संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 241, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें[page_start] २३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२
इन्द्रजिन्मन्त्रलब्धं तु रथमारुह्य वै पुनः। वानरेषु च सर्वेषु शरवर्षं ववर्ष सः॥७२
रात्रौ तद्द्बाणभिन्नं तु बलं सर्वं च राघवम्। निश्चेष्टमखिलं दृष्ट्वा जाम्बवत्प्रेरितस्तदा॥७३
वीर्यादौषधमानीय हनूमान् मारुतात्मजः। भूम्यां शयानमुत्थाप्य रामं हरिगणांस्तथा॥७४
तैरेव वानरैः सार्धं ज्वलितोल्काकरैर्निशि। दाहयामास लङ्कां तां हस्त्यश्वरथराक्षसाम्॥७५
वर्षन्तं शरजालानि सर्वदिक्षु घनो यथा। स भ्रात्रा मेघनादं तं घातयामास राघवः॥७६
घातितेष्वथ रक्षस्सु पुत्रमित्रादिबन्धुषु। कारितेष्वथ विघ्नेषु होमजप्यादिकर्मणाम्॥७७
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो लङ्काद्वारे विनिर्गतः। क्वासौ राम इति ब्रूते मानुषस्तापसाकृतिः॥७८
योद्धा कपिबलीत्युच्चैर्व्याहरद्राक्षसाधिपः। वेगवद्भिर्विनीतैश्च अश्वैश्चित्ररथे स्थितः॥७९
अथायान्तं तु तं दृष्ट्वा रामः प्राह दशाननम्। रामोऽहमत्र दुष्टात्मन्नेहि रावण मां प्रति॥८०
इत्युक्ते लक्ष्मणः प्राह रामं राजीवलोचनम्। अनेन रक्षसा योत्स्ये त्वं तिष्ठेति महाबल॥८१
ततस्तु लक्ष्मणो गत्वा रुरोध शरवृष्टिभिः। विंशद्बाहुविसृष्टैस्तु शस्त्रास्त्रैर्लक्ष्मणं युधि॥८२
रुरोध स दशग्रीवः तयोर्युद्धमभून्महत्। देवा व्योम्नि विमानस्था वीक्ष्य तस्थुर्महाहवम्॥८३
ततो रावणशस्त्राणिच्छित्त्वा स्वैस्तीक्ष्णसायकैः। लक्ष्मणः सारथिं हत्वा तस्याश्वानपि भल्लकैः॥८४
तत्पश्चात् इन्द्रजित् मन्त्रशक्तिसे प्राप्त हुए रथपर आरूढ़ हो समस्त वानरोंपर बाण-वृष्टि करने लगा। रात्रिके समय समस्त वानर-सेना तथा श्रीरामचन्द्रजीको मेघनादके बाणोंसे विद्ध हो सर्वथा निश्चेष्ट पड़े देख पवनकुमार हनूमान्जी जाम्बवान्के द्वारा प्रेरित हो अपने पराक्रमसे औषध ले आये। उन्होंने उस औषधके प्रभावसे भूमिपर पड़े हुए श्रीरामचन्द्रजी तथा वानरगणोंको उठाया और प्रज्वलित उल्का हाथमें लिये उन्हीं वानरोंके साथ रातमें जाकर हाथी, रथ और घोड़ोंसे युक्त राक्षसोंकी लङ्कामें आग लगा दी। तदनन्तर भगवान् रामने बादलके समान समस्त दिशाओंमें बाणोंकी वर्षा करते हुए मेघनादका अपने भाई लक्ष्मणके द्वारा वध करा दिया॥७२-७६॥
इस प्रकार जब पुत्र-मित्रादि समस्त राक्षस-बन्धु मारे गये तथा होम-जप आदि अभिचार-कर्मोंमें वानरोंद्वारा विघ्न डाल दिया गया, तब कुपित हो दशशीश रावण वेगशाली सुशिक्षित अश्वोंसे युक्त विचित्र रथमें बैठकर लङ्काके द्वारपर निकल आया और कहने लगा—'तपस्वीका वेष बनाये वह मनुष्य राम कहाँ है, जो वानरोंके बलपर योद्धा बना हुआ है?' राक्षसराज रावणने यह बात बड़े जोरोंसे कही। यह सुन भगवान् रामने दशानन रावणको आते देख उससे कहा—'दुष्टात्मा रावण! मैं ही राम हूँ और यहाँ खड़ा हूँ, तू मेरी ओर चला आ'॥७७-८०॥
उनके यों कहनेपर लक्ष्मणने कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—'महाबल! आप अभी ठहरें, मैं इस राक्षसके साथ युद्ध करूँगा।' तदनन्तर लक्ष्मणने आगे बढ़कर बाणोंकी वृष्टिसे रावणको ढक दिया। फिर दशग्रीव रावणने भी अपनी बीस भुजाओंद्वारा छोड़े हुए शस्त्रास्त्रोंसे लक्ष्मणको संग्राममें आच्छादित कर दिया। इस प्रकार उन दोनोंमें महान् युद्ध हुआ। विमानपर आरूढ़ देवतागण इस महान् संग्रामको देख [कौतूहलवश] आकाशमें स्थित हो गये॥८१-८३॥
तत्पश्चात् लक्ष्मणने अपने तीखे बाणोंद्वारा रावणके अस्त्र-शस्त्र काटकर उसके सारथिको मार डाला और भल्ल नामक बाणोंसे उसके घोड़ोंको भी नष्ट कर दिया।
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