संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५१ ] हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २२१
तथेत्युक्तो भर्त्सितश्च राक्षसीराह राक्षसः। द्विमासाभ्यन्तरे चैनां वशीकुरुत मानुषीम्॥ २५ यदि नेच्छति मां सीता ततः खादत मानुषीम्। इत्युक्त्वा गतवान् दुष्टो रावणः स्वं निकेतनम्॥ २६ ततो भयेन तां प्राहू राक्षस्यो जनकात्मजाम्। रावणं भज कल्याणि सधनं सुखिनी भव॥ २७ इत्युक्ता प्राह ताः सीता राघवोऽलघुविक्रमः। निहत्य रावणं युद्धे सगणं मां नयिष्यति॥ २८ नाहमन्यस्य भार्या स्यामृते रामं रघूत्तमम्। स ह्यागत्य दशग्रीवं हत्वा मां पालयिष्यति॥ २९ इत्याकर्ण्य वचस्तस्या राक्षस्यो ददृशुर्भयम्। हन्यतां हन्यतामेषा भक्ष्यतां भक्ष्यतामियम्॥ ३० ततस्तास्त्रिजटा प्राह स्वप्ने दृष्टमनिन्दिता। शृणुध्वं दुष्टराक्षस्यो रावणस्य विनाशनः॥ ३१ रक्षोभिः सह सर्वैस्तु रावणस्य मृतिप्रदः। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा रामस्य विजयप्रदः॥ ३२ स्वप्नः शुभो मया दृष्टः सीतायाश्च पतिप्रदः। त्रिजटावाक्यमाकर्ण्य सीतापाश्र्वं विसृज्य ताः॥ ३३ राक्षस्यस्ता ययुः सर्वाः सीतामाहाञ्जनीसुतः। कीर्तयन् रामवृत्तान्तं सकलं पवनात्मजः॥ ३४ तस्यां विश्वासमानीय दत्त्वा रामाङ्गुलीयकम्। सम्भाष्य लक्षणं सर्वं रामलक्ष्मणयोस्ततः॥ ३५ महत्या सेनया युक्तः सुग्रीवः कपिनायकः। तेन सार्धमिहागत्य रामस्तव पतिः प्रभुः॥ ३६ लक्ष्मणश्च महावीरो देवरस्ते शुभानने। रावणं सगणं हत्वा त्वामितोऽदाय गच्छति॥ ३७ इत्युक्ते सा तु विश्वस्ता वायुपुत्रमथाब्रवीत्। कथमत्रागतो वीर त्वमुत्तीर्य महोदधिम्॥ ३८ इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः पुनस्तामाह वानरः। गोष्पदवन्मयोत्तीर्णः समुद्रोऽयं वरानने॥ ३९
सीताजीका यह उत्तर और फटकार पाकर राक्षसराज रावणने राक्षसियोंसे कहा—'तुम लोग इस मानव-कन्याको दो महीनेके भीतर समझाकर मेरे वशीभूत कर दो। यदि इतने दिनोंतक इसका मन मेरी ओर न झुके तो इस मानुषीको तुम खा डालना।' यों कहकर दुष्ट रावण अपने महलमें चला गया। तब रावणके डरसे डरी हुई राक्षसियोंने जनकनन्दिनी सीतासे कहा—'कल्याणि! रावण बहुत धनी है, इसे स्वीकार कर लो और सुखसे रहो।' राक्षसियोंके यों कहनेपर सीताने उनसे कहा—'महापराक्रमी भगवान् श्रीराम युद्धमें रावणको उसके सेवकगणोंसहित मारकर मुझे ले जायँगे। मैं रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके सिवा दूसरेकी भार्या नहीं हो सकती। वे ही आकर रावणको मारकर मेरी रक्षा करेंगे'॥ २५-२९॥
सीताकी यह बात सुनकर राक्षसियोंने उन्हें भय दिखाते हुए कहा—'अरी! इसे मार डालो, मार डालो; खा जाओ, खा जाओ।' उन राक्षसियोंमें एकका नाम त्रिजटा था। वह उत्तम विचार रखनेवाली-साध्वी स्त्री थी। उसने उन सभी राक्षसियोंको स्वप्नमें देखी हुई बात बतायी। वह बोली—'अरी दुष्टा राक्षस्यो! सुनो; मैंने एक शुभ स्वप्न देखा है, जो रावणके लिये विनाशकारी है, समस्त राक्षसोंके साथ रावणको मौतके मुँहमें डालनेवाला है, भ्राता लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीकी विजयका सूचक है और सीताको पतिसे मिलानेवाला है।' त्रिजटाकी बात सुनकर वे सभी राक्षसियाँ सीताके पाससे हटकर दूर चली गयीं। तब अञ्जनीनन्दन हनुमान्जीने अपनेको सीताके सामने प्रकट किया और 'श्रीराम-नाम' का कीर्तन करते हुए उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण वृत्तान्तका उनके समक्ष वर्णन किया। इस प्रकार सीताके मनमें विश्वास उत्पन्न करके उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी अँगूठी दी। फिर उनसे श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरके लक्षण बताये और कहा—'सुमुखि! वानरोंके राजा सुग्रीव बहुत बड़ी सेनाके स्वामी हैं। उन्हींके साथ आपके पतिदेव भगवान् श्रीरामचन्द्रजी तथा आपके देवर महावीर लक्ष्मणजी यहाँ पधारेंगे और रावणको सेनासहित मारकर आपको यहाँसे ले जायँगे'॥ ३०-३७॥
हनुमान्जीके यह कहनेपर सीताजीका उनपर विश्वास हो गया। वे बोलीं—'वीर! तुम किस तरह महासागरको पार करके यहाँ चले आये?' उनका यह वचन सुनकर हनुमान्जीने पुनः उनसे कहा—'वरानने! मैं इस समुद्रको उसी प्रकार लाँघ गया, जैसे कोई गौके खुरसे बने हुए
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