संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 20, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] अनुसर्गके स्रष्टा १७
नवमो रुद्रसर्गस्तु नव सर्गाः प्रजापतेः । कहा गया है। नवाँ ‘रुद्रसर्ग' है—ये ही नौ सर्ग प्रजापतिसे पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्ते त्रयः स्मृताः । उत्पन्न हुए हैं। इनमें पहलेके तीन 'प्राकृत सर्ग' कहे प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥ २७ गये हैं। उसके बादवाले पाँच 'वैकृत सर्ग' हैं और नवाँ जो 'कौमार सर्ग' है, वह प्राकृत और वैकृत भी है। इस प्राकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेतवः । प्रकार सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त हुए ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए जो सृजतो ब्रह्मणः सृष्टिमुत्पन्ना ये मयेरिताः ॥ २८ जगत्की उत्पत्तिके मूलकारण प्राकृत और वैकृत सर्ग हैं, उनका मैंने वर्णन किया। सबके आत्मरूपसे जाननेयोग्य तं तं विकारं च परं परेशो अव्यक्तस्वरूप परमात्मा परमेश्वर भगवान् अनन्तदेव मायामधिष्ठाय सृजत्यनन्तः । अपनी मायाका आश्रय लेकर प्रेरित होते हुए-से उन- अव्यक्तरूपी परमात्मसंज्ञः उन विकारोंकी सृष्टि करते हैं ॥ २३—२९ ॥ सम्प्रेर्यमाणो निखिलात्मवेद्यः ॥ २९ । इति श्रीनरसिंहपुराणे सृष्टिरचनाप्रकारोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सृष्टिरचनाका प्रकार' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय अनुसर्गके स्रष्टा
भरद्वाज उवाच भरद्वाजजी बोले—सूतजी ! अव्यक्त जन्मा ब्रह्माजीसे नवधा सृष्टिरुत्पन्ना ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । जो नौ प्रकारकी सृष्टि हुई, उसका विस्तार किस प्रकार कथं सा ववृधे सूत एतत्कथय मेऽधुना ॥ १ हुआ ? यही इस समय आप हमें बतलाइये ॥ १ ॥ सूत उवाच सूतजी बोले—ब्रह्माजीने पहले जिन मरीचि आदि प्रथमं ब्रह्मणा सृष्टा मरीच्यादय एव च । ऋषियोंको उत्पन्न किया, उनके नाम इस प्रकार हैं— मरीचिरत्रिश्च तथा अङ्गिराः पुलहः क्रतुः ॥ २ मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, महातेजस्वी पुलस्त्य, पुलस्त्यश्च महातेजाः प्रचेता भृगुरेव च । प्रचेता, भृगु, नारद और दसवें महाबुद्धिमान् वसिष्ठ हैं। नारदो दशमश्चैव वसिष्ठश्च महामतिः ॥ ३ सनक आदि ऋषि निवृत्तिमार्गमें तत्पर हुए और एकमात्र सनकादयो निवृत्ताख्ये ते च धर्मे नियोजिताः । नारद मुनिको छोड़कर शेष सभी मरीचि आदि मुनि प्रवृत्ताख्ये मरीच्याद्या मुक्त्वैकं नारदं मुनिम् ॥ ४ प्रवृत्तिमार्गमें नियुक्त हुए ॥ २-४ ॥ योऽसौ प्रजापतिस्त्वन्यो दक्षनामाङ्गसम्भवः । ब्रह्माजीके दायें अङ्गसे उत्पन्न जो 'दक्ष' नामक तस्य दौहित्रवंशेन जगदेतच्चराचरम् ॥ ५ दूसरे प्रजापति कहे गये हैं, उनके दौहित्रोंके वंशसे यह देवाश्च दानवाश्चैव गन्धर्वोरगपक्षिणः । चराचर जगत् व्याप्त है। देव, दानव, गन्धर्व, उरग (सर्प) सर्वे दक्षस्य कन्यासु जाताः परमधार्मिकाः ॥ ६ और पक्षी—ये सभी, जो सब-के-सब बड़े धर्मात्मा थे, चतुर्विधानि भूतानि ह्यचराणि चराणि च । दक्षकी कन्याओंसे उत्पन्न हुए। चार प्रकारके चराचर वृद्धिं गतानि तान्येवमनुसर्गोद्भवानि तु ॥ ७ प्राणी अनुसर्गमें उत्पन्न होकर वृद्धिको प्राप्त हुए। अनुसर्गस्य कर्तारो मरीच्याद्या महर्षयः । महाभाग ! पूर्वोक्त मरीचिसे लेकर वसिष्ठतक सभी वसिष्ठान्ता महाभाग ब्रह्मणो मानसोद्भवाः ॥ ८ श्रीब्रह्माजीकी मानस संतान हैं। ये सब अनुसर्गके स्रष्टा हैं।