संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१७ इत्युक्ते जाम्बवानाह तां सिद्धां सुमहामतिः । | उसकी बात सुनकर महामति जाम्बवान्ने उस सिद्धा सुग्रीवस्य वयं भृत्या आगता ह्यत्र शोभने ॥ १४१ | तपस्विनीसे कहा—'शोभने! पापहीने! हम सुग्रीवके भृत्य | हैं, श्रीरामचन्द्रजीकी भार्या सीताकी खोज करनेके लिये यहाँ रामभार्यार्थमनघे सीतान्वेषणकर्मणि । | आये हैं। हम किस दिशाको जायँ, इसका ज्ञान हमें नहीं कां दिग्भूता निराहारा अदृष्ट्वा जनकात्मजाम् ॥ १४२ | रह गया है। सीताजीका पता न पानेके कारण अभीतक हमने | कुछ भोजन भी नहीं किया' ॥ १४१-१४२ ॥ इत्युक्ते जाम्बवत्यत्र पुनस्तानाह सा शुभा। | जाम्बवान्के यों कहनेपर उस कल्याणी तपस्विनीने जानामि रामं सीतां च लक्ष्मणं च कपीश्वरम् ॥ १४३ | पुनः उन वानरोंसे कहा—'मैं श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और | कपिराज सुग्रीवको भी जानती हूँ। वानरेन्द्रगण! आप लोग भुञ्जीध्वमत्र मे दत्तमाहारं च कपीश्वराः । | यहाँ मेरा दिया हुआ आहार ग्रहण करें। आप लोग रामकार्यगतास्त्वत्र यूयं रामसमा मम ॥ १४४ | श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे यहाँ आये हैं, अतः हमारे लिये | श्रीरामचन्द्रजीके समान ही आदरणीय हैं।' यों कहकर इत्युक्त्वा चामृतं तेषां योगाद्दत्त्वा तपस्विनी । | उस तपस्विनीने अपने योगबलसे उन वानरोंको अमृतमय भोजयित्वा यथाकामं भूयस्तानाह तापसी ॥ १४५ | मधुर पदार्थ अर्पित किया तथा यथेष्ट भोजन कराकर पुनः | उनसे कहा—'सीताका स्थान पक्षिराज सम्पातिको ज्ञात है। सीतास्थानं तु जानाति सम्पातिर्नाम पक्षिराट् । | वे इसी वनमें महेन्द्रपर्वतपर रहते हैं। वानरगण! आप आस्थितो वै वने सोऽपि महेन्द्रे पर्वते द्विजः ॥ १४६ | लोग इसी मार्गसे वहाँ पहुँच जायँगे। सम्पाति बहुत मार्गेणानेन हरयस्तत्र यूयं गमिष्यथ । | दूरतक देखनेवाले हैं, अतः वे सीताका पता बता देंगे। स वक्ति सीतां सम्पातिर्दूरदर्शी तु यः खगः ॥ १४७ | उनके बताये हुए मार्गसे आप लोग पुनः आगे जाइयेगा। | जनकनन्दिनी सीताको ये पवनकुमार हनुमान्जी अवश्य तेनादिष्टं तु पन्थानं पुनरासाद्य गच्छथ। | देख लेंगे' ॥ १४३–१४८॥ अवश्यं जानकीं सीतां द्रक्ष्यते पवनात्मजः ॥ १४८ | तयैवमुक्ताः कपयः परां प्रीतिमुपागताः । | उसके इस प्रकार कहनेपर वानरगण बहुत ही प्रसन्न हृष्टास्तेजनमापन्नास्तां प्रणम्य प्रतस्थिरे ॥ १४९ | हुए; उन्हें बड़ा उत्साह मिला। फिर वे उस तपस्विनीको | प्रणाम करके वहाँसे प्रस्थित हुए। सम्पातिको देखनेकी महेन्द्राद्रिं गता वीरा वानरास्तद्दिदृक्षया । | इच्छासे वे वीर कपीश्वर महेन्द्रपर्वतपर गये तथा वहाँ बैठे तत्र सम्पातिमासीनं दृष्टवन्तः कपीश्वराः ॥ १५० | हुए सम्पातिको उन्होंने देखा। तब पक्षिराज सम्पातिने वहाँ | आये हुए वानरोंसे कहा—'आप लोग कौन हैं? किसके तानुवाचाथ सम्पातिर्वानरानागतान्द्विजः । | दूत हैं? कहाँसे आये हैं? शीघ्र बतायें' ॥ १४९–१५१ ॥ के यूयमिति सम्प्राप्ताः कस्य वा ब्रूत मा चिरम् ॥ १५१ | | सम्पातिके यों पूछनेपर वानरोंने सारा समाचार यथार्थरूपसे इत्युक्ते वानरा ऊचुर्यथावृत्तमनुक्रमात् । | क्रमशः बताना आरम्भ किया—'पक्षिराज! हम सब रामदूता वयं सर्वे सीतान्वेषणकर्मणि ॥ १५२ | श्रीरामचन्द्रजीके दूत हैं। कपिराज महात्मा सुग्रीवने हमें | सीताजीकी खोजके लिये भेजा है। पक्षिवर! एक सिद्धाके प्रेषिताः कपिराजेन सुग्रीवेण महात्मना । | कहनेसे हम आपका दर्शन करनेके लिये यहाँ आये हैं। त्वां द्रष्टुमिह सम्प्राप्ताः सिद्धाया वचनाद्विज ॥ १५३ | महामते! महाभाग! सीताके स्थानका पता आप हमें बता सीतास्थानं महाभाग त्वं नो वद महामते। | दें।' वानरोंके इस तरह अनुरोध करनेपर गृध्र सम्पातिने इत्युक्तो वानरैः श्येनो वीक्षांचक्रे सुदक्षिणाम् ॥ १५४ | अपनी दृष्टि दक्षिण दिशाकी ओर दौड़ायी और पतिव्रता In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth