संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५३ यज्ञादिकं कर्म निजं च कृत्वा पौरैस्तु रामो दिवमारुरोह। राजन्मया ते कथितं समास्तो रामस्य भूम्यां चरितं महात्मनः। इदं सुभक्त्या पठतां च शृण्वतां ददाति रामः स्वपदं जगत्पतिः॥ १२५ धर्मपूर्वक राज्य किया तथा राजोचित यागादि कर्मोंका अनुष्ठान करके वे पुरवासियोंके साथ ही स्वर्गलोक (साकेतधाम)-को चले गये। राजन्! पृथ्वीपर महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके किये हुए चरित्रोंका मैंने तुमसे संक्षेपतः वर्णन किया। जो लोग इसको भक्तिपूर्वक पढ़ते और सुनते हैं, उन्हें जगत्पति भगवान् श्रीराम अपना धाम प्रदान करते हैं॥ १२३-१२५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे द्विपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५२॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें श्रीरामावतारकी कथाविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५२॥ तिरपनवाँ अध्याय बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र मार्कण्डेय उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रादुर्भावद्वयं शुभम्। तृतीयस्य तु रामस्य कृष्णस्य तु समासतः॥ १ पुरा ह्यसुरभारार्ता मही प्राह नृपोत्तम। आसीनं देवमध्ये तु ब्रह्माणं कमलासनम्॥ २ देवासुरे हता ये तु विष्णुना दैत्यदानवाः। ते सर्वे क्षत्रिया जाताः कंसाद्याः कमलोद्भव॥ ३ तद्बूरिभारसम्प्राप्ता सीदन्ती चतुरानन। मम तद्धारहानिः स्याद्यथा देव तथा कुरु॥ ४ तथैवमुक्तो ब्रह्माथ देवैः सह जगाम ह। क्षीरोदस्योत्तरं कूलं विष्णुं भक्तिविबोधितम्॥ ५ तत्र गत्वा जगत्त्रष्टा देवैः सार्धं जनार्दनम्। नरसिंहं महादेवं गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ६ अभ्यर्च्य भक्त्या गोविन्दं वाक्पुष्पेण च केशवम्। पूजयामास राजेन्द्र तेन तुष्टो जगत्पतिः॥ ७ मार्कण्डेयजी कहते हैं—अब मैं तीसरे राम (बलराम) और श्रीकृष्णके युगल अवतारोंका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, पृथ्वी दैत्योंके भारसे पीडित हो देवताओंके मध्यमें विराजमान कमलासन ब्रह्माजीके पास गयी और इस प्रकार बोली॥ १-२॥ 'कमलोद्भव! देवासुर-संग्राममें जो-जो दैत्य और दानव भगवान् विष्णुके हाथसे मारे गये थे, वे सभी कंस आदि क्षत्रियोंके रूपमें उत्पन्न हुए हैं। चतुरानन! उनके भारी बोझसे दबकर मैं बहुत दुःखी हो गयी हूँ। देव! मेरा वह भार जैसे भी दूर हो, वह उपाय आप करें'॥ ३-४॥ पृथ्वीके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना की जानेपर, कहते हैं, ब्रह्माजी समस्त देवताओंके साथ क्षीरसागरके उत्तर तटपर भगवान् विष्णुके निकट गये। उन्होंने भगवान्को अपनी भक्तिके प्रभावसे सोतेसे जगाया था। वहाँ पहुँचकर जगतकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजीने समस्त देवताओंके साथ नरसिंहस्वरूप महान् देवता भगवान् जनार्दनकी गन्ध-पुष्पादिके द्वारा क्रमशः भक्तिपूर्वक पूजा की। फिर वाक्पुष्पसे भी उन गोविन्द-केशवका पूजन किया। राजेन्द्र! इससे वे जगदीश्वर भगवान् विष्णु उनपर बहुत संतुष्ट हुए॥ ५-७॥ राजोवाच वाक्पुष्पेण कथं ब्रह्मन् ब्रह्माप्यर्चितवान् हरिम्। तन्मे कथय विप्रेन्द्र ब्रह्मोक्तं स्तोत्रमुत्तमम्॥ ८ राजा बोले—ब्रह्मन्! ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुकी वाक्पुष्पसे किस प्रकार पूजा की? विप्रेन्द्र! ब्रह्माजीद्वारा कहे हुए उस उत्तम स्तोत्र (वाक्पुष्प)-को आप मुझे सुनाइये॥ ८॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth