो दैत्यगुरु शुक्राचार्यकी आँख छेद डाली थी, उसे उन्होंने पुनः भगवान्‌की स्तुतिद्वारा किस प्रकार प्राप्त किया ? ॥ १ ॥

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५५

२४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५५ मार्कण्डेय उवाच वामनेन स विद्धाक्षो बहुतीर्थेषु भार्गवः। जाह्नवीसलिले स्थित्वा देवमभ्यर्च्य वामनम्॥ २ ऊर्ध्वबाहुः स देवेशं शंखचक्रगदाधरम्। हृदि संचिन्त्य तुष्टाव नरसिंहं सनातनम्॥ ३ शुक्र उवाच नमामि देवं विश्वेशं वामनं विष्णुरूपिणम्। बलिदर्पहरं शान्तं शाश्वतं पुरुषोत्तमम्॥ ४ धीरं शूरं महादेवं शङ्खचक्रगदाधरम्। विशुद्धं ज्ञानसम्पन्नं नमामि हरिमच्युतम्॥ ५ सर्वशक्तिमयं देवं सर्वगं सर्वभावनम्। अनादिमजरं नित्यं नमामि गरुडध्वजम्॥ ६ सुरासुरैर्भक्तिमद्भिः स्तुतो नारायणः सदा। पूजितं च हृषीकेशं तं नमामि जगद्गुरुम्॥ ७ हृदि संकल्प्य यद्रूपं ध्यायन्ति यतयः सदा। ज्योतिरूपमनौपम्यं नरसिंहं नमाम्यहम्॥ ८ न जानन्ति परं रूपं ब्रह्माद्या देवतागणाः। यस्यावताररूपाणि समर्च्चन्ति नमामि तम्॥ ९ एतत्समस्तं येनादौ सृष्टं दुष्टवधात्पुनः। त्रातं यत्र जगल्लीनं तं नमामि जनार्दनम्॥ १० भक्तैरभ्यर्चितो यस्तु नित्यं भक्तप्रियो हि यः। तं देवममलं दिव्यं प्रणमामि जगत्पतिम्॥ ११ दुर्लभं चापि भक्तानां यः प्रयच्छति तोषितः। तं सर्वसाक्षिणं विष्णुं प्रणमामि सनातनम्॥ १२ श्रीमार्कण्डेय उवाच इति स्तुतो जगन्नाथः पुरा शुक्रेण पार्थिव। प्रादुर्बभूव तस्याग्रे शङ्खचक्रगदाधरः॥ १३ उवाच शुक्रमेकाक्षं देवो नारायणस्तदा। किमर्थं जाह्नवीतीरे स्तुतोऽहं तद्ब्रवीहि मे॥ १४ मार्कण्डेयजी बोले—वामनजीके द्वारा जब आँख छेद दी गयी, तब भृगुनन्दन शुक्राचार्यजीने बहुत तीर्थोंमें भ्रमण किया। फिर एक जगह गङ्गाजीके जलमें खड़े हो भगवान् वामनकी पूजा की और अपनी बाँहें ऊपर उठाकर शङ्ख-चक्र-गदाधारी सनातन देवेश्वर भगवान् नरसिंहका मन-ही-मन ध्यान करते हुए वे उनकी स्तुति करने लगे॥ २-३॥ शुक्राचार्यजी बोले—मैं सम्पूर्ण विश्वके स्वामी और श्रीविष्णुके अवतार उन देवदेव वामनजीको नमस्कार करता हूँ, जो बलिक अभिमान चूर्ण करनेवाले, परम शान्त, सनातन पुरुषोत्तम हैं। जो धीर हैं, शूर हैं, सबसे बड़े देवता हैं, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले हैं, उन विशुद्ध एवं ज्ञानसम्पन्न भगवान् अच्युतको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन जरारहित, अनादिदेव भगवान् गरुडध्वजको मैं प्रणाम करता हूँ। देवता और असुर सदा ही जिन नारायणकी भक्तिपूर्वक स्तुति किया करते हैं, उन सर्वपूजित जगद्गुरु भगवान् हृषीकेशको मैं नमस्कार करता हूँ। यतिजन अपने अन्तःकरणमें भावनाद्वारा स्थापित करके जिनके स्वरूपका सदा ध्यान करते रहते हैं, उन अतुलनीय एवं ज्योतिर्मय भगवान् नृसिंहको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि देवतागण जिनके परमार्थ स्वरूपको भलीभाँति नहीं जानते, अतः जिनके अवताररूपोंका ही वे सदा पूजन किया करते हैं, उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने प्रथम इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की थी, फिर जिन्होंने दुष्टोंका वध करके इसकी रक्षा की है तथा जिनमें ही यह सारा जगत् लीन हो जाता है, उन भगवान् जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। भक्तजन जिनका सदा अर्चन करते हैं तथा जो भक्तोंके प्रेमी हैं, उन परम निर्मल, दिव्य कान्तिमय जगदीश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो प्रसन्न होनेपर अपने भक्तोंको दुर्लभ वस्तु भी प्रदान करते हैं, उन सर्वसाक्षी सनातन विष्णुभगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ॥ ४—१२॥ श्रीमार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! पूर्वकालमें शुक्राचार्यजीके द्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् जगन्नाथ उनके समक्ष प्रकट हो गये। उस समय भगवान् नारायणने एक आँखवाले शुक्राचार्यजीसे कहा—'ब्रह्मन्! तुमने गङ्गातटपर किसलिये मेरा स्तवन किया है? यह मुझसे बताओ'॥ १३-१४॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४७

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४७ शुक्र उवाच शुक्राचार्यजी बोले—देवदेव! मैंने पहले (बलिके देवदेव मया पूर्वमपराधो महान् कृतः। यज्ञमें) आपका बहुत बड़ा अपराध किया है; उसी तद्दोषस्यापनुत्त्यर्थं स्तुतवानस्मि साम्प्रतम्॥ १५ दोषको दूर करनेके लिये इस समय आपका स्तवन किया है॥ १५॥ श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान् बोले- मुने! मेरे प्रति किये गये ममापराधान्नयनं नष्टमेकं तवाधुना। अपराधसे ही तुम्हारा एक नेत्र नष्ट हो गया था। शुक्र ! संतुष्टोऽस्मि ततः शुक्र स्तोत्रेणानेन ते मुने॥ १६ इस समय तुम्हारे इस स्तवनसे मैं तुमपर संतुष्ट हूँ ॥ १६ ॥ इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तं मुनिं प्रहसन्निव । यह कहकर देवदेवेश्वर जनार्दनने हँसते हुए-से अपने पाञ्चजन्येन तच्चक्षुः पस्पर्श च जनार्दनः ॥ १७ पाञ्चजन्य शङ्खसे शुक्राचार्यके फूटे हुए नेत्रका स्पर्श किया। नृपश्रेष्ठ ! शार्ङ्गधन्वा देवदेव विष्णुके द्वारा शङ्खका स्पर्श स्पृष्टमात्रे तु शङ्खेन देवदेवेन शार्ङ्गिणा । कराये जाते ही शुक्राचार्यका वह नेत्र पहलेकी भाँति ही बभूव निर्मलं चक्षुः पूर्ववन्नृपसत्तम ॥ १८ निर्मल हो गया। इस प्रकार शुक्राचार्यको नेत्र देकर और एवं दत्त्वा मुनेश्चक्षुः पूजितस्तेन माधवः । उनसे पूजित होकर भगवान् लक्ष्मीपति तुरंत अन्तर्धान हो जगामादर्शनं सद्यः शुक्रोऽपि स्वाश्रमं ययौ ॥ १९ गये और शुक्राचार्य भी अपने आश्रमको चले गये। राजन् ! इस प्रकार पूर्वकालमें मुनिवर महात्मा शुक्राचार्यने देवेश्वर इत्येतदुक्तं मुनिना महात्मना भगवान् विष्णुकी कृपासे अपना नेत्र प्राप्त कर लिया- प्राप्तं पुरा देववरप्रसादात्। यह प्रसङ्ग तुम्हारे प्रश्नानुसार मैंने सुना दिया। अब तुम्हें शुक्रेण किं ते कथयामि राजन् मैं और क्या सुनाऊँ? तुम्हारे मनमें और भी यदि कुछ पुनश्च मां पृच्छ मनोरथान्तः ॥ २० पूछनेकी इच्छा हो तो मुझसे प्रश्न करो ॥ १७-२० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे शुक्रवरप्रदानो नाम पञ्चपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'शुक्राचार्यको वरप्रदान' नामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥ छप्पनवाँ अध्याय विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि राजोवाच राजा बोले- ब्रह्मन् ! अब मैं शार्ङ्गधनुषधारी देवदेव साम्प्रतं देवदेवस्य नरसिंहस्य शार्ङ्गिणः । नरसिंहके स्थापनकी समस्त उत्तम विधिको सुनना श्रोतुमिच्छामि सकलं प्रतिष्ठायाः परं विधिम् ॥ १ चाहता हूँ ॥ १ ॥ श्रीमार्कण्डेय उवाच श्रीमार्कण्डेयजी बोले- भूपाल ! देवदेवेश्वर प्रतिष्ठाया विधिं विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः । चक्रपाणि भगवान् विष्णुके स्थापनकी पुण्यदायिनी प्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रं शृणु भूपाल पुण्यदम् ॥ २ विधि सुनो; मैं शास्त्रके अनुसार उसका वर्णन कर कर्तुं प्रतिष्ठां यश्चात्र विष्णोरिच्छति पार्थिव । रहा हूँ। पृथिवीपते ! जो भी इस लोकमें भगवान् स पूर्वं स्थिरनक्षत्रे भूमिशोधनमारभेत् ॥ ३ विष्णुकी स्थापना करना चाहे, उसको चाहिये कि वह पहले स्थिर-संज्ञक * नक्षत्रोंमें भूमिशोधनका कार्य प्रारम्भ

