भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 19

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[शीर्षक] १६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३


[बायाँ स्तम्भ : संस्कृत श्लोक]

सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा। अबुद्धिपूर्वकं तस्य प्रादुर्भूतं तमस्तदा॥ १५ तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः। अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः॥ १६ पञ्चधाधिष्ठितः सर्गो ध्यायतोऽप्रतिबोधवान्। बहिरन्तोऽप्रकाशश्च संवृतात्मा नगात्मकः। मुख्यसर्गः स विज्ञेयः सर्गसिद्धिविचक्षणैः॥ १७ यत्पुनर्ध्यायस्तस्तस्य ब्रह्मणः समपद्यत। तिर्यक्स्रोतस्ततस्तस्मात् तिर्यग्योनिस्ततः स्मृतः॥ १८ पश्चादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणश्च ये। तमप्यसाधकं मत्वा तिर्यग्योनिं चतुर्मुखः॥ १९ ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु सात्त्विकः समवर्तत। तदा तुष्टोऽन्यसर्गं च चिन्तयामास वै प्रभुः॥ २० ततश्चिन्तयतस्तस्य सर्गवृद्धिं प्रजापतेः। अर्वाक्स्रोताः समुत्पन्ना मनुष्याः साधका मताः॥ २१ ते च प्रकाशबहुलास्तमोयुक्ता रजोऽधिकाः। तस्मात्ते दुःखबहुला भूयो भूयश्च कारिणः॥ २२ एते ते कथिताः सर्गा बहवो मुनिसत्तम। प्रथमो महतः सर्गस्तन्मात्राणां द्वितीयकः॥ २३ वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः। मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः॥ २४ तिर्यक्स्रोताश्च यः प्रोक्तस्तिर्यग्योनिः स उच्यते। ततोर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः॥ २५ ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमो मानुषः स्मृतः। अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विको य उदाहृतः॥ २६


[दायाँ स्तम्भ : हिन्दी अनुवाद]

इस प्रकार कल्पके आदिमें पूर्ववत् सृष्टिका चिन्तन करते समय ब्रह्माजीके बिना जाने ही असावधानता हो जानेके कारण तमोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ॥ ११—१५॥ उस समय उन महात्मासे तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामक पञ्चपर्वा (पाँच प्रकारकी) अविद्या उत्पन्न हुई। फिर सृष्टिके लिये ध्यान करते हुए ब्रह्माजीसे वृक्ष, गुल्म, लता, वीरुध् एवं तृणरूप पाँच प्रकारका स्थावरात्मक सर्ग हुआ, जो बाहर-भीतरसे प्रकाशरहित, अविद्यासे आवृत एवं ज्ञानशून्य था। सर्गसिद्धिके ज्ञाता विद्वान् इसे 'मुख्य सर्ग' समझें; (क्योंकि अचल वस्तुओंको मुख्य कहा गया है।) फिर सृष्टिके लिये ध्यान करनेपर उन ब्रह्माजीसे तिर्यक्- स्रोत नामक सृष्टि हुई। तिरछा चलनेके कारण उसकी 'तिर्यक्' संज्ञा है। उससे उत्पन्न हुआ सर्ग 'तिर्यग्योनि' कहा जाता है। वे विख्यात पशु आदि जो कुमार्गसे चलनेवाले हैं, तिर्यग्योनि कहलाते हैं। चतुर्मुख ब्रह्माजीने उस तिर्यक्स्रोता सर्गको पुरुषार्थका असाधक मानकर जब पुनः सृष्टिके लिये चिन्तन किया, तब उनसे तृतीय 'ऊर्ध्वस्रोता' नामक सर्ग हुआ। यह सत्त्वगुणसे युक्त था (यही 'देवसर्ग' है)। तब भगवान्ने प्रसन्न होकर पुनः अन्य सृष्टिके लिये चिन्तन किया। तदनन्तर सर्गकी वृद्धिके विषयमें चिन्तन करते हुए उन प्रजापतिसे 'अर्वाक्स्रोता' नामक सर्गकी उत्पत्ति हुई। इसीके अन्तर्गत मनुष्य हैं, जो पुरुषार्थके साधक माने गये हैं। इनमें प्रकाश (सत्त्वगुण), और रज—इन दो गुणोंकी अधिकता है और तमोगुण भी है। इसलिये ये अधिकतर दुःखी और अत्यधिक क्रियाशील होते हैं॥ १६—२२॥ मुनिश्रेष्ठ! इन बहुत-से सर्गोंका मैंने आपसे वर्णन किया है। इनमें 'महत्तत्त्व' को पहला सर्ग कहा गया है। दूसरा सर्ग 'तन्मात्राओं' का है। तीसरा वैकारिक सर्ग है, जो 'ऐन्द्रिय' (इन्द्रियसम्बन्धी) कहलाता है। चौथा 'मुख्य' सर्ग है। स्थावर (वृक्ष, तृण, लता आदि) ही 'मुख्य' कहे गये हैं। तिर्यक्स्रोता नामक जो पाँचवाँ सर्ग कहा गया है, वह 'तिर्यग्योनि' कहलाता है। इसके बाद छठा 'ऊर्ध्वस्रोताओं' का सर्ग है। उसे 'देवसर्ग' कहा जाता है। फिर सातवाँ अर्वाक्स्रोताओंका सर्ग है, उसे 'मानव- सर्ग' कहते हैं। आठवाँ 'अनुग्रह-सर्ग' है, जिसे 'सात्त्विक'


[पाद-टिप्पणी] In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth