भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 240

अध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २२९ बोधितस्तूर्यनादैस्तु गजयूथक्रमैः शनैः। तदनन्तर वाद्योंके घोषसे जगाया गया कुम्भकर्ण पुनः प्राकारमुल्लङ्घ्य कुम्भकर्णो विनिर्गतः ॥ ५८ लङ्काके परकोटेको लाँघकर धीरे-धीरे गजसमूहकी-सी उत्तुङ्गस्थूलदेहोऽसौ भीमदृष्टिर्महाबलः। मन्द गतिसे बाहर निकला। उसका शरीर बहुत ही ऊँचा वानरान् भक्षयन् दुष्टो विचचार क्षुधान्वितः ॥ ५९ और मोटा था, आँखें बड़ी ही भयानक थीं। वह महाबली दुष्ट राक्षस भूखसे व्याकुल हो वानरोंको अपना तं दृष्ट्वोत्पत्य सुग्रीवः शूलेनोरस्यताडयत्। आहार बनाता हुआ रणभूमिमें विचरने लगा। उसे देख कर्णद्वयं कराभ्यां तु च्छित्त्वा वक्त्रेण नासिकाम् ॥ ६० सुग्रीवने उछलकर उसकी छातीमें शूलसे प्रहार किया तथा अपने दोनों हाथोंसे उसके दोनों कानोंको और सर्वतो युध्यमानांश्च रक्षोनाथान् रणेऽधिकान्। मुखसे उसकी नासिकाको काट लिया॥ ५८-६०॥ राघवो घातयित्वा तु वानरेन्द्रैः समन्ततः ॥ ६१ तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने रणमें सब ओर युद्ध करते हुए बहुसंख्यक राक्षसाधिपतियोंको चारों ओरसे वानरोंद्वारा चकर्त विशिखैस्तीक्ष्णैः कुम्भकर्णस्य कन्थराम्। विजित्येन्द्रजितं साक्षाद्गरुडेनागतेन सः ॥ ६२ मरवाकर अपने तीखे बाणोंसे कुम्भकर्णका भी गला काट लिया। फिर वहाँ आये हुए साक्षात् गरुडके द्वारा रामो लक्ष्मणसंयुक्तः शुशुभे वानरैर्वृतः। इन्द्रजित्को भी जीतकर वानरोंसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी व्यर्थं गते चेन्द्रजिति कुम्भकर्णे निपातिते ॥ ६३ लक्ष्मणसहित बड़ी शोभा पाने लगे। इन्द्रजित्का उद्योग व्यर्थ होने और कुम्भकर्णके मारे जानेपर लङ्कापति लङ्कानाथस्ततः क्रुद्धः पुत्रं त्रिशिरसं पुनः। रावणने क्रुद्ध हो अपने पुत्र त्रिशिरा, अतिकाय, महाकाय, अतिकायमहाकायौ देवान्तकनरान्तकौ ॥ ६४ देवान्तक और नरान्तकसे कहा-'पुत्रवरो! तुम उन यूयं हत्वा तु पुत्राद्या तौ नरौ युधि निघ्नत। दोनों मनुष्यों-राम और लक्ष्मणको युद्धमें मार डालो।' तान्नियुज्य दशग्रीवः पुत्रानेवं पुनर्ब्रवीत् ॥ ६५ इस प्रकार उन पुत्रोंको ऐसी आज्ञा दे दशकण्ठ रावणने महोदरमहापाश्र्वौ सार्धमेतैर्महाबलैः। पुनः महोदर और महापार्श्व नामक राक्षसोंसे कहा- 'तुम संग्रामेऽस्मिन् रिपून् हन्तुं युवां व्रजतमुद्यतौ ॥ ६६ दोनों इस संग्राममें शत्रुओंका वध करनेके लिये उद्यत हो बहुत बड़ी सेनाओंके साथ जाओ'॥ ६१-६६॥ दृष्ट्वा तानागतांश्चैव युध्यमानान् रणे रिपून्। रणभूमिमें उपर्युक्त शत्रुओंको आकर युद्ध करते अनयल्लक्ष्मणः षड्भिः शरैस्तीक्ष्णैर्यमालयम् ॥ ६७ देख लक्ष्मणने छः तीखे बाणोंसे मारकर उन्हें यमलोक वानराणां समूहश्च शिष्टांश्च रजनीचरान्। भेज दिया। इसके बाद वानरगणने शेष राक्षसोंको मार सुग्रीवेण हतः कुम्भो राक्षसो बलदर्पितः ॥ ६८ डाला। सुग्रीवने बलाभिमानी कुम्भ नामक राक्षसको मारा, हनुमान्‌जीने देवताओंके लिये कण्टकरूप निकुम्भका निकुम्भो वायुपुत्रेण निहतो देवकण्टकः। वध किया। युद्ध करते हुए विरूपाक्षको विभीषणने विरूपाक्षं युध्यमानं गदया तु विभीषणः ॥ ६९ गदासे मार डाला। वानरश्रेष्ठ भीम और मैन्दने श्वपतिका भीममैन्दौ च श्वपतिं वानरेन्द्रौ निजघ्नतुः। संहार किया, अङ्गद और जाम्बवान् तथा अन्य वानरोंने अङ्गदो जाम्बवांश्चाथ हरयोऽन्यान्निशाचरान् ॥ ७० दूसरे निशाचरोंका संहार किया। नरेश्वर! युद्धमें लगे हुए श्रीरामचन्द्रजीने भी संग्रामभूमिमें बाणोंकी वर्षा करनेवाले युध्यमानस्तु समरे महालक्षं महाचलम्। महालक्ष और महाचल नामक राक्षसोंको मौतके घाट जघान रामोऽथ रणे बाणवृष्टिकं नृप ॥ ७१ उतार दिया॥ ६७-७१॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth