भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 237

२२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२ लक्ष्मणः प्राह—कातरजनमनोऽवलम्बिना किं | लक्ष्मण बोले—'भाई! कातर पुरुषोंके हृदयको दैवेन। | अवलम्बन देनेवाले भाग्य या दैवसे क्या होनेवाला है? यावल्ललाटशिखरं भ्रुकुतिर्न याति | जबतक हमारी भ्रुकुटि रोषसे तनकर ललाटके ऊपरतक यावन्न कार्मुकशिखामधिरोहति ज्या। | नहीं जाती और जबतक प्रत्यञ्चा धनुषके अग्रभागपर तावन्निशाचरपतेः पटिमानमेतु | नहीं चढ़ती, तभीतक निशाचरराज रावणका दर्प त्रिभुवनका त्रैलोक्यमूलविभुजेषु भुजेषु दर्पः ॥ २४ ॥ | मूलोच्छेदन करनेवाली उसकी भुजाओंके भरोसे बढ़ता रहे' ॥ २४ ॥ तदा लक्ष्मणः रामस्य कर्णे लगित्वा | ऐसा विचार प्रकट करके लक्ष्मणने उसी समय पितृवधवैरस्मरणे अथ तद्भक्तिवीर्यपरीक्षणाय | भगवान् श्रीरामके कानमें मुँह लगाकर कहा—'अब इस लक्षणविज्ञानायादिश्यतामङ्गदाय दूत्यम्। रामः साधु | समय इस बातकी परीक्षा तथा जानकारीके लिये कि इति भणित्वा अङ्गदं सबहुमानमवलोक्य | यह अङ्गद अपने पिता वालीके वैरजनित वधका स्मरण आदिशति ॥ २५ ॥ अङ्गद! पिता ते | करके भी आपमें कितनी भक्ति रखता है, इसमें कितना यद्द्याली बलिनि दशकण्ठे कलितवान्शक्तास्तद्वक्तुं | पराक्रम है तथा इसके अब कैसे लक्षण (रंग-ढंग) हैं, वयमपि मुदा तेन पुलकः। | आप अङ्गदको पुनः दूतकर्म करनेका आदेश दीजिये।' स एव त्वं व्यावर्तयसि तनुजत्वेन पितृतां | श्रीरामचन्द्रजी 'बहुत अच्छा' कहकर अङ्गदकी ओर ततः किं वक्तव्यं तिलकयति सृष्टार्थपदवीम् ॥ २६ ॥ | बड़े आदरसे देखकर उन्हें आदेश देने लगे—'अङ्गद! अङ्गदो मौलिमण्डलमिलत्करयुगलेन प्रणम्य | तुम्हारे पिता वालीने दशकण्ठ रावणके प्रति जो पुरुषार्थ यदाज्ञापयति देवः। अवधार्यताम् ॥ २७ ॥ | किया था, उसका हम भी वर्णन नहीं कर सकते। उसकी किं प्राकारविहारतोरणवतीं लङ्कामिहैवानये | याद आते ही हर्षके कारण हमारे शरीरमें रोमाञ्च हो आता किं वा सैन्यमहं द्रुतं रघुपते तत्रैव सम्पादये। | है। वही वाली आज तुम्हारे रूपमें प्रकट है। तुम पुत्ररूपमें अत्यल्पं कुलपर्वतैरविरलैर्बध्नामि वा सागरं | उत्पन्न हो, अपने पुरुषार्थसे पिताको भी पीछे छोड़ रहे देवादेशय किं करोमि सकलं दोर्दण्डसाध्यं मम ॥ २८ ॥ | हो; अतः तुम्हारे विषयमें क्या कहना है। तुम पुत्र- श्रीरामस्तद्वचनमात्रेणैव तद्भक्तिं सामर्थ्यं | पदवीको मस्तकका तिलक बना रहे हो' ॥ २५-२६ ॥ चावेक्ष्य वदति ॥ २९ ॥ | अङ्गदने अपने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़ भगवान्को अज्ञानादथवाधिपत्यरभसा वास्मत्परोक्षे हृता | प्रणाम करके कहा—'जैसी आज्ञा; भगवान् इधर ध्यान सीतेयं प्रविमुच्यतामिति वचो गत्वा दशास्यं वद। | दें। रघुपते! क्या मैं चहारदीवारी, विहार-स्थल और नो चेल्लक्ष्मणमुक्तमार्गणगणच्छेदोच्छलच्छोणित- | नगरद्वारसहित लङ्कापुरीको यहीं उठा लाऊँ? या अपनी छत्रच्छन्नदिगन्तमन्तकपुरीं पुत्रैर्वृतो यास्यसि ॥ ३० ॥ | सारी सेनाको ही उस पुरीमें आक्रमणके लिये पहुँचा दूँ? अथवा इस अत्यन्त तुच्छ सागरको अविरल कुलाचलोंद्वारा पाट दूँ? भगवन्! आज्ञा दीजिये, क्या करूँ? मेरे भुज- दण्डोंद्वारा सब कुछ सिद्ध हो सकता है' ॥ २७-२८ ॥ भगवान् रामने अङ्गदके कथनसे ही उनकी भक्ति और शक्तिका अनुमान लगाकर कहा—'वीर! तुम दशमुख रावणके पास जाकर कहो—'रावण! तुम अज्ञानसे या प्रभुत्वके अभिमानमें आकर हम लोगोंके पीठ-पीछे चोरकी भाँति जिस सीताको ले गये हो, उसे छोड़ दो; नहीं तो लक्ष्मणके छोड़े हुए बाणोंद्वारा बेधे जाकर छलकते हुए रक्तकी धाराओंसे छत्रकी भाँति दिगन्तको आच्छादित करके तुम अपने पुत्रोंके साथ ही यमपुरीको प्रस्थान करोगे' ॥ २९-३० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 113 Narsingpuran_Section_9_1_Back