संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२ बावनवाँ अध्याय श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और उन्हें लङ्काके राज्यकी प्राप्ति; समुद्रका श्रीरामको मार्ग देना; पुलद्वारा समुद्र पार करके वानरसेनासहित श्रीरामका सुवेल पर्वतपर पड़ाव डालना; अङ्गदका प्रभाव; लक्ष्मणकी प्रेरणासे श्रीरामका अङ्गदकी प्रशंसा करना; अङ्गदके वीरोचित उद्गार और दौत्यकर्म; वानर वीरोंद्वारा राक्षसोंका संहार; रावणका श्रीरामके द्वारा युद्धमें पराजित होना, कुम्भकर्णका वध; अतिकाय आदि राक्षस वीरोंका मारा जाना; मेघनादका पराक्रम और वध; रावणकी शक्तिसे मूर्च्छित लक्ष्मणका हनुमान्जीके द्वारा पुनर्जीवन; राम-रावण-युद्ध; रावण-वध; देवताओंद्वारा श्रीरामकी स्तुति; सीताके साथ अयोध्यामें आनेपर श्रीरामका राज्याभिषेक और अन्तमें पुरवासियोंसहित उनका परमधामगमन
मार्कण्डेय उवाच इति श्रुत्वा प्रियावार्तां वायुपुत्रेण कीर्तिताम्। रामो गत्वा समुद्रान्तं वानरैः सह विस्तृतैः॥ १ सागरस्य तटे रम्ये तालीवनविराजिते। सुग्रीवो जाम्बवांश्चाथ वानरैरतिहर्षितैः॥ २ संख्यातीतैर्वृतः श्रीमान् नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः। अनुजेन च धीरेण वीक्ष्य तस्थौ सरित्पतिम्॥ ३ रावणेनाथ लङ्कायां स सूक्तौ भर्त्सतोऽनुजः। विभीषणो महाबुद्धिः शास्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिः सह॥ ४ नरसिंहे महादेवे श्रीधरे भक्तवत्सले। एवं रामेऽचलां भक्तिमागत्य विनयात्तदा॥ ५ कृताञ्जलिरुवाचेदं राममक्लिष्टकारिणम्। राम राम महाबाहो देवदेव जनार्दन॥ ६ विभीषणोऽस्मि मां रक्ष अहं ते शरणं गतः। इत्युक्त्वा निपपाताथ प्राञ्जली रामपादयोः॥ ७ विदितार्थोऽथ रामस्तु तमुत्थाप्य महामतिम्। समुद्रतोयैस्तं वीरमभिषिच्य विभीषणम्॥ ८ लङ्काराज्यं तवैवेति प्रोक्तः सम्भाष्य तस्थिवान्। ततो विभीषणेनोक्तं त्वं विष्णुर्भुवनेश्वरः॥ ९ अब्धिर्ददातु मार्गं ते देव तं याचयामहे। इत्युक्तो वानरैः सार्धं शिश्ये तत्र स राघवः॥ १०
मार्कण्डेयजी बोले—वायुनन्दन हनुमान्जीके द्वारा कथित प्रिया जानकीका वृत्तान्त सुन लेनेके पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी विशाल वानरसेनाके साथ समुद्रके निकट गये। साथ ही सुग्रीव और जाम्बवान् भी तालवनसे सुशोभित सागरके सुरम्य तटपर जा पहुँचे। अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे पूर्ण उन असंख्य वानरोंसे घिरे हुए श्रीमान् भगवान् राम नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे। अपने धीर-वीर अनुज लक्ष्मणजीके साथ समुद्रकी विशालताका अवलोकन करते हुए वे उसके तटपर ठहर गये। इधर लङ्कामें रावणने [राक्षसकुलके हितके लिये] अच्छी बात कहनेपर भी अपने छोटे भाई महाबुद्धिमान् विभीषणको बहुत फटकारा। तब वे अपने शास्त्रज्ञ मन्त्रियोंके साथ महान् देवता भक्तवत्सल लक्ष्मीपतिके अवतार नरश्रेष्ठ श्रीराममें अविचल भक्ति रखते हुए उनके निकट आये और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले उन भगवान् श्रीरामसे हाथ जोड़ विनयपूर्वक यों बोले—'महाबाहो श्रीराम! देवदेव जनार्दन! मैं [रावणका भाई] विभीषण हूँ, आपकी शरणमें आया हूँ; मेरी रक्षा कीजिये'—यों कहकर हाथ जोड़े हुए वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें गिर पड़े। उनका अभिप्राय जानकर भगवान् श्रीरामने उन महाबुद्धिमान् वीर विभीषणको उठाया और समुद्रके जलसे उनका राज्याभिषेक करके कहा—'अब लङ्काका राज्य तुम्हारा ही होगा।' श्रीरामके यों कहनेपर विभीषण उनके साथ बातचीत करके वहीं खड़े रहे॥ १–८ १/२ ॥ तब विभीषणने कहा—'प्रभो! आप जगत्पति भगवान् विष्णु हैं। देव! ऐसी चेष्टा करें कि समुद्र ही आपको जानेका मार्ग दे दे। हम सब लोग उससे प्रार्थना करें।' उनके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी वानरोंके साथ समुद्रके