संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३७
श्रीमार्कण्डेय उवाच इति स्तुतो जगन्नाथः श्रीधरः पद्मयोनिना। आविर्बभूव भगवान्शङ्खचक्रगदाधरः ॥ २५ उवाच च हृषीकेशः पद्मयोनिं सुरानपि। स्तुत्यानयाहं संतुष्टः पितामह दिवौकसः ॥ २६ पठतां पापनाशाय नृणां भक्तिमतामपि । यतोऽस्मि प्रकटीभूतो दुर्लभोऽपि हरिः सुराः ॥ २७ देवैः सेन्द्रैः सरुद्रैस्तु पृथ्व्या च प्रार्थितो ह्यहम्। पद्मयोने वदाद्य त्वं श्रुत्वा तत्करवाणि ते ॥ २८ इत्युक्ते विष्णुना प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः। दैत्यानां गुरुभारेण पीडितेयं मही भृशम् ॥ २९ लघ्वीमिमां कारयितुं त्वयाहं पुरुषोत्तम। तेनागतः सुरैः सार्धं नान्यदस्तीति कारणम् ॥ ३० इत्युक्तो भगवान् प्राह गच्छध्वममराः स्वकम्। स्थानं निरामयाः सर्वे पद्मयोनिस्तु गच्छतु ॥ ३१ देवक्यां वसुदेवाच्च अवतीर्य महीतले। सितकृष्णे च मच्छक्ती कंसादीन् घातयिष्यतः ॥ ३२ इत्याकर्ण्य हरेर्वाक्यं हरिं नत्वा ययुः सुराः। गतेषु त्रिदिवौकःसु देवदेवो जनार्दनः ॥ ३३ शिष्टानां पालनार्थाय दुष्टनिग्रहणाय च। प्रेषयामास ते शक्ती सितकृष्णे स्वके नृप ॥ ३४ तयोः सिता च रोहिण्यां वसुदेवाद्बभूव ह। तद्वत्कृष्णा च देवक्यां वसुदेवाद्बभूव ह॥ ३५ रौहिणेयोऽथ पुण्यात्मा रामनामाश्रितो महान्। देवकीनन्दनः कृष्णस्तयोः कर्म शृणुष्व मे ॥ ३६ गोकुले बालकाले तु राक्षसी शकुनी निशि। रामेण निहता राजन् तथा कृष्णेन पूतना ॥ ३७ धेनुकः सगणास्तालवने रामेण घातितः। शकटश्चार्जुनौ वृक्षौ तद्वत्कृष्णेन घातितौ ॥ ३८
श्रीमार्कण्डेयजी कहते हैं—ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर जगत्पति भगवान् लक्ष्मीधर हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण किये वहाँ प्रकट हुए तथा वे भगवान् हृषीकेश ब्रह्माजी और देवताओंसे बोले—‘पितामह ! देवताओ! मैं तुम्हारी इस स्तुतिसे बहुत ही प्रसन्न हूँ। देवगण ! यह स्तोत्र इसका पाठ करनेवालोंके सारे पाप नष्ट करनेमें समर्थ है। यद्यपि मैं श्रीहरिके रूपमें भक्तिमान् पुरुषोंको भी कठिनतासे ही प्राप्त होता हूँ, तथापि इस स्तोत्रके प्रभावसे मैं प्रत्यक्ष प्रकट हो गया हूँ। ब्रह्माजी ! आज रुद्र और इन्द्रसहित समस्त देवताओं तथा पृथिवीने मेरी प्रार्थना की है, अतः तुम लोग अपना मनोरथ कहो; उसे सुनकर पूर्ण करूँगा' ॥ २५–२८ ॥ भगवान् विष्णुके यों कहनेपर लोकपितामह ब्रह्माजी बोले—'पुरुषोत्तम ! यह पृथ्वी दैत्योंके गुरुतर भारसे अत्यन्त पीडित हो रही है। अतः मैं आपके द्वारा इस वसुधाके भारको उतरवानेके लिये यहाँ देवताओंके साथ आया हूँ। मेरे आनेका दूसरा कोई कारण नहीं है' ॥ २९–३० ॥ यह सुनकर भगवान्ने कहा—'देवगण ! तुम लोग निश्चिन्त होकर अपने-अपने स्थानको लौट जाओ। ब्रह्माजी भी चले जायँ। मेरी गौर और कृष्ण—दो शक्तियाँ पृथ्वीपर वसुदेवजीके वीर्य एवं देवकीके गर्भसे अवतार लेकर कंस आदि असुरोंका वध करेंगी' ॥ ३१–३२ ॥ भगवान्का यह वचन सुनकर सभी देवता उनको प्रणाम करके चले गये। राजन् ! देवताओंके चले जानेपर देवदेव जनार्दनने सज्जनोंकी रक्षा और दुष्टोंका संहार करनेके लिये अपनी वे गौर-कृष्ण—दो शक्तियाँ भेजीं। उनमेंसे गौर शक्ति वसुदेवद्वारा रोहिणीके गर्भसे प्रकट हुई तथा कृष्ण शक्तिने वसुदेवके अंश एवं देवकीके गर्भसे अवतार लिया। पुण्यात्मा महापुरुष रोहिणीनन्दनने 'राम' नाम धारण किया और देवकीनन्दनका 'श्रीकृष्ण' नाम रखा गया। नरेश्वर ! तुम उन दोनोंके कर्म मुझसे सुनो ॥ ३३–३६ ॥ राजन् ! गोकुलमें रामने बाल्यकालमें ही रात्रिके समय एक पक्षीरूपधारिणी राक्षसीको मारा था और श्रीकृष्णने 'पूतना' का संहार किया था। रामने तालवनमें 'धेनुक' नामक राक्षसको उसके गणोंसहित मारा था और श्रीकृष्णने भी शकट उलट दिया तथा 'यमलार्जुन' नामक दो वृक्षोंको
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