संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२
रावणे बद्धवैरस्तु अगस्त्यो वै जयप्रदम्। दिलानेवाले 'आदित्यहृदय' नामक स्तोत्र-मन्त्रका उपदेश आदित्यहृदयं नाम मन्त्रं प्रादाज्जयप्रदम् ॥ ९८ किया। महाबली श्रीरामचन्द्रजीने भी अगस्त्यमुनिके बताये रामोऽपि जप्त्वा तन्मन्त्रमगस्त्योक्तं जयप्रदम्। हुए उस विजयदायक मन्त्रका जप करके उनके द्वारा तद्दत्तं वैष्णवं चापमतुलं सगुणं दृढम् ॥ ९९ अर्पित किये गये उत्तम डोरीवाले, सुदृढ़ एवं अनुपम वैष्णव-धनुषको सादर ग्रहण किया और उसपर प्रत्यञ्चा पूजयित्वा तदादाय सज्यं कृत्वा महाबलः। चढ़ायी। फिर प्रतापी रघुनाथजी शत्रुओंका मर्म-भेदन सौवर्णपुङ्खैस्तीक्ष्णैस्तु शरैर्मर्मविदारणैः ॥ १०० करनेमें समर्थ सोनेकी पाँखवाले तीक्ष्ण बाणोंद्वारा राक्षसराज युयुधे राक्षसेन्द्रेण रघुनाथः प्रतापवान्। रावणके साथ युद्ध करने लगे ॥ ९७-१००१/२ ॥ तयोस्तु युध्यतोस्तत्र भीमशक्त्योर्महामते ॥ १०१ महामते ! नृपश्रेष्ठ ! उन दोनों भयंकर शक्तिवाले श्रीराम और रावणके परस्पर युद्ध करते समय एक- परस्परविसृष्टस्तु व्योम्नि संवर्द्धितोऽनलः। दूसरेपर छोड़ी हुई अग्निकी ज्वाला उठ-उठकर वहाँ समुत्थितो नृपश्रेष्ठ रामरावणयोर्युधि ॥ १०२ आकाशमें फैलने लगी। इस वर्तमान संग्राममें अवर्णनीय संगरे वर्तमाने तु रामो दाशरथिस्तदा। पराक्रमवाले वीर दशरथनन्दन श्रीराम पैदल ही युद्ध पदातिर्युयुधे वीरो रामोऽनुक्तपराक्रमः ॥ १०३ कर रहे थे। यह देख देवराज इन्द्रने अपने सारथि मातुलिसहित एक महान् लोकविख्यात दिव्य रथ भेजा, सहस्राश्वयुतं दिव्यं रथं मातलिमेव च। जिसमें एक हजार घोड़े जुते थे। प्रतापी श्रीरामचन्द्रजी प्रेषयामास देवेन्द्रो महान्तं लोकविश्रुतम् ॥ १०४ श्रेष्ठ देवोंद्वारा प्रशंसित होकर उस रथपर आरूढ़ हुए रामस्तं रथमारुह्य पूज्यमानः सुरोत्तमैः। और मातलिके उपदेशसे उस दुष्ट दशाननका, जिसे मातल्युक्तोपदेशस्तु रामचन्द्रः प्रतापवान् ॥ १०५ ब्रह्माजीने वरदान दिया था, ब्रह्मास्त्रद्वारा वध किया। इस प्रकार प्रतापी भगवान् श्रीरामने अपने क्रूर वैरी रावणका ब्रह्मदत्तवरं दुष्टं ब्रह्मास्त्रेण दशाननम्। संहार किया ॥ १०१-१०६ ॥ जघान वैरिणं क्रूरं रामदेवः प्रतापवान् ॥ १०६ श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा शत्रु रावणका उसके गणोंसहित रामेण निहते तत्र रावणे सगणे रिपौ। वध हो जानेपर इन्द्र आदि सभी देवता परस्पर कहने इन्द्राद्या देवताः सर्वाः परस्परमथाब्रुवन् ॥ १०७ लगे- "साक्षात् भगवान् विष्णुने ही श्रीरामावतार लेकर हमारे वैरी रावणका, जो दूसरोंके लिये अवध्य था, रामो भूत्वा हरिर्यस्मादस्माकं वैरिणं रणे। युद्धमें वध किया है। इसलिये हम लोग आकाशसे अन्यैरवध्यमप्येनं जघान युधि रावणम् ॥ १०८ उतरकर इन अनन्त पराक्रमी तथा किसीसे भी पराजित न होनेवाले 'श्रीराम' नामक परमेश्वरकी पूजा करें।" तस्मात्तं रामनामानमनन्तमपराजितम्। ऐसी सम्मति करके वे रुद्र, इन्द्र, वसु और चन्द्र आदि पूजयामोऽवतीर्यैनमित्युक्त्वा ते दिवौकसः ॥ १०९ देवतागण अनेक कान्तिमान् विमानोंद्वारा पृथ्वीपर उतरे। नानाविमानैः श्रीमद्भिरवतीर्य महीतले। वे जगत्के रचयिता, विश्वमूर्ति, सनातन पुरुष, विजयशील रुद्रेन्द्रवसुचन्द्राद्या विधातारं सनातनम् ॥ ११० भगवान् विष्णुके स्वरूपभूत अविनाशी परमात्मा श्रीरामका लक्ष्मणसहित विधिवत् पूजन करके उन्हें सब ओरसे विष्णुं जिष्णुं जगन्मूर्ति सानुजं राममव्ययम्। घेरकर खड़े हो गये ॥ १०७-१११॥ तं पूजयित्वा विधिवत्परिवार्योपतस्थिरे ॥ १११ सब देवता परस्पर कहने लगे- 'देवगण! देखो- रामोऽयं दृश्यतां देवा लक्ष्मणोऽयं व्यवस्थितः। ये श्रीरामचन्द्रजी हैं, ये लक्ष्मणजी खड़े हैं, ये सूर्यनन्दन सुग्रीवो रविपुत्रोऽयं वायुपुत्रोऽयं व्यवस्थितः ॥ ११२ सुग्रीव हैं, ये वायुनन्दन हनुमान्जी खड़े हैं और ये
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