संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३९ मृतस्य मल्लस्य च मुष्टिकस्य पहलवानका, जो अपने बल और पराक्रमके कारण मित्रं पुनः पुष्करकं स रामः। बहुत ही प्रसिद्ध था, कचूमर निकाल दिया। भगवान् युद्धार्थमुत्थाय कृतक्षणं तं श्रीकृष्णने उस जन-समाजमें दैत्य मल्ल चाणूरके साथ मुष्टिप्रहारेण जघान वीरः॥५० देरतक युद्ध करनेके बाद उसका वध किया था। फिर वीरवर बलरामजीने युद्धके लिये उत्साहपूर्वक उठे हुए कृष्णः पुनस्तान् सकलान्निहत्य पुष्करको, जो 'मृत मुष्टिक' नामक मल्लका मित्र था, निगृह्य कंसं विनिपात्य भूमौ। मुक्केसे ही मार डाला। इसके बाद श्रीकृष्णने वहाँ स्वयं च देहे विनिपत्य तस्य उपस्थित समस्त दैत्योंका संहार करके कंसको पकड़ हत्वा तथोर्व्यां निचकर्ष कृष्णः॥५१ लिया और उसे मञ्चके नीचे भूमिपर पटककर वे स्वयं भी उसके शरीरपर कूद पड़े। इस प्रकार कंसका वध हते तु कंसे हरिणातिक्रुद्धो करके श्रीकृष्णने उसके मृत देहको भूमिपर घसीटा। भ्रातापि तस्यातिरुषेण चोत्थितः। श्रीकृष्णद्वारा कंसके मारे जानेपर उसका बलवान् एवं सुनाभसंज्ञो बलवीर्ययुक्तो पराक्रमी भ्राता सुनाभ अत्यन्त क्रोधपूर्वक युद्धके लिये रामेण नीतो यमसादनं क्षणात्॥५२ उठा; किंतु उसे भी बलरामजीने तुरंत ही मारकर यमलोक भेज दिया॥४८-५२॥ तौ वन्द्य मातापितरौ सुहृष्टौ तदनन्तर समस्त यदुवंशियोंसे घिरे हुए उन दोनों जनैः समस्तैर्यदुभिः सुसंवृतौ। भाइयोंने अत्यन्त प्रसन्न हुए माता-पिताकी वन्दना करके कृत्वा नृपं चोग्रसेनं यदूनां श्रीउग्रसेनको ही यदुवंशियोंका राजा बनाया और उन्हें सभां सुधर्मां ददतुर्महेन्द्रीम्॥५३ इन्द्रकी 'सुधर्मा' नामक दिव्य सभा प्रदान की॥५३॥ सर्वज्ञभावावपि रामकृष्णौ यद्यपि बलराम और श्रीकृष्ण सर्वज्ञ थे, तो भी सम्प्राप्य सांदीपनितोऽस्त्रविद्याम्। उन्होंने सांदीपनिसे अस्त्र-विद्याकी शिक्षा पायी। फिर गुरोः कृते पञ्चजनं निहत्य गुरुको दक्षिणा देनेके लिये उद्यत हो, 'पञ्चजन' दैत्यको यमं च जित्वा गुरवे सुतं ददौ॥५४ मारा और यमराजको जीतकर वे दीर्घकालके मरे हुए गुरुपुत्रको वहाँसे ले आये। वही पुत्र उन्होंने गुरुजीको निहत्य रामो मगधेश्वरस्य दक्षिणाके रूपमें अर्पित किया॥५४॥ बलं समस्तं बहुशः समागतम्। फिर बलरामजीने अपने ऊपर अनेकों बार चढ़ाई दिव्यास्त्रपूरैरमराविमावुभौ करनेवाले मगधराज जरासंधके समस्त सैनिकोंको शुभां पुरीं चक्रतुः सागरान्ते॥५५ दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करके मार डाला। इसके बाद उन दोनों देवेश्वरोंने समुद्रके भीतर एक सुन्दर पुरी द्वारकाका तस्यां विधायाथ जनस्य वासं निर्माण कराया। उसमें मथुरावासी कुटुम्बीजनोंको बसाकर हत्वा शृगालं हरिरव्ययात्मा। अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णने राजा शृगालका वध दग्ध्वा महान्तं यवनं ह्युपाया- किया। फिर एक उपाय करके महान् योद्धा यवनराजको द्दूरं च दत्त्वा नृपतेर्जगाम॥५६ भस्म कर, राजा मुचुकुन्दको वरदान दे, वे द्वारकामें लौट गये॥५५-५६॥ रामोऽथ संशान्तसमस्तविग्रहः तत्पश्चात् सारा बखेड़ा समाप्त हो जानेपर सम्प्राप्य नन्दस्य पुनः स गोकुलम्। बलरामजी एक बार फिर नन्दके गोकुल (नन्दगाँव)- वृन्दावने गोपजनैः सुभाषितः में गये और वहाँ वृन्दावनमें गोपजनोंसे भलीभाँति सीरेण रामो यमुनां चकर्ष॥५७ प्रेमालाप आदिके द्वारा सम्मानित हुए। वहाँ उन्होंने अपने हलसे यमुनाजीका आकर्षण किया था। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth