भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 318 में से

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पृष्ठ 239

२२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

हत्वा शीघ्रं पुनः प्राप्ताः स्वसेनामेव वानराः । बलाभिमानी राक्षसोंका भी संहार करके पुनः शीघ्रतापूर्वक एवं हतेषु सर्वेषु राक्षसेषु दशाननः ॥ ४४ अपनी सेनामें लौट आये ॥ ३७-४३ १/२ ॥ रोदमानासु तत्स्त्रीषु निर्गतः क्रोधमूर्च्छितः । इस प्रकार सब राक्षसोंके मारे जानेपर उनकी स्त्रियोंको रोदन करते देख दशानन रावण क्रोधसे द्वारे स पश्चिमे वीरो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः ॥ ४५ मूर्च्छित होकर निकला। वह प्रतापी वीर हाथमें धनुष क्वासौ रामेति च वदन् धनुष्पाणिः प्रतापवान् । ले बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ पश्चिम द्वारपर आया रथस्थः शरवर्षं च विसृजन् वानरेषु सः ॥ ४६ और बोला- 'कहाँ है वह राम ?' तथा रथपर बैठे-बैठे वानरोंपर बाणोंकी वर्षा करने लगा। उसके बाणोंसे ततस्तद्वाणछिन्नाङ्गा वानरा दुद्रुवुस्तदा। अङ्ग छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण वानर इधर-उधर पलायमानांस्तान् दृष्ट्वा वानरान् राघवस्तदा ॥ ४७ भागने लगे। उस समय वानरोंको भागते देख श्रीरामने कस्मात्तु वानरा भग्नाः किमेषां भयमागतम्। पूछा- 'वानरोंमें क्यों भगदड़ पड़ गयी है? इनपर कौन-सा भय आ पहुँचा?' ॥ ४४-४७ १/२ ॥ इति रामवचः श्रुत्वा प्राह वाक्यं विभीषणः ॥ ४८ शृणु राजन् महाबाहो रावणो निर्गतोऽधुना । श्रीरामकी बात सुनकर विभीषणने कहा- 'राजन्! महाबाहो ! सुनिये, इस समय रावण युद्धके लिये निकला तद्बाणछिन्ना हरयः पलायन्ते महामते ॥ ४९ है। महामते ! उसीके बाणोंसे क्षत-विक्षत हो वानरगण भाग रहे हैं' ॥ ४८-४९॥ इत्युक्तो राघवस्तेन धनुरुद्यम्य रोषितः । विभीषणके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने कुपित ज्याघोषतलघोषाभ्यां पूरयामास खं दिशः ॥ ५० होकर धनुष उठाया और प्रत्यञ्चाकी टंकारसे समस्त दिशाओं तथा आकाशको गुँजा दिया। तत्पश्चात् कमलनयन युयुधे रावणेनाथ रामः कमललोचनः । श्रीरामचन्द्रजी रावणसे युद्ध करने लगे और सुग्रीव, सुग्रीवो जाम्बवांश्चैव हनूमानङ्गदस्तथा ॥ ५१ जाम्बवान्, हनूमान्, अङ्गद, विभीषण, पराक्रमी लक्ष्मण विभीषणो वानराश्च लक्ष्मणश्चापि वीर्यवान् । तथा अन्यान्य महाबली वानर पहुँचकर हाथी, घोड़े उपेत्य रावणीं सेनां वर्षन्तीं सर्वसायकान् ॥ ५२ और रथोंसे युक्त रावणकी चतुरङ्गिणी सेनाको, जो हस्त्यश्वरथसंयुक्तां ते निजघ्नुर्महाबलाः । सब प्रकारके बाणोंकी वर्षा कर रही थी, मारने लगे। रामरावणयोर्युद्धमभूत् तत्रापि भीषणम् ॥ ५३ वहाँ भी श्रीराम और रावणका युद्ध बड़ा ही भयंकर हुआ। रावण जिन-जिन अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करता रावणेन विसृष्टानि शस्त्रास्त्राणि च यानि वै। था, उन सबका बाणोंद्वारा छेदन करके महाबली तानि छित्त्वाथ शस्त्रैस्तु राघवश्च महाबलः ॥ ५४ श्रीरामचन्द्रजीने एक बाणसे सारथिको तथा दस बाणोंसे शरेण सारथिं हत्वा दशभिश्च महाहयान् । उसके बड़े-बड़े घोड़ोंको धराशायी करके एक भल्ल रावणस्य धनुश्छित्त्वा भल्लेनैकेन राघवः ॥ ५५ नामक बाणद्वारा रावणके धनुषको भी काट डाला। फिर मुकुटं पञ्चदशभिश्च्छित्त्वा तन्मस्तकं पुनः। महान् पराक्रमी रामने पंद्रह बाणोंसे उसके मुकुट बेधकर सुवर्णकी पाँखवाले दस बाणोंसे उसके मस्तकोंको भी सुवर्णपुङ्खैर्दशभिः शरैर्विव्याध वीर्यवान् ॥ ५६ बेध दिया। उस समय देवताओंका मान-मर्दन करनेवाला तदा दशास्यो व्यथितो रामबाणैर्भृशं तदा। रावण श्रीरामके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो गया और विवेश मन्त्रिभिर्नीतः स्वपुरीं देवमर्दकः ॥ ५७ मन्त्रियोंद्वारा ले जाया जाकर वह अपनी पुरी लङ्काको लौट गया ॥ ५०-५७ ॥

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