  • तीनों उत्तरा और रोहिणी - वे 'स्थिर' नक्षत्र कहलाते हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (यथावत रूप में) प्रस्तुत है:

२४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६

खात्वा पुरुषमात्रं तु बाहुद्वयमथापि वा। | करे। एक पुरुषके बराबर अर्थात् साढ़े तीन हाथ अथवा पूरयेच्छुद्धमृद्भिस्तु जलाक्तैः शर्करान्वितैः॥ ४ | दो हाथ नीचेतक नींव खोदकर उसमें जलसे भीगी हुई | कंकड़ और बालूसहित शुद्ध मिट्टी भर दे। राजन्! फिर अधिष्ठानं ततो बुद्ध्वा पाषाणेष्टकमृण्मयम्। | उसे ही आधार समझकर उसके ऊपर अपनी शक्तिके प्रासादं कारयेत्तत्र वास्तुविद्याविदा नृप॥ ५ | अनुसार पत्थर, ईंट अथवा मिट्टीसे गृहनिर्माण-विद्यामें | कुशल कारीगरोंके द्वारा मन्दिर तैयार कराये। वह मन्दिर चतुरस्रं सूत्रमार्गे चतुःकोणं समन्ततः। | चारों ओरसे बराबर और चौकोर हो। उसकी दीवार शिलाभित्तिकमुत्कृष्टं तदलाभेष्टकामयम्॥ ६ | पत्थरकी हो तो बहुत उत्तम; पत्थर न मिलनेपर ईंटोंकी | ही दीवार बनवा ले। यदि ईंटें भी न मिल सकें तो तदलाभे तु मृत्कुड्यं पूर्वद्वारं सुशोभनम्। | मिट्टीकी ही भींत उठा ले। मन्दिर बहुत ही सुन्दर हो और जातिकाष्ठमयैः स्तम्भैस्तल्लग्नैः फलदान्वितैः॥ ७ | उसका दरवाजा पूर्वकी ओर होना चाहिये। उस मन्दिरमें | अच्छी जातिवाले काठके खंभे लगे हों और उनमें चित्रकला उत्पलैः पद्मपत्रैश्च पातितैश्चित्रशिल्पिभिः। | जाननेवाले शिल्पियोंके द्वारा फलयुक्त वृक्ष, कुमुद तथा इत्थं तु कारयित्वा हि हरेर्वेश्म सुशोभनम्॥ ८ | कमलदल चित्रित कराने चाहिये॥ २—७१/२॥ | नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार जिसमें सुन्दर किवाड़ लगे हों और पूर्वद्वारं नृपश्रेष्ठ सुकपाटं सुचित्रितम्। | जिसका द्वार पूर्व दिशाकी ओर हो—ऐसा बेल-बूटोंसे अतिवृद्धातिबालैस्तु कारयेन्नाकृतिं हरेः॥ ९ | भलीभाँति चित्रित भगवान्का परम सुहावना मन्दिर बनवाकर | बुद्धिमान् एवं हृष्टपुष्ट शरीरवाले पुरुषके द्वारा विश्वकर्माकी कुष्ठाद्युपहतैर्वापि अन्यैर्वा दीर्घरोगिभिः। | बतायी हुई पद्धतिके अनुसार पुराणोक्त दिव्य प्रतिमाका विश्वकर्मोक्तमार्गेण पुराणोक्तां नृपोत्तम॥ १० | निर्माण कराये। जो कारीगर अत्यन्त बूढ़ा या बालक अथवा | कोढ़ आदि रोगोंसे दूषित या पुराना रोगी हो, उससे कारयेत् प्रतिमां दिव्यां पुष्टाङ्गेन तु धीमता। | भगवत्प्रतिमाका निर्माण नहीं कराना चाहिये। प्रतिमाका मुख सौम्याननां सुश्रवणां सुनासां च सुलोचनाम्॥ ११ | सौम्य (प्रसन्न) तथा कान, नाक और नेत्र आदि अङ्ग सुढार | होने चाहिये। उसकी दृष्टि न तो बहुत नीची हो, न बहुत नाधोदृष्टिं नोर्ध्वदृष्टिं तिर्यग्दृष्टिं न कारयेत्। | ऊँची हो और न तिरछी ही हो। विद्वान् पुरुष ऐसी प्रतिमा कारयेत् समदृष्टिं तु पद्मपत्रायतेक्षणाम्॥ १२ | बनवाये, जिसकी दृष्टि सम हो और जिसके नेत्र कमलदलके | समान विशाल हों। भौंहें, ललाट और कपोल सुन्दर हों, सुभ्रुवं सुललाटां च सुकपोलां समां शुभाम्। | उसका समस्त विग्रह सुडौल और सौम्य हो। उसके दोनों बिम्बोष्ठीं सुष्ठुचिबुकां सुग्रीवां कारयेद्बुधः॥ १३ | ओठ लाल हों, ठोढ़ी (अधरके नीचेका भाग) मनोहर तथा | कण्ठ सुन्दर हो। प्रतिमाकी भुजाएँ चार होनी चाहिये—दो उपबाहुकरे देयं दक्षिणे चक्रमर्कवत्। | भुजाएँ और दो उपभुजाएँ। उनमेंसे दाहिनी उपभुजाके हाथमें नाभिसंलग्नदिव्यारं परितो नेमिसंयुतम्॥ १४ | सूर्यके समान आकारवाला चक्र धारण कराना चाहिये। | चक्रकी नाभिके चारों ओर दिव्य अरे हों और उनके भी वामपार्श्वेत्युपभुजे देयं शङ्खं शशिप्रभम्। | ऊपर सब ओरसे नेमि (हाल) लगी हो। बायीं उपभुजाके पाञ्चजन्यमिति ख्यातं दैत्यदर्पहरं शुभम्॥ १५ | हाथमें चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिमय पाञ्चजन्य नामक | शंख देना चाहिये, जो दैत्योंके मदको चूर्ण करनेवाला और | कल्याणप्रद है॥ ८—१५॥

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४९

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २४९ हारार्पितवरां दिव्यां कण्ठे त्रिवलिसंयुताम्। | उस दिव्य भगवत्प्रतिमाके कण्ठमें सुन्दर हार पहनाया सुस्तनीं चारुहृदयां सुजठरां समां शुभाम् ॥ १६ | गया हो, गलेमें त्रिवली-चिह्न हो, स्तनभाग सुन्दर, वक्षःस्थल रुचिर और उदर मनोहर होना चाहिये। कटिलग्नवामकरां पद्मलग्नां च दक्षिणाम्। | सम्पूर्ण अङ्ग बराबर और सुन्दर हों। वह प्रतिमा अपना केयूरबाहुकां दिव्यां सुनाभिवलिभङ्गिकाम् ॥ १७ | बायाँ हाथ कमरपर रखे हो और दाहिनेमें कमल धारण किये हो। बाहुओंमें भुजबन्ध पहने हो और सुन्दर नाभि सुकटीं च सुजङ्घोरूं वस्त्रमेखलभूषिताम्। | तथा त्रिवलीसे सुशोभित एवं दिव्य जान पड़ती हो। एवं तां कारयित्वा तु प्रतिमां राजसत्तम ॥ १८ | उसका कटिभाग (नितम्ब), जाँघें और पिंडलियाँ मनोहर हों, वह कमरमें मेखला और पीतवस्त्रसे विभूषित हो। सुवर्णवस्त्रदानेन तत्कर्तृन् पूज्य सत्तम। | नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवत्प्रतिमाका निर्माण कराकर पूर्वपक्षे शुभे काले प्रतिमां स्थापयेद्बुधः ॥ १९ | उसके बनानेवाले शिल्पियोंको सुवर्ण-दान एवं वस्त्र-दानके द्वारा सम्मानित करके विद्वान् पुरुष पूर्व पक्षमें शुभ समयपर उस प्रतिमाकी स्थापना करे ॥ १६–१९ ॥ प्रासादस्याग्रतः कृत्वा यागमण्डपमुत्तमम्। | चतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु चतुर्भिस्तोरणैर्युतम् ॥ २० | मन्दिरके सामने एक उत्तम यज्ञमण्डप बनवाये। समधान्याङ्कुरैर्युक्तं शङ्खभेरीनिनादितम्। | उसमें चारों ओर एक-एकके क्रमसे चार दरवाजे हों और सारा मण्डप चार तोरणों (बड़े-बड़े फाटकों)- प्रतिमां क्षाल्य विद्वद्भिः षट्त्रिंशद्भिर्घटोदकैः ॥ २१ | से घिरा हो। उसमें सप्तधान्यके अङ्कुर उगे हों तथा शंख और भेरी आदि बाजे बजते हों। विद्वानोंके द्वारा छत्तीस प्रविश्य मण्डपे तस्मिन् ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । | घड़े जलसे उस प्रतिमाका अभिषेक कराकर उसके तत्रापि स्नापयेत्पश्चात् पञ्चगव्यैः पृथक् पृथक् ॥ २२ | साथ वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको साथमें लिये उक्त मण्डपमें प्रवेश करे और फिर पञ्चगव्योंसे पृथक्-पृथक् तथोष्णवारिणा स्नाप्य पुनः शीतोदकेन च। | स्नान कराये। इसी प्रकार गर्म जलसे नहलाकर फिर ठंडे हरिद्राकुङ्कुमाद्यैस्तु चन्दनैश्चोपलेपयेत् ॥ २३ | जलसे स्नान कराये। तत्पश्चात्, हल्दी और कुङ्कुम आदिका तथा चन्दनोंका उसपर लेप करे, फिर फूलोंकी मालाओंसे पुष्पमाल्यैरलङ्कृत्य वस्त्रैराच्छाद्य तां पुनः। | विभूषितकर उसे वस्त्र धारण करा दे और पुण्याहवाचन पुण्याहं तत्र कृत्वा तु ऋग्भिस्तां प्रोक्ष्य वारिभिः ॥ २४ | करके वैदिक ऋचाओंसे उच्चारणपूर्वक जलसे प्रोक्षित कर भक्त ब्राह्मणोंद्वारा उस भगवद्विग्रहको नहलाये। स्नात्वा तां ब्राह्मणैर्भक्तैः शंखभेरीस्वनैर्युतम्। | तत्पश्चात् शंख, भेरी आदि बाजे बजाते हुए उसे नदीके वासयेत्सप्तरात्रं तु त्रिरात्रं वा नदीजले ॥ २५ | जलमें रखकर सात या तीन दिनोंतक उसे वहाँ रहने दे। ह्रदे तु विमले शुद्धे तडागे वापि रक्षयेत् । | अथवा किसी निर्मल जलाशय या शुद्ध सरोवरमें ही अधिवास्य जले देवमेवं पार्थिवपुङ्गव ॥ २६ | रखकर उसकी रक्षा करे। नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान्‌का जलाधिवास कराके ब्राह्मणोंद्वारा उनको उठवाये और तत उत्थाप्य विप्रैस्तु स्थाप्या्वलङ्कृत्य पूर्ववत्। | पालकी आदिमें चढ़ाकर पूर्ववत् उन्हें माला आदिसे ततो भेरीनिनादैस्तु वेदघोषैश्च केशवम् ॥ २७ | विभूषित करे। तदनन्तर नगारोंकी ध्वनि और वेदमन्त्रोंके गम्भीर घोषके साथ भगवान्‌को वहाँसे ले आये और आनीय मण्डपे शुद्धे पद्माकारविनिर्मिते । | कमलाकार बने हुए शुद्ध मण्डपमें रखे। वहाँ पुनः स्नान कृत्वा पुनस्ततः स्नाप्य विष्णुभक्तैरलङ्क्रियात् ॥ २८ | कराके विष्णुभक्तोंद्वारा उसका शृङ्गार कराये ॥ २०-२८॥

२५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६

२५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६ [संस्कृत श्लोक] ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु विधिवत् षोडशर्त्विजः। चतुर्भिरध्ययनं कार्यं चतुर्भिः पालनं तथा ॥ २९ चतुर्भिस्तु चतुर्दिक्षु होमः कार्यो विचक्षणैः । पुष्पाक्षतान्नमिश्रेण दद्यादिक्षु बलीन् नृप ॥ ३० एकेन दापयेत्तेषामिन्द्राद्याः प्रीयन्तामिति । प्रत्येकं सायंसंध्यायां मध्यरात्रे तथोषसि ॥ ३१ उदिते च ततो दद्यान्मातृविप्रगणाय वा। जपन् पुरुषसूक्तं तु एकतस्तु पुनः पुनः ॥ ३२ एकतो मनसा राजन् विष्णोर्मन्दिरमध्यगः । अहोरात्रोषितो भूत्वा यजमानो द्विजैः सह ॥ ३३ प्रविश्य प्रतिमाद्वारं शुभलग्ने विचक्षणः । देवसूक्तं द्विजैः सार्धमुपस्थाप्य च तां दृढम् ॥ ३४ संस्थाप्य विष्णुसूक्तेन पवमानेन वा पुनः । प्रोक्षयेद्देवदेवेशमाचार्यः कुशवारिणा ॥ ३५ तदग्रे चाग्निमाधाय सम्परिस्तीर्य यत्नतः । जुहुयाज्जातकर्मादि गायत्र्या वैष्णवेन तु ॥ ३६ चतुर्भिराज्याहुतिभिरेकामेकां क्रियां प्रति। आचार्यस्तु स्वयं कुर्यादस्त्रैर्बन्धं च कारयेत् ॥ ३७ त्रातारमिति चैन्द्रयां तु कुर्यादाज्यप्रणुन्नकम् । परोदिवेति याम्यायां वारुण्यां निषसेति च ॥ ३८ या ते रुद्रेति सौम्यां तु हुवेदाज्याहुतीर्नृप। परोमात्रेति सूक्ताभ्यां सर्वत्राज्याहुतीर्नृप ॥ ३९ [हिन्दी अनुवाद] इसके बाद सोलह ऋत्विज् ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक भोजन कराये। उनमेंसे चार ब्राह्मणोंको तो वहाँ वेद-पुराणादिका स्वाध्याय (पाठ) करना चाहिये, चार विप्रोंको उस भगवद्विग्रहकी रक्षामें संलग्न रहना चाहिये तथा चार विद्वानोंको यज्ञमण्डपके भीतर चारों दिशाओंमें हवन करना चाहिये। राजन्! फिर एक ब्राह्मणके द्वारा फूल, अक्षत और अन्नसे समस्त दिशाओंमें बलि अर्पित कराये। यह बलि इन्द्रादि देवताओंकी प्रसन्नताके लिये होती है। प्रत्येक दिशाके अधिपतिको 'इन्द्रः प्रीयताम्' इत्यादि रूपसे उसके नामोच्चारणपूर्वक ही बलि दे। सायंकाल, आधी रात, उषःकाल तथा सूर्योदयके समय प्रत्येक दिक्पालको बलि अर्पित करनी चाहिये। इसके बाद मातृकागणोंको बलि और ब्राह्मणोंको उपहार दे। राजन्! इसके पश्चात् यजमानको चाहिये कि भगवान् विष्णुके मन्दिरमें एक ओर बैठकर एकाग्रचित्तसे बार-बार पुरुषसूक्तका जप करे। फिर पूरे एक दिन-रात उपवास करके शुभ लग्नमें वह बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मणोंको साथ ले मण्डपमें, जहाँ प्रतिमा रखी गयी हो, उस द्वारसे मण्डपके भीतर प्रवेश करे और ब्राह्मणोंके साथ देवसूक्तका पाठ करते हुए भगवत्प्रतिमाका उपस्थान करके उसे मन्दिरमें लाये और विष्णुसूक्त अथवा पवमानसूक्तका पाठ करते हुए उसे वहाँ दृढ़तापूर्वक स्थापित करे। तत्पश्चात् आचार्य कुशयुक्त जलसे उन देवदेवेश्वर भगवान्‌का अभिषेक करे॥ २९-३५॥ फिर भगवान्‌के सम्मुख अग्निस्थापन करे। अग्निके चारों ओर यत्नपूर्वक कुशास्तरण करके गायत्री और विष्णुमन्त्रोंद्वारा जातकर्मादि संस्कारकी सिद्धिके निमित्त हवन करे। आचार्यको चाहिये कि प्रत्येक क्रियामें चार-चार बार घीकी आहुति दे तथा अस्त्रमन्त्र (अस्त्राय फट्) बोलकर दिग्बन्ध कराये। 'ॐ त्रातारमिन्द्रम्०' इत्यादि मन्त्र (शु० यजु० २०। ५०)-से अग्निवेदीपर पूर्वकी ओर घीकी आहुति दे। 'परो दिवा०' इत्यादि मन्त्र (शु० यजु० १७। २९)-से दक्षिण दिशामें और 'निषसाद०' इत्यादि मन्त्र (शु० यजु० १०। २७)-से पश्चिममें घृतका हवन करे। हे नृप! 'या ते रुद्र०' (शु० यजु० १६। २)-इस मन्त्रसे उत्तर दिशामें और 'परो मात्रया०' (ऋग्वेद ७। ६। ९९) इत्यादि दो सूक्तोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंमें घीकी आहुति दे। इस प्रकार विधिवत् हवन करके 'यदस्या०' (शु० यजु० २३। २८) इस In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २५१

अध्याय ५६ ] विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि २५१ हुत्वा जपेच्च विधिवद्यदस्येति च स्विष्टकृत् । मन्त्रका जप करे और घीसे 'स्विष्टकृत्' संज्ञक होम ततः स दक्षिणां दद्यादृृत्विग्भ्यश्च यथार्हतः ॥ ४० करे। तदनन्तर ऋत्विजोंको उनके सम्मानके अनुकूल सादर दक्षिणा दे। इसके बाद यजमान आचार्यको दो वस्त्रे द्वे कुण्डले चैव गुरवे चाङ्गुलीयकम्। वस्त्र, दो सुवर्णमय कुण्डल और सोनेकी अंगूठी दे यजमानस्ततो दद्याद्विभवे सति काञ्चनम् ॥ ४१ तथा यदि सामर्थ्य हो तो इसके अतिरिक्त भी सुवर्णदान करे ॥ ३६-४१ ॥ कलशाष्टसहस्रेण कलशाष्टशतेन वा। फिर विद्वान् पुरुष यथासम्भव एक हजार आठ या एकविंशतिना वापि स्नपनं कारयेद् बुधः ॥ ४२ एक सौ आठ अथवा इक्कीस घड़े जलसे भगवान्‌को स्नान कराये। उस समय शंख और दुन्दुभि आदि बाजे शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्वेदघोषैश्च मङ्गलैः। बजते रहें, वेदमन्त्रोंका घोष और मङ्गलपाठ होता रहे। यवव्रीहियुतैः पात्रैरूद्धतैरूच्छिताङ्कुरैः ॥ ४३ अपनी शक्तिके अनुसार जिनपर जौ आदिके अङ्कुर निकले हों, ऐसे जौ और व्रीहि (चावल)-से भरे पात्रोंद्वारा तथा दीपयष्टिपताकाभिश्च्छत्रचामरतोरणैः । दीप, यष्टि (छड़ी), पताका, छत्र, चँवर, तोरण आदि स्नपनं कारयित्वा तु यथाविभवविस्तरम् ॥ ४४ सामग्रियोंके साथ स्नान-विधि पूर्ण कराके वहाँ भी ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। राजन्! इस प्रकार जो तत्रापि दद्याद्विप्रेभ्यो यथाशक्त्या तु दक्षिणाम्। भगवान् विष्णुकी प्रतिष्ठा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त एवं यः कुरुते राजन् प्रतिष्ठां देवचक्रिणः ॥ ४५ हो जाता है और मृत्युके पश्चात् अपनेसहित इक्कीस सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वभूषणभूषितः । पीढ़ीके पितरोंको साथ ले, सब प्रकारके आभूषणोंसे विमानेन विचित्रेण त्रिःसप्तकुलजैर्वृतः ॥ ४६ भूषित एवं विचित्र विमानपर आरूढ हो, क्रमशः इन्द्रादि लोकोंमें विशेष सम्मान प्राप्त करता है तथा अपने बन्धुजनोंको पूजां सम्प्राप्य महतीमिन्द्रलोकादिषु क्रमात्। उन लोकोंमें रखकर स्वयं विष्णुलोकमें जाकर प्रतिष्ठित बान्धवांस्तेषु संस्थाप्य विष्णुलोके महीयते ॥ ४७ होता है। फिर वहाँ ही भगवत्तत्त्वका ज्ञान प्राप्तकर वह तत्रैव ज्ञानमासाद्य वैष्णवं पदमाप्नुयात्। विष्णुस्वरूपमें लीन हो जाता है ॥ ४२-४७ १/२ ॥ प्रतिष्ठाविधिरयं विष्णोर्मयैवं ते प्रकीर्तितः ॥ ४८ राजन्! इस प्रकार तुमसे मैंने यह प्रतिष्ठा-विधि पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनः ॥ ४९ बतायी। इसका पाठ और श्रवण करनेवाले लोगोंके सब पाप दूर हो जाते हैं। नरनाथ! जब मनुष्य इस पूर्वोक्त यदा नृसिंहं नरनाथ भूमौ विधिसे पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहकी स्थापना कर लेता संस्थाप्य विष्णुं विधिना ह्यनेन । है, तब मृत्युके बाद वह भगवान् विष्णुके उस नित्यधामको तदा ह्यसौ याति हरेः पदं तु प्राप्त होता है, जहाँ रहकर वह पुनः संसारमें नहीं यत्र स्थितोऽयं न निवर्तते पुनः ॥ ५० लौटता ॥ ४८-५० ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे प्रतिष्ठाविधिर्नाम षट्पञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'प्रतिष्ठाविधि' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५७

२५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५७ सत्तावनवाँ अध्याय * भक्तके लक्षण; हारीत-स्मृतिका आरम्भ; ब्राह्मणधर्मका वर्णन

राजोवाच भक्तानां लक्षणं ब्रूहि नरसिंहस्य मे द्विज। येषां संगतिमात्रेण विष्णुलोको न दूरतः॥ १

राजा बोले—ब्रह्मन्! आप मुझसे भगवान् नृसिंहके भक्तोंका लक्षण बतलाइये, जिनका सङ्ग करनेमात्रसे विष्णुलोक दूर नहीं रह जाता॥ १॥

श्रीमार्कण्डेय उवाच विष्णुभक्ता महोत्साहा विष्ण्वर्चनविधौ सदा। संयता धर्मसम्पन्नाः सर्वार्थान् साधयन्ति ते॥ २ परोपकारनिरता गुरुशुश्रूषणे रताः। वर्णाश्रमाचारयुताः सर्वेषां सुप्रियंवदाः॥ ३ वेदवेदार्थतत्त्वज्ञा गतरोषा गतस्पृहाः। शान्ताश्च सौम्यवदना नित्यं धर्मपरायणाः॥ ३ हितं मितं च वक्तारः काले शक्त्यातिथिप्रियाः। दम्भमायाविनिर्मुक्ताः कामक्रोधविवर्जिताः॥ ५ ईदृग्विधा नरा धीराः क्षमावन्तो बहुश्रुताः। विष्णुकीर्तनसंजातहर्षा रोमाञ्चिता जनाः॥ ६ विष्ण्वर्चापूजने यत्तास्तत्कथायां कृतादराः। ईदृग्विधा महात्मानो विष्णुभक्ताः प्रकीर्तिताः॥ ७

श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! भगवान् विष्णुके भक्त उनकी पूजा-अर्चा करनेमें महान् उत्साह रखते हैं। वे अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए धर्ममें तत्पर रहकर सारे मनोरथोंको सिद्ध कर लेते हैं। भगवद्भक्त जन सदा परोपकार और गुरु-सेवामें लगे रहते हैं, सबसे मीठे वचन बोलते और अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके सदाचारोंका पालन करते हैं। वे वेद और वेदार्थका तत्त्व जाननेवाले होते हैं, उनमें क्रोध और कामनाओंका अभाव होता है। वे सदा शान्त रहते हैं, उनके मुखपर सौम्यभाव लक्षित होता है तथा वे निरन्तर धर्माचरणमें लगे रहते हैं। थोड़ा किंतु हितकारी वचन बोलते हैं, समयपर अपनी शक्तिके अनुसार सदा अतिथिकी सेवा करनेमें उनका प्रेम बना रहता है। वे दम्भ, कपट, काम और क्रोधसे रहित होते हैं। जो मनुष्य इन पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त एवं धीर हैं, बहुश्रुत और क्षमावान् हैं तथा विष्णुभगवान्के नामोंका कीर्तन अथवा श्रवण करते समय हर्षसे रोमाञ्चित हो जाते हैं, इसी तरह जो विष्णुपूजनमें तत्पर और भगवत्कथामें आदर रखनेवाले हैं, ऐसे महात्मा पुरुष भगवान् विष्णुके भक्त कहे गये हैं॥ २-७॥

राजोवाच ये वर्णाश्रमधर्मस्थास्ते भक्ताः केशवं प्रति। इति प्रोक्तं त्वया विद्वन् भृगुवर्य गुरो मम॥ ८ वर्णानामाश्रमाणां च धर्मं मे वक्तुमर्हसि। यैः कृतैस्तुष्यते देवो नरसिंहः सनातनः॥ ९

राजा बोले—विद्वन्! भृगुवर्य! मेरे गुरुदेव! आपने अभी कहा है कि जो अपने वर्ण और आश्रमके धर्ममें लगे रहते हैं, वे भगवान् विष्णुके भक्त हैं; अतः आप कृपा करके वर्णों और आश्रमोंके धर्म बताइये, जिनके पालन करनेसे सनातन भगवान् नृसिंह संतुष्ट होते हैं॥ ८-९॥

श्रीमार्कण्डेय उवाच अत्र ते वर्णयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम्। मुनिभिः सह संवादं हारीतस्य महात्मनः॥ १० हारीतं धर्मतत्त्वज्ञमासीनं बहुपाठकम्। प्रणिपत्याब्रुवन् सर्वे मुनयो धर्मकाङ्क्षिणः॥ ११

श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—इस विषयमें मुनियोंके साथ महात्मा हारीत ऋषिका संवाद हुआ था; उसी प्राचीन एवं उत्तम इतिहासका आज मैं तुम्हारे समक्ष वर्णन करूँगा॥ १०॥ एक समयकी बात है, धर्मका तत्त्व जाननेकी इच्छावाले समस्त मुनियोंने एक जगह आसनपर आसीन, धर्म- तत्त्ववेत्ता एवं बहुपाठी महात्मा हारीत ऋषिके पास जाकर

  • यहाँसे 'हारीत-स्मृति' का प्रारम्भ है। अधुना उपलब्ध 'लघु हारीत स्मृति'के पाठ इसके पाठसे प्रायः मिलते हैं। कुछ-कुछ पाठान्तर भी उपलब्ध होते हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५७ ] भक्तके लक्षण; हारीत-स्मृतिका आरम्भ; ब्राह्मणधर्मका वर्णन २५३

भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक। वर्णानामाश्रमाणां च धर्मं प्रब्रूहि शाश्वतम्॥ १२ हारीत उवाच नारायणः पुरा देवो जगत्स्रष्टा जलोपरि। सुष्वाप भोगिपर्यङ्के शयने तु श्रिया सह॥ १३ तस्य सुप्तस्य नाभौ तु दिव्यं पद्ममभूत् किल। तन्मध्ये चाभवद्ब्रह्मा वेदवेदाङ्गभूषणः॥ १४ स चोक्तस्तेन देवेन ब्राह्मणान् मुखतोऽसृजत्। असृजत्क्षत्रियान् बाह्रोर्वैश्यांस्तु ऊरुतोऽसृजत्॥ १५ शूद्रांस्तु पादतः सृष्टास्तेषां चैवानुपूर्वशः। धर्मशास्त्रं च मर्यादां प्रोवाच कमलोद्भवः॥ १६ तद्वत्सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुत द्विजसत्तमाः। धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्॥ १७

उन्हें प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! आप समस्त धर्मोंके ज्ञाता और प्रवर्तक हैं; अतः आप हमलोगोंसे वर्ण और आश्रमोंसे सम्बन्ध रखनेवाले सनातन धर्मका वर्णन कीजिये'॥ ११-१२॥ श्रीहारीतजी बोले—पूर्वकालमें जगत्स्रष्टा भगवान् नारायण जलके ऊपर शेषनागकी शय्यापर श्रीलक्ष्मीजीके साथ शयन करते थे। कहते हैं, शयन-कालमें ही उन भगवान्की नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ और उस कमल-कोषमेंसे वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञानसे विभूषित श्रीब्रह्माजी प्रकट हुए। उन ब्रह्माजीने सृष्टिके लिये भगवान् नारायणकी आज्ञा होनेपर सर्वप्रथम ब्राह्मणोंको अपने मुखसे प्रकट किया। फिर क्षत्रियोंको बाहुओंसे और वैश्योंको जाँघोंसे उत्पन्न किया। अन्तमें उन्होंने चरणोंसे शूद्रोंकी सृष्टि की। फिर कमलोद्भव ब्रह्माजीने क्रमशः उन्हीं ब्राह्मणादि वर्णोंके धर्मका उपदेश करनेवाले शास्त्र और वर्णोंकी मर्यादाका वर्णन किया। द्विजवरो! ब्रह्माजीने जो कुछ उपदेश किया, वह सब मैं आप लोगोंसे कह रहा हूँ; आप सुनें। यह धर्मशास्त्र धन, यश और आयुको बढ़ानेवाला तथा स्वर्ग और मोक्षरूपी फलको देनेवाला है॥ १३-१७॥


ब्राह्मण्यां ब्राह्मणेनैव चोत्पन्नो ब्राह्मणः स्मृतः। तस्य धर्मं प्रवक्ष्यामि तद्योग्यं देशमेव च॥ १८ कृष्णसारो मृगो यत्र स्वभावात्तु प्रवर्तते। तस्मिन् देशे वसेद्धर्मं कुरु ब्राह्मणपुंगव॥ १९ षट्कर्माणि च यान्याहुर्ब्राह्मणस्य मनीषिणः। तैरेव सततं यस्तु प्रवृत्तः सुखमेधते॥ २० अध्ययनमध्यापनं च यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहश्चेति कर्मषट्कमिहोच्यते॥ २१ अध्यापनं च त्रिविधं धर्मस्यार्थस्य कारणम्। शुश्रूषाकारणं चैव त्रिविधं परिकीर्तितम्॥ २२ योग्यानध्यापयेच्छिष्यान् याज्यानपि च याजयेत्। विधिना प्रतिगृह्णींश्च गृहधर्मप्रसिद्धये॥ २३ वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं शुभे देशे समाहितः। नित्यं नैमित्तिकं काम्यं कर्म कुर्यात् प्रयत्नतः॥ २४ गुरुशुश्रूषणं चैव यथान्यायमतन्द्रितः। सायं प्रातरुपासीत विधिनाग्निं द्विजोत्तमः॥ २५

जो ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुई स्त्रीके गर्भ और ब्राह्मणके ही वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, वह 'ब्राह्मण' कहा गया है। अब मैं ब्राह्मणके धर्म और निवास-योग्य देशको बता रहा हूँ। ब्रह्माजीने ब्राह्मणको उत्पन्न करके उनसे कहा—'ब्राह्मणश्रेष्ठ! जिस देशमें कृष्णसार मृग स्वभावतः निवास करता हो, उसी देशमें रहकर तुम धर्मका पालन करो।' मनीषियोंने जो ब्राह्मणके छः कर्म बतलाये हैं, उन्हींके अनुसार जो सदा व्यवहार करता है, वह सुखपूर्वक अभ्युदयशील होता है। अध्ययन (पढ़ना), अध्यापन (पढ़ाना), यजन (यज्ञ करना), याजन (यज्ञ कराना), दान करना और दान लेना—ये ही ब्राह्मणके छः कर्म कहे जाते हैं। इनमेंसे अध्ययन तीन प्रकारका बताया जाता है—पहला धर्मके लिये, दूसरा धनके लिये और तीसरा अपनी सेवा करानेके लिये होता है। ब्राह्मणको चाहिये कि योग्य शिष्योंको पढ़ाये, योग्य यजमानोंका यज्ञ कराये और गृहस्थधर्मकी सिद्धि (जीविका चलाने आदि)-के लिये विधिपूर्वक दूसरेका दान भी ग्रहण करे। शुभ स्थानपर रहकर, एकाग्रचित्त हो, प्रतिदिन वेदका ही अभ्यास करे तथा यत्नपूर्वक नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्मोंका अनुष्ठान करे। श्रेष्ठ ब्राह्मणको चाहिये कि आलस्य त्यागकर उचितरूपसे गुरुजनोंकी सेवा करे और प्रतिदिन प्रातःकाल तथा सायंकाल विधिपूर्वक अग्निकी सेवा किया करे॥ १८-२५॥

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८

२५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८ कृतस्नानस्तु कुर्वीत वैश्वदेवं दिने दिने। अतिथिं चागतं भक्त्या पूजयेच्छक्तितो गृही॥ २६ अन्यांश्चागतान् दृष्ट्वा पूजयेदविरोधतः। स्वदारनिरतो नित्यं परदारविवर्जितः॥ २७ सत्यवादी जितक्रोधः स्वधर्मनिरतो भवेत्। स्वकर्मणि च सम्प्राप्ते प्रमादं नैव कारयेत्॥ २८ प्रियां हितां वदेद्वाचं परलोकाविरोधिनीम्। एवं धर्मः समुद्दिष्टो ब्राह्मणस्य समासतः। धर्ममेवं तु यः कुर्यात्स याति ब्रह्मणः पदम्॥ २९ इत्येष धर्मः कथितो मया वै विप्रस्य विप्रा अखिलाघहारी। वदामि राजादिजनस्य धर्मं पृथक्पृथग्बोधत विप्रवर्याः॥ ३० गृहस्थ ब्राह्मण स्नान आदिके बाद प्रतिदिन बलिवैश्वदेव करे और घरपर आये हुए अतिथिका अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक सम्मान करे। एक अतिथिके आ जानेपर यदि दूसरे भी आ जायँ तो उन्हें भी देखकर विरोध न माने, उनका भी यथाशक्ति सम्मान करे। सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखे, दूसरेकी स्त्रीके सम्पर्कसे सदा दूर रहे। सदा सत्य बोले, क्रोध न करे, अपने धर्मका पालन करता रहे। अपने नैतिक आदि कर्मका समय प्राप्त होनेपर प्रमाद न करे। जिससे परलोक न बिगड़े—ऐसी सत्य, प्रिय और हितकारिणी वाणी बोले। इस प्रकार मैंने ब्राह्मण-धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया। जो ब्राह्मण इस प्रकार अपने धर्मका पालन करता है, वह नित्य ब्रह्मधाम (सत्यलोक)-को प्राप्त होता है। विप्रगण! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे यह ब्राह्मण-धर्म कहा है, यह समस्त पापोंको दूर करनेवाला है। विप्रवरो! अब क्षत्रियादि जातियोंका पृथक्-पृथक् धर्म बताता हूँ, आप लोग सुनें॥ २६—३०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे ब्राह्मणधर्मकथनं नाम सप्तपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'ब्राह्मणधर्मका वर्णन' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५७॥ अठ्ठावनवाँ अध्याय क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन हारीत उवाच क्षत्रादीनां प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः। येन येन प्रवर्तन्ते विधिना क्षत्रियादयः॥ १ राज्यस्थः क्षत्रियश्चैव प्रजा धर्मेण पालयेत्। कुर्यादध्ययनं सम्यग्यजेद्यज्ञान् यथाविधि॥ २ दद्याद्दानं द्विजाग्र्येभ्यो धर्मबुद्धिसमन्वितः। स्वदारनिरतो नित्यं परदारविवर्जितः॥ ३ नीतिशास्त्रार्थकुशलः संधिविग्रहतत्त्ववित्। देवब्राह्मणभक्तश्च पितृकार्यपरस्तथा॥ ४ धर्मेणैव जयं काङ्क्षेद्धर्मं परिवर्जयेत्। उत्तमां गतिमाप्नोति क्षत्रियोऽथैवमाचरन्॥ ५ श्रीहारीत मुनि बोले—अब मैं क्रमशः क्षत्रियादि वर्णोंके लिये विहित नियमोंका यथावत् वर्णन करूँगा, जिनके अनुसार क्षत्रियादिको अपना व्यवहार निभाना चाहिये। राजपदपर स्थित क्षत्रियको उचित है कि वह धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करे। उसे भलीभाँति वेदाध्ययन और विधिपूर्वक यज्ञ भी करने चाहिये। धर्मबुद्धिसे युक्त हो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान दे, सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहकर परस्त्रीका त्याग करे, नीतिशास्त्रका अर्थ समझनेमें निपुण हो, संधि और विग्रहका तत्त्व समझे। देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखे, पितरोंका पूजन-श्राद्धादि कर्म करे। धर्मपूर्वक ही विजयकी इच्छा करे, अधर्मको भलीभाँति त्याग दे। इस प्रकार आचरण करनेवाला क्षत्रिय उत्तम गतिको प्राप्त होता है॥ १-५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५५ गोरक्षाकृषिवाणिज्यं कुर्याद्वैश्यो यथाविधि। वैश्यको चाहिये कि वह विधिपूर्वक गोरक्षा, कृषि दानधर्मं यथाशक्त्या गुरुशुश्रूषणं तथा॥ ६ और व्यापार करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दानधर्म और गुरुसेवा भी करे। लोभ और दम्भसे सर्वथा दूर रहे, लोभदम्भर्विनिर्मुक्तः सत्यवागनसूयकः। सत्यवादी हो, किसीके दोष न देखे, मन और इन्द्रियोंको स्वदारनिरतो दान्तः परदारविवर्जितः॥ ७ संयममें रखकर परस्त्रीका त्याग करे और अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहे। यज्ञ-कालमें शीघ्रतापूर्वक ब्राह्मणोंका धनैर्विप्रान् समर्चेत यज्ञकाले त्वरान्वितः। धनसे सम्मान करे तथा आलस्य छोड़कर प्रतिदिन यज्ञाध्ययनदानानि कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः॥ ८ यज्ञ, अध्ययन और दान करता रहे। श्राद्ध-काल प्राप्त पितृकार्यं च तत्काले नरसिंहार्चनं तथा। होनेपर पितृ-श्राद्ध अवश्य करे और नित्यप्रति भगवान् एतद्वैश्यस्य कर्मोक्तं स्वधर्ममनुतिष्ठतः॥ ९ श्रीनृसिंहदेवका पूजन करे। अपने धर्मका पालन करनेवाले वैश्यके लिये यही कर्तव्य कर्म बतलाया गया है। पूर्वोक्त एतदासेवमानस्तु स स्वर्गी स्यान्न संशयः। कर्मका पालन करनेवाला वैश्य निःसंदेह स्वर्गलोकका वर्णत्रयस्य शुश्रूषां कुर्याच्छूद्रः प्रयत्नतः॥१० अधिकारी होता है॥ ६-९ १/२ ॥ दासद्वद्ब्राह्मणानां च विशेषेण समाचरेत्। शूद्रको चाहिये कि वह यत्नपूर्वक इन तीनों अयाचितं प्रदातव्यं कृषिं वृत्त्यर्थमाचरेत्॥ ११ वर्णोंकी सेवा करे और ब्राह्मणोंकी तो दासकी भाँति विशेषरूपसे शुश्रूषा करे। किसीसे माँगकर नहीं, अपनी ग्रहाणां मासिकं कार्यं पूजनं न्यायधर्मतः। ही कमाईका दान करे। जीविकाके लिये कृषि-कर्म धारणं जीर्णवस्त्रस्य विप्रस्योच्छिष्टमार्जनम्॥ १२ करे। प्रत्येक मासमें न्याय और धर्मके अनुसार ग्रहोंका पूजन करे, पुराना वस्त्र धारण करे। ब्राह्मणका जूठा स्वदारेषु रतिं कुर्यात् परदारविवर्जितः। बर्तन माँजे। अपनी स्त्रीमें अनुराग रखे। परस्त्रियोंको पुराणश्रवणं विप्रान्नृसिंहस्य पूजनम्॥ १३ दूरसे ही त्याग दे। ब्राह्मणके मुखसे पुराणकथा श्रवण तथा विप्रनमस्कारं कार्यं श्रद्धासमन्वितम्। करे, भगवान् नरसिंहका पूजन करे। इसी प्रकार सत्यसम्भाषणं चैव रागद्वेषविवर्जनम्॥ १४ ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक नमस्कार करे। राग-द्वेष त्याग दे और सत्यभाषण करे। इस प्रकार मन, वाणी, शरीर इत्थं कुर्वन् सदा शूद्रो मनोवाक्कायकर्मभिः। और कर्मसे आचरण करनेवाला शूद्र पापरहित हो स्थानमैन्द्रमवाप्नोति नष्टपापस्तु पुण्यभाक्॥ १५ पुण्यका भागी होता है और मृत्युके पश्चात् इन्द्रलोकको वर्णेषु धर्मा विविधा मयोक्ता प्राप्त होता है॥ १०-१५ ॥ यथाक्रमं ब्राह्मणवर्यसाधिताः। मुनीन्द्रगण! वर्णोंके ये नाना प्रकारके धर्म मैंने आप शृणुध्वमत्राश्रमधर्ममाद्यं लोगोंसे क्रमशः कहे हैं। इन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने बतलाया मयोच्यमानं क्रमशॊ मुनीन्द्राः॥ १६ है। अब मैं क्रमसे प्रथम ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्म बता रहा हूँ, आप लोग सुनें॥ १६ ॥ हारीत उवाच श्रीहारीत मुनि बोले—उपनयन-संस्कार हो जानेके उपनीतो माणवको वसेद्गुरुकुले सदा। बाद ब्रह्मचारी बालक सदा गुरुकुलमें निवास करे। उसको गुरोः प्रियहितं कार्यं कर्मणा मनसा गिरा॥ १७ चाहिये कि मन, वाणी और कर्मसे गुरुका प्रिय और हित In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८

२५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८ ब्रह्मचर्यमधःशय्या तथा वह्नेरुपासनम्। उदकुम्भं गुरोर्दद्यात्तथा चेन्धनमाहरेत् ॥ १८ कुर्यादध्ययनं पूर्वं ब्रह्मचारी यथाविधि। विधिं हित्वा प्रकुर्वाणो न स्वाध्यायफलं लभेत् ॥ १९ यत्किंचित् कुरुते कर्म विधिं हित्वा निरात्मकः। न तत्फलमवाप्नोति कुर्वाणो विधिविच्युतः ॥ २० तस्मादेवं व्रतानीह चरेत् स्वाध्यायसिद्धये । शौचाचारमशेषं तु शिक्षयेद्गुरुसंनिधौ ॥ २१ अजिनं दण्डकाष्ठं च मेखलां चोपवीतकम्। धारयेदप्रमत्तस्तु ब्रह्मचारी समाहितः ॥ २२ सायं प्रातश्चरेद्भैक्षं भोजनं संयतेन्द्रियः। गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु ॥ २३ अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वपूर्वं च वर्जयेत्। आचम्य प्रयतो नित्यमश्नीयाद्गुर्वनुज्ञया ॥ २४ शयनात् पूर्वमुत्थाय दर्भमृद्दन्तशोधनम्। वस्त्रादिकमथान्यच्च गुरवे प्रतिपादयेत् ॥ २५ स्नाने कृते गुरौ पश्चात् स्नानं कुर्वीत यत्नवान्। ब्रह्मचारी व्रती नित्यं न कुर्याद्दन्तशोधनम् ॥ २६ छत्रोपानहमभ्यङ्गं गन्धमाल्यानि वर्जयेत्। नृत्यगीतकथालापं मैथुनं च विशेषतः ॥ २७ वर्जयेन्मधु मांसं च रसास्वादं तथा स्त्रियः । कामं क्रोधं च लोभं च परिवादं तथा नृणाम् ॥ २८ स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भमुपघातं परस्य च। एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत् क्वचित् ॥ २९ स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः । स्नात्वार्कमर्चयित्वाग्निं पुनर्मामित्यृचं जपेत् ॥ ३० --- [हिन्दी अनुवाद] --- करे। वह ब्रह्मचर्यका पालन, भूमिपर शयन और अग्निकी उपासना करे। गुरुके लिये जलका घड़ा भरकर लाये और हवनके निमित्त समिधा ले आये। इस प्रकार सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहकर विधिपूर्वक अध्ययन करना चाहिये। जो विधिको त्याग करके अध्ययन करता है, उसे उस अध्ययनका फल नहीं प्राप्त होता (उसकी विद्या सफल नहीं होती)। विधिकी अवहेलना करके वह जो कुछ भी कर्म करता है, विधिभ्रष्ट एवं नास्तिक होनेके कारण उसे उसका फल नहीं मिलता। इसलिये गुरुकुलमें रहकर अपने अध्ययनकी सफलताके लिये उपर्युक्त व्रतोंका आचरण करना चाहिये और गुरुके निकट समस्त शौचाचारोंको सीखना चाहिये। ब्रह्मचारी सावधान और एकाग्रचित्त रहकर मृगचर्म, पलाशदण्ड, मेखला और उपवीत (जनेऊ) धारण करे। अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर सायंकाल और प्रातःकाल भिक्षासे मिला हुआ अन्न भोजन करे। गुरुके कुलमें और उनके कुटुम्बी बन्धु-बान्धवोंके घरमें भिक्षा न माँगे। दूसरेके घर न मिले तो पूर्वोक्त घरोंमेंसे भी भिक्षा ले सकता है; किंतु यथासाध्य पूर्व-पूर्व गृहोंका त्याग करे। अर्थात् पहले कहे हुए गुरुगृह या गुरुकुलका त्यागकर अन्यत्र भिक्षा ले। नित्य आचमन करके शुद्धचित्त होकर गुरुकी आज्ञासे भोजन करे। रात्रि बीतनेपर गुरुसे पहले ही अपने आसनसे उठ जाय और गुरुके लिये कुश, मिट्टी, दाँतुन और वस्त्र आदि अन्य सामान एकत्र करके उनको दे। गुरुजीके स्नान कर लेनेपर स्वयं यत्नपूर्वक स्नान करे। ब्रह्मचारी सदा व्रत रखे और काठ आदिसे दन्तधावन न करे॥ १७-२६॥ छाता, जूता, उबटन, गन्धयुक्त इत्र आदि और फूल-माला आदिको त्याग दे। विशेषतः नाच, गान और ग्राम्य कथा-वार्ता एवं मैथुनका सर्वथा त्याग करे। मधु, मांस और रसास्वाद (जिह्वाके स्वाद)-को त्याग दे। स्त्रियोंसे अलग रहे। काम, क्रोध, लोभ तथा दूसरे मनुष्योंके अपवाद (निन्दा)-का परित्याग करे। स्त्रियोंकी ओर देखने, उनका स्पर्श करने और दूसरे जीवोंकी हिंसा करने आदिसे बचकर रहे। सब जगह अकेले ही शयन करे, कभी कहीं भी वीर्यपात न करे। यदि कामभाव न होनेपर भी स्वप्नमें वीर्य-स्खलन हो जाय तो ब्रह्मचारी द्विजको चाहिये, वह स्नान करके सूर्य और अग्निकी आराधना करे तथा 'पुनर्मामेत्विन्द्रियम्' इस In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५७

आस्तिकोऽहरहः संध्यां त्रिकालं संयतेन्द्रियः । उपासीत यथान्यायं ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ॥ ३१

अभिवाद्य गुरोः पादौ संध्याकर्मावसानतः । यथायोग्यं प्रकुर्वीत मातापित्रोस्तु भक्तितः ॥ ३२

एतेषु त्रिषु तुष्टेषु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः । तदेषां शासने तिष्ठेद्ब्रह्मचारी विमत्सरः ॥ ३३

अधीत्य चतुरो वेदान् वेदौ वेदमथापि वा। गुरवे दक्षिणां दत्त्वा तदा स्वस्वेच्छया वसेत् ॥ ३४

विरक्तः प्रव्रजेद्विद्वान् संरक्तस्तु गृही भवेत् । सरागो नरकं याति प्रव्रजन् हि ध्रुवं द्विजः ॥ ३५

यस्यैतानि सुशुद्धानि जिह्वोपस्थोदरं गिरः । संन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ॥ ३६

एवं यो विधिमास्थाय नयेत् कालमतन्द्रितः । तेन भूयः प्रजायेत ब्रह्मचारी दृढव्रतः ॥ ३७

यो ब्रह्मचारी विधिमेतमास्थित- श्ररेत् पृथिव्यां गुरुसेवने रतः । सम्प्राप्य विद्यामपि दुर्लभां तां फलं हि तस्याः सकलं हि विन्दति ॥ ३८


