भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 318 में से

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पृष्ठ 253

२४२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४ [संस्कृत मूल पाठ] ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा धर्मपराङ्मुखाः। घोरे कलियुगे प्राप्ते द्विजदेवपराङ्मुखाः॥ ११ व्याजधर्मरताः सर्वे दम्भाचारपरायणाः। असूयानिरताश्चैव वृथाहंकारदूषिताः॥ १२ सर्वैः संक्षिप्यते सत्यं नरैः पण्डितगर्वितैः। अहमेवाधिक इति सर्व एव वदन्ति वै॥ १३ अधर्मलोलुपाः सर्वे तथान्येषां च निन्दकाः। अतः स्वल्पायुषः सर्वे भविष्यन्ति कलौ युगे॥ १४ अल्पायुष्ट्वान्मनुष्याणां न विद्याग्रहणं द्विजाः। विद्याग्रहणशून्यत्वादधर्मो वर्तते पुनः॥ १५ ब्राह्मणाद्यास्तथा वर्णाः संकीर्यन्ते परस्परम्। कामक्रोधपरा मूढा वृथा संतापपीडिताः॥ १६ बद्धवैरा भविष्यन्ति परस्परवधेप्सवः। ब्राह्मणाःक्षत्रिया वैश्याः सर्वे धर्मपराङ्मुखाः॥ १७ शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः। उत्तमा नीचतां यान्ति नीचाश्चोत्तमतां तथा॥ १८ राजानो द्रव्यनिरतास्तथा लोभपरायणाः। धर्मकञ्चुकसंवीता धर्मविध्वंसकारिणः॥ १९ घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वाधर्मसमन्विते। यो योऽश्वरथनागाढ्यः स स राजा भविष्यति॥ २० पितॄन् पुत्रा नियोक्ष्यन्ति वध्वःश्वश्रूश्च कर्मसु। पतीन्पुत्रान्वञ्चयित्वा गमिष्यन्ति स्त्रियोऽन्यतः॥ २१ पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं श्वबाहुल्यं गवां क्षयः। धनानि श्लाघनीयानि सतां वृत्तमपूजितम्। खण्डवर्षी च पर्जन्यः पन्थानस्तस्करावृताः। सर्वः सर्वं च जानाति वृद्धाननुपसेव्य च॥ २२ न कश्चिदकविर्नाम सुरापा ब्रह्मवादिनः। किंकराश्च भविष्यन्ति शूद्राणां च द्विजातयः॥ २३ [हिन्दी अनुवाद] उस समय सभी धर्म नष्ट हो जायँगे। घोर कलियुग प्राप्त होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी लोग धर्म, ब्राह्मण तथा देवताओंसे विमुख हो जायँगे। सभी किसी-न-किसी व्याजसे (स्वार्थसिद्धिके लिये) ही धर्ममें प्रवृत्त होंगे; दम्भ—ढोंगका आचरण करेंगे। एक- दूसरेमें दोष ढूँढ़नेवाले और व्यर्थ अभिमानसे दूषित विचारवाले होंगे। पाण्डित्यका गर्व रखनेवाले सभी मनुष्य सत्यका अपलाप करेंगे और सब लोग यही कहेंगे कि 'मैं ही सबसे बड़ा हूँ'। कलियुगमें सभी अधर्मलोलुप तथा दूसरोंकी निन्दा करनेवाले होंगे, अतः सबकी आयु बहुत थोड़ी होगी। द्विजगण! मनुष्योंकी आयु अल्प होनेसे ब्राह्मणलोग अधिक विद्याध्ययन नहीं कर सकेंगे। विद्याध्ययनसे शून्य होनेके कारण उनके द्वारा पुनः अधर्मकी ही प्रवृत्ति होगी॥ ९—१५॥ ब्राह्मण आदि वर्णोंमें परस्पर संकरता आ जायगी। वे कामी, क्रोधी, मूर्ख और व्यर्थ संतापसे पीड़ित होंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आपसमें वैर बाँधकर एक- दूसरेका वध कर देनेकी इच्छावाले होंगे। वे सभी अपने- अपने धर्मसे विमुख होंगे। तप एवं सत्यभाषणादिसे रहित होकर शूद्रके समान हो जायँगे। उत्तम वर्णवाले नीचे गिरेंगे और नीच वर्णवाले उत्तम बनेंगे। राजालोग लोभी तथा केवल धनोपार्जनमें ही प्रवृत्त रहेंगे। वे धर्मका चोला पहनकर उसीकी ओटमें धर्मका विध्वंस करनेवाले होंगे। समस्त अधर्मोंसे युक्त घोर कलियुगके आ जानेपर जो- जो घोड़े, रथ और हाथीसे सम्पन्न होंगे, वे-वे ही राजा कहे जायँगे। पुत्र अपने पितासे काम करायेंगे और बहुएँ साससे काम लेंगी। स्त्रियाँ पति और पुत्रको धोखा देकर अन्य पुरुषोंके पास जाया करेंगी॥ १६—२१॥ पुरुषोंकी संख्या कम और स्त्रियोंकी अधिक होगी। कुत्तोंकी अधिकता होगी और गौओंका ह्रास। सबके मनमें धनका ही महत्त्व रहेगा। सत्पुरुषोंके सदाचारका सम्मान नहीं होगा। मेघ कहीं वर्षा करेंगे, कहीं नहीं करेंगे। समस्त मार्ग चोरोंसे घिरे रहेंगे। गुरुजनोंकी सेवामें रहे बिना ही सभी लोग सब कुछ जाननेका अभिमान करेंगे। कोई भी ऐसा न होगा जो अपनेको कवि न मानता हो। शराब पीनेवाले लोग ब्रह्मज्ञानका उपदेश करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth