भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 318 में से

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पृष्ठ 249

२३८ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ५३


[संस्कृत श्लोक - बायाँ स्तम्भ]

प्रलम्बो निधनं नीतो दैत्यो रामेण मुष्टिना। कालियो दमितस्तोये कालिन्द्यां विषपन्नगः ॥ ३९ गोवर्धनश्च कृष्णेन धृतो वर्षति वासवे। गोकुलं रक्षता तेन अरिष्टश्च निपातितः ॥ ४० केशी च निधनं नीतो दुष्टवाजी महासुरः। अक्रूरेण च तौ नीतौ मथुरायां महात्मना ॥ ४१ ददर्श तु निमग्नश्च रामकृष्णौ महामते। स्वं स्वं रूपं जले तस्य अक्रूरस्य विभूतिदम् ॥ ४२ अनयोर्भावमतुलं ज्ञात्वा दृष्ट्वा च यादवाः। बभूवुः प्रीतमनसो ह्यक्रूरश्च नृपात्मज ॥ ४३ दुर्वचश्च प्रजल्पन्तं कंसस्य रजकं ततः। कृष्णो जघान रामश्च तद्वस्त्रं ब्राह्मणे ददौ ॥ ४४ मालाकारेण भक्त्या तु सुमनोभिः प्रपूजितौ। ततस्तस्य वरान्दत्त्वा दुर्लभान् रामकेशवौ ॥ ४५ गच्छन्तौ राजमार्गं तु कुब्जया पूजितौ ततः। तत्कौटिल्यमपानीय विरूपं कार्मुकं ततः ॥ ४६ बभञ्ज कृष्णो बलवान् कंसस्याकृष्य तत्क्षणात्। रक्षपालान् जघानाथ रामस्तत्र खलान् बहून्। हत्वा कुवलयाख्यं च गजं रामजनार्दनौ ॥ ४७ प्रविश्य रङ्गं गजदन्तपाणी मदानुलिप्तौ वसुदेवपुत्रौ। युद्धे तु रामो निजघान म Narc... (मल्लं) शैलोपमं मुष्टिकमव्ययात्मा ॥ ४८ कृष्णोऽपि चाणूरमतिप्रसिद्धं बलेन वीर्येण च कंसमल्लकम्। युध्द्वा तु तेनाथ चिरं जघान तं दैत्यमल्लं जनसंसदीशः ॥ ४९


[हिन्दी अनुवाद - दायाँ स्तम्भ]

उखाड़ दिया था। रामने 'प्रलम्ब' नामक राक्षसको मुक्केसे मारकर मौतके घाट उतारा तथा श्रीकृष्णने यमुनाके जलमें रहनेवाले विषैले सर्प 'कालिय' का दमन किया और इन्द्रके वर्षा करते समय वे सात दिनोंतक हाथपर गोवर्धनपर्वत धारण किये खड़े रहे। इतना ही नहीं, श्रीकृष्णने गोकुलकी रक्षा करते हुए अरिष्टासुरका भी वध किया था। फिर दुष्ट घोड़ेका रूप धारण करनेवाले महान् असुर केशीका उन्होंने संहार किया; इसके बाद महात्मा अक्रूरजी [कंसकी आज्ञासे] आये तथा राम और कृष्ण—दोनों बन्धुओंको मथुरा ले गये। महामते! मार्गमें अक्रूरजीने यमुनामें डुबकी लगाते समय जलके भीतर राम और कृष्ण—दोनोंको देखा। उन दोनों बन्धुओंने अक्रूरजीको अपने-अपने ऐश्वर्यदायक स्वरूपका दर्शन कराया। नृपनन्दन! उन दोनोंके अनुपम स्वरूपको देख और जानकर अक्रूरजीके साथ ही समस्त यादवगण बहुत ही प्रसन्न हुए॥ ३७-४३॥

तत्पश्चात् [मथुरामें भ्रमण करते समय] कटुवचन कहनेवाले कंसके एक धोबीको कृष्ण और रामने मार डाला तथा उसके वस्त्र ब्राह्मणोंको बाँट दिये। फिर मार्गमें एक मालीने फूलोंसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की। तब राम और श्रीकृष्णने उसे दुर्लभ वर दिये। उसके बाद जब वे सड़कपर घूम रहे थे, उसी समय 'कुब्जा' दासीने आकर उनका आदर-सत्कार किया। तब श्रीकृष्णने उसकी भद्दी लगनेवाली कुब्जताको दूर कर दिया। तदनन्तर [यज्ञशालामें रखे गये] कंसके धनुषको महाबली श्रीकृष्णने [बलपूर्वक] खींचा और तत्काल ही तोड़ डाला। उस समय वहाँके अनेकों दुष्ट रक्षकोंको बलरामजीने मार डाला। फिर बलराम और श्रीकृष्ण—दोनोंने मिलकर 'कुवलयापीड' नामक हाथीको भी मार गिराया ॥ ४४–४७ ॥

तदनन्तर उन दोनों वसुदेवकुमारोंने हाथीके दाँत उखाड़कर हाथमें ले लिये और उसके मदसे सने हुए ही रङ्गभूमिमें प्रवेश किया। वहाँ अविनाशी बलरामजीने पर्वताकार 'मुष्टिक' नामक पहलवानको कुश्तीमें मार डाला और श्रीकृष्णचन्द्रने भी कंसके 'चाणूर' नामक


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