संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २२७ अङ्गदः ॥ ३१ ॥ देव! अङ्गदने कहा—'देव! मुझ दूतके रहते हुए रावण संधि करे या विग्रह, दोनों ही अवस्थाओंमें उसके दसों मस्तक संधौ वा विग्रहे वापि मयि दूते दशाननी। पृथ्वीतलपर गिरकर लोटेंगे। हाँ, इतना अन्तर अवश्य होगा अक्षता वाक्षता वापि क्षितिपीठे लुठिष्यति ॥ ३२ कि संधि कर लेनेपर उसके मस्तक बिना कटे ही (आपके सामने प्रणामके लिये) गिरेंगे और विग्रह करनेपर कटकर तदा श्रीरामचन्द्रेण प्रशस्य प्रहितोऽङ्गदः । गिरेंगे।' तब श्रीरामचन्द्रजीने अङ्गदकी प्रशंसा करके उन्हें उक्तिप्रत्युक्तिचातुर्यैः पराजित्यागतो रिपुम् ॥ ३३ भेजा और वे भी वहाँ जा, वाद-प्रतिवादकी चातुरीसे शत्रुको हराकर लौट आये ॥ ३१-३३॥ राघवस्य बलं ज्ञात्वा चारैस्तदनुजस्य च। दशानन रावणने भी अपने गुप्तचरोंद्वारा श्रीरामचन्द्रजीका, वानराणां च भीतोऽपि निर्भीरिव दशाननः ॥ ३४ उनके भाई लक्ष्मणका और वानरोंका बल जानकर भयभीत होनेपर भी निडरकी भाँति लङ्कापुरीकी रक्षाके लिये लङ्कापुरस्य रक्षार्थमादिदेश स राक्षसान्। राक्षसोंको आज्ञा दी। सम्पूर्ण दिशाओंमें राक्षसोंको जानेकी आदिश्य सर्वतो दिक्षु पुत्रानाह दशाननः ॥ ३५ आज्ञा दे उसने अपने पुत्रोंसे और धूम्राक्ष तथा धूम्रपानसे भी कहा—'राक्षसो! तुम लोग नगरमें जाओ और उन दोनों धूम्राक्षं धूम्रपानं च राक्षसा यात मे पुरीम्। मनुष्य-कुमारोंको पाशसे बाँध लाओ। शत्रुओंके लिये पाशैर्बध्नीत तौ मर्त्यौ अमित्रान्तकवीर्यवान्। यमराजके समान पराक्रमी मेरा भाई कुम्भकर्ण भी इस कुम्भकर्णोऽपि मद्भ्राता तुर्यनादैः प्रबोधितः ॥ ३६ समय वाद्योंके शब्दसे जगा लिया गया है ॥ ३४-३६ ॥ इतना ही नहीं, रावणने बड़े बलवान्-बलवान् राक्षसोंको राक्षसाश्चैव संदिष्टा रावणेन महाबलाः। युद्धके लिये आदेश दिया और वे भी उसकी आज्ञा तस्याज्ञां शिरसाऽऽदाय युयुधुर्वानरैः सह ॥ ३७ शिरोधार्य कर वानरोंके साथ जूझने लगे। अपनी शक्तिभर युद्ध करते हुए करोड़ों राक्षस वानरोंके हाथ मारे गये। युध्यमाना यथाशक्त्या कोटिसंख्यास्तु राक्षसाः। और-तो-और, दशमुख रावणने जिन दूसरे-दूसरे अपार- वानरैर्निधनं प्राप्ताः पुनरन्यान् यथाऽऽदिशत् ॥ ३८ तेजस्वी राक्षसोंको पूर्वद्वारपर युद्धके लिये आदेश किया था, वे सब भी नील आदि वानरोंसे युद्ध करते हुए पूर्वद्वारे दशग्रीवो राक्षसानमितौजसः। मृत्युको प्राप्त हुए। इसके बाद रावणने दक्षिण दिशामें ते चापि युध्य हरिभिर्नीलाद्यैर्निधनं गताः ॥ ३९ लड़नेके लिये जिन राक्षसोंको नियुक्त किया था, वे भी श्रेष्ठ वानरोंद्वारा अपने अङ्गोंके विदीर्ण कर दिये जानेपर अथ दक्षिणदिग्भागे रावणेन नियोजिताः। यमलोकको चले गये। फिर पश्चिम द्वारपर जो पर्वताकार ते सर्वे वानरैर्दारितास्तु यमं गताः ॥ ४० राक्षस थे, वे भी अत्यन्त गर्वीले अङ्गदादि वानर वीरोंद्वारा यमपुरीको पहुँचा दिये गये। फिर उत्तर द्वारपर रावणके पश्चिमेऽङ्गदमुख्यैश्च वानरैरतिगर्वितैः। द्वारा ठहराये हुए क्रूर राक्षस मैन्द आदि वानरोंके हाथ राक्षसाः पर्वताकाराः प्रापिता यमसादनम् ॥ ४१ मारे जाकर धराशायी हो गये। तदनन्तर वानरगण लङ्काकी ऊँची चहारदीवारी फाँदकर उसके भीतर रहनेवाले तदुत्तरे तु दिग्भागे रावणेन निवेशिताः। पेतुस्ते राक्षसाः क्रूरा मैन्दाद्यैर्वानरैर्हताः ॥ ४२ ततो वानरसङ्घास्तु लङ्काप्राकारमुच्छ्रितम्। उत्प्लुत्याभ्यन्तरस्थांश्च राक्षसान् बलदर्पितान् ॥ ४३ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 1113 Narsingpuran_Section_9_2_Front