संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३ यो मत्स्यरूपेण रसातलस्थितान् | जिन्होंने युद्धमें मधु और कैटभ—इन दोनों वेदान् समाहृत्य मम प्रदत्तवान्। | दैत्योंको मारा तथा मत्स्यरूप धारण करके रसातलमें निहत्य युद्धे मधुकैटभावुभौ | पहुँचे हुए वेदोंको लाकर मुझे दिया था, उन वेदवेद्य तं वेदवेद्यं प्रणतोऽस्म्यहं सदा॥ १७ | परमेश्वरको मैं सदा ही प्रणाम करता हूँ। पूर्वकालमें देवासुरैः क्षीरसमुद्रमध्यतो | जिन्होंने देवता और असुरोंद्वारा क्षीरसमुद्रमें डाले हुए न्यस्तो गिरिर्येन धृतः पुरा महान्। | महान् मन्दराचलको सबका हित करनेके लिये हिताय कौर्मं वपुरास्थितो य- | कूर्मरूपसे पीठपर धारण किया था, उन प्रकाश स्तं विष्णुमाद्यं प्रणतोऽस्मि भास्करम्॥ १८ | देनेवाले आदिदेव भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हत्वा हिरण्याक्षमतीव दर्पितं | हूँ। जिन सनातन भगवान्ने वराहरूप धारण करके वराहरूपी भगवान् सनातनः। | इस सम्पूर्ण वसुंधराका जलसे उद्धार किया और उसी यो भूमिमेतां सकलां समुद्धरं- | समय अत्यन्त अभिमानी दैत्य हिरण्याक्षको मार गिराया स्तं वेदमूर्तिं प्रणमामि सूकरम्॥ १९ | था, उन वेदमूर्ति सूकररूपधारी भगवान्को प्रणाम कृत्वा नृसिंहं वपुरात्मनः परं | करता हूँ। जिन सनातन भगवान् श्रीहरिने त्रिलोकीका हिताय लोकस्य सनातनो हरिः | हित करनेके लिये स्वयं ही श्रेष्ठ नृसिंहरूप धारण जघान यस्तीक्ष्णनखैर्दितेः सुतं | करके अपने तीखे नखोंद्वारा दिति-नन्दन हिरण्यकशिपुका तं नारसिंहं पुरुषं नमामि॥ २० | वध किया था, उन परम पुरुष भगवान् नरसिंहको यो वामनोऽसौ भगवाञ्जनार्दनो | मैं प्रणाम करता हूँ। जिन वामनरूपधारी भगवान् बलिं बबन्ध त्रिभिरूर्जितैः पदैः। | जनार्दनने बलिको बाँधा था और अपने बढ़े हुए तीन जगत्त्रयं क्रम्य ददौ पुरंदरे | पगोंसे त्रिभुवनको नापकर उसे इन्द्रको दे दिया था, तदेवमाद्यं प्रणतोऽस्मि वामनम्॥ २१ | उन आदिदेव वामनको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने यः कार्तवीर्यं निजघान रोषात् | कोपवश राजा कार्तवीर्यको मार डाला तथा इक्कीस त्रिस्सप्तकृत्वः क्षितिपात्मजानपि। | बार क्षत्रियोंका संहार किया, पृथ्वीका भार दूर तं जामदग्न्यं क्षितिभारनाशकं | करनेवाले परशुरामरूपधारी उन पुरुषोत्तम भगवान् नतोऽस्मि विष्णुं पुरुषोत्तमं सदा ॥ २२ | विष्णुको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने समुद्रमें सेतुं महान्तं जलधौ बबन्ध यः | बहुत बड़ा पुल बाँधा और लङ्कामें पहुँचकर त्रिलोकीकी सम्प्राप्य लङ्कां सगणं दशाननम्। | रक्षाके लिये रावणको उसके गणोंसहित मार डाला जघान भृत्यै जगतां सनातनं | था, उन सनातन पुरुष भगवान् श्रीरामको मैं सदा तं रामदेवं सततं नतोऽस्मि ॥ २३ | प्रणाम करता हूँ। भगवन् ! विष्णो ! जिस प्रकार यथा तु वाराहनृसिंहरूपैः | [पूर्वकालमें] वराह-नृसिंह आदि रूपोंसे आपने कृतं त्वया देव हितं सुराणाम्। | देवताओंका हित किया है, उसी प्रकार आज भी प्रसन्न तथाद्य भूमेः कुरु भारहानिं | होकर पृथ्वीका भार दूर करें। देव! आपको सादर प्रसीद विष्णो भगवन्नमस्ते ॥ २४ | नमस्कार है ॥ १७—२४॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth