संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५१
जपतो रामरामेति सागरो गोष्पदायते। | गड्ढेको लाँघ जाय। जो 'राम-राम' का जप करता दुःखमग्नासि वैदेहि स्थिरा भव शुभानने॥ ४० | है, उसके लिये समुद्र गौके खुरके चिह्नके समान हो | जाता है। शुभानने वैदेहि ! आप दुःखमग्ना दिखायी देती क्षिप्रं पश्यसि रामं त्वं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते। | हैं, अब धैर्य धारण कीजिये। मैं आपसे सत्य-सत्य कह इत्याश्वास्य सतीं सीतां दुःखितां जनकात्मजाम्॥ ४१ | रहा हूँ, आप बहुत शीघ्र श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करेंगी।' | इस प्रकार दुःखमें डूबी हुई पतिव्रता जनकनन्दिनी ततश्चूडामणिं प्राप्य श्रुत्वा काकपराभवम्। | सीताको आश्वासन दे, उनसे पहचानके लिये चूड़ामणि नत्वा तां प्रस्थितो वीरो गन्तुं कृतमतिः कपिः॥ ४२ | पाकर और श्रीरामके प्रभावसे काकरूपी जयन्तके | पराभवकी कथा सुनकर, वहाँसे चल देनेका विचार ततो विमृश्य तद्भङ्क्त्वा क्रीडावनमशेषतः। | करके हनुमान्जीने सीताको नमस्कार करनेके पश्चात् तोरणस्थो ननादोच्चै रामो जयति वीर्यवान्॥ ४३ | प्रस्थान किया॥ ३८-४२॥ | तत्पश्चात् कुछ सोचकर पराक्रमी हनुमान्जीने रावणके अनेकान् राक्षसान् हत्वा सेनाः सेनापतींश्च सः। | उस सम्पूर्ण क्रीडावन (अशोकवाटिका)-को नष्ट-भ्रष्ट कर तदा त्वक्षकुमारं तु हत्वा रावणसैनिकम्॥ ४४ | डाला और वनके द्वारपर स्थित हो, उच्चस्वरसे सिंहनाद | करते हुए बोले—'भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो!' फिर साश्वं ससारथिं हत्वा इन्द्रजित्तं गृहीतवान्। | तो युद्धके लिये सामने आये हुए अनेक राक्षसोंको मारकर रावणस्य पुरः स्थित्वा रामं संकीर्त्य लक्ष्मणम्॥ ४५ | सेना और सेनापतियोंका संहार किया। इसके बाद रावणके | सेनापति अक्षकुमारको अश्व तथा सारथिसहित यमलोक सुग्रीवं च महावीर्यं दग्ध्वा लङ्कामशेषतः। | पहुँचा दिया। इसपर रावणपुत्र इन्द्रजित्ने वरके प्रभावसे उन्हें निर्भर्त्स्य रावणं दुष्टं पुनः सम्भाष्य जानकीम्॥ ४६ | बंदी बना लिया। इसके बाद वे रावणके सम्मुख उपस्थित | किये गये। वहाँसे छूटकर उन्होंने श्रीराम, लक्ष्मण और भूयः सागरमुत्तीर्य ज्ञातीनासाद्य वीर्यवान्। | महाबली सुग्रीवके यशका कीर्तन करते हुए सम्पूर्ण लङ्कापुरीको सीतादर्शनमावेद्य हनूमांश्चैव पूजितः॥ ४७ | जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर दुष्टात्मा रावणको डाँट | बताकर पुनः सीताजीसे वार्तालाप किया। फिर पराक्रमी वानरैः सार्धमागत्य हनुमान्मधुवनं महत्। | हनूमान्जी समुद्रके इस पार आकर अपने वानर बन्धुओंसे निहत्य रक्षपालांस्तु पाययित्वा च तन्मधु॥ ४८ | मिले और सीताजीके दर्शनका समाचार सुनाकर सबसे | सम्मानित हुए॥ ४३-४७॥ सर्वे दधिमुखं पात्य हर्षितो हरिभिः सह। | तत्पश्चात् हनुमान्जी सभी वानरोंके साथ मधुवनमें आये। खमुत्पत्य च सम्प्राप्य रामलक्ष्मणपादयोः॥ ४९ | उसके रखवालोंको मारकर उन्होंने वहाँ सब साथियोंको | मधु-पान कराया और स्वयं भी पीया। इस कार्यमें बाधा नत्वा तु हनुमांस्तत्र सुग्रीवं च विशेषतः। | देनेवाले दधिमुख नामके वानरको सबने धरतीपर दे मारा। आदितः सर्वमावेद्य समुद्रतरणादिकम्॥ ५० | इसके बाद हनुमान्जी सब वानरोंके साथ आनन्दित हो, | आकाशमें उछलते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके निकट जा कथयामास रामाय सीता दृष्टा मयेति वै। | पहुँचे। वहाँ उन दोनोंके चरणोंमें प्रणाम कर, विशेषतः अशोकवनिकामध्ये सीता देवी सुदुःखिता॥ ५१ | सुग्रीवको मस्तक झुकाकर उन्होंने समुद्र लाँघनेसे लेकर | सारा समाचार आद्योपान्त सुनाया और यह भी कहा कि | 'मैंने अशोक-वाटिकाके भीतर सीतादेवीका दर्शन किया।
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