संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 244, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २३३ अङ्गदाद्या इमे सर्वे इत्यूचुस्ते दिवौकसः । गन्धामोदितदिक्चक्रा भ्रमरालिपदानुगा ॥ ११३ देवस्त्रीकरनिर्मुक्ता राममूर्धनि शोभिता । पपात पुष्पवृष्टिस्तु लक्ष्मणस्य च मूर्धनि ॥ ११४ ततो ब्रह्मा समागत्य हंसयानेन राघवम् । अमोघाख्येन स्तोत्रेण स्तुत्वा राममवोचत ॥ ११५ ब्रह्मोवाच त्वं विष्णुरादिर्भूतानामनन्तो ज्ञानदृक्प्रभुः । त्वमेव शाश्वतं ब्रह्म वेदान्ते विदितं परम् ॥ ११६ त्वया यदद्य निहतो रावणो लोकरावणः । तदाशु सर्वलोकानां देवानां कर्म साधितम् ॥ ११७ इत्युक्ते पद्मयोनौ तु शङ्करः प्रीतिमास्थितः । प्रणम्य रामं तस्मै तं भूयो दशरथं नृपम् ॥ ११८ दर्शयित्वा गतो देवः सीता शुद्धेति कीर्तयन्। ततो बाहुबलप्राप्तं विमानं पुष्पकं शुभम् ॥ ११९ पूतामारोप्य सीतां तामादिष्टः पवनात्मजः । ततस्तु जानकीं देवीं विशोकां भूषणान्विताम् ॥ १२० वन्दितां वानरेन्द्रैस्तु सार्धं भ्रात्रा महाबलः । प्रतिष्ठाप्य महादेवं सेतुमध्ये स राघवः ॥ १२१ लब्धवान् परमां भक्तिं शिवे शम्भोरनुग्रहात् । रामेश्वर इति ख्यातो महादेवः पिनाकधृक् ॥ १२२ तस्य दर्शनमात्रेण सर्वहत्यां व्यपोहति । रामस्तीर्णप्रतिज्ञोऽसौ भरतासक्तमानसः ॥ १२३ ततोऽयोध्यां पुरीं दिव्यां गत्वा तस्यां द्विजोत्तमैः । अभिषिक्तो वसिष्ठाद्यैर्भरतेन प्रसादितः । अकरोद्धर्मतो राज्यं चिरं रामः प्रतापवान् ॥ १२४ [दायाँ भाग - हिन्दी अनुवाद] अङ्गद आदि सभी वानर वीर विराजमान हैं।' तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणके मस्तकपर देवाङ्गनाओं-के हाथसे छोड़े गये फूलोंकी वर्षा हुई। उस समय वहाँकी सब दिशाएँ उन दिव्य पुष्पोंकी सुगन्धसे सुवासित हो रही थीं और उन पुष्पोंपर भ्रमरगण मँडरा रहे थे॥११२-११४॥ तदनन्तर ब्रह्माजी हंसकी सवारीसे वहाँ आये और 'अमोघ' नामक स्तोत्रसे भगवान् श्रीरामकी स्तुति करके तब उनसे बोले॥११५॥ ब्रह्माजीने कहा—आप समस्त प्राणियोंके आदिकारण, अविनाशी, ज्ञानदृष्टि भगवान् विष्णु हैं; आप ही वेदान्त-विख्यात सनातन परब्रह्म हैं। आपने आज जो सम्पूर्ण लोकोंको रुलानेवाले रावणका वध किया है, इससे समस्त लोकों तथा देवताओंका भी कार्य सद्यः सिद्ध हो गया॥११६-११७॥ ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेके पश्चात् भगवान् शङ्करने भी पहले श्रीरामचन्द्रजीको प्रेमपूर्वक प्रणाम किया। फिर उन्हें राजा दशरथका दर्शन कराया। उसके बाद यह कहकर कि 'श्रीसीताजी निष्कलङ्क और शुद्ध चरित्रवाली हैं'-भगवान् शंकर चले गये॥११८१/२॥ तदनन्तर पवित्रात्मा सीताजीको अपने बाहुबलसे प्राप्त सुन्दर पुष्पकविमानपर चढ़ाकर भगवान्ने हनुमान्जी-को चलनेका आदेश दिया। तब समस्त वानरेन्द्रांद्वारा वन्दित शोकरहित जानकीदेवीको आभूषणोंसे विभूषितकर महाबली रामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मणके साथ चले। लौटती बार श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रके पुलपर महादेवजीकी स्थापना की और शङ्करजीकी कृपासे उन्होंने उन शिवजीमें परमभक्ति प्राप्त की। वहाँ स्थापित हुए पिनाकधारी महादेवजी 'रामेश्वर' नामसे विख्यात हुए। उनके दर्शनमात्र-से शिवजी सब प्रकारके हत्यादि दोषोंको दूर कर देते हैं॥११९-१२२१/२॥ इस प्रकार प्रतिज्ञा पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी अपना चित्त भरतजीकी ओर लगा रहनेके कारण वहाँसे दिव्यपुरी अयोध्याको गये। फिर भरतजीके मनानेपर श्रीरामचन्द्रजीने वसिष्ठ आदि उत्तम ब्राह्मणोंके द्वारा अपना राज्याभिषेक कराया। तत्पश्चात् प्रतापी भगवान् श्रीरामने चिरकालतक