संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 18, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ] ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण १५ तथेत्युक्त्वा स तं देवं विष्णुं ब्रह्माथ चिन्तयन्। अन्तर्धान हो गये। उन भगवान् विष्णुसे 'तथास्तु' आस्ते किंचिज्जगद्बीजं नाध्यगच्छत किंचन ॥ ३ कहकर ब्रह्माजी सोचने लगे—'क्या जगत्की सृष्टिका कोई बीज है?' परंतु बहुत सोचनेपर भी उन्हें किसी तावत्तस्य महान् रोषो ब्रह्मणोऽभून्महात्मनः। बीजका पता न लगा। तब महात्मा ब्रह्माजीको महान् ततो बालः समुत्पन्नस्तस्याङ्के रोषसम्भवः ॥ ४ रोष हुआ। रोष होते ही उनकी गोदमें एक बालक प्रकट हो गया, जो उनके रोषसे ही प्रादुर्भूत हुआ था। स रुदन्वारितस्तेन ब्रह्मणा व्यक्तमूर्तना। उस बालकको रोते देख स्थूल शरीरधारी ब्रह्माजीने उसे नाम मे देहि चेत्युक्तस्तस्य रुद्रेत्यसौ ददौ ॥ ५ रोनेसे मना किया। फिर उसके यह कहनेपर कि 'मेरा नाम रख दीजिये', उन्होंने उसका 'रुद्र' नाम रख तेनासौ विसृजस्वेति प्रोक्तो लोकमिमं पुनः। दिया॥ १—५॥ अशक्तस्तत्र सलिले ममज्ज तपसाऽऽदृतः ॥ ६ इसके बाद ब्रह्माजीने उससे कहा कि 'तुम इस लोककी सृष्टि करो'—यह कहनेपर उस कार्यमें असमर्थ तस्मिन् सलिलमग्ने तु पुनरन्यं प्रजापतिः। होनेके कारण वह सादर तपस्याके लिये जलमें निमग्न ब्रह्मा ससर्ज भूतेशो दक्षिणाङ्गुष्ठतोऽपरम् ॥ ७ हो गया। उसके जलमें निमग्न हो जानेपर भूतनाथ प्रजापति ब्रह्माजीने फिर अपने दाहिने अँगूठेसे 'दक्ष' नामक एक दक्षं वामे ततोऽङ्गुष्ठे तस्य पत्नी व्यजायत। दूसरे पुत्रको उत्पन्न किया, तत्पश्चात् बायें अँगूठेसे उसकी स तस्यां जनयामास मनुं स्वायम्भुवं प्रभुः ॥ ८ पत्नी प्रकट हुई। प्रभु दक्षने उस स्त्रीसे स्वायम्भुव मनुको जन्म दिया। तब ब्रह्माजीने उसी मनुसे प्रजाओंकी सृष्टि तस्मात् सम्भाविता सृष्टिः प्रजानां ब्रह्मणा तदा। बढ़ायी। मुनिवर! वसुधाकी सृष्टि करनेवाले उस विधाताकी इत्येवं कथिता सृष्टिर्मया ते मुनिसत्तम। सृष्टि-रचनाका यह क्रम मैंने आपसे वर्णन किया। अब सृजतो जगतीं तस्य किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ९ आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ६—९॥ भरद्वाज उवाच संक्षेपेण तदाऽऽख्यातं त्वया मे लोमहर्षण। भरद्वाजजी बोले—लोमहर्षणजी! आपने यह सब विस्तरेण पुनर्ब्रूहि आदिसर्गं महामते ॥ १० वृत्तान्त मुझसे पहले संक्षेपसे कहा है। महामते! अब आप विस्तारके साथ आदिसर्गका वर्णन कीजिये॥ १०॥ सूत उवाच सूतजी बोले—पिछले कल्पका अन्त होनेपर रात्रिमें तथैव कल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः। सोकर उठनेके बाद सत्त्वगुणके उद्रेकसे युक्त सत्त्वोद्रिक्तस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत ॥ ११ (नारायणस्वरूप) भगवान् ब्रह्माजीने उस समय सम्पूर्ण लोकको शून्यमय देखा। वे ब्रह्मस्वरूपी भगवान् नारायण नारायणः परोऽचिन्त्यः पूर्वेषामपि पूर्वजः। सबसे परे हैं, अचिन्त्य हैं, पूर्वजोंके भी पूर्वज हैं, ब्रह्मस्वरूपी भगवानादिः सर्वसम्भवः ॥ १२ अनादि हैं और सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। इस जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत उन ब्रह्मस्वरूप नारायणदेवके विषयमें इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति। पुराणवेत्ता विद्वान् यह श्लोक कहते हैं—"जल भगवान् ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवात्मकम् ॥ १३ नर—पुरुषोत्तमसे उत्पन्न है, इसलिये 'नार' कहलाता है। आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः। नार (जल) ही उनका प्रथम अयन (आदि शयन-स्थान) अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ १४ है, इसलिये वे भगवान् 'नारायण' कहे जाते हैं।" In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth