संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २३१ रावणस्य धनुश्छित्त्वा ध्वजं च निशितैः शरैः । फिर तीखे बाणोंसे रावणका धनुष और उसकी ध्वजा वक्षःस्थलं महावीर्यो विव्याध परवीरहा ॥ ८५ काटकर शत्रु-वीरोंका नाश करनेवाले महान् पराक्रमी लक्ष्मणजीने उसके वक्षःस्थलको बेध दिया। तब राक्षसराज ततो रथान्निपत्याधः क्षिप्रं राक्षसनायकः । रावण रथसे नीचे गिर पड़ा। किंतु शीघ्र ही उठकर कुपित शक्तिं जग्राह कुपितो घण्टानादविनादिनीम् ॥ ८६ हो उसने हाथमें शक्ति उठायी, जो सैकड़ों घड़ियालोंके समान आवाज करनेवाली थी। उसकी धार अग्निकी अग्निज्वालाज्वलज्जिह्वां महोल्कासदृशद्युतिम् । ज्वालाके समान प्रज्वलित थी तथा उसकी कान्ति महती दृढमुष्ट्या तु निक्षिप्ता शक्तिः सा लक्ष्मणोरसि ॥ ८७ उल्काके समान प्रतीत होती थी। उसने दृढ़तापूर्वक मुट्ठी बाँधकर उस शक्तिको लक्ष्मणकी छातीपर फेंका। वह विदार्यान्तःप्रविष्टाथ देवास्त्रस्तास्ततोऽम्बरे । शक्ति उनकी छाती छेदकर भीतर घुस गयी। इससे आकाशमें लक्ष्मणं पतितं दृष्ट्वा रुदद्भिर्वानरेश्वरैः ॥ ८८ स्थित देवतागण भयभीत हो गये। लक्ष्मणको गिरा देख रोते हुए वानराधिपतियोंके साथ दुःखी हो भगवान् श्रीराम दुःखितः शीघ्रमागम्य तत्पार्श्वं प्राह राघवः । शीघ्र ही उनके पास आये और कहने लगे— 'मेरे मित्र क्व गतो हनुमान् वीरो मित्रो मे पवनात्मजः ॥ ८९ पवनकुमार हनुमान् कहाँ चले गये? पृथ्वीपर पड़ा हुआ मेरा भाई लक्ष्मण जिस-किसी प्रकार भी जीवित हो सके, यदि जीवति मे भ्राता कथंचित्पतितो भुवि । वह उपाय होना चाहिये' ॥ ८४-८९१/२ ॥ इत्युक्ते हनुमान् राजन् वीरो विख्यातपौरुषः ॥ ९० राजन् ! उनके इस प्रकार कहनेपर, विख्यात पराक्रमी बद्ध्वाञ्जलिं बभाषेदं देह्यनुज्ञां स्थितोऽस्मि भोः । वीर हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले— 'देव ! आज्ञा दें, मैं रामः प्राह महावीर विशल्यकरणी मम ॥ ९१ सेवामें उपस्थित हूँ' ॥ ९०१/२ ॥ श्रीरामने कहा— 'महावीर ! मुझे 'विशल्यकरणी' अनुजं विरुजं शीघ्रं कुरु मित्र महाबल । ओषधि चाहिये। महाबली! उसे लाकर मेरे भाईको ततो वेगात्समुत्पत्य गत्वा द्रोणगिरिं कपिः ॥ ९२ शीघ्र ही नीरोग करो ॥ ९११/२ ॥ तब हनुमान्जी बड़े वेगसे उछले और द्रोणगिरिपर बद्ध्वा च शीघ्रमानीय लक्ष्मणं नीरुजं क्षणात् । जाकर शीघ्र ही वहाँसे दवा बाँधकर ले आये और उसका चकार देवदेवेशां पश्यतां राघवस्य च ॥ ९३ प्रयोग करके देवदेवेश्वरों तथा रामचन्द्रजीके देखते-देखते क्षणभरमें लक्ष्मणको नीरोग कर दिया ॥ ९२-९३ ॥ ततः क्रुद्धो जगन्नाथो रामः कमललोचनः । तदनन्तर जगदीश्वर कमलनयन श्रीराम बहुत ही कुपित रावणस्य बलं शिष्टं हस्त्यश्वरथराक्षसम् ॥ ९४ हुए और रावणकी बची हुई सेनाको हाथी, घोड़े, रथ तथा राक्षसोंसहित क्षणभरमें मार गिराया। उन्होंने तीखे बाणोंसे हत्वा क्षणेन रामस्तु तच्छरीरं तु सायकैः । रावणका शरीर जर्जर कर दिया और रणभूमिमें वानरोंसे तीक्ष्णैर्जर्जरितं कृत्वा तस्थिवान् वानरैर्वृतः ॥ ९५ घिरे हुए खड़े रहे। रावण निश्चेष्ट होकर गिर पड़ा। फिर धीरे-धीरे होशमें आनेपर वह उठकर कुपित हो सिंहनाद अस्तचेष्टो दशग्रीवः संज्ञां प्राप्य शनैः पुनः । करने लगा। उसकी गर्जना सुनकर आकाशवर्ती देवता लोग उत्थाय रावणः क्रुद्धः सिंहनादं ननाद च ॥ ९६ दहल गये ॥ ९४-९६१/२ ॥ तन्नादश्रवणैर्व्योम्नि वित्रस्तो देवतागणः । इसी समय रावणके प्रति वैर बाँधे महामुनि अगस्त्य एतस्मिन्नेव काले तु रामं प्राप्य महामुनिः ॥ ९७ श्रीरामचन्द्रजीके पास आये और शत्रुओंपर विजय In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth