संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २२५ सुप्ते रामे गतं तत्र त्रिरात्रममितद्युतौ। तटपर धरना देते हुए लेट गये। अपार कान्तिमान् भगवान् ततः क्रुद्धो जगन्नाथो रामो राजीवलोचनः ॥ ९१ श्रीरामको वहाँ लेटे-लेटे तीन रातें बीत गयीं; तब कमलनयन जगदीश्वर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा ही क्रोध हुआ और संशोषणमपां कर्तुमस्त्रमाग्नेयमाददे। उन्होंने समुद्रके जलको सुखा डालनेके लिये हाथमें तदोत्थाय वचः प्राह लक्ष्मणश्च रुषान्वितम् ॥ ९२ अग्निबाण धारण किया। यह देख लक्ष्मणजी तत्काल उठे और क्रुद्ध हुए भगवान् रामसे यों बोले— ॥ ९—१२ ॥ क्रोधस्ते लयकर्ता हि एनं जहि महामते। 'महामते ! आपका क्रोध तो समस्त ब्रह्माण्डका भूतानां रक्षणार्थाय अवतारस्त्वया कृतः ॥ १३ प्रलय करनेवाला है, इस समय इस कोपको दबा दें; क्योंकि आपने प्राणियोंकी रक्षाके लिये अवतार धारण क्षन्तव्यं देवदेवेश इत्युक्त्वा धृतवान् शरम्। किया है। देवदेव ! आप क्षमा करें',—यों कहकर ततो रात्रित्रये याते क्रुद्धं राममवेक्ष्य सः ॥ १४ उन्होंने श्रीरामके उस बाणको पकड़ लिया। इधर तीन रात बीत जानेपर श्रीरामचन्द्रजीको कुपित देख, उनके आग्नेयास्त्राच्च संत्रस्तः सागरोऽभ्येत्य मूर्तिमान्। अग्निबाणसे भयभीत हो, समुद्र मनुष्यरूप धारणकर आह रामं महादेवं रक्ष मामपकारिणम् ॥ १५ उनके निकट आया और महान् देवता भगवान् श्रीरामसे बोला—'भगवन् ! मुझ अपराधीकी रक्षा कीजिये। रघुनन्दन ! मार्गो दत्तो मया तेऽद्य कुशलः सेतुकर्मणि। अब मैंने आपको जानेका मार्ग दे दिया। आपकी सेनामें नलश्च कथितो वीरस्तेन कारय राघव ॥ १६ वीरवर नल पुल बनानेमें निपुण कहे गये हैं। उनके द्वारा आपको जितना बड़ा अभीष्ट हो, उतने ही बड़े उत्तम यावदिष्टं तु विस्तीर्णं सेतुबन्धनमुत्तमम्। पुलका निर्माण करा लीजिये' ॥ १३—१६ १/२ ॥ ततो नलमुखैर्नानावनैरमितौजसैः ॥ १७ तब भगवान् रामने नल आदि अन्य अमित-तेजस्वी बन्धयित्वा महासेतुं तेन गत्वा स राघवः। वानरोंद्वारा बहुत बड़ा पुल बनवाया और उसीके द्वारा सुवेलाख्यं गिरिं प्राप्तः स्थितोऽसौ वानरैर्वृतः ॥ १८ समुद्रके पार जा, सुवेल नामक पर्वतपर पहुँचकर वहीं वानरोंके साथ डेरा डाल दिया। वहाँसे अङ्गदने देखा— हर्म्यस्थलस्थितं दुष्टं रावणं वीक्ष्य चाङ्गदः। 'दुष्ट रावण महलकी अट्टालिकापर बैठा हुआ है।' उसे रामादेशादथोत्प्लुत्य दूतकर्मसु तत्परः ॥ १९ देखते ही वे भगवान् श्रीरामकी आज्ञा ले, दूत-कार्यमें संलग्न हो, उछलकर रावणके पास जा पहुँचे। जाते ही प्रादात्पादप्रहारं तु रोषाद्रावणमूर्धनि। उन्होंने रोषपूर्वक रावणके मस्तकपर लात मारी। उस विस्मितं तैः सुरगणैर्वीक्षितः सोऽतिवीर्यवान् ॥ २० समय देवताओंने महान् पराक्रमी अङ्गदजीकी ओर बड़े विस्मयके साथ देखा। इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञा पूरी साधयित्वा प्रतिज्ञां तां सुवेलं पुनरागतः। करके वे पुनः सुवेल पर्वतपर चले आये। तदनन्तर प्रतापी ततो वानरसेनाभिः संख्यातीताभिरच्युतः ॥ २१ भगवान् श्रीरामने असंख्य वानर-सेनाओंके द्वारा रावणकी पुरी लङ्काको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १७—२१ १/२ ॥ रुरोध रावणपुरीं लङ्कां तत्र प्रतापवान्। तब श्रीरामने चारों ओर देख लक्ष्मणको पास बुलाकर रामः समन्तादालोक्य प्राह लक्ष्मणमन्तिके ॥ २२ कहा—'भाई ! हम लोगोंने समुद्र तो पार कर लिया तथा कपिराज सुग्रीवके सैनिकोंने राक्षसोंकी राजधानी लङ्काको तीर्णोऽर्णवः कवलितेव कपीश्वरस्य आनन-फाननमें अपना ग्रास-सा बना लिया है। पुरुषार्थसे सेनाभटैर्झटिति राक्षसराजधानीम्। जो कुछ सिद्ध होनेके योग्य था, उसका अङ्कुर तो हमने यत्पौरुषोचितमिहाङ्कुरितं मया तद् उत्पन्न कर दिया; अब आगे जो कुछ होना है, वह भाग्य दैवस्य वश्यमपरं धनुषोऽथ वास्य ॥ २३ अथवा इस धनुषके अधीन है' ॥ २२-२३ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 1113 Narsingpuran_Section_9_1_Front