भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 318 में से

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पृष्ठ 229

२१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० सीतां दृष्ट्वा स लङ्कायामशोकाख्ये महावने। सीताको देखकर बताया—'सीताजी लङ्कामें अशोकवनके स्थितेति कथितं तेन जटायुस्तु मृतस्तव ॥ १५५ भीतर ठहरी हुई हैं।' तब वानरोंने कहा—'आपके भ्राता जटायुने सीताजीकी रक्षाके लिये ही प्राणत्याग किया है।' भ्रातेति चोचुः स स्नात्वा दत्त्वा तस्योदकाञ्जलिम्। यह सुनकर महामति सम्पातिने स्नान करके जटायुको योगमास्थाय स्वं देहं विससर्ज महामतिः ॥ १५६ जलाञ्जलि दी और योगधारणाका आश्रय ले अपने शरीरको त्याग दिया॥ १५२—१५६॥ ततस्तं वानरा दग्ध्वा दत्त्वा तस्योदकाञ्जलिम्। तदनन्तर वानरोंने सम्पातिके शवका दाह-संस्कार किया गत्वा महेन्द्रशृङ्गं ते समारुह्य क्षणं स्थिताः ॥ १५७ और उन्हें जलाञ्जलि दे, महेन्द्रपर्वतपर जाकर तथा उसके शिखरपर आरूढ़ हो, क्षणभर खड़े रहे। फिर समुद्रकी सागरं वीक्ष्य ते सर्वे परस्परमथाब्रुवन्। ओर देख वे सभी परस्पर कहने लगे—'रावणने ही भगवान् रावणेनैव भार्या सा नीता रामस्य निश्चितम् ॥ १५८ श्रीरामकी भार्या सीताका अपहरण किया है, यह बात निश्चित हो गयी। सम्पातिके वचनसे आज सब बातें ठीक- सम्पातिवचनादद्य संज्ञातं सकलं हि तत्। ठीक ज्ञात हो गयीं। शोभाशाली वानरो! अब आप सब वानराणां तु कश्चात्र उत्तीर्य लवणोदधिम् ॥ १५९ लोग सोचकर बतायें कि यहाँ वानरोंमें कौन ऐसा वीर है, जो इस क्षार समुद्रके पार जा लङ्कामें घुसे और परम लङ्कां प्रविश्य दृष्ट्वा तां रामपत्नीं यशस्विनीम्। यशस्विनी श्रीरामपत्नी सीताजीका दर्शन करके पुनः समुद्रके पुनश्चोदधितरणे शक्तिं ब्रूत हि शोभनाः ॥ १६० पार लौट आनेमें समर्थ हो सके'॥ १५७—१६०॥ वानरोंकी यह बात सुनकर जाम्बवान्ने कहा—'समुद्रको इत्युक्तो जाम्बवान् प्राह सर्वे शक्तास्तु वानराः। पार करनेमें तो सभी वानर समर्थ हैं, परंतु यह कार्य एक सागरोत्तरणे किंतु कार्यमन्यस्य सम्भवेत् ॥ १६१ अन्यतम वानरसे ही सिद्ध होगा। मेरे विचारमें तो यह आता है कि इस कार्यको सिद्ध करनेमें केवल हनूमान्‌जी तत्र दक्षोऽयमेवात्र हनूमानिति मे मतिः। ही समर्थ हैं। अब समय नहीं खोना चाहिये। हमारे कालक्षेपो न कर्तव्यो मासार्धमधिकं गतम् ॥ १६२ लौटनेकी जो नियत अवधि थी। उससे पंद्रह दिन अधिक बीत गये हैं। वानरेन्द्रगण! यदि हमलोग सीताको यद्यदृष्ट्वा तु गच्छामो वैदेहीं वानरर्षभाः। देखे बिना ही लौट जायँगे तो कपिराज सुग्रीव हमारी नाक कर्णनासादि नः स्वाङ्गं निकृन्तति कपीश्वरः ॥ १६३ और कान काट लेंगे। इसलिये मेरी राय यह है कि हम सब लोग इस कार्यके लिये वायुनन्दन हनुमान्‌जीसे ही तस्मात्प्रार्थ्यः स चास्माभिर्वायुपुत्रस्तु मे मतिः। प्रार्थना करें'॥ १६१—१६३१/२ ॥ इत्युक्तास्ते तथेत्यूचुर्वानरा वृद्धवानरम् ॥ १६४ यह सुनकर उन वानरोंने वृद्ध जाम्बवान्‌जीसे कहा, 'अच्छा, ऐसा ही हो।' तत्पश्चात् वे सभी वानर कार्यसाधनमें ततस्ते प्रार्थयामासुर्वानराः पवनात्मजम्। विशेष कुशल महाबुद्धिमान् पवननन्दन हनूमान्‌जीसे प्रार्थना हनूमन्तं महाप्राज्ञं दक्षं कार्येषु चाधिकम् ॥ १६५ करने लगे—'अञ्जनीनन्दन! आप श्रीरामचन्द्रजीके प्रिय सेवक हैं। आप ही रावणको भय देनेके लिये लङ्कामें गच्छ त्वं रामभृत्यस्त्वं रावणस्य भयाय च। जायँ और हमारे वानरवृन्दकी रक्षा करें।' वानरोंके यों रक्षस्व वानरकुलमस्माकमञ्जनीसुत। कहनेपर पवनकुमार हनुमान्‌जीने 'तथास्तु' कहकर उनकी इत्युक्तस्तांस्तथेत्याह वानरान् पवनात्मजः ॥ १६६ प्रार्थना स्वीकार की। एक तो श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा थी, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth