संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२४० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३
[संस्कृत श्लोक]
सम्प्राप्य भार्यामथ रेवतीं च रेमे तया द्वारवतीं स लाङ्गली। क्षात्रेण सम्प्राप्य तदा स रुक्मिणीं कृष्णोऽपि रेमे पुरुषः पुराणः॥ ५८
द्यूते कलिङ्गराजस्य दन्तानुत्पाट्य लाङ्गली। जघानाष्टपदेनैव रुक्मिणं चानृतान्वितम्॥ ५९
कृष्णः प्राग्ज्योतिषो दैत्यान् हयग्रीवादिकान् बहून्। हत्वा तु नरकं चापि जग्राह च महद्धनम्॥ ६०
अदित्यै कुण्डले दत्त्वा जित्वेन्द्रं दैवतैः सह। गृहीत्वा पारिजातं तु ततो द्वारावतीं पुरीम्॥ ६१
कुरुभिश्च धृतं साम्बं राम एको महाबलः। कुरूणां भयमुत्पाद्य मोचयामास वीर्यवान्॥ ६२
बाणबाहुवनं छिन्नं कृष्णेन युधि धीमता। रामेण तद्बलं नीतं क्षयं कोटिगुणं क्षणात्॥ ६३
देवापकारी रामेण निहतो वानरो महान्। ततोऽर्जुनस्य साहाय्यं कुर्वता कंसशत्रुणा॥ ६४
सर्वभूतवधाद्राजन् भुवो भारोऽवरोपितः। तीर्थयात्रा कृता तद्वद्रामेण जगतः कृते॥ ६५
रामेण निहता ये तु तान्न संख्यातुमुत्सहे। एवं तौ रामकृष्णौ तु कृत्वा दुष्टवधं नृप॥ ६६
अवतार्य भुवो भारं जग्मतुः स्वेच्छया दिवम्। इत्येतौ कथितौ दिव्यौ प्रादुर्भावौ मया तव। संक्षेपाद्रामकृष्णस्य काल्क्यं शृणु ममाधुना॥ ६७
इत्थं हि शक्ती सितकृष्णरूपे हरेरनन्तस्य महाबलाढ्ये। कृत्वा तु भूमेर्नृप भारहानिं पुनश्च विष्णुं प्रतिजग्मतुस्ते॥ ६८
[हिन्दी अनुवाद]
तदनन्तर द्वारकामें 'रेवती' नामकी भार्याको पाकर बलरामजी उनके साथ सुखपूर्वक रहने लगे और पुराणपुरुष श्रीकृष्णचन्द्र भी क्षत्रियधर्मके अनुसार 'रुक्मिणी' नामक भार्याको हस्तगत करके उसके साथ सानन्द विहार करने लगे। तदनन्तर एक बार जूआ खेलते समय हलधरने कलिङ्गराजके दाँतोंको उखाड़ लिया और असत्यका आश्रय लेनेवाले रुक्मीको भी पासेसे ही मार गिराया। इसी प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रने भी प्राग्ज्योतिषपुरके हयग्रीव आदि बहुत-से दैत्योंको यमलोक पहुँचाया तथा नरकासुरका भी संहार करके वे उसके यहाँसे बहुत धन ले आये। वहाँसे श्रीकृष्ण इन्द्रलोकमें गये। वहाँ उन्होंने अदितिको उनके वे दोनों दिव्य कुण्डल दिये, जो नरकासुरने हड़प लिये थे। फिर देवताओंसहित इन्द्रको जीतकर पारिजात वृक्ष साथ ले, वे अपनी पुरी द्वारकाको लौट आये॥ ५७-६१॥
तदनन्तर महाबली एवं महापराक्रमी बलरामजीने अकेले ही हस्तिनापुरमें जा कौरवोंको भय दिखाया और उनके द्वारा बंदी बनाये गये [श्रीकृष्णपुत्र] साम्बको छुड़ाया। फिर बुद्धिमान् श्रीकृष्णचन्द्रने युद्धमें बाणासुरकी भुजाओंको काट डाला और बलरामजीने उसके करोड़ों सैनिकोंका क्षणभरमें ही संहार कर दिया। इसके बाद बलरामजीने देववैरी 'द्विविद' नामक महान् वानरका वध किया। इसी तरह भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी सहायता करके उनके द्वारा समस्त दुष्ट क्षत्रियोंका वध कराया और पृथ्वीका सारा भार उतार दिया। उन दिनों बलरामजी लोकहितके लिये तीर्थयात्रा कर रहे थे॥ ६२-६५॥
राजन्! बलराम और श्रीकृष्णचन्द्रने जितने दुष्टोंका वध किया था, उनकी गणना हम नहीं कर सकते। इस प्रकार दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने दुष्टोंका संहार करके भूमिकका भार दूर किया। फिर वे स्वेच्छानुसार वैकुण्ठधामको पधार गये। इस तरह राम और श्रीकृष्णके इन दिव्य अवतारोंको मैंने तुम्हें संक्षेपसे कह सुनाया। अब मुझसे 'कल्कि-अवतार' का वर्णन सुनो। नरेश्वर! इस प्रकार अनन्त भगवान् विष्णुकी वे दोनों महाबलवती गौर और कृष्ण शक्तियाँ पृथ्वीका भार उतारकर पुनः अपने विष्णुस्वरूपमें लीन हो गयीं॥ ६६-६८॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे कृष्णप्रादुर्भावो नाम त्रिपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