ऋचाका जप करे। ईश्वर और परलोकके अस्तित्वपर विश्वास करता हुआ, ब्रह्मचारियोंके लिये उचित व्रतके पालनमें तत्पर रहकर, जितेन्द्रिय हो, प्रतिदिन न्यायतः प्राप्त त्रिकालसंध्याकी उपासना करे। संध्या-कर्म समाप्त होनेपर गुरुके चरणोंमें प्रणाम करे और यदि सुयोग प्राप्त हो तो माता-पिताके चरणोंमें भी भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न रहते हैं; इसलिये ब्रह्मचारीको चाहिये कि डाह छोड़कर इन तीनोंके शासनमें रहे। यथासम्भव चार, दो अथवा एक ही वेदका अध्ययन पूर्ण करके गुरुको दक्षिणा दे। फिर अपने इच्छानुसार कहीं भी निवास करे। यदि वह विद्वान् ब्रह्मचारी विरक्त हो, तब तो संन्यासी हो जाय; किंतु यदि उसका विषय-भोगोंके प्रति अनुराग हो तो गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे। द्विजो! रागी पुरुष यदि संन्यासी हो जाय तो वह निश्चय ही नरकमें जाता है। जिसकी जिह्वा, उपस्थ (जननेन्द्रिय), उदर और वाणी शुद्ध हों, अर्थात् जो स्वाद, काम और बुभुक्षाको जीत चुका हो और सत्यवादी या मौन रहता हो, वह पुरुष यदि ब्रह्मचर्यवान् ब्राह्मण हो तो वह विवाह न करके संन्यास ले सकता है॥ २७-३६॥

इस प्रकार जो आलस्य त्यागकर विधिका पालन करते हुए ही समय-यापन करता है, वह ब्रह्मचारी अधिकाधिक दृढ़ व्रतवाला होता है। जो ब्रह्मचारी पूर्वोक्त विधिका सहारा लेकर गुरु-सेवापरायण हो पृथ्वीपर भ्रमण करता है, वह दुर्लभ विद्याको भी सीखकर उसके सम्पूर्ण फलोंको प्राप्त कर लेता है* ॥ ३७-३८ ॥


हारीत उवाच

गृहीतवेदाध्ययनः श्रुतिशास्त्रार्थतत्त्ववित् । गुरोर्दत्तवरः सम्यक् समावर्तनमारभेत् ॥ ३९

असमाननामगोत्रां कन्यां भ्रातृयुतां शुभाम् । सर्वावयवसंयुक्तां सद्‌वृत्तामुद्वहेत्ततः ॥ ४०

नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् । वाचालामसतिलोमां च न व्यङ्गां भीमदर्शनाम् ॥ ४१


श्रीहारीत मुनि कहते हैं—पूर्वोक्त रीतिसे वेदाध्ययन समाप्तकर श्रुति तथा अन्यान्य शास्त्रोंके अर्थ एवं तत्त्वका ज्ञान रखनेवाला ब्रह्मचारी विद्वान् गुरुसे आशीर्वाद प्राप्तकर विधिपूर्वक समावर्तन-संस्कार आरम्भ करे। फिर, जिसके नाम और गोत्र अपनेसे भिन्न हों, जिसके भाई भी हो, जो सुन्दरी एवं शुभ लक्षणोंवाली हो, जिसके शरीरके सभी अवयव अविकल हों और जिसका आचरण उत्तम हो, ऐसी कन्याके साथ विवाह करे। जिसके शरीरका रंग कपिल हो, जो अधिकाङ्गी या रोगिणी हो, बहुत बोलनेवाली और अधिक रोमवाली हो, जिसका कोई अङ्ग विकृत या


  • इससे आगे 'हारीत उवाच' पुनः दिया गया है। इससे जान पड़ता है, यह अध्याय यहाँ पूर्ण हो गया है।

1113 Narsingpuran_Section_10_In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८

२५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८ नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्तपर्वतनामिकाम्। हीन हो और जिसकी सूरत डरावनी हो, ऐसी कन्यासे न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्॥ ४२ विवाह न करे। जिसका नाम नक्षत्र, वृक्ष या नदीके नामपर रखा गया हो, अथवा जिसके नामके अन्तमें पर्वतवाचक अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम्। शब्द हो, अथवा जो पक्षी, साँप और दास आदि अर्थवाले तन्वोष्ठकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत् स्त्रियम्॥ ४३ नामोंसे युक्त हो, या जिसका भयंकर नाम हो, ऐसी कन्यासे भी विवाह न करे। जिसके शरीरके सभी अवयव ब्राह्मेण विधिना कुर्यात् प्रशस्तेन द्विजोत्तमः। सुडौल हों, नाम कोमल और मधुर हो, जो हंस या गजराजके समान मन्द एवं लीलायुक्त गतिसे चलनेवाली यथायोगं तथा ह्येवं विवाहं वर्णधर्मतः॥ ४४ हो, जिसके अधर, दाँत और केश पतले हों एवं जिसका शरीर कोमल हो, ऐसी कन्यासे विवाह करे। श्रेष्ठ द्विजातिको उषःकाले समुत्थाय कृतशौचो द्विजोत्तमः। चाहिये कि यथासम्भव सर्वोत्तम ब्राह्मविधिसे विवाह करे। कुर्यात् स्नानं ततो विद्वान्दन्तधावनपूर्वकम्॥ ४५ इस प्रकार वर्णधर्मके अनुसार विवाह-संस्कार पूर्ण करना चाहिये॥ ३९-४४॥ मुखे पर्युषिते नित्यं यतोऽपूतो भवेन्नरः। इसके बाद विद्वान् द्विजको चाहिये कि प्रतिदिन तस्माच्छुष्कमथार्द्रं वा भक्षयेद्दन्तधावनम्॥ ४६ सूर्योदयसे पूर्व उठकर शौचादिके अनन्तर दन्तधावन करके तुरंत स्नान कर ले। प्रतिदिन रातमें सोकर उठनेके खदिरं च कदम्बं च करञ्जं च वटं तथा। बाद मुख पर्युषित होनेके कारण मनुष्य अपवित्र रहता है, अपामार्गं च बिल्वं च अर्कश्चोदुम्बरस्तथा॥ ४७ अतः शुद्धि के लिये सूखा या गीला दन्तधावन अवश्य चबाना चाहिये। दाँतुनके लिये खदिर, कदम्ब, करञ्ज, एते प्रशस्ताः कथिता दन्तधावनकर्मणि। वट, अपामार्ग, बिल्व, मदार और गूलर—ये वृक्ष उत्तम दन्तधावनकाष्ठं च वक्ष्यामि तत्प्रशस्तताम्॥ ४८ माने गये हैं। दन्तधावनके लिये उपयुक्त काष्ठ और उसकी उत्तमताका लक्षण बता रहा हूँ॥ ४५-४८॥ सर्वे कण्टकिनः पुण्याः क्षीरिणस्तु यशस्विनः। जितने काँटेवाले वृक्ष हैं, वे सभी पवित्र हैं। जितने अष्टाङ्गुलेन मानेन तत्प्रमाणमिहोच्यते॥ ४९ दूधवाले वृक्ष हैं, वे सभी यश देनेवाले हैं। दाँतुनकी लकड़ीकी लम्बाई आठ अंगुलकी बतायी जाती है। अथवा बित्तामात्र प्रादेशमात्रमथवा तेन दन्तान् विशोधयेत्। उसकी लम्बाई होनी चाहिये। ऐसी दाँतुनसे दाँतोंको स्वच्छ प्रतिपद्दर्शषष्ठीषु नवम्यां चैव सत्तमाः॥ ५० करना चाहिये। परंतु साधुशिरोमणियो! प्रतिपदा, अमावास्या, षष्ठी और नवमीको काठकी दाँतुन नहीं करनी चाहिये; दन्तानां काष्ठसंयोगाद् दहत्यासप्तमं कुलम्। क्योंकि उक्त तिथियोंको यदि दाँतसे काठका संयोग हो अलाभे दन्तकाष्ठस्य प्रतिषिद्धे च तद्दिने॥ ५१ जाय तो वह सात पीढ़ीत्तकके कुलको दग्ध कर डालता है। जिस दिन दाँतुन न मिले या जिस दिन दाँतुन करना अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखशुद्धिर्विधीयते। निषिद्ध है, उस दिन बारह बार जलका कुल्ला करके मुखकी शुद्धि कर लेनेकी विधि है॥ ४९-५१ १/२॥ स्नात्वा मन्त्रवदाचम्य पुनराचमनं चरेत्॥ ५२ दाँतुनके बाद स्नान करे। फिर मन्त्रपाठपूर्वक आचमन करके पुनः आचमन करना चाहिये। मन्त्रपाठपूर्वक अपने मन्त्रवान् प्रोक्ष्य चात्मानं प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिम्। ऊपर भी जल छिड़के और सूर्यके लिये अर्घ्यके तौरपर आदित्येन सह प्रातर्मन्देहा नाम राक्षसाः॥ ५३ जलाञ्जलि भरकर उछाले। अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके वरदानसे In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 13 Narsingpuran_Section_10__Back