भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 318 में से

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पृष्ठ 231

२२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५१


[संस्कृत श्लोक]

उत्पतंश्च वने वीरः सिंहिकास्यं महाकपिः। आस्यप्रान्तं प्रविश्याथ वेगेनान्तर्विनिस्सृतः॥ ९

निस्सृत्य गतवाञ्शीघ्रं वायुपुत्रः प्रतापवान्। लङ्घयित्वा तु तं देशं सागरं पवनात्मजः॥ १०

त्रिकूटशिखरे रम्ये वृक्षाग्रे निपपात ह। तस्मिन् स पर्वतश्रेष्ठे दिनं नीत्वा दिनक्षये॥ ११

संध्यामुपास्य हनुमान् रात्रौ लङ्कां शनैर्निशि। लङ्काभिधां विनिर्जित्य देवतां प्रविवेश ह॥ १२

लङ्कामनेकरत्नाढ्यां बह्वाश्चर्यसमन्विताम्। राक्षसेषु प्रसुप्तेषु नीतिमान् पवनात्मजः॥ १३

रावणस्य ततो वेश्म प्रविवेशाथ ऋद्धिमत्। शयानं रावणं दृष्ट्वा तल्पे महति वानरः॥ १४

नासापुटैर्घोरकारैर्विंशद्भिर्वायुमोचकैः । तथैव दशभिर्वक्त्रैर्दंष्ट्रोपेतैस्तु संयुतम्॥ १५

स्त्रीसहस्रैस्तु दृष्ट्वा तं नानाभरणभूषितम्। तस्मिन् सीतामदृष्ट्वा तु रावणस्य गृहे शुभे॥ १६

तथा शयानं स्वगृहे राक्षसानां च नायकम्। दुःखितो वायुपुत्रस्तु सम्पातेर्वचनं स्मरन्॥ १७

अशोकवनिकां प्राप्तो नानापुष्पसमन्विताम्। जुष्टां मलयजातेन चन्दनेन सुगन्धिना॥ १८

प्रविश्य शिंशपावृक्षमाश्रितां जनकात्मजाम्। रामपत्नीं समद्राक्षीद् राक्षसीभिः सुरक्षिताम्॥ १९

अशोकवृक्षमारुह्य पुष्पितं मधुपल्लवम्। आसांचक्रे हरिरस्तत्र सेयं सीतेति संस्मरन्॥ २०

सीतां निरीक्ष्य वृक्षाग्रे यावदास्तेऽनिलात्मजः। स्त्रीभिः परिवृतस्तत्र रावणस्तावदागतः॥ २१

आगत्य सीतां प्राहार्थ प्रिये मां भज कामुकम्। भूषिता भव वैदेहि त्यज रामगतं मनः॥ २२

इत्येवं भाषमाणं तमन्तर्धाय तृणं ततः। प्राह वाक्यं शनैः सीता कम्पमन्नाथ रावणम्॥ २३

गच्छ रावण दुष्ट त्वं परदारपरायण। अचिराद्रामबाणास्ते पिबन्तु रुधिरं रणे॥ २४


[हिन्दी अनुवाद]

मार्गमें सिंहिका नामकी राक्षसी थी। उसने जलमें मुँह फैला रखा था। महाकपि हनुमान्‌जी उसके मुँहमें जा पड़े। मुँहमें पड़ते ही वे वेगपूर्वक उसके भीतर घुसकर पुनः बाहर निकल आये। इस प्रकार सिंहिकाके मुखसे निकलकर प्रतापी पवनकुमार उस समुद्र-प्रदेशको लाँघते हुए त्रिकूट पर्वतके सुरम्य शिखरपर एक महान् वृक्षके ऊपर जा उतरे। उसी उत्तम पर्वतपर दिन बिताकर हनुमान्‌जीने वहीं सायंकालकी संध्योपासना की। फिर रातमें धीरे-धीरे वे लङ्काकी ओर चले। मार्गमें मिली हुई ‘लङ्का’ नामकी नगर-देवताको जीतकर उन्होंने नाना रत्नोंसे सम्पन्न और अनेक प्रकारके आश्चर्योंसे युक्त लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ ७-१२ १/२॥

तदनन्तर जब सब राक्षस गहरी नींदमें सो गये, तब नीतिज्ञ हनुमान्‌जीने रावणके समृद्धिशाली भवनमें प्रवेश किया। वहाँ रावण एक बहुत बड़े पलंगपर सो रहा था। हनुमान्‌जीने देखा—साँस छोड़नेवाले बीस भयंकर नासिका-छिद्रोंसे युक्त उसके दसों मुखोंमें बड़ी भयानक दाढ़ें थीं। नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित रावण हजारों स्त्रियोंके साथ वहाँ सोया था। किंतु रावणके उस सुन्दर भवनमें सीताजी कहीं नहीं दिखायी दीं। वह राक्षसराज अपने घरके भीतर गाढ़ निद्रामें सो रहा था। सीताजीका दर्शन न होनेसे वायुनन्दन हनुमान्‌जी बहुत दुःखी हुए। फिर सम्पातिके कथनको याद करके वे अशोकवाटिकाforegroundमें आये, जो विविध प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित और अत्यन्त सुगन्धित मलयज-चन्दनसे व्याप्त थी॥ १३-१८॥

वाटिकामें प्रवेश करके हनुमान्‌जीने अशोकवृक्षके नीचे बैठी हुई जनकनन्दिनी श्रीरामपत्नी सीताको देखा, जो राक्षसियोंसे सुरक्षित थीं। वह अशोकवृक्ष सुन्दर मृदुल पल्लवोंसे विलसित और पुष्पोंसे सुशोभित था। कपिवर हनुमान्‌जी उस वृक्षपर चढ़ गये और ‘ये ही सीता हैं’—यह सोचते हुए वहीं बैठ गये। सीताजीका दर्शन करके वे पवनकुमार ज्यों ही वृक्षके शिखरपर बैठे, त्यों ही रावण बहुत-सी स्त्रियोंसे घिरा हुआ वहाँ आया। आकर उसने सीतासे कहा—‘प्रिये! मैं कामपीड़ित हूँ, मुझे स्वीकार करो। वैदेहि! अब शृङ्गार धारण करो और श्रीरामकी ओरसे मन हटा लो।' इस प्रकार कहते हुए रावणसे भयवश काँपती हुई सीताजी बीचमें तिनकेकी ओट रखकर धीरे-धीरे बोलीं—'परस्त्रीसेवी दुष्ट रावण! तू चला जा। मैं शाप देती हूँ—भगवान् श्रीरामके बाण शीघ्र ही रणभूमिमें तुम्हारा रक्त पीयें'॥ १९-२४॥

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