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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पहला अध्याय

ॐ नमो भगवते श्रीनृसिंहाय नमः श्रीनरसिंहपुराण पहला अध्याय प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न; सूतजीद्वारा कथारम्भ और सृष्टिक्रमका वर्णन

॥ श्रीलक्ष्मीनृसिंहाय नमः ॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ तप्तहाटककेशान्तज्वलत्पावकलोचन । वज्राधिकनखस्पर्श दिव्यसिंह नमोऽस्तु ते॥ २ पान्तु वो नरसिंहस्य नखलाङ्गूलकोटयः। हिरण्यकशिपोर्वक्षःक्षेत्रासृक्कर्दमारुणाः ॥ ३ हिमवद्द्वासिनः सर्वे मुनयो वेदपारगाः। त्रिकालज्ञा महात्मानो नैमिषारण्यवासिनः ॥ ४ येऽर्बुदारण्यनिरताः पुष्करारण्यवासिनः। महेन्द्राद्रिरता ये च ये च विन्ध्यनिवासिनः ॥ ५ धर्मारण्यरता ये च दण्डकारण्यवासिनः। श्रीशैलनिरता ये च कुरुक्षेत्रनिवासिनः॥ ६ कौमारपर्वते ये च ये च पम्पानिवासिनः। एते चान्ये च बहवः सशिष्या मुनयोऽमलाः॥ ७ माघमासे प्रयागं तु स्नातुं तीर्थं समागताः। तत्र स्नात्वा यथान्यायं कृत्वा कर्म जपादिकम् ॥ ८

अन्तर्यामी भगवान् नारायण ( श्रीकृष्ण) उनके सखा नरश्रेष्ठ नर (अर्जुन) तथा इनकी लीला प्रकट करनेवाली सरस्वती देवीको नमस्कार करनेके पश्चात् 'जय' (इतिहास-पुराण)-का पाठ करे ॥ १ ॥ दिव्य सिंह ! तपाये हुए सुवर्णके समान पीले केशोंके भीतर प्रज्वलित अग्निकी भाँति आपके नेत्र देदीप्यमान हो रहे हैं तथा आपके नखोंका स्पर्श वज्रसे भी अधिक कठोर है, इस प्रकार अमित प्रभावशाली आप परमेश्वरको मेरा नमस्कार है। भगवान् नृसिंहके नखरूपी हलके अग्रभाग, जो हिरण्यकशिपु नामक दैत्यके वक्षःस्थलरूपी खेतकी रक्तमयी कीचड़के लगनेसे लाल हो गये हैं, आप लोगोंकी रक्षा करें ॥ २-३ ॥ एक समय हिमालयकी घाटियोंमें रहनेवाले, वेदोंके पारगामी एवं त्रिकालवेत्ता समस्त महात्मा मुनिगण नैमिषारण्य, अर्बुदारण्य और पुष्करारण्यके निवासी मुनि, महेन्द्र पर्वत और विन्ध्यगिरिके निवासी ऋषि, धर्मारण्य, दण्डकारण्य, श्रीशैल और कुरुक्षेत्रमें वास करनेवाले मुनि तथा कुमार पर्वत एवं पम्पासरके निवासी ऋषि—ये तथा अन्य भी बहुत-से शुद्ध हृदयवाले महर्षिगण अपने शिष्योंके साथ माघके महीनेमें स्नान करनेके लिये प्रयाग-तीर्थमें आये ॥ ४-७१/२ ॥ वहाँपर यथोचित रीतिसे स्नान और जप आदि करके

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८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १

८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १ नत्वा तु माधवं देवं कृत्वा च पितृतर्पणम्। उन्होंने भगवान् वेणीमाधवको नमस्कार किया; फिर पितरोंका दृष्ट्वा तत्र भरद्वाजं पुण्यतीर्थनिवासिनम्॥ ९ तर्पण करके उस पावन तीर्थके निवासी भरद्वाज मुनिका तं पूजयित्वा विधिवत्तेनैव च सुपूजिताः। दर्शन किया। वहाँ उन ऋषियोंने भरद्वाजजीका भलीभाँति आसनेषु विचित्रेषु वृष्यादिषु यथाक्रमम्॥ १० पूजन किया और स्वयं भी भरद्वाजजीके द्वारा पूजित हुए। भरद्वाजेन दत्तेषु आसीनास्ते तपोधनाः। तत्पश्चात् वे सभी तपोधन भरद्वाज मुनिके दिये हुए वृषी* कृष्णाश्रिताः कथाः सर्वे परस्परमथाब्रुवन् ॥ ११ आदि विचित्र आसनोंपर विराजमान हुए और परस्पर भगवान् श्रीकृष्णसे सम्बन्ध रखनेवाली कथाएँ कहने लगे। उन कथान्तेषु ततस्तेषां मुनीनां भावितात्मनाम्। शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंकी कथा हो ही रही थी कि आजगाम महातेजास्तत्र सूतो महामतिः ॥ १२ व्यासजीके शिष्य लोमहर्षण नामक सूतजी वहाँ आ पहुँचे। व्यासशिष्यः पुराणज्ञो लोमहर्षणसंज्ञकः। वे अत्यन्त तेजस्वी, परम बुद्धिमान् और पुराणोंके विद्वान् तान् प्रणम्य यथान्यायं स च तैश्चाभिपूजितः ॥ १३ थे। सूतजीने वहाँ बैठे हुए सभी ऋषियोंको यथोचित विधिसे प्रणाम किया और स्वयं भी उनके द्वारा सम्मानित हुए। उपविष्टो यथायोग्यं भरद्वाजमतेन सः। फिर भरद्वाजजीकी अनुमतिसे वे यथायोग्य आसनपर बैठे। व्यासशिष्यं सुखासीनं ततस्तं लोमहर्षणम्। इस प्रकार जब वे सुखपूर्वक विराजमान हुए, तब उस स पप्रच्छ भरद्वाजो मुनीनामग्रतस्तदा॥ १४ समय उन व्यासशिष्य लोमहर्षणजीसे भरद्वाजजीने सभी मुनियोंके समक्ष यह प्रश्न किया ॥ ८-१४॥ भरद्वाज उवाच भरद्वाजजी बोले- सूतजी! पूर्वकालमें शौनकजीके शौनकस्य महासत्रे वाराहाख्या तु संहिता। महान् यज्ञमें हम सभी लोगोंने आपसे 'वाराह-संहिता' त्वत्तः श्रुता पुरा सूत एतैरस्माभिरेव च॥ १५ सुनी थी। अब हम 'नरसिंहपुराण' की संहिता सुनना साम्प्रतं नारसिंहाख्यां त्वत्तः पौराणसंहिताम्। चाहते हैं तथा ये ऋषि लोग भी उसे ही सुननेके लिये श्रोतुमिच्छाम्यहं सूत श्रोतुकामा इमे स्थिताः ॥ १६ यहाँ उपस्थित हैं। अतः महामुने सूतजी! आज प्रातःकाल अतस्त्वां परिपृच्छामि प्रश्नमेतं महामुने। इन महात्मा मुनियोंके समक्ष हम आपसे ये प्रश्न पूछते ऋषीणामग्रतः सूत प्रातर्ह्येषां महात्मनाम् ॥ १७ हैं- 'यह चराचर जगत् कहाँसे उत्पन्न हुआ है? कौन इसकी कुत एतत् समुत्पन्नं केन वा परिपाल्यते। रक्षा करता है? अथवा किसमें इसका लय होता है? कस्मिन् वा लयमध्येति जगदेतच्चराचरम् ॥ १८ महाभाग! इस भूमिकामान क्या है तथा महामते! किं प्रमाणं च वै भूमेर्नृसिंहः केन तुष्यति। भगवान् नृसिंह किस कर्मसे संतुष्ट होते हैं- यह हमें कर्मणा तु महाभाग तन्मे ब्रूहि महामते ॥ १९ बताइये। सृष्टिका आरम्भ कैसे हुआ? उसका अवसान कथं च सृष्टेरादिः स्यादवसानं कथं भवेत्। (अन्त) किस प्रकार होता है? युगोंकी गणना कैसे होती कथं युगस्य गणना किं वा स्यात्तु चतुर्युगम् ॥ २० है? चतुर्युगका स्वरूप क्या है? उन चारों युगोंमें क्या अन्तर होता है? कलियुगमें लोगोंकी क्या अवस्था होती को वा विशेषस्तेष्वत्र का वावस्था कलौ युगे। है? तथा देवतालोग भगवान् नरसिंहकी किस प्रकार कथमाराध्यते देवो नरसिंहोऽप्यमानुषैः ॥ २१ आराधना करते हैं? पुण्यक्षेत्र कौन-कौन हैं? पावन क्षेत्राणि कानि पुण्यानि के च पुण्याः शिलोच्चयाः। पर्वत कौन-से हैं? और मनुष्योंके पापोंको हर लेनेवाली नद्यश्च काः पराः पुण्या नृणां पापहराः शुभाः ॥ २२ परम पावन एवं उत्तम नदियाँ कौन-कौन-सी हैं?

  • व्रतपरायण पुरुषके लिये कुशका बना हुआ एक विशेष प्रकारका आसन। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय १ ] प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न ९ देवादीनां कथं सृष्टिर्मनोर्मन्वन्तरस्य तु। देवताओंकी सृष्टि कैसे हुई? मनु, मन्वन्तर एवं विद्याधर तथा विद्याधरादीनां सृष्टिरादौ कथं भवेत्॥ २३ आदिकी सृष्टि किस प्रकार होती है? कौन-कौन राजा यज्ञ करनेवाले हुए हैं और किस-किसने परम उत्तम यज्वानः के च राजानः के च सिद्धिं परां गताः। सिद्धि प्राप्त की है?' महाभाग! ये सारी बातें आप एतत्सर्वं महाभाग कथयस्व यथाक्रमम्॥ २४ क्रमशः बताइये ॥ १५-२४॥ सूत उवाच सूतजी बोले-तपोधनो! मैं जिन गुरुदेव व्यासजीके व्यासप्रसादाज्जानामि पुराणानि तपोधनाः। प्रसादसे पुराणोंका ज्ञान प्राप्त कर सका हूँ, उनकी भक्तिपूर्वक वन्दना करके आपलोगोंसे नरसिंहपुराणकी तं प्रणम्य प्रवक्ष्यामि पुराणं नारसिंहकम्॥ २५ कथा कहना आरम्भ करता हूँ। जो समस्त देवताओंके पाराशर्यं परमपुरुषं विश्वदेवैकयोनिं एकमात्र कारण और वेदों तथा उनके छहों अङ्गोंद्वारा जाननेयोग्य परम पुरुष विष्णुके स्वरूप हैं; जो विद्यावान्, विद्यावन्तं विपुलमतिदं वेदवेदाङ्गवेद्यम्। विमल बुद्धिदाता, नित्य शान्त, विषयकामनाशून्य और शश्वच्छान्तं शमितविषयं शुद्धतेजो विशालं पापरहित हैं, उन विशुद्ध तेजोमय महात्मा पराशरनन्दन वेदव्यासं विगतशमलं सर्वदाहं नमामि॥ २६ वेदव्यासजीको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। उन अमित नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे। तेजस्वी भगवान् व्यासजीको नमस्कार है, जिनकी कृपासे मैं भगवान् वासुदेवकी इस कथाको कह सकूँगा। यस्य प्रसादाद्वक्ष्यामि वासुदेवकथामिमाम्॥ २७ मुनिगण! आपलोगोंने भलीभाँति विचार करके मुझसे सुनिर्णीतो महान् प्रश्नस्त्वया यः परिकीर्तितः। जो महान् प्रश्न पूछे हैं, उनका उत्तर भगवान् विष्णुकी विष्णुप्रसादेन विना वक्तुं केनापि शक्यते ॥ २८ कृपा हुए बिना कौन बतला सकता है? तथापि भरद्वाजजी! भगवान् नरसिंहकी कृपाके बलसे ही आपके प्रश्नोंके तथापि नरसिंहस्य प्रसादादेव तेऽधुना। उत्तरमें अत्यन्त पवित्र नरसिंहपुराणकी कथा आरम्भ प्रवक्ष्यामि महापुण्यं भारद्वाज शृणुष्व मे॥ २९ करता हूँ। आप ध्यानसे सुनें। अपने शिष्योंके साथ जो- जो मुनि यहाँ उपस्थित हैं, वे सब लोग भी सावधान शृण्वन्तु मुनयः सर्वे सशिश्यास्त्वत्र ये स्थिताः। होकर सुनें। मैं सभीको यथावत् रूपसे नरसिंहपुराणकी पुराणं नरसिंहस्य प्रवक्ष्यामि यथातथा॥ ३० कथा सुनाता हूँ॥ २५-३०॥ नारायणादिदं सर्वं समुत्पन्नं चराचरम्। यह समस्त चराचर जगत् भगवान् नारायणसे ही तेनैव पाल्यते सर्वं नरसिंहादिमूर्तिभिः ॥ ३१ उत्पन्न हुआ और वे ही नरसिंहादि रूपोंसे सबका पालन करते हैं। इसी प्रकार अन्तमें यह जगत् उन्हीं ज्योतिःस्वरूप तथैव लीयते चान्ते हरौ ज्योतिःस्वरूपिणि। भगवान् विष्णुमें लीन हो जाता है। भगवान् जिस प्रकार यथैव देवः सृजति तथा वक्ष्यामि तच्छृणु॥ ३२ सृष्टि करते हैं, उसे मैं बतलाता हूँ, आप सुनें। सृष्टिकी कथा पुराणोंमें ही विस्तारके साथ वर्णित है, अतः पुराणानां हि सर्वेषामयं साधारणः स्मृतः। पुराणोंका लक्षण बतानेके लिये यह एक श्लोक साधारणतया श्लोको यस्तं मुने श्रुत्वा निःशेषं त्वं ततः शृणु॥ ३३ सभी पुराणोंमें कहा गया है। मुने! इस श्लोकको पहले सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। सुनकर फिर सारी बातें सुनियेगा। यह श्लोक इस प्रकार है-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित- वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ ३४ इन्हीं पाँच लक्षणोंसे युक्त 'पुराण' होता है। आदिसर्ग, आदिसर्गोऽनुसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। अनुसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित-इन सबका वंशानुचरितं चैव वक्ष्याम्यनुसमासतः ॥ ३५ मैं क्रमशः संक्षेपस्वरूपसे वर्णन करता हूँ॥ ३१-३५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

१० श्रीमन्नरसिंहपुराण [ अध्याय १

१० श्रीमन्नरसिंहपुराण [ अध्याय १ आदिसर्गो महांस्तावत् कथयिष्यामि वै द्विजाः। द्विजगण! आदिसर्ग महान् है, अतः पहले मैं यस्मादारभ्य देवानां राज्ञां चरितमेव च॥ ३६ उसीका वर्णन करता हूँ। वहाँसे सृष्टिका वर्णन आरम्भ करनेपर देवताओं और राजाओंके चरित्रोंका तथा ज्ञायते सरहस्यं च परमात्मा सनातनः। सनातन परमात्माके तत्त्वका भी रहस्यसहित ज्ञान हो प्राक्सृष्टेः प्रलयादूर्ध्वं नासीत् किंचिद्द्विजोत्तम॥ ३७ जाता है। द्विजोत्तम! सृष्टिके पहले महाप्रलय होनेके बाद (परब्रह्मके सिवा) कुछ भी शेष नहीं था। उस ब्रह्मसंज्ञमभूदेकं ज्योतिष्मत्सर्वकारणम्। समय एकमात्र 'ब्रह्म' नामक तत्त्व ही विद्यमान था, नित्यं निरञ्जनं शान्तं निर्गुणं नित्यनिर्मलम्॥ ३८ जो परम प्रकाशमय और सबका कारण है। वह नित्य, निरञ्जन, शान्त, निर्गुण एवं सदा ही दोषरहित है। मुमुक्षु आनन्दसागरं स्वच्छं यं काङ्क्षन्ति मुमुक्षवः। पुरुष विशुद्ध आनन्द-महासागर परमेश्वरकी अभिलाषा सर्वज्ञं ज्ञानरूपत्वादनन्तमजमव्ययम्॥ ३९ किया करते हैं। वह ज्ञानस्वरूप होनेके कारण सर्वज्ञ, अनन्त, अजन्मा और अव्यय (अविकारी) है। सृष्टि- सर्गकाले तु सम्प्राप्ते ज्ञात्वाऽसौ ज्ञातृनायकः। रचनाका समय आनेपर उसी ज्ञानीश्वर परब्रह्मने जगत्‌को अन्तर्लीनं विकारं च तत्तत्स्रष्टुमुपचक्रमे॥ ४० अपनेमें लीन जानकर पुनः उसकी सृष्टि आरम्भ की॥ ३६—४०॥ तस्मात् प्रधानमुद्भूतं ततश्चापि महानभूत्। उस ब्रह्मसे प्रधान (मूलप्रकृति)-का आविर्भाव सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान्॥ ४१ हुआ। प्रधानसे महत्तत्त्व प्रकट हुआ। सात्त्विक, राजस और तामस-भेदसे महत्तत्त्व तीन प्रकारका है। महत्तत्त्वसे वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः। वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) और भूतादिरूप त्रिविधोऽयमहंकारो महत्तत्त्वादजायत॥ ४२ (तामस)—इन तीन भेदोंसे युक्त अहंकार उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार प्रधानसे महत्तत्त्व आवृत है, उसी प्रकार यथा प्रधानं हि महान् महता स तथाऽऽवृतः। महत्तत्त्वसे अहंकार भी व्याप्त है। तदनन्तर 'भूतादि' भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दतन्मात्रकं ततः॥ ४३ नामक तामस अहंकारने विकृत होकर शब्दतन्मात्राकी सृष्टि की और उससे 'शब्द' गुणवाला आकाश उत्पन्न ससर्ज शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दलक्षणम्। हुआ। तब उस भूतादिने शब्द गुणवाले आकाशको शब्दमात्रं तथाऽऽकाशं भूतादिः स समावृणोत्॥ ४४ आवृत किया। आकाशने भी विकृत होकर स्पर्शतन्मात्राकी सृष्टि की। उससे बलवान् वायुकी उत्पत्ति हुई। वायुका आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह। गुण स्पर्श माना गया है। फिर शब्द गुणवाले आकाशने बलवानभवद्वायुस्तस्य स्पर्शो गुणो मतः॥ ४५ 'स्पर्श' गुणवाले वायुको आवृत किया। तत्पश्चात् वायुने विकृत होकर रूपतन्मात्राकी सृष्टि की। उससे आकाशं शब्दतन्मात्रं स्पर्शमात्रं तथाऽऽवृणोत्। ज्योतिर्मय अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। ज्योतिका गुण 'रूप' ततो वायुर्विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह॥ ४६ कहा गया है। फिर स्पर्शतन्मात्रारूप वायुने रूपतन्मात्रावाले तेजको आवृत किया। तब तेजने विकृत होकर रस- ज्योतिरुत्पद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते। तन्मात्राकी सृष्टि की। उससे रस गुणवाला जल प्रकट स्पर्शमात्रं तु वै वायू रूपमात्रं समावृणोत्॥ ४७ ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह। सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि तु॥ ४८

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अध्याय १ ] प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न ११ रसमात्राणि चाम्भांसि रूपमात्रं समावृणोत्। हुआ। रूप गुणवाले तेजने रस गुणवाले जलको आवृत विकुर्वाणानि चाम्भांसि गन्धमात्रं ससर्जिरे ॥ ४९ किया। तब जलने विकारको प्राप्त होकर गन्ध- तन्मात्राकी सृष्टि की। उससे यह पृथिवी उत्पन्न हुई तस्माज्जाता मही चेयं सर्वभूतगुणाधिका। जो आकाशादि सभी भूतोंके गुणोंसे युक्त होनेके कारण संघातो जायते तस्मात्तस्य गन्धगुणो मतः ॥ ५० उनसे अधिक गुणवाली है। गन्धतन्मात्रारूप पार्थिवतत्त्वसे ही स्थूल पिण्डकी उत्पत्ति होती है। पृथिवीका गुण तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रा तेन तन्मात्रता स्मृता। 'गन्ध' है। उन-उन आकाशादि भूतोंमें तन्मात्राएँ हैं तन्मात्राण्यविशेषाणि विशेषाः क्रमशोपराः ॥ ५१ अर्थात् केवल उनके गुण शब्द आदि ही हैं। इसलिये वे तन्मात्रा (गुण) रूप ही कहे गये हैं। तन्मात्राएँ भूततन्मात्रसर्गोऽयमहंकारात्तु तामसात्। अविशेष कही गयी हैं; क्योंकि उनमें 'अमुक तन्मात्रा कीर्तितस्ते समासेन भरद्वाज मया तव ॥ ५२ आकाशकी है और अमुक वायुकी' इसका ज्ञान करानेवाला कोई विशेष भेद (अन्तर) नहीं होता। किंतु तैजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवा वैकारिका दश। उन तन्मात्राओंसे प्रकट हुए आकाशादि भूत क्रमशः एकादशं मनश्चात्र कीर्तितं तत्र चिन्तकैः ॥ ५३ विशेष (भेद)-युक्त होते हैं। इसलिये उनकी 'विशेष' संज्ञा है। भरद्वाजजी ! तामस अहंकारसे होनेवाली यह बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चात्र पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च। पञ्चभूतों और तन्मात्राओंकी सृष्टि मैंने आपसे थोड़ेमें तानि वक्ष्यामि तेषां च कर्माणि कुलपावन ॥ ५४ कह दी ॥ ४१-५२ ॥ सृष्टि-तत्त्वपर विचार करनेवाले विद्वानोंने इन्द्रियोंको श्रवणे च दृशौ जिह्वा नासिका त्वक् च पञ्चमी। तैजस अहंकारसे उत्पन्न बतलाया है और उनके अभिमानी शब्दादिज्ञानसिद्ध्यर्थं बुद्धियुक्तानि पञ्च वै ॥ ५५ दस देवताओं तथा ग्यारहवें मनको वैकारिक अहंकारसे उत्पन्न कहा है। कुलको पवित्र करनेवाले भरद्वाजजी ! पायूपस्थे हस्तपादौ वाग् भरद्वाज पञ्चमी। इन इन्द्रियोंमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। विसर्गानन्दशिल्पी च गत्युक्ती कर्म तत्स्मृतम् ॥ ५६ अब मैं उन सम्पूर्ण इन्द्रियों तथा उनके कर्मोंका वर्णन कर रहा हूँ। कान, नेत्र, जिह्वा, नाक और पाँचवीं आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा। त्वचा-ये पाँच 'ज्ञानेन्द्रियाँ' कही गयी हैं, जो शब्द शब्दादिभिर्गुणैर्विप्र संयुक्तान्युत्तरोत्तरैः ॥ ५७ आदि विषयोंका ज्ञान करानेके लिये हैं। तथा पायु (गुदा), उपस्थ (लिङ्ग), हाथ, पाँव और वाक्-इन्द्रिय- नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहतिं विना। ये 'कर्मेन्द्रियाँ' कहलाती हैं। विसर्ग (मल-त्याग), नाशक्नुवन् प्रजां स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥ ५८ आनन्द (मैथुनजनित सुख), शिल्प (हाथकी कला), गमन और बोलना-ये ही क्रमशः इन कर्मेन्द्रियोंके समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्परसमाश्रयात्। पाँच कर्म कहे गये हैं ॥ ५३-५६ ॥ एकसंघातलक्ष्याश्च सम्प्राप्यैक्यमशेषतः ॥ ५९ विप्र ! आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी-ये पाँच भूत क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-इन पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च प्रधानानुग्रहेण च। गुणोंसे उत्तरोत्तर युक्त हैं, अर्थात् आकाशमें एकमात्र महदाद्या विशेषांखास्त्वण्डमुत्पादयन्ति ते ॥ ६० शब्द गुण है, वायुमें शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, तेजमें शब्द, स्पर्श और रूप तीन गुण हैं, इसी प्रकार जलमें चार और पृथिवीमें पाँच गुण हैं। ये पञ्चभूत अलग- अलग भिन्न-भिन्न प्रकारकी शक्तियोंसे युक्त हैं। अतः परस्पर पूर्णतया मिले बिना ये सृष्टि-रचना नहीं कर सके। तब एक ही संघातको उत्पन्न करना जिनका लक्ष्य है, उन महत्तत्त्वसे लेकर पञ्चभूतपर्यन्त सभी विकारोंने पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण परस्पर मिलकर In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २

१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २ तत्क्रमेण विवृद्धं तु जलबुद्बुद्वत् स्थितम्। भूतेभ्योऽण्डं महाबुद्धे बृहत्तदुदकेशयम्॥ ६१ प्राकृतं ब्रह्मरूपस्य विष्णोः स्थानमनुत्तमम्। तत्राव्यक्तस्वरूपोऽसौ विष्णुर्विश्वेश्वरः प्रभुः ॥ ६२ ब्रह्मस्वरूपमास्थाय स्वयमेव व्यवस्थितः। मेरुश्चोल्बमभूत्तस्य जरायुश्च महीधराः। गर्भोदकं समुद्राश्च तस्याभूवन् महात्मनः॥ ६३ अद्रिद्वीपसमुद्राश्च सज्योतिर्लोकसंग्रहः। तस्मिन्नण्डेऽभवत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ६४ रजोगुणयुतो देवः स्वयमेव हरिः परः। ब्रह्मरूपं समास्थाय जगत्सृष्टौ प्रवर्तते ॥ ६५ सृष्टं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना। नरसिंहादिरूपेण रुद्ररूपेण संहरेत् ॥ ६६ ब्राह्मेण रूपेण सृजत्यनन्तो जगत्समस्तं परिपातुमिच्छन्। रामादिरूपं स तु गृह्य पाति भूत्वाथ रुद्रः प्रकरोति नाशम् ॥ ६७ एक-दूसरेका आश्रय ले, सर्वथा एकरूपताको प्राप्त हो, प्रधानतत्त्वके अनुग्रहसे एक अण्डकी उत्पत्ति की। वह अण्ड क्रमशः बड़ा होकर जलके ऊपर बुलबुलेके समान स्थित हुआ। महाबुद्धे! समस्त भूतोंसे प्रकट हो जलपर स्थित हुआ। वह महान् प्राकृत अण्ड ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ)-रूप भगवान् विष्णुका अत्यन्त उत्तम आधार हुआ। उसमें वे अव्यक्तस्वरूप जगदीश्वर भगवान् विष्णु स्वयं ही हिरण्यगर्भरूपसे विराजमान हुए। उस समय सुमेरु पर्वत उन महात्मा भगवान् हिरण्यगर्भका उल्ब (गर्भको ढँकनेवाली झिल्ली) था। अन्यान्य पर्वत जरायुज (गर्भाशय) थे और समुद्र ही गर्भाशयके जल थे॥ ५७–६३॥ पर्वत, द्वीप, समुद्र और ग्रह-ताराओंसहित समस्त लोक तथा देवता, असुर और मनुष्यादि प्राणी सभी उस अण्डसे ही प्रकट हुए हैं। परमेश्वर भगवान् विष्णु स्वयं ही रजोगुणसे युक्त ब्रह्माका स्वरूप धारणकर संसारकी सृष्टिमें प्रवृत्त होते हैं। जबतक कल्पकी सृष्टि रहती है, तबतक वे ही नरसिंहादिरूपसे प्रत्येक युगमें अपने रचे हुए इस जगत्की रक्षा करते हैं और कल्पान्तमें रुद्ररूपसे इसका संहार कर लेते हैं। भगवान् अनन्त स्वयं ही ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं, फिर इसके पालनकी इच्छासे रामादि अवतार धारणकर इसकी रक्षा करते हैं और अन्तमें रुद्ररूप होकर समस्त जगत्का नाश कर देते हैं॥ ६४–६७॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे 'सर्गनिरूपणं' नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सर्गका निरूपण' विषयक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १ ॥ दूसरा अध्याय ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप सूत उवाच ब्रह्मा भूत्वा जगत्सृष्टौ नरसिंहः प्रवर्तते। यथा ते कथयिष्यामि भरद्वाज निबोध मे॥ १ नारायणाख्यो भगवान् ब्रह्मलोकपितामहः। उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वन् नित्योऽसावुपचारतः ॥ २ निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्। तत्पराख्यं तदर्धं च परार्धमभिधीयते॥ ३ सूतजी कहते हैं - भरद्वाज ! भगवान् नरसिंह जिस प्रकार ब्रह्मा होकर जगत्की सृष्टिके कार्यमें प्रवृत्त होते हैं, उसका मैं आपसे वर्णन करता हूँ, सुनिये। विद्वन्! 'नारायण' नामसे प्रसिद्ध लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा नित्य-सनातन पुरुष हैं, तथापि वे 'उत्पन्न हुए हैं'-ऐसा उपचारसे कहा जाता है। उनके अपने परिमाणसे उनकी आयु सौ वर्षकी बतायी जाती है। उस सौ वर्षका नाम 'पर' है। उसका आधा 'परार्ध' कहलाता है। निष्पाप In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २ ] ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप १३

अध्याय २ ] ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप १३ कालस्वरूपं विष्णोश्च यन्मयोक्तं तवानघ। महर्षे! साधुशिरोमणे! मैंने तुमसे भगवान् विष्णुके जिस तेन तस्य निबोध त्वं परिमाणोपपादनम्॥ ४ कालस्वरूपका वर्णन किया था, उसीके द्वारा उस ब्रह्माकी अन्येषां चैव भूतानां चराणामचराश्च ये। तथा दूसरे भी जो पृथ्वी, पर्वत और समुद्र आदि पदार्थ भूभूभृत्सागरादीनामशेषाणां च सत्तम॥ ५ एवं चराचर जीव हैं, उनकी आयुका परिमाण नियत संख्याज्ञानं च ते वच्मि मनुष्याणां निबोध मे। किया जाता है। अब मैं आपसे मनुष्योंकी 'काल-गणना' अष्टादश निमेषास्तु काष्ठैका परिकीर्तिता॥ ६ का ज्ञान बता रहा हूँ, सुनिये॥ १-५१/२॥ काष्ठास्त्रिंशत्कला ज्ञेया कलास्त्रिंशन्मुहूर्तकम्। अठारह निमेषोंकी एक 'काष्ठा' कही गयी है, तीस त्रिंशत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्॥ ७ काष्ठाओंकी एक 'कला' समझनी चाहिये तथा तीस अहोरात्राणि तावन्ति मासपक्षद्वयात्मकः। कलाओंका एक 'मुहूर्त' होता है। तीस मुहूर्तोंका एक तैः षड्भिरयनं मासैर्द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे॥ ८ मानव 'दिन-रात' माना गया है। उतने ही (तीस ही) अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्। दिन-रात मिलकर एक 'मास' होता है। इसमें दो पक्ष अयनद्वितयं वर्षं मर्त्यानामिह कीर्तितम्॥ ९ होते हैं। छः महीनोंका एक 'अयन' होता है। अयन नृणां मासः पितॄणां तु अहोरात्रमुदाहृतम्। दो हैं—'दक्षिणायन' और 'उत्तरायण'। दक्षिणायन वस्वादीनामहोरात्रं मानुषो वत्सरः स्मृतः॥ १० देवताओंकी रात्रि है और उत्तरायण दिन। दो अयन दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु युगं त्रेतादिसंज्ञितम्। मिलकर मनुष्योंका एक 'वर्ष' कहा गया है। मनुष्योंका चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे॥ ११ एक मास पितरोंका एक दिन-रात बताया गया है और चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्। मनुष्योंका एक वर्ष वसु आदि देवताओंका एक दिन- दिव्याब्दानां सहस्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः॥ १२ रात कहा गया है। देवताओंके बारह हजार वर्षोंका त्रेता तत्प्रमाणैः शतैः संध्या पूर्वा तत्र विधीयते। आदि नामक चतुर्युग होता है। उसका विभाग आपलोग संध्यांशकश्च तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः॥ १३ मुझसे समझ लें॥ ६-११॥ संध्यासंध्यांशयोर्मध्ये यः कालो वर्तते द्विज। पुराण-तत्त्ववेत्ताओंने कृत आदि युगोंका परिमाण युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञकः॥ १४ क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चेति चतुर्युगम्। बतलाया है। ब्रह्मन्! प्रत्येक युगके पूर्व उतने ही सौ प्रोच्यते तत्सहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसं द्विज॥ १५ वर्षोंकी 'संध्या' कही गयी है और युगके पीछे उतने ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवस्तु चतुर्दश। ही परिमाणवाले 'संध्यांश' होते हैं। विप्र! संध्या और भवन्ति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृणु॥ १६ संध्यांशके बीचका जो काल है, उसे सत्ययुग और सप्तर्षयस्तु शक्रोऽथ मनुस्तत्सूनवोऽपि ये। त्रेता आदि नामोंसे प्रसिद्ध युग समझना चाहिये। एककालं हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत्॥ १७ 'सत्ययुग', 'त्रेता', 'द्वापर' और 'कलि'-ये चार युग चतुर्युगानां संख्या च साधिका ह्येकसप्ततिः। मिलकर 'चतुर्युग' कहलाते हैं। द्विज! एक हजार मन्वन्तरं मनोः कालः शक्रादीनामपि द्विज॥ १८ चतुर्युग मिलकर 'ब्रह्माका एक दिन' होता है। ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। उनका कालकृत परिमाण सुनिये। सप्तर्षि, इन्द्र, मनु और मनु-पुत्र— ये पूर्व कल्पानुसार एक ही समय उत्पन्न किये जाते हैं तथा इनका संहार भी एक ही साथ होता है। ब्रह्मन्! इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक काल एक 'मन्वन्तर' कहलाता है। यही मनु तथा इन्द्रादि देवोंका

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१४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३

१४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३ अष्टौ शतसहस्राणि दिव्याया संख्यया स्मृतः। काल है। इस प्रकार दिव्य वर्ष-गणनाके अनुसार द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु ॥ १९ यह मन्वन्तर आठ लाख बावन हजार वर्षोंका समय त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज। कहा गया है। महामुने! द्विजवर! मानवीय वर्ष-गणनाके सप्तषष्टिश्च तथान्यानि नियुतानि महामुने ॥ २० अनुसार पूरे तीस करोड़, सरसठ लाख, बीस हजार विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना। वर्षोंका काल एक मन्वन्तरका परिमाण है, इससे अधिक मन्वन्तरस्य संख्येयं मानुषैर्वत्सरैर्द्विज ॥ २१ नहीं ॥ १२–२१ ॥ चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्राह्मामहः स्मृतम्। इस कालका चौदह गुना ब्रह्माका एक दिन होता विश्वस्यादौ सुमनसा सृष्ट्वा देवांस्तथा पितॄन् ॥ २२ है। ब्रह्माजीने विश्व-सृष्टिके आदिकालमें प्रसन्न मनसे देवताओं गन्धर्वान् राक्षसान् यक्षान् पिशाचान् गुह्यकांस्तथा। तथा पितरोंकी सृष्टि करके गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, पिशाच, ऋषीन् विद्याधराँश्चैव मनुष्यांश्च पशूंस्तथा ॥ २३ गुह्यक, ऋषि, विद्याधर, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर (वृक्ष, पक्षिणः स्थावरांश्चैव पिपीलिकभुजंगमान् । पर्वत आदि), पिपीलिका (चींटी) और साँपोंकी रचना चातुर्वर्ण्यं तथा सृष्ट्वा नियुज्याध्वरकर्मणि ॥ २४ की है। फिर चारों वर्णोंकी सृष्टि करके वे उन्हें यज्ञकर्ममें पुनर्दिनान्ते त्रैलोक्यमुपसंहृत्य स प्रभुः । नियुक्त करते हैं। तत्पश्चात् दिन बीतनेपर वे अविनाशी शेते चानन्तशयने तावतीं रात्रिमव्ययः ॥ २५ प्रभु त्रिभुवनका उपसंहार करके दिनके ही बराबर तस्यान्तेऽभून्महाकल्पो ब्राह्म इत्यभिविश्रुतः । परिमाणवाली रात्रिमें शेषनागकी शय्यापर सोते हैं। उस यस्मिन् मत्स्यावतारोऽभून्मथनं च महोदधेः ॥ २६ रात्रिके बीतनेपर 'ब्राह्म' नामक विख्यात महाकल्प हुआ, तद्वद्वाराहकल्पश्च तृतीयः परिकल्पितः । जिसमें भगवान्‌का मत्स्यावतार और समुद्र-मन्थन हुआ। यत्र विष्णुः स्वयं प्रीत्या वाराहं वपुराश्रितः । इस ब्राह्म-कल्पके ही समान तीसरा 'वाराह-कल्प' हुआ, उद्धर्तुं वसुधां देवीं स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ २७ जिसमें कि भगवती वसुंधरा (पृथ्वी)-का उद्धार करनेके सृष्ट्वा जगद्व्योमचराप्रमेयः लिये साक्षात् भगवान् विष्णुने प्रसन्नतापूर्वक वाराहरूप प्रजाश्च सृष्ट्वा सकलास्तथेशः । धारण किया। उस समय महर्षिगण उनकी स्तुति करते नैमित्तिकाख्ये प्रलये समस्तं थे। स्थलचर और आकाशचारी जीवोंके द्वारा जिनकी इयत्ताको संहृत्य शेते हरिरादिदेवः ॥ २८ जान लेना नितान्त असम्भव है, वे आदिदेव भगवान् विष्णु समस्त प्रजाओंकी सृष्टि कर 'नैमित्तिक प्रलय' में सबका संहार करके शयन करते हैं ॥ २२–२८ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सर्गरचनायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सृष्टिरचनाविषयक' दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥ ────────────────────────── तीसरा अध्याय ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण सूत उवाच सूतजी बोले—महाभाग ! नैमित्तिक प्रलयकालमें तत्र सुप्तस्य देवस्य नाभौ पद्ममभून्महत् । सोये हुए भगवान् नारायणकी नाभिमें एक महान् कमल तस्मिन् पद्मे महाभाग वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १ उत्पन्न हुआ। उसीसे वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी ब्रह्माजीका ब्रह्मोत्पन्नः स तेनोक्तः प्रजां सृज महामते । प्रादुर्भाव हुआ। तब उनसे भगवान् नारायणने कहा— एवमुक्त्वा तिरोभावं गतो नारायणः प्रभुः ॥ २ 'महामते ! तुम प्रजाकी सृष्टि करो' और यह कहकर वे In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ३ ] ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण १५ तथेत्युक्त्वा स तं देवं विष्णुं ब्रह्माथ चिन्तयन्। अन्तर्धान हो गये। उन भगवान् विष्णुसे 'तथास्तु' आस्ते किंचिज्जगद्बीजं नाध्यगच्छत किंचन ॥ ३ कहकर ब्रह्माजी सोचने लगे—'क्या जगत्की सृष्टिका कोई बीज है?' परंतु बहुत सोचनेपर भी उन्हें किसी तावत्तस्य महान् रोषो ब्रह्मणोऽभून्महात्मनः। बीजका पता न लगा। तब महात्मा ब्रह्माजीको महान् ततो बालः समुत्पन्नस्तस्याङ्के रोषसम्भवः ॥ ४ रोष हुआ। रोष होते ही उनकी गोदमें एक बालक प्रकट हो गया, जो उनके रोषसे ही प्रादुर्भूत हुआ था। स रुदन्वारितस्तेन ब्रह्मणा व्यक्तमूर्तना। उस बालकको रोते देख स्थूल शरीरधारी ब्रह्माजीने उसे नाम मे देहि चेत्युक्तस्तस्य रुद्रेत्यसौ ददौ ॥ ५ रोनेसे मना किया। फिर उसके यह कहनेपर कि 'मेरा नाम रख दीजिये', उन्होंने उसका 'रुद्र' नाम रख तेनासौ विसृजस्वेति प्रोक्तो लोकमिमं पुनः। दिया॥ १—५॥ अशक्तस्तत्र सलिले ममज्ज तपसाऽऽदृतः ॥ ६ इसके बाद ब्रह्माजीने उससे कहा कि 'तुम इस लोककी सृष्टि करो'—यह कहनेपर उस कार्यमें असमर्थ तस्मिन् सलिलमग्ने तु पुनरन्यं प्रजापतिः। होनेके कारण वह सादर तपस्याके लिये जलमें निमग्न ब्रह्मा ससर्ज भूतेशो दक्षिणाङ्गुष्ठतोऽपरम् ॥ ७ हो गया। उसके जलमें निमग्न हो जानेपर भूतनाथ प्रजापति ब्रह्माजीने फिर अपने दाहिने अँगूठेसे 'दक्ष' नामक एक दक्षं वामे ततोऽङ्गुष्ठे तस्य पत्नी व्यजायत। दूसरे पुत्रको उत्पन्न किया, तत्पश्चात् बायें अँगूठेसे उसकी स तस्यां जनयामास मनुं स्वायम्भुवं प्रभुः ॥ ८ पत्नी प्रकट हुई। प्रभु दक्षने उस स्त्रीसे स्वायम्भुव मनुको जन्म दिया। तब ब्रह्माजीने उसी मनुसे प्रजाओंकी सृष्टि तस्मात् सम्भाविता सृष्टिः प्रजानां ब्रह्मणा तदा। बढ़ायी। मुनिवर! वसुधाकी सृष्टि करनेवाले उस विधाताकी इत्येवं कथिता सृष्टिर्मया ते मुनिसत्तम। सृष्टि-रचनाका यह क्रम मैंने आपसे वर्णन किया। अब सृजतो जगतीं तस्य किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ९ आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ६—९॥ भरद्वाज उवाच संक्षेपेण तदाऽऽख्यातं त्वया मे लोमहर्षण। भरद्वाजजी बोले—लोमहर्षणजी! आपने यह सब विस्तरेण पुनर्ब्रूहि आदिसर्गं महामते ॥ १० वृत्तान्त मुझसे पहले संक्षेपसे कहा है। महामते! अब आप विस्तारके साथ आदिसर्गका वर्णन कीजिये॥ १०॥ सूत उवाच सूतजी बोले—पिछले कल्पका अन्त होनेपर रात्रिमें तथैव कल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः। सोकर उठनेके बाद सत्त्वगुणके उद्रेकसे युक्त सत्त्वोद्रिक्तस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत ॥ ११ (नारायणस्वरूप) भगवान् ब्रह्माजीने उस समय सम्पूर्ण लोकको शून्यमय देखा। वे ब्रह्मस्वरूपी भगवान् नारायण नारायणः परोऽचिन्त्यः पूर्वेषामपि पूर्वजः। सबसे परे हैं, अचिन्त्य हैं, पूर्वजोंके भी पूर्वज हैं, ब्रह्मस्वरूपी भगवानादिः सर्वसम्भवः ॥ १२ अनादि हैं और सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। इस जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत उन ब्रह्मस्वरूप नारायणदेवके विषयमें इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति। पुराणवेत्ता विद्वान् यह श्लोक कहते हैं—"जल भगवान् ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवात्मकम् ॥ १३ नर—पुरुषोत्तमसे उत्पन्न है, इसलिये 'नार' कहलाता है। आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः। नार (जल) ही उनका प्रथम अयन (आदि शयन-स्थान) अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ १४ है, इसलिये वे भगवान् 'नारायण' कहे जाते हैं।" In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[शीर्षक] १६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३


[बायाँ स्तम्भ : संस्कृत श्लोक]

सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा। अबुद्धिपूर्वकं तस्य प्रादुर्भूतं तमस्तदा॥ १५ तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः। अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः॥ १६ पञ्चधाधिष्ठितः सर्गो ध्यायतोऽप्रतिबोधवान्। बहिरन्तोऽप्रकाशश्च संवृतात्मा नगात्मकः। मुख्यसर्गः स विज्ञेयः सर्गसिद्धिविचक्षणैः॥ १७ यत्पुनर्ध्यायस्तस्तस्य ब्रह्मणः समपद्यत। तिर्यक्स्रोतस्ततस्तस्मात् तिर्यग्योनिस्ततः स्मृतः॥ १८ पश्चादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणश्च ये। तमप्यसाधकं मत्वा तिर्यग्योनिं चतुर्मुखः॥ १९ ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु सात्त्विकः समवर्तत। तदा तुष्टोऽन्यसर्गं च चिन्तयामास वै प्रभुः॥ २० ततश्चिन्तयतस्तस्य सर्गवृद्धिं प्रजापतेः। अर्वाक्स्रोताः समुत्पन्ना मनुष्याः साधका मताः॥ २१ ते च प्रकाशबहुलास्तमोयुक्ता रजोऽधिकाः। तस्मात्ते दुःखबहुला भूयो भूयश्च कारिणः॥ २२ एते ते कथिताः सर्गा बहवो मुनिसत्तम। प्रथमो महतः सर्गस्तन्मात्राणां द्वितीयकः॥ २३ वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः। मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः॥ २४ तिर्यक्स्रोताश्च यः प्रोक्तस्तिर्यग्योनिः स उच्यते। ततोर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः॥ २५ ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमो मानुषः स्मृतः। अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विको य उदाहृतः॥ २६


[दायाँ स्तम्भ : हिन्दी अनुवाद]

इस प्रकार कल्पके आदिमें पूर्ववत् सृष्टिका चिन्तन करते समय ब्रह्माजीके बिना जाने ही असावधानता हो जानेके कारण तमोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ॥ ११—१५॥ उस समय उन महात्मासे तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामक पञ्चपर्वा (पाँच प्रकारकी) अविद्या उत्पन्न हुई। फिर सृष्टिके लिये ध्यान करते हुए ब्रह्माजीसे वृक्ष, गुल्म, लता, वीरुध् एवं तृणरूप पाँच प्रकारका स्थावरात्मक सर्ग हुआ, जो बाहर-भीतरसे प्रकाशरहित, अविद्यासे आवृत एवं ज्ञानशून्य था। सर्गसिद्धिके ज्ञाता विद्वान् इसे 'मुख्य सर्ग' समझें; (क्योंकि अचल वस्तुओंको मुख्य कहा गया है।) फिर सृष्टिके लिये ध्यान करनेपर उन ब्रह्माजीसे तिर्यक्- स्रोत नामक सृष्टि हुई। तिरछा चलनेके कारण उसकी 'तिर्यक्' संज्ञा है। उससे उत्पन्न हुआ सर्ग 'तिर्यग्योनि' कहा जाता है। वे विख्यात पशु आदि जो कुमार्गसे चलनेवाले हैं, तिर्यग्योनि कहलाते हैं। चतुर्मुख ब्रह्माजीने उस तिर्यक्स्रोता सर्गको पुरुषार्थका असाधक मानकर जब पुनः सृष्टिके लिये चिन्तन किया, तब उनसे तृतीय 'ऊर्ध्वस्रोता' नामक सर्ग हुआ। यह सत्त्वगुणसे युक्त था (यही 'देवसर्ग' है)। तब भगवान्ने प्रसन्न होकर पुनः अन्य सृष्टिके लिये चिन्तन किया। तदनन्तर सर्गकी वृद्धिके विषयमें चिन्तन करते हुए उन प्रजापतिसे 'अर्वाक्स्रोता' नामक सर्गकी उत्पत्ति हुई। इसीके अन्तर्गत मनुष्य हैं, जो पुरुषार्थके साधक माने गये हैं। इनमें प्रकाश (सत्त्वगुण), और रज—इन दो गुणोंकी अधिकता है और तमोगुण भी है। इसलिये ये अधिकतर दुःखी और अत्यधिक क्रियाशील होते हैं॥ १६—२२॥ मुनिश्रेष्ठ! इन बहुत-से सर्गोंका मैंने आपसे वर्णन किया है। इनमें 'महत्तत्त्व' को पहला सर्ग कहा गया है। दूसरा सर्ग 'तन्मात्राओं' का है। तीसरा वैकारिक सर्ग है, जो 'ऐन्द्रिय' (इन्द्रियसम्बन्धी) कहलाता है। चौथा 'मुख्य' सर्ग है। स्थावर (वृक्ष, तृण, लता आदि) ही 'मुख्य' कहे गये हैं। तिर्यक्स्रोता नामक जो पाँचवाँ सर्ग कहा गया है, वह 'तिर्यग्योनि' कहलाता है। इसके बाद छठा 'ऊर्ध्वस्रोताओं' का सर्ग है। उसे 'देवसर्ग' कहा जाता है। फिर सातवाँ अर्वाक्स्रोताओंका सर्ग है, उसे 'मानव- सर्ग' कहते हैं। आठवाँ 'अनुग्रह-सर्ग' है, जिसे 'सात्त्विक'


[पाद-टिप्पणी] In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४ ] अनुसर्गके स्रष्टा १७

अध्याय ४ ] अनुसर्गके स्रष्टा १७

नवमो रुद्रसर्गस्तु नव सर्गाः प्रजापतेः । कहा गया है। नवाँ ‘रुद्रसर्ग' है—ये ही नौ सर्ग प्रजापतिसे पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्ते त्रयः स्मृताः । उत्पन्न हुए हैं। इनमें पहलेके तीन 'प्राकृत सर्ग' कहे प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥ २७ गये हैं। उसके बादवाले पाँच 'वैकृत सर्ग' हैं और नवाँ जो 'कौमार सर्ग' है, वह प्राकृत और वैकृत भी है। इस प्राकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेतवः । प्रकार सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त हुए ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए जो सृजतो ब्रह्मणः सृष्टिमुत्पन्ना ये मयेरिताः ॥ २८ जगत्की उत्पत्तिके मूलकारण प्राकृत और वैकृत सर्ग हैं, उनका मैंने वर्णन किया। सबके आत्मरूपसे जाननेयोग्य तं तं विकारं च परं परेशो अव्यक्तस्वरूप परमात्मा परमेश्वर भगवान् अनन्तदेव मायामधिष्ठाय सृजत्यनन्तः । अपनी मायाका आश्रय लेकर प्रेरित होते हुए-से उन- अव्यक्तरूपी परमात्मसंज्ञः उन विकारोंकी सृष्टि करते हैं ॥ २३—२९ ॥ सम्प्रेर्यमाणो निखिलात्मवेद्यः ॥ २९ । इति श्रीनरसिंहपुराणे सृष्टिरचनाप्रकारोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सृष्टिरचनाका प्रकार' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

चौथा अध्याय अनुसर्गके स्रष्टा

भरद्वाज उवाच भरद्वाजजी बोले—सूतजी ! अव्यक्त जन्मा ब्रह्माजीसे नवधा सृष्टिरुत्पन्ना ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । जो नौ प्रकारकी सृष्टि हुई, उसका विस्तार किस प्रकार कथं सा ववृधे सूत एतत्कथय मेऽधुना ॥ १ हुआ ? यही इस समय आप हमें बतलाइये ॥ १ ॥ सूत उवाच सूतजी बोले—ब्रह्माजीने पहले जिन मरीचि आदि प्रथमं ब्रह्मणा सृष्टा मरीच्यादय एव च । ऋषियोंको उत्पन्न किया, उनके नाम इस प्रकार हैं— मरीचिरत्रिश्च तथा अङ्गिराः पुलहः क्रतुः ॥ २ मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, महातेजस्वी पुलस्त्य, पुलस्त्यश्च महातेजाः प्रचेता भृगुरेव च । प्रचेता, भृगु, नारद और दसवें महाबुद्धिमान् वसिष्ठ हैं। नारदो दशमश्चैव वसिष्ठश्च महामतिः ॥ ३ सनक आदि ऋषि निवृत्तिमार्गमें तत्पर हुए और एकमात्र सनकादयो निवृत्ताख्ये ते च धर्मे नियोजिताः । नारद मुनिको छोड़कर शेष सभी मरीचि आदि मुनि प्रवृत्ताख्ये मरीच्याद्या मुक्त्वैकं नारदं मुनिम् ॥ ४ प्रवृत्तिमार्गमें नियुक्त हुए ॥ २-४ ॥ योऽसौ प्रजापतिस्त्वन्यो दक्षनामाङ्गसम्भवः । ब्रह्माजीके दायें अङ्गसे उत्पन्न जो 'दक्ष' नामक तस्य दौहित्रवंशेन जगदेतच्चराचरम् ॥ ५ दूसरे प्रजापति कहे गये हैं, उनके दौहित्रोंके वंशसे यह देवाश्च दानवाश्चैव गन्धर्वोरगपक्षिणः । चराचर जगत् व्याप्त है। देव, दानव, गन्धर्व, उरग (सर्प) सर्वे दक्षस्य कन्यासु जाताः परमधार्मिकाः ॥ ६ और पक्षी—ये सभी, जो सब-के-सब बड़े धर्मात्मा थे, चतुर्विधानि भूतानि ह्यचराणि चराणि च । दक्षकी कन्याओंसे उत्पन्न हुए। चार प्रकारके चराचर वृद्धिं गतानि तान्येवमनुसर्गोद्भवानि तु ॥ ७ प्राणी अनुसर्गमें उत्पन्न होकर वृद्धिको प्राप्त हुए। अनुसर्गस्य कर्तारो मरीच्याद्या महर्षयः । महाभाग ! पूर्वोक्त मरीचिसे लेकर वसिष्ठतक सभी वसिष्ठान्ता महाभाग ब्रह्मणो मानसोद्भवाः ॥ ८ श्रीब्रह्माजीकी मानस संतान हैं। ये सब अनुसर्गके स्रष्टा हैं।

१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५

१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५ सर्गे तु भूतानि धियश्च खानि ख्यातानि सर्वं सृजते महात्मा। स एव पश्चाच्चतुरास्यरूपी मुनिस्वरूपी च सृजत्यनन्तः ॥ ९ सर्ग अर्थात् आदिसृष्टिमें महात्मा भगवान् नारायण पाँच महाभूत, बुद्धि तथा पूर्वोक्त इन्द्रियवर्ग-इन सबको उत्पन्न करते हैं। इसके पश्चात् (अनुसर्गकालमें) वे अनन्तदेव स्वयं ही चतुर्मुख ब्रह्मा और मरीचि आदि मुनियोंके रूपसे प्रकट हो जगत्की सृष्टि करते हैं॥५-९॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें चौथा अध्याय पूरा हुआ॥४॥

पाँचवाँ अध्याय रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार

भरद्वाज उवाच रुद्रसर्गं तु मे ब्रूहि विस्तरेण महामते। पुनः सर्वे मरीच्याद्याः ससृजुस्ते कथं पुनः ॥ १ मित्रावरुणपुत्रत्वं वसिष्ठस्य कथं भवेत्। ब्रह्मणो मनसः पूर्वमुत्पन्नस्य महामते॥ २ सूत उवाच रुद्रसृष्टिं प्रवक्ष्यामि तत्सर्गांश्चैव सत्तम। प्रतिसर्गं मुनीनां तु विस्तराद्वदतः शृणु॥ ३ कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतःस्ततः। प्रादुरासीत् प्रभोरङ्के कुमारो नीललोहितः॥ ४ अर्धनारीनरवपुः प्रचण्डोऽतिशरीरवान्। तेजसा भासयन् सर्वा दिशश्च प्रदिशश्च सः॥ ५ तं दृष्ट्वा तेजसा दीप्तं प्रत्युवाच प्रजापतिः। विभजात्मानमद्य त्वं मम वाक्यान्महामते॥ ६ इत्युक्तो ब्रह्मणा विप्र रुद्रस्तेन प्रतापवान्। स्त्रीभावं पुरुषत्वं च पृथक् पृथगथाकरोत्॥ ७ बिभेद पुरुषत्वं च दशधा चैकधा च सः। तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणु मे द्विजसत्तम॥ ८ अजैकपादहिर्बुध्न्यः कपाली रुद्र एव च। हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः॥ ९ वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा। एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ १०

श्रीभरद्वाजजी बोले- महामते! अब मुझसे 'रुद्रसर्ग' का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये तथा यह भी बताइये कि मरीचि आदि ऋषियोंने पहले किस प्रकार सृष्टि की? महाबुद्धिमान् सूत ! वसिष्ठजी तो पहले ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न हुए थे; फिर वे मित्रावरुणके पुत्र कैसे हो गये? ॥१-२॥ सूतजी बोले-साधुशिरोमणे! आपके प्रश्नानुसार मैं अब रुद्र-सृष्टिका तथा उसमें होनेवाले सर्गोंका वर्णन करूँगा, साथ ही मुनियोंद्वारा सम्पादित प्रतिसर्ग (अनुसर्ग)-को भी मैं विस्तारके साथ बताऊँगा; आपलोग ध्यानसे सुनें। कल्पके आदिमें प्रभु ब्रह्माजी अपने ही समान शक्तिशाली पुत्र होनेका चिन्तन कर रहे थे। उस समय उनकी गोदमें एक नीललोहित वर्णका बालक प्रकट हुआ। उसका आधा शरीर स्त्रीका और आधा पुरुषका था। वह प्रचण्ड एवं विशालकाय था और अपने तेजसे दिशाओं तथा अवान्तर दिशाओंको प्रकाशित कर रहा था। उसे तेजसे देदीप्यमान देख प्रजापतिने कहा- 'महामते ! इस समय मेरे कहनेसे तुम अपने शरीरके दो भाग कर लो।' विप्र! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी रुद्रने अपने स्त्रीरूप और पुरुषरूपको अलग-अलग कर लिया। द्विजश्रेष्ठ ! फिर पुरुषरूपको उन्होंने ग्यारह स्वरूपोंमें विभक्त किया; मैं उन सबके नाम बतलाता हूँ, सुनें। अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य, कपाली, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी और रैवत-ये 'ग्यारह रुद्र' कहे गये हैं, जो तीनों

अध्याय ५ ] रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार १९ स्त्रीत्वं चैव तथा रुद्रो बिभेद दशधैकधा। भुवनोंके स्वामी हैं। पुरुषकी भाँति स्त्रीरूपके भी रुद्रने उमैव बहुरूपेण पत्नी सैव व्यवस्थिता॥ ११ ग्यारह विभाग किये। भगवती उमा ही अनेक रूप धारण कर इन सबकी पत्नी हैं॥ ३—११॥ तपः कृत्वा जले घोरमुत्तीर्णः स यदा पुरा। विप्रेन्द्र! पूर्वकालमें प्रतापी रुद्रदेव जलमें घोर तपस्या तदा स सृष्टवान् देवो रुद्रस्तत्र प्रतापवान्॥ १२ करके जब बाहर निकले, तब अपने तपोबलसे उन्होंने तपोबलेन विप्रेन्द्र भूतानि विविधानि च। वहाँ नाना प्रकारके भूतोंकी सृष्टि की। सिंह, ऊँट और पिशाचान् राक्षसांश्चैव सिंहोष्ट्रमकराननान्॥ १३ मगरके समान मुँहवाले पिशाचों, राक्षसों तथा वेताल वेतालप्रमुखान् भूतानन्यांश्चैव सहस्रशः। आदि अन्य सहस्रों भूतोंको उत्पन्न किया। साढ़े तीस विनायकानामुग्राणां त्रिंशत्कोट्यर्थमेव च॥ १४ करोड़ उग्र स्वभाववाले विनायकगणोंकी सृष्टि की तथा अन्यकार्यं समुद्दिश्य सृष्टवान् स्कन्दमेव च। दूसरे कार्यके उद्देश्यसे स्कन्दको उत्पन्न किया। इस एवं प्रकारो रुद्रोऽसौ मया ते कीर्तितः प्रभुः॥ १५ प्रकार भगवान् रुद्र तथा उनके सर्गका मैंने आपसे वर्णन किया॥ १२—१५॥ अनुसर्गं मरीच्यादेः कथयामि निबोध मे। अब मरीचि आदि ऋषियोंके अनुसर्गका वर्णन देवादिस्यावरान्ताश्च प्रजाः सृष्टाः स्वयम्भुवा॥ १६ करता हूँ, आप सुनें। स्वयम्भू ब्रह्माजीने देवताओंसे यदास्य च प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः। लेकर स्थावरोंतक सारी प्रजाओंकी सृष्टि की। किंतु इन तदा मानसपुत्रान् स सदृशानात्मनोऽसृजत्॥ १७ बुद्धिमान् ब्रह्माजीकी ये सब प्रजाएँ जब वृद्धिको प्राप्त मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्। नहीं हुई, तब इन्होंने अपने ही समान मानस-पुत्रोंकी प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं चैव महामतिम्॥ १८ सृष्टि की। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः। प्रचेता, वसिष्ठ और महाबुद्धिमान् भृगुको उत्पन्न किया। अग्निश्च पितरश्चैव ब्रह्मपुत्रौ तु मानसौ॥ १९ ये लोग पुराणमें नौ ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। ब्रह्मन् ! सृष्टिकाले महाभागौ ब्रह्मन् स्वायम्भुवोद्गतौ। अग्नि और पितर भी ब्रह्माके ही मानस-पुत्र हैं। इन दोनों शतरूपां च सृष्ट्वा तु कन्यां स मनवे ददौ॥ २० महाभागोंको सृष्टिकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने उत्पन्न किया। फिर उन्होंने 'शतरूपा' नामक कन्याकी सृष्टि करके उसे मनुको दे दिया॥ १६—२०॥ तस्माच्च पुरुषाद्देवी शतरूपा व्यजायत। उन स्वायम्भुव मनुसे देवी शतरूपाने 'प्रियव्रत' प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूतिं चैव कन्यकाम्॥ २१ और 'उत्तानपाद' नामक दो पुत्र उत्पन्न किये और ददौ प्रसूतिं दक्षाय मनुः स्वायम्भुवः सुताम्। 'प्रसूति' नामवाली एक कन्याको जन्म दिया। स्वायम्भुव प्रसूत्यां च तदा दक्षश्चतुर्विंशतिकं तथा॥ २२ मनुने अपनी कन्या प्रसूति दक्षको ब्याह दी। दक्षने ससर्ज कन्यकास्तासां शृणु नामानि मेऽधुना। प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। अब मुझसे उन श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा तथा क्रिया॥ २३ कन्याओंके नाम सुनें—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी। मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और अपत्यार्थं प्रजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः॥ २४ तेरहवीं कीर्ति थी। भगवान् धर्मने संतानोत्पत्तिके लिये श्रद्धादीनां तु पत्नीनां जाताः कामादयः सुताः। इन तेरह कन्याओंका पाणिग्रहण किया। धर्मकी इन धर्मस्य पुत्रपौत्राद्यैर्धर्मवंशो विवर्धितः॥ २५ श्रद्धा आदि पत्नियोंके गर्भसे काम आदि पुत्र उत्पन्न हुए। अपने पुत्र और पौत्र आदिसे धर्मका वंश खूब बढ़ा॥ २१—२५॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५

२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५


[संस्कृत श्लोक]

ताभ्यः शिष्टा यवीयस्यस्तासां नामानि कीर्तये। सम्भूतिश्चानसूया च स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा ॥ २६ संनतिश्चाथ सत्या च ऊर्जा ख्यातिर्द्विजोत्तम। तद्गतपुत्रौ महाभागौ मातरिश्वाथ सत्यवान् ॥ २७ स्वाहाथ दशमी ज्ञेया स्वधा चैकादशी स्मृता। एताश्च दत्ता दक्षेण ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ २८ मरीच्यादीनां तु ये पुत्रास्तानहं कथयामि ते। पत्नी मरीचेः सम्भूतिर्जज्ञे सा कश्यपं मुनिम् ॥ २९ स्मृतिश्चाङ्गिरसः पत्नी प्रसूता कन्यकास्तथा। सिनीवाली कुहूश्चैव राका चानुमतिस्तथा ॥ ३० अनसूया तथा चात्रेर्जज्ञे पुत्रानकल्मषान्। सोमं दुर्वाससं चैव दत्तात्रेयं च योगिनम् ॥ ३१ योऽसावग्नेरभीमानी ब्रह्मणस्तनयोऽग्रजः। तस्मात् स्वाहा सुताँल्लेभे त्रीनुदारौजसो द्विज ॥ ३२ पावकं पवमानं च शुचिं चापि जलाशिनम्। तेषां तु संततावन्वे चत्वारिंशच्च पञ्च च ॥ ३३ कथ्यन्ते वह्नयश्चैते पिता पुत्रत्रयं च यत्। एवमेकोनपञ्चाशद्वह्नयः परिकीर्तिताः ॥ ३४ पितरो ब्रह्मणा सृष्टा व्याख्याता ये मया तव। तेभ्यः स्वधा सुते जज्ञे मेनां वै धारिणीं तथा ॥ ३५ प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा। यथा ससर्ज भूतानि तथा मे शृणु सत्तम ॥ ३६ मनसैव हि भूतानि पूर्वं दक्षोऽसृजन्मुनिः। देवानृषींश्च गन्धर्वानसुरान् पन्नगांस्तथा ॥ ३७ यदास्य मनसा जाता नाभ्यवर्धन्त ते द्विज। तदा संचिन्त्य स मुनिः सृष्टिहेतोः प्रजापतिः ॥ ३८ मैथुनेनैव धर्मेण सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः। असिक्नीमुद्वहन् कन्यां वीरणस्य प्रजापतेः ॥ ३९


[हिन्दी अनुवाद]

द्विजश्रेष्ठ! श्रद्धा आदिसे छोटी अवस्थावाली जो उनकी शेष बहनें थीं, उनके नाम बता रहा हूँ—सम्भूति, अनसूया, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संनति, सत्या, ऊर्जा, ख्याति, दसवीं स्वाहा और ग्यारहवीं स्वधा है। दक्षके 'मातरिश्वा' और 'सत्यवान्' नामक दो महाभाग पुत्र भी हुए। उपर्युक्त ग्यारह कन्याओंको दक्षने पुण्यात्मा ऋषियोंको दिया ॥ २६-२८ ॥ मरीचि आदि मुनियोंके जो पुत्र हुए, उन्हें मैं आपसे बतलाता हूँ। मरीचिकी पत्नी सम्भूति थी। उसने कश्यप मुनिको जन्म दिया। अङ्गिराकी भार्या स्मृति थी। उसने सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति—इन चार कन्याओंको उत्पन्न किया। इसी प्रकार अत्रि मुनिकी पत्नी अनसूयाने सोम, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय—इन तीन पापरहित पुत्रोंको जन्म दिया। द्विज ! ब्रह्माजीका ज्येष्ठ पुत्र, जो अग्निका अभिमानी देवता है, उससे उसकी पत्नी स्वाहाने पावक, पवमान और जलका भक्षण करनेवाले शुचि— इन अत्यन्त तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया। इन तीनोंके (प्रत्येकके पंद्रह-पंद्रहके क्रमसे) अन्य पैंतालीस अग्निस্বরূপ संतानें हुईं। पिता अग्नि, उसके तीनों पुत्र तथा उनके भी ये पूर्वोक्त पैंतालीस पुत्र सब मिलकर 'अग्नि' ही कहलाते हैं। इस प्रकार उनचास अग्नि कहे गये हैं। ब्रह्माजीके द्वारा रचे गये जिन पितरोंका मैंने आपके समक्ष वर्णन किया था, उनसे उनकी पत्नी स्वधाने मेना और धारिणी—इन दो कन्याओंको जन्म दिया ॥ २९-३५॥ साधुशिरोमणे ! पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीके द्वारा 'तुम प्रजाकी सृष्टि करो' यह आज्ञा पाकर दक्षने जिस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि की थी, उसे सुनिये। विप्रवर ! दक्षमुनिने पहले देवता, ऋषि, गन्धर्व, असुर और सर्प—इन सभी भूतोंको मनसे ही उत्पन्न किया। परंतु जब मनसे उत्पन्न किये हुए ये देवादि सर्ग वृद्धिको प्राप्त नहीं हुए, तब उन दक्ष प्रजापति ऋषिने सृष्टिके लिये पूर्णतः विचार करके मैथुनधर्मके द्वारा ही नाना प्रकारकी सृष्टि रचनेकी इच्छा मनमें लिये वीरण प्रजापतिकी कन्या असिक्नीके साथ विवाह किया।


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अध्याय ५ ] रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार २१ षष्टिं दक्षोऽसृजत् कन्या वीरण्यामिति नः श्रुतम्। ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश॥ ४० सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने। द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा॥ ४१ द्वे कृशाश्वाय विदुषे तदपत्यानि मे शृणु। विश्वेदेवांस्तु विश्वा या साध्या साध्यानसूत॥ ४२ मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवः स्मृताः। भानोस्तु भानवो देवा मुहूर्तायां मुहूर्तजाः ॥ ४३ लम्बायाश्चैव घोषाख्यो नागवीथिश्च जामिजा। पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत॥ ४४ संकल्पायाश्च संकल्पः पुत्रो जज्ञे महामते। ये त्वनेकवसुप्राणा देवा ज्योतिःपुरोगमाः ॥ ४५ वसवोऽष्टौ समाख्यातास्तेषां नामानि मे शृणु। आपो ध्रुवश्च सोमश्च धर्मश्चैवानिलोऽनलः ॥ ४६ प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः। तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४७ साध्याश्च बहवः प्रोक्तास्तत्पुत्राश्च सहस्रशः। कश्यपस्य तु भार्या यास्तासां नामानि मे शृणु। अदितिर्दितिर्दिनुश्चैव अरिष्टा सुरसा खसा॥ ४८ सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा। कद्रूर्मुनिश्ध धर्मज्ञ तदपत्यानि मे शृणु॥ ४९ हमने सुना है कि दक्ष प्रजापतिने वीरण-कन्या असिक्नीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दस कन्याएँ उन्होंने धर्मको और तेरह कश्यप मुनिको ब्याह दीं*। फिर सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो बहुपुत्रको, दो अङ्गिराको और दो कन्याएँ विद्वान् कृशाश्वको समर्पित कर दीं। अब इन सबकी संतानोंका वर्णन सुनिये॥ ३६—४१ १/२॥ जो विश्वा नामकी कन्या थी, उसने विश्वेदेवोंको और साध्याने साध्योंको जन्म दिया। मरुत्वतीके मरुत्वान् (वायु), वसुके वसुगण, भानुके भानुदेवता और मुहूर्ताके मुहूर्ताभिमानी देवगण हुए। लम्बासे घोष नामक पुत्र हुआ, जामिसे नागवीथि नामवाली कन्या हुई और अरुन्धतीसे† पृथिवीके समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। महाबुद्धे! संकल्पा नामक कन्यासे संकल्पका जन्म हुआ, अनेक प्रकारके वसु (तेज अथवा धन) ही जिनके प्राण हैं, ऐसे जो आठ ज्योतिर्मय वसु देवता कहे गये हैं, उनके नाम सुनिये—आप, ध्रुव, सोम, धर्म, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये 'आठ वसु' कहलाते हैं। इनके पुत्रों और पौत्रोंकी संख्या सैकड़ों और हजारोंतक पहुँच गयी है॥ ४२-४७॥ इसी प्रकार साध्यगणोंकी भी संख्या बहुत है और उनके भी हजारों पुत्र हैं। जो (दक्ष-कन्याएँ) कश्यप मुनिकी पत्नियाँ हुईं, उनके नाम सुनिये—वे अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि थीं। धर्मज्ञ! अब आप मुझसे उनकी संतानोंका विवरण सुनिये।

  • पाँचवें अध्यायके श्लोक बाईसमें यह चर्चा आयी है कि स्वायम्भुव मनुने प्रजापतिको अपनी पुत्री प्रसूति ब्याह दी थी। उसके गर्भसे दक्षने चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनमेंसे तेरह कन्याओंका विवाह उन्होंने धर्मके साथ कर दिया था। फिर इसी अध्यायके उन्तालीस-चालीस श्लोकोंमें यह बात आती है कि दक्षने वीरण प्रजापतिकी पुत्री असिक्नीके साथ विवाह किया, जिसके गर्भसे उन्होंने साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनमेंसे दसका विवाह उन्होंने धर्मके साथ किया था। एक ही दक्षके विषयमें ये दो प्रकारकी बातें आपाततः संदेह उत्पन्न करती हैं। विष्णुपुराणमें भी यह प्रसंग आया है। अध्याय सातके उन्नीससे चौबीसवें श्लोकतक तथा अध्याय पंद्रहके उक्त दोनों प्रसंगोंका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। एक सौ तीनवें श्लोकमें उन प्रसंगोंके पर्यालोचनसे यह प्रतीत होता है कि उक्त दोनों दक्ष दो व्यक्ति थे और दोनों दो कालमें उत्पन्न हुए थे। पहले दक्ष ब्रह्माजीके मानस-पुत्र थे और दूसरे प्रचेताओँके पुत्र। इतनेपर भी मैत्रेयजीने यह प्रश्न उठाया है कि 'ब्रह्माजीके पुत्र दक्ष प्रचेताओँके पुत्र कैसे हो गये?' वहाँ पराशरजीने यह समाधान किया है कि 'युगे युगे भवन्त्येते दक्षाद्या मुनिसत्तम।' इस प्रकार युगभेदसे दोनों प्रसंगोंकी संगति बैठायी गयी है। वही समाधान यहाँ भी समझ लेना चाहिये। † यहाँ 'अरुन्धती' की जगह 'मरुत्वती' पाठ भी मिलता है, परंतु वह असंगत है। 'मरुत्वत्यां मरुत्वन्तः' कहकर मरुत्वतीकी संततिका वर्णन आ चुका है। अतः यहाँ 'अरुन्धती' पाठ ही ठीक है; अन्यत्र धर्मकी नवीं पत्नीका नाम नहीं मिलेगा। विष्णुपुराण १५।१०९वें श्लोकमें भी 'अरुन्धत्याम्' ही पाठ है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण एवं सटीक पाठ दिया गया है:

[शीर्षक / Header] २२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५


[मूल संस्कृत श्लोक - बायाँ स्तम्भ]

अदित्यां कश्यपाज्जाताः पुत्रा द्वादश शोभनाः । तानहं नामतो वक्ष्ये शृणुष्व गदतो मम ॥ ५० भगोऽशुंश्चार्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा । सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महामते ॥ ५१ त्वष्टा पूषा तथा चेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते । दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम् ॥ ५२ हिरण्याक्षो महाकायो वाराहेण तु यो हतः । हिरण्यकशिपुश्चैव नरसिंहेन यो हतः ॥ ५३ अन्ये च बहवो दैत्या दनुपुत्राश्च दानवाः । अरिष्टायां तु गन्धर्वा जज्ञिरे कश्यपात्तथा ॥ ५४ सुरसायामथोत्पन्ना विद्याधरगणा बहु । गा वै स जनयामास सुरभ्यां कश्यपो मुनिः ॥ ५५ विनतायां तु द्वौ पुत्रौ प्रख्यातौ गरुडारुणौ । गरुडो देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः ॥ ५६ वाहनत्वमियात्प्रीत्या अरुणः सूर्यसारथिः । ताम्रायां कश्यपाज्जाताः षट्पुत्रास्तान्निबोध मे ॥ ५७ अश्वा उष्ट्रा गर्दभाश्च हस्तिनो गवया मृगाः । क्रोधायां जज्ञिरे तद्वद्ये भूम्यां दुष्टजातयः ॥ ५८ इरा वृक्षलतावल्लीशणजातींश्च जज्ञिरे । खसा तु यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा ॥ ५९ कद्रूपुत्रा महानागा दंदशूका विषोल्बणाः । सप्तविंशति याः प्रोक्ताः सोमपत्न्योऽथ सुव्रताः ॥ ६० तासां पुत्रा महासत्त्वा बुधाद्यास्त्वभवन् द्विज । अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ॥ ६१ बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्युतः स्मृताः । प्रत्यङ्गिरस्सुताः श्रेष्ठा ऋषयश्चर्षिसत्कृताः ॥ ६२ कृशाश्वस्य तु देवर्षेर्देवाश्च ऋषयः सुताः । एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि ॥ ६३ एते कश्यपदायादाः कीर्तिताः स्थाणुजंगमाः । स्थितौ स्थितस्य देवस्य नरसिंहस्य धर्मतः ॥ ६४ एता विभूतयो विप्र मया ते परिकीर्तिताः । कथिता दक्षकन्यानां मया तेऽपत्यसंततिः ॥ ६५ श्रद्धावान् संस्मरेदेतां स सुसंतानवान् भवेत् ॥ ६६


[हिन्दी अनुवाद - दायाँ स्तम्भ]

महामते! अदितिके कश्यपजीसे बारह सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम बता रहा हूँ, सुनिये— महामते! भग, अंशु, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं। दितिके कश्यपजीसे दो पुत्र हुए थे, ऐसा हमने सुना है। पहला महाकाय हिरण्याक्ष हुआ, जिसे भगवान् वाराहने मारा और दूसरा हिरण्यकशिपु हुआ, जो नृसिंहजीके द्वारा मारा गया। इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दैत्य दितिसे उत्पन्न हुए। दनुके पुत्र दानव हुए और अरिष्टाके कश्यपजीसे गन्धर्वगण उत्पन्न हुए। सुरसासे अनेक विद्याधरगण हुए और सुरभिसे कश्यप मुनिने गौओंको जन्म दिया॥ ४८-५५॥

विनताके 'गरुड' और 'अरुण' नामक दो विख्यात पुत्र हुए। गरुडजी प्रेमवश अमित-तेजस्वी देवदेव भगवान् विष्णुके वाहन हो गये और अरुण सूर्यके सारथि बने। ताम्राके कश्यपजीसे छः पुत्र हुए, उन्हें आप मुझसे सुनिये— घोड़ा, ऊँट, गदहा, हाथी, गवय और मृग। पृथ्वीपर जितने दुष्ट जीव हैं, वे क्रोधासे उत्पन्न हुए हैं। इरााने वृक्ष, लता, वल्ली और 'सन' जातिके तृणवर्गको जन्म दिया। खसाने यक्ष और राक्षसों तथा मुनिने अप्सराओंको प्रकट किया। कद्रूके पुत्र प्रचण्ड विषवाले 'दंदशूक' नामक महासर्प हुए। विप्रवर! चन्द्रमाकी सुन्दर व्रतवाली जिन सत्ताईस स्त्रियोंकी चर्चा की गयी है, उनसे बुध आदि महान् पराक्रमी पुत्र हुए। अरिष्टनेमिकी स्त्रियोंके गर्भसे सोलह संतानें हुईं ॥ ५६-६१ ॥

विद्वान् बहुपुत्रकी संतानें कपिला, अतिलोहिता, पीता और सिता—इन चार वर्णोंवाली चार बिजलियाँ कही गयी हैं। प्रत्यङ्गिराके पुत्रगण ऋषियोंद्वारा सम्मानित उत्तम ऋषि हुए। देवर्षि कृशाश्वके पुत्र देवर्षि ही हुए। ये एक-एक हजार युग (अर्थात् एक कल्प)- के बीतनेपर पुनः-पुनः उत्पन्न होते रहते हैं। इस प्रकार कश्यपके वंशमें उत्पन्न हुए चर-अचर प्राणियोंका वर्णन किया गया। विप्रवर! धर्मपूर्वक पालनकर्ममें लगे हुए भगवान् नरसिंहकी इन विभूतियोंका यहाँ मैंने आपके समक्ष वर्णन किया है। साथ ही दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा भी बतलायी है। जो श्रद्धापूर्वक इन सबका स्मरण करता है, वह सुन्दर संतानसे

अध्याय ६ ] अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग २३ सर्गानुसर्गौ कथितौ मया ते युक्त होता है। ब्रह्मन् ! सृष्टि-विस्तारके लिये ब्रह्मा तथा समासतः सृष्टिविवृद्धिहेतोः। अन्य प्रजापतियोंद्वारा जो सर्ग और अनुसर्ग सम्पादित पठन्ति ये विष्णुपराः सदा नरा हुए, उन सबको मैंने संक्षेपसे आपको बता दिया। जो द्विजाति मानव भगवान् विष्णुमें मन लगाकर इन इदं द्विजास्ते विमला भवन्ति ॥ ६७ प्रसङ्गोंको सदा पढ़ेंगे वे निर्मल हो जायेंगे ॥ ६२-६७ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सृष्टिकथने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके सृष्टिवर्णनमें पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥ छठा अध्याय अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग सूत उवाच सूतजी बोले—ब्रह्मन् ! परमात्मा भगवान् विष्णुसे जिस सृष्टिस्ते कथिता विष्णोर्मायास्य जगतो द्विज। प्रकार देव, दानव और यक्ष आदि उत्पन्न हुए, वह जगत्की देवदानवयक्षाद्या यथोत्पन्ना महात्मनः॥ १ सृष्टिका वृत्तान्त मैंने आपसे कह दिया। अब ऋषियोंके यमुद्दिश्य त्वया पृष्टः पुराहमृषिसंनिधौ। निकट जिस उद्देश्यको लेकर पहले आपने मुझसे प्रश्न मित्रावरुणपुत्रत्वं वसिष्ठस्य कथं त्विति॥ २ किया था कि 'वसिष्ठजी मित्रावरुणके पुत्र कैसे हो गये ?' उसी तदिदं कथयिष्यामि पुण्याख्यानं पुरातनम्। पुरातन पवित्र कथाको कहूँगा। भरद्वाजजी ! आप एकाग्रचित्त शृणुष्वैकाग्रमनसा भरद्वाज विशेषतः॥ ३ हो, विशेष सावधानीके साथ उसे सुनिये ॥ १-३ ॥ सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञः सर्ववेदविदां वरः। सम्पूर्ण धर्म और अर्थोंके तत्त्वको जाननेवाले, पारगः सर्वविद्यानां दक्षो नाम प्रजापतिः॥ ४ समस्त वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा समग्र विद्याओंके पारदर्शी तेन दत्ताः शुभाः कन्याः सर्वाः कमललोचनाः। 'दक्ष' नामक प्रजापतिने अपनी तेरह सुन्दरी कन्याओंको, सर्वलक्षणसम्पूर्णाः कश्यपाय त्रयोदश॥ ५ जो सभी कमलके समान नेत्रोंवाली और समस्त शुभ तासां नामानि वक्ष्यामि निबोधत ममाधुना। लक्षणोंसे सम्पन्न थीं, कश्यप मुनिको दिया था। उनके अदितिर्दितिर्दनुः काला मुहूर्ता सिंहिका मुनिः॥ ६ नाम बतलाता हूँ, आप लोग इस समय मुझसे उनके नाम जान लें—अदिति, दिति, दनु, काला, मुहूर्ता, इरा क्रोधा च सुरभिर्विनता सुरसा खसा। सिंहिका, मुनि, इरा, क्रोधा, सुरभि, विनता, सुरसा, कद्रूश्च सरमा चैव या तु देवशुनी स्मृता॥ ७ खसा, कद्रू और सरमा, जो देवताओंकी कुतिया कही दक्षस्यैता दुहितरस्ताः प्रादात् कश्यपाय सः। गयी हैं—ये सभी दक्ष-प्रजापतिकी कन्याएँ हैं*। तासां ज्येष्ठा वरिष्ठा च अदितिर्नाम्तो द्विज॥ ८ इनको दक्षने कश्यपजीको समर्पित किया था। विप्रवर ! अदिति नामकी जो कन्या थी, वही इन सबमें श्रेष्ठ और अदितिः सुषुवे पुत्रान् द्वादशाग्निसमप्रभान्। बड़ी थी॥ ४-८॥ तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणुष्व गदतो मम॥ ९ अदितिने बारह पुत्रोंको उत्पन्न किया†, जो अग्निके समान कान्तिमान् एवं तेजस्वी थे। उन सबके नाम बतला रहा हूँ, आप मुझसे उन्हें सुनें।

  • अध्याय पाँचके ४८-४९ श्लोकोंमें कश्यपकी तेरह पत्नियोंके नाम आये हैं। यहाँ पंद्रह नाम आये हैं; इनमें 'मुहूर्ता' और 'सरमा'—ये दो नाम अधिक हैं। 'मुहूर्ता' तो धर्मकी पत्नी थीं। 'सरमा' कश्यपकी पत्नी होनेपर भी दक्षकन्या नहीं थी। इसके अतिरिक्त अरिष्टा एवं ताम्राके स्थानपर यहाँ काला और सिंहिका नाम आये हैं। ये नाम अन्यत्र पुराणोंमें भी आते हैं। † यद्यपि पाँचवें अध्यायके ५१-५२ श्लोकोंमें अदितिकी सन्तानोंका वर्णन आ गया है; अतः यहाँ इस प्रसङ्गकी पुनरुक्ति जान पड़ती है; तथापि इसका समाधान यह है कि वहाँ सृष्टिवर्णनके प्रसङ्गमें वह बात कही गयी है और यहाँ 'वसिष्ठ तथा अगस्त्यजीकी मित्रावरुणके पुत्ररूपमें पुनरुत्पत्ति कैसे हुई ?' इस प्रश्नके समाधानके प्रसङ्गमें मित्र और वरुण देवताका परिचय देना आवश्यक हुआ। वे दोनों बारह आदित्योंमें परिगणित हैं; अतः अदितिके उन बारहौं पुत्रोंका पुनः वर्णन प्रसंगवशात् आ गया है; अतः पुनरुक्ति-दोष नहीं मानना चाहिये। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६

२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६ यैरिदं वासरं नक्तं वर्तते क्रमशः सदा। उन्हींके द्वारा सर्वदा क्रमशः दिन और रात होते रहते भगोंऽशुस्त्वर्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा॥ १० हैं। भग, अंशु, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु हैं। ये सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महामते। बारह आदित्य तपते और वर्षा करते हैं॥ ९-११ १/२॥ त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो विष्णुर्द्वादशमः स्मृतः॥ ११ अदितिके मध्यम पुत्र वरुण 'लोकपाल' कहे गये एते च द्वादशादित्यास्तपन्ते वर्षयन्ति च। हैं; इनकी स्थिति वरुण-दिशा (पश्चिम)-में बतलायी तस्याश्च मध्यमः पुत्रो वरुणो नाम नामतः॥ १२ जाती है। ये पश्चिम दिशामें पश्चिम समुद्रके तटपर लोकपाल इति ख्यातो वारुण्यां दिशि शब्द्यते। सुशोभित होते हैं। वहाँ एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वत है। पश्चिमस्य समुद्रस्य प्रतीच्यां दिशि राजते॥ १३ उसके शिखर सब रत्नमय हैं। उनपर नाना प्रकारकी जातरूपमयः श्रीमानास्ते नाम शिलोच्चयः। धातुएँ और झरने हैं। इनसे युक्त और नाना प्रकारके सर्वरत्नमयैः शृङ्गैर्धातुप्रस्रवणान्वितैः॥ १४ रत्नोंसे परिपूर्ण वह सुन्दर पर्वत बड़ी शोभा पाता है। उसमें बड़े-बड़े दर्रे और गुहाएँ हैं, जहाँ बाघ और सिंह संयुक्तो भाति शैलेशो नानारत्नमयः शुभः। दहाड़ते रहते हैं। वहाँके अनेकानेक एकान्त स्थलोंपर महादरीगुहाभिश्च सिंहशार्दूलनादितः॥ १५ सिद्ध और गन्धर्व वास करते हैं। जब सूर्य वहाँ पहुँचते नानाविविक्तभूमीषु सिद्धगन्धर्वसेवितः। हैं, तब समस्त संसार अन्धकारसे पूर्ण हो जाता है। उसी यस्मिन् गते दिनकरे तमसाऽऽपूर्यते जगत्॥ १६ पर्वतके शिखरपर विश्वकर्माकी बनायी हुई एक 'विश्वावती' नामकी शोभनपुरी है, जो बड़ी, दिव्य तथा सुवर्णसे बनी तस्य शृङ्गे महादिव्या जाम्बूनदमयी शुभा। रम्या मणिमयैः स्तम्भैर्विहिता विश्वकर्मणा॥ १७ हुई है और उसमें मणियोंके खंभे लगे हैं। इस प्रकार वह पुरी रमणीय एवं सम्पूर्ण भोग-साधनोंसे सम्पन्न है। उसीमें पुरी विश्वावती नाम समृद्धा भोगसाधनैः। अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए 'वरुण' नामक आदित्य तस्यां वरुण आदित्यो दीप्यमानः स्वतेजसा॥ १८ ब्रह्माजीकी प्रेरणासे इन सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं। पाति सर्वानिमाँल्लोकान् नियुक्तो ब्रह्मणा स्वयम्। वहाँ उनकी सेवामें गन्धर्व और अप्सराएँ रहा करती उपास्यमानो गन्धर्वैस्तथैवाप्सरसां गणैः॥ १९ हैं॥ १२-१९॥ दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गो दिव्याभरणभूषितः। एक दिन वरुण अपने अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप कदाचिद्वरुणो यातो मित्रेण सहितो वनम्॥ २० लगाये, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो 'मित्र' के साथ वनको गये। ब्रह्मर्षिगण सदा जिसका सेवन करते हैं, जो नाना कुरुक्षेत्रे शुभे रम्ये सदा ब्रह्मर्षिसेविते। प्रकारके फल और फूलोंसे युक्त तथा अनेक तीर्थोंसे व्याप्त नानापुष्पफलोपेते नानातीर्थसमाकुले॥ २१ है; जहाँ ऊर्ध्वरेता मुनियोंके आश्रम दृष्टिगोचर होते हैं तथा आश्रमा यत्र दृश्यन्ते मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्। जो प्रचुर फल-फूल और जलसे पूर्ण है, उस सुन्दर सुरम्य तस्मिंस्तीर्थे समाश्रित्य बहुपुष्पफलोदके॥ २२ कुरुक्षेत्र तीर्थमें पहुँचकर वे दोनों देवता चीर और कृष्णमृगचर्म चीरकृष्णाजिनधरौ चरन्तौ तप उत्तमम्। धारण करके तपस्या करने लगे। वहाँपर वनके एक तत्रैकस्मिन् वनोद्देशे विमलोदो ह्रदः शुभः॥ २३ भागमें निर्मल जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर है, In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ६ ] अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग २५ बहुगुल्मलताकीर्णो नानापक्षिनिषेवितः । जो बहुत-सी झाड़ियों और बेलोंसे आवृत है; अनेकानेक नानातरुवनच्छन्नो नलिन्या चोपशोभितः ॥ २४ पक्षी उसका सेवन करते हैं। वह भाँति-भाँतिके वृक्षसमूहोंसे आच्छन्न और कमलोंसे सुशोभित है। उस सरोवरकी पौण्डरीक इति ख्यातो मीनकच्छपसेवितः । 'पौण्डरीक' नामसे प्रसिद्धि है। उसमें बहुत-सी मछलियाँ ततस्तु मित्रावरुणौ भ्रातरौ वनचारिणौ । और कछुए निवास करते हैं। तप आरम्भ करनेके तं तु देशं गतौ देवौ विचरन्तौ यदृच्छया ॥ २५ पश्चात् वे दोनों भाई—मित्र और वरुणदेवता एक दिन वनमें विचरण करते और स्वेच्छानुसार घूमते हुए उस सरोवरकी ओर गये ॥ २०-२५ ॥ ताभ्यां तत्र तदा दृष्टा उर्वशी तु वराप्सराः । वहाँ उन दोनोंने उस समय श्रेष्ठ एवं सुन्दरी अप्सरा स्नायन्ती सहितान्याभिः सखीभिः सा वरानना । उर्वशीको देखा, जो अपनी अन्य सहेलियोंके साथ स्नान गायन्ती च हसन्ती च विश्वस्ता निर्जने वने ॥ २६ कर रही थी। वह सुमुखी अप्सरा उस निर्जन वनमें विश्वस्त होकर हँसती और गाती थी। उसका वर्ण गोरा था। कमलके गौरी कमलगर्भाभा स्निग्धकृष्णाशिरोरुहा । भीतरी भागके समान उसकी कान्ति थी। उसकी अलकें पद्मपत्रविशालाक्षी रक्तोष्ठी मृदुभाषिणी ॥ २७ काली-काली और चिकनी थीं, आँखें कमल-दलके समान बड़ी-बड़ी थीं, होठ लाल थे, उसका भाषण शङ्खकुन्देन्दुधवलैर्दन्तैरविरलैः समैः । बहुत ही मधुर था। उसके दाँत शङ्ख, कुन्द और चन्द्रमाके सुभ्रूः सुनासा सुमुखी सुललाटा मनस्विनी ॥ २८ समान श्वेत, परस्पर मिले हुए और बराबर थे। उस मनस्विनीकी भौंहें, नासिका, मुख और ललाट—सभी सिंहवत् सूक्ष्ममध्याङ्गी पीनोरुजघनस्तनी । सुन्दर थे। कटिभाग सिंहके कटिप्रदेशकी भाँति पतला मधुरालापचतुरा सुमध्‍या चारुहासिनी ॥ २९ था। उरोज, ऊरु और जघन—ये मोटे और घने थे। वह मधुर भाषण करनेमें चतुर थी। उसका मध्यभाग रक्तोत्पलकरा तन्वी सुपदी विनयान्विता । सुन्दर और मुस्कान मनोहर थी। दोनों हाथ लाल कमलके पूर्णचन्द्रनिभा बाला मत्तद्विरदगामिनी ॥ ३० समान सुन्दर एवं कोमल थे। शरीर पतला और पैर सुन्दर थे। वह बाला बड़ी ही विनीता थी। उसका मुख दृष्ट्वा तस्यास्तु तद्रूपं तौ देवौ विस्मयं गतौ । पूर्णचन्द्रके समान आह्लादजनक और गति मत्त गजराजके तस्या हास्येन लास्येन स्मितेन ललितेन च ॥ ३१ समान मन्द थी। उर्वशीके उस दिव्य रूपको देखकर वे दोनों देवता विस्मयमें पड़ गये। उसके लास्य (नृत्य), मृदुना वायुना चैव शीतानिलसुगन्धिना । हास्य, ललितभाव-मिश्रित मन्द मुस्कान और मधुर सुरीले मत्तभ्रमरगीतेन पुंस्कोकिलरुतेन च ॥ ३२ गानसे तथा शीतल-मन्द-सुगन्धित मलयानलके स्पर्शसे एवं मतवाले भौंरोंके संगीत और कोकिलोंके कलरवसे सुस्वरेण हि गीतेन उर्वश्या मधुरेण च । उन दोनोंका मन और भी मुग्ध हो गया। साथ ही ईक्षितो च कटाक्षेण स्कन्दतुस्तावूभावपि । उर्वशीकी तिरछी चितवनके शिकार होकर वे दोनों निमेः शापादथोत्क्रम्य स्वदेहान्मुनिसत्तम ॥ ३३ ही वहाँ स्खलित हो गये (उनके वीर्यका पतन हो गया)। मुनिसत्तम ! इसके बाद निमिके शापवश* वसिष्ठजीका वसिष्ठ मित्रावरुणात्मजोऽसी- जीवात्मा अपने शरीरसे पृथक् होकर (मित्रावरुणके त्यथोचुरागत्य हि विश्वदेवाः । वीर्यमें आविष्ट हुआ) ॥ २६-३३ ॥ रेतस्त्रिभागं कमलेऽचरत्तद् 'वसिष्ठ ! तुम मित्रावरुणके पुत्र होओगे'—इस प्रकार वसिष्ठ एवं तु पितामहोक्तेः ॥ ३४ विश्वेदेवोंने (निमिके शुक्रमें) आकर कहा था तथा ब्रह्माजीका भी यही कथन था; अतएव मित्रावरुणके तीन स्थानोंपर

  • एक बार राजा निमिने यज्ञ करनेकी इच्छासे अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे परामर्श किया। वसिष्ठजीने कहा—'मैं देवलोकमें एक यज्ञ आरम्भ करा चुका हूँ। उसके समाप्त होनेतक आप अपना यज्ञ रोके रहें। वहाँसे आकर हम आपका यज्ञ आरम्भ करायेंगे।' निमिने उनकी प्रतीक्षा नहीं की। वसिष्ठजीने लौटनेपर यज्ञ होता देख राजाको शाप दिया कि 'तुम विदेह हो जाओ।' तब राजाने भी शाप दिया कि 'आपका भी यह शरीर न रहे।'

२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६

२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६ त्रिधा समभवद्रेतः कमलेऽथ स्थले जले। अरविन्दे वसिष्ठस्तु जातः स मुनिसत्तमः। स्थले त्वगस्त्यः सम्भूतो जले मत्स्यो महाद्युतिः ॥ ३५ स तत्र जातो मतिमान् वसिष्ठः कुम्भे त्वगस्त्यः सलिलेऽथ मत्स्यः। स्थानत्रये तत्पतितं समानं मित्रस्य यस्माद्वरुणस्य रेतः ॥ ३६ एतस्मिन्नेव काले तु गता सा उर्वशी दिवम्। उपेत्य तानृषीन् देवौ गतौ भूयः स्वमाश्रमम्। यमावपि तु तप्येते पुनरुग्रं परं तपः ॥ ३७ गिरे हुए वीर्यमेंसे जो भाग कमलपर गिरा था, उसीसे वसिष्ठजी हुए। उन दोनों देवताओंका वीर्य तीन भागोंमें विभक्त होकर कमल, जल और स्थलपर (घड़ेमें) गिरा। कमलपर गिरे हुए वीर्यसे मुनिवर वसिष्ठ उत्पन्न हुए, स्थलपर गिरे हुए रेतस्‌से अगस्त्य और जलमें गिरे हुए शुक्रसे अत्यन्त कान्तिमान् मत्स्यकी उत्पत्ति हुई। इस तरह उस कमलपर बुद्धिमान् वसिष्ठ, कुम्भमें अगस्त्य और जलमें मत्स्यका आविर्भाव हुआ; क्योंकि मित्रावरुणका वीर्य तीनों स्थानोंपर बराबर गिरा था। इसी समय उर्वशी स्वर्गलोकमें चली गयी। वसिष्ठ और अगस्त्य—इन दोनों ऋषियोंको साथ लेकर वे दोनों देवता पुनः अपने आश्रममें लौट आये और पुनः उन दोनोंने अत्यन्त उग्र तप आरम्भ किया ॥ ३४–३७ ॥ तपसा प्राप्तुकामौ तौ परं ज्योतिः सनातनम्। तपस्यन्तौ सुरश्रेष्ठौ ब्रह्माऽऽगत्येदमब्रवीत् ॥ ३८ मित्रावरुणकौ देवौ पुत्रवन्तौ महाद्युती। सिद्धिर्भविष्यति यथा युवयोर्वैष्णवी पुनः ॥ ३९ स्वाधिकारेण स्थीयेतामधुना लोकसाक्षिकौ। इत्युक्त्वान्तर्दधे ब्रह्मा तौ स्थितौ स्वाधिकारकौ ॥ ४० तपस्याके द्वारा सनातन परम ज्योति (ब्रह्मधाम)–को प्राप्त करनेकी इच्छावाले उन दोनों तपस्वी देवेश्वरोंसे ब्रह्माजीने आकर यह कहा—'महान् कान्तिमान् और पुत्रवान् मित्र तथा वरुण देवताओ! तुम दोनोंको पुनः वैष्णवी सिद्धि प्राप्त होगी। इस समय संसारके साक्षीरूपसे तुम लोग अपने अधिकारपर स्थित हो जाओ।' यों कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और वे दोनों देवता अपने अधिकृत पदपर स्थित हुए ॥ ३८–४० ॥ एवं ते कथितं विप्र वसिष्ठस्य महात्मनः। मित्रावरुणपुत्रत्वमगस्त्यस्य च धीमतः ॥ ४१ इदं पुंसीयमाख्यानं वारुणं पापनाशनम्। पुत्रकामास्तु ये केचिच्छृण्वन्तीदं शुचिव्रताः। अचिरादेव पुत्रांस्ते लभन्ते नात्र संशयः ॥ ४२ यश्चैतत्पठते नित्यं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः। देवाश्च पितरस्तस्य तृप्ता यान्ति परं सुखम् ॥ ४३ यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः। नन्दते स सुखं भूमौ विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ४४ इत्येतदाख्यानमिदं मयेरितं पुरातनं वेदविद्वैरुदीरितम्। पठिष्यते यस्तु शृणोति सर्वदा स याति शुद्धो हरिलोकमञ्जसा ॥ ४५ ब्राह्मण! इस प्रकार महात्मा वसिष्ठजी और बुद्धिमान् अगस्त्यजी जिस तरह मित्रावरुणके पुत्र हुए थे, वह सब प्रसङ्ग मैंने आपसे कह दिया। यह वरुणदेवता-सम्बन्धी पुंसवनाख्यान पाप नष्ट करनेवाला है। जो लोग पुत्रकी कामनासे शुद्ध व्रतका आचरण करते हुए इसका श्रवण करते हैं, वे शीघ्र ही अनेक पुत्र प्राप्त करते हैं—इसमें संदेह नहीं है। जो उत्तम ब्राह्मण हव्य (देवयाग) और कव्य (पितृयाग)-में इसका पाठ करता है, उसके देवता तथा पितर तृप्त होकर अत्यन्त सुख प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य नित्य प्रातःकाल उठकर इसका श्रवण करता है, वह पृथ्वीपर सुखपूर्वक प्रसन्नताके साथ रहता है और फिर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। वेदवेत्ताओंके द्वारा प्रतिपादित इस पुरातन उपाख्यानको, जिसे मैंने कहा है, जो लोग सादर पढ़ेंगे और सुनेंगे, वे शुद्ध होकर अनायास ही विष्णुलोकको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४१–४५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे पुंसवनाख्यानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पुंसवन' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth