भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 318 में से

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पृष्ठ 246

अध्याय ५३ ] बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र २३५ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! मैं ब्रह्माजीके मुखसे शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि स्तोत्रं ब्रह्ममुखेरितम्। निकले हुए उस उत्तम स्तोत्रको कहता हूँ, सुनो! वह सर्वपापहरं पुण्यं विष्णुतुष्टिकरं परम्॥ ९ स्तोत्र समस्त पापोंको हरनेवाला, पवित्र तथा भगवान् विष्णुको अत्यन्त संतुष्ट करनेवाला है। राजन्! ब्रह्माजीने तमाराध्य जगन्नाथमूर्ध्वबाहुः पितामहः। पूर्वोक्त रूपसे भगवान् जगन्नाथकी पूजा करके एकाग्रचित्त भूत्वैकाग्रमना राजन्निदं स्तोत्रमुदीरयत्॥ १० हो इस स्तोत्रका पाठ किया॥ ९-१०॥ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले—मैं सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी भगवान् नमामि देवं नरनाथमच्युतं अच्युतको, सनातन लोकगुरु भगवान् नारायणको नमस्कार नारायणं लोकगुरुं सनातनम्। करता हूँ। जो अनादि, अव्यक्त, अचिन्त्य और अविनाशी अनादिमव्यक्तमचिन्त्यमव्ययं हैं, उन वेदान्तवेद्य पुरुषोत्तम श्रीहरिको प्रणाम करता हूँ। वेदान्तवेद्यं पुरुषोत्तमं हरिम्॥ ११ जो परमानन्दस्वरूप, परात्पर, ज्ञानमय एवं ज्ञानियोंके परम आश्रय हैं तथा जो सर्वमय, सर्वव्यापक, अद्वितीय आनन्दरूपं परमं परात्परं और सबके ध्येयरूप हैं, उन भगवान् लक्ष्मीपतिको मैं चिदात्मकं ज्ञानवतां परां गतिम्। प्रणाम करता हूँ। जो भक्तोंके प्रेमी, अत्यन्त कमनीय सर्वात्मकं सर्वगतैकरूपं और दोषोंसे रहित हैं, जो समस्त देवताओंके स्वामी हैं, ध्येयस्वरूपं प्रणमामि माधवम्॥ १२ विद्वान् पुरुष जिनकी स्तुति करते हैं, जिनके चार भुजाएँ हैं, नीलकमलके समान जिनकी श्यामल कान्ति है, जो भक्तप्रियं कान्तमतीव निर्मलं हाथमें चक्र धारण किये रहते हैं, उन परमेश्वर केशवको सुराधिपं सूरिजनैरभिष्टुतम् । मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके हाथोंमें गदा, तलवार, शङ्ख चतुर्भुजं नीरजवर्णमीश्वरं और कमल सुशोभित हैं, जो लक्ष्मीजीके पति हैं, सदा रथाङ्गपाणिं प्रणतोऽस्मि केशवम्॥ १३ ही कल्याण करनेवाले हैं, जो शार्ङ्गधनुष धारण किये रहते हैं, जिनकी सूर्यके समान कान्ति है, जो पीतवस्त्र गदासिशङ्खाब्जकरं श्रियः पतिं धारण किये रहते हैं, जिनका उदरभाग हारसे विभूषित सदाशिवं शार्ङ्गधरं रविप्रभम्। है तथा जिनके मस्तकपर मुकुट शोभा पा रहा है, उन पीताम्बरं हारविराजितोदरं भगवान् विष्णुको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। जिनके नमामि विष्णुं सततं किरीटिनम्॥ १४ कपोलोंपर सुन्दर रक्तवर्ण कुण्डल शोभा पा रहे हैं, जो अपनी कान्तिसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे गण्डस्थलासक्तसुरक्तकुण्डलं हैं, गन्धर्व और सिद्धगण जिनका सुयश गाते रहते हैं सुदीपिताशेषदिशं निजत्विषा। तथा जिनका वैदिक ऋचाओंद्वारा यशोगान किया जाता गन्धर्वसिद्धैरुपगीतमृग्ध्वनिं है, उन भूतनाथ भगवान् जनार्दनको मैं प्रणाम करता जनार्दनं भूतपतिं नमामि तम्॥ १५ हूँ। जो भगवान् प्रत्येक युगमें पृथ्वीपर अवतार ले, हत्वासुरान् पाति युगे युगे सुरान् देवद्रोही दानवोंकी हत्या करके अपने धर्ममें स्थित स्वधर्मसंस्थान् भुवि संस्थितो हरिः। देवताओंकी रक्षा करते हैं तथा जो इस जगत्की सृष्टि करोति सृष्टिं जगतः क्षयं य- एवं संहार करते हैं, उन सर्वान्तर्यामी भगवान् केशवको स्त वासुदेवं प्रणतोऽस्मि केशवम्॥ १६ मैं प्रणाम करता हूँ॥ ११–१६॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth