संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५१ ] हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २१९ रामप्रयुक्तश्च पुनः स्वभर्तॄणा फिर अपने स्वामी सुग्रीवने भी आदेश दिया था, इसके पुनर्महेन्द्रे कपिभिश्च नोदितः । बाद महेन्द्रपर्वतपर उन वानरोंने भी उन्हें प्रेरित किया, गन्तुं प्रचक्रे मतिमञ्जनीसुतः अतः अञ्जनीकुमार हनुमान्जीने समुद्र लाँघकर निशाचरपुरी समुद्रमुत्तीर्य निशाचरालयम् ॥ १६७ ॥ लङ्कामें जानेका निश्चय कर लिया ॥ १६४-१६७॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारकी कथाविषयक' पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥ इक्यावनवाँ अध्याय हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन करके श्रीरामको समाचार देना मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले- हनुमान्जीने रावणद्वारा हरी गयी सीताकी खोज करने तथा उनके स्थानका पता स तु रावणनीतायाः सीतायाः परिमार्गणम् । लगानेके लिये चारणोंके मार्ग (आकाश)-से जानेकी इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि ॥ १ इच्छा की। पूर्वाभिमुख हो, हाथ जोड़कर उन्होंने देवगणोंसहित आत्मयोनि ब्रह्माजीको मन-ही-मन प्रणाम अञ्जलिं प्राङ्मुखं कृत्वा सगणायात्मयोनये । किया तथा श्रीराम और महारथी लक्ष्मणको भी मनसे मनसाऽऽवन्द्य रामं च लक्ष्मणं च महारथम् ॥ २ ही प्रणाम करके सागर तथा सरिताओंको मस्तक नवाया। फिर अपने वानर-बन्धुओंको गले लगाकर उन सबकी सागरं सरितश्चैव प्रणम्य शिरसा कपिः । प्रदक्षिणा की। तब अन्य सब वानरोंने यह आशीर्वाद ज्ञातींश्चैव परिष्वज्य कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम् ॥ ३ दिया- 'वीर ! तुम (सकुशल) लौट आनेके लिये पवित्र वायुसे सेवित मार्गपर बिना विघ्न-बाधाके जाओ।' यों अरिष्टं गच्छ पन्थानं पुण्यवायुनिषेवितम् । कहकर उन्होंने हनुमान्जीका सम्मान किया। फिर पराक्रमी पुनरागमानायेति वानरैरभिपूजितः ॥ ४ पवनकुमार अपनी सहज शक्तिको प्राप्त हुए-उनमें वायुके सदृश बलका आवेश हो गया। दूरतकके मार्गका अञ्जसा स्वं तथा वीर्यमाविवेशाथ वीर्यवान् । अवलोकन करते हुए उन्होंने ऊपर दृष्टि डाली। अपने- मार्गमालोकयन् दूरादूर्ध्वं प्रणिहितेक्षणः ॥ ५ आपमें षड्विध ऐश्वर्यकी पूर्णताका-सा अनुभव करते हुए वे महाबली हनुमान् महेन्द्र पर्वतको पैरोंसे दबाकर सम्पूर्णमिव चात्मानं भावयित्वा महाबलः । उसके शिखरसे आकाशकी ओर उछले ॥ १-६॥ उत्पात गिरेः शृङ्गान्निष्पीड्य गिरिमम्बरम् ॥ ६ बुद्धिमान् वायुपुत्र हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीके कार्य- साधनमें तत्पर हो जब अपने पिता वायुके मार्गसे चले पितुर्मार्गेण यातस्य वायुपुत्रस्य धीमतः । जा रहे थे, उस समय उनको थोड़ी देरतक विश्राम देनेके रामकार्यपरस्यास्य सागरेण प्रचोदितः ॥ ७ लिये, समुद्रद्वारा प्रेरित हो, मैनाक पर्वत पानीसे बाहर ऊपरकी ओर उठ गया। उसे देख उन्होंने वहाँ थोड़ा- विश्रामार्थं समुत्तस्थौ मैनाको लवणोदधेः । सा रुककर उससे आदरपूर्वक बातचीत की और फिर तं निरीक्ष्य निपीड्याथ रयात्सम्भाष्य सादरम् ॥ ८ उसे अपने वेगसे दबाकर उछलते हुए वे दूर चले गये। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth