भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 318 में से

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पृष्ठ 234

अध्याय ५१ ] हनुमान्‌जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २२३ राक्षसीभिः परिवृता त्वां स्मरन्ती च सर्वदा। उन्हें राक्षसियाँ घेरे हुए थीं और वे बहुत दुःखी होकर अश्रुपूर्णमुखी दीना तव पत्नी वरानना ॥ ५२ निरन्तर आपका ही स्मरण कर रही थीं। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी और वे बड़ी दीन अवस्थामें शीलवृत्तसमायुक्ता तत्रापि जनकात्मजा। थीं। रघुनन्दन ! आपकी धर्मपत्नी सुमुखी सीता वहाँ भी सर्वत्रान्वेषमाणेन मया दृष्टा पतिव्रता ॥ ५३ शील और सदाचारसे सम्पन्न हैं। मैंने सब जगह ढूँढ़ते हुए पतिव्रता जानकीको अशोकवनमें पाया, उनसे वार्तालाप मया सम्भाषिता सीता विश्वस्ता रघुनन्दन । किया और उन्होंने भी मेरा विश्वास किया। प्रभो! उन्होंने अलङ्कारश्च सुमणिस्तया ते प्रेषितः प्रभो ॥ ५४ आपको देनेके लिये अपना श्रेष्ठ मणिमय अलङ्कार भेजा है' ॥ ४८-५४ ॥ इत्युक्त्वा दत्तवांस्तस्मै चूडामणिमनुत्तमम्। यह कहकर हनुमान्‌जीने भगवान् श्रीरामको वह इदं च वचनं तुभ्यं पत्न्या सम्प्रेषितं शृणु ॥ ५५ उत्तम चूड़ामणि दे दी और कहा- 'प्रभो! आपकी धर्मपत्नी श्रीसीताजीने यह संदेश भी कहला भेजा है, चित्रकूट मदङ्के तु सुप्ते त्वयि महाव्रत। सुनिये—'महान् व्रतका पालन करनेवाले महाराज ! चित्रकूट वायसाभिभवं राजंस्तत्किल स्मर्तुमर्हसि ॥ ५६ पर्वतपर जब आप मेरी गोदमें [सिर रखकर] सो गये थे, उस समय काकवेषधारी जयन्तका जो आपने मान- अल्पापराधे राजेन्द्र त्वया बलिभुजि प्रभो। मर्दन किया था, उसे स्मरण करें। राजेन्द्र ! प्रभो ! उस यत्कृतं तन्न कर्तुं च शक्यं देवासुरैरपि ॥ ५७ कौएके थोड़े-से ही अपराधपर उसे दण्ड देनेके लिये आपने जो अद्भुत कर्म किया था, उसे देवता और असुर ब्रह्मास्त्रं तु तदोत्सृष्टं रावणं किं न जेष्यसि । भी नहीं कर सकते। उस समय तो आपने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया था? क्या इस समय इस रावणको पराजित इत्येवमादि बहुशः प्रोक्त्वा सीता रुरोद ह। नहीं करेंगे?' इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर सीताजी एवं तु दुःखिता सीता तां मोक्तुं यत्नमाचर ॥ ५८ रोने लगी थीं। यह है दुःखिनी सीताका वृत्तान्त ! आप उन्हें उस दुःखसे मुक्त करनेका प्रयत्न कीजिये।' पवनकुमार इत्येवमुक्ते पवनात्मजेन हनुमान्‌जीके इस प्रकार कहनेपर सीताजीका वह संदेश सीतावचस्तच्छुभभूषणं च। सुन और उनके उस सुन्दर आभूषणको देख, भगवान् श्रुत्वा च दृष्ट्वा च रुरोद रामः श्रीराम उन कपिवर हनुमान्‌जीको गलेसे लगाकर रोने कपिं समालिङ्गय शनैः प्रतस्थे ॥ ५९ लगे और धीरे-धीरे वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ५५-५९॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारकी कथाविषयक' इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