भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 318 में से

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पृष्ठ 21

१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५ सर्गे तु भूतानि धियश्च खानि ख्यातानि सर्वं सृजते महात्मा। स एव पश्चाच्चतुरास्यरूपी मुनिस्वरूपी च सृजत्यनन्तः ॥ ९ सर्ग अर्थात् आदिसृष्टिमें महात्मा भगवान् नारायण पाँच महाभूत, बुद्धि तथा पूर्वोक्त इन्द्रियवर्ग-इन सबको उत्पन्न करते हैं। इसके पश्चात् (अनुसर्गकालमें) वे अनन्तदेव स्वयं ही चतुर्मुख ब्रह्मा और मरीचि आदि मुनियोंके रूपसे प्रकट हो जगत्की सृष्टि करते हैं॥५-९॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें चौथा अध्याय पूरा हुआ॥४॥

पाँचवाँ अध्याय रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार

भरद्वाज उवाच रुद्रसर्गं तु मे ब्रूहि विस्तरेण महामते। पुनः सर्वे मरीच्याद्याः ससृजुस्ते कथं पुनः ॥ १ मित्रावरुणपुत्रत्वं वसिष्ठस्य कथं भवेत्। ब्रह्मणो मनसः पूर्वमुत्पन्नस्य महामते॥ २ सूत उवाच रुद्रसृष्टिं प्रवक्ष्यामि तत्सर्गांश्चैव सत्तम। प्रतिसर्गं मुनीनां तु विस्तराद्वदतः शृणु॥ ३ कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतःस्ततः। प्रादुरासीत् प्रभोरङ्के कुमारो नीललोहितः॥ ४ अर्धनारीनरवपुः प्रचण्डोऽतिशरीरवान्। तेजसा भासयन् सर्वा दिशश्च प्रदिशश्च सः॥ ५ तं दृष्ट्वा तेजसा दीप्तं प्रत्युवाच प्रजापतिः। विभजात्मानमद्य त्वं मम वाक्यान्महामते॥ ६ इत्युक्तो ब्रह्मणा विप्र रुद्रस्तेन प्रतापवान्। स्त्रीभावं पुरुषत्वं च पृथक् पृथगथाकरोत्॥ ७ बिभेद पुरुषत्वं च दशधा चैकधा च सः। तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणु मे द्विजसत्तम॥ ८ अजैकपादहिर्बुध्न्यः कपाली रुद्र एव च। हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः॥ ९ वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा। एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ १०

श्रीभरद्वाजजी बोले- महामते! अब मुझसे 'रुद्रसर्ग' का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये तथा यह भी बताइये कि मरीचि आदि ऋषियोंने पहले किस प्रकार सृष्टि की? महाबुद्धिमान् सूत ! वसिष्ठजी तो पहले ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न हुए थे; फिर वे मित्रावरुणके पुत्र कैसे हो गये? ॥१-२॥ सूतजी बोले-साधुशिरोमणे! आपके प्रश्नानुसार मैं अब रुद्र-सृष्टिका तथा उसमें होनेवाले सर्गोंका वर्णन करूँगा, साथ ही मुनियोंद्वारा सम्पादित प्रतिसर्ग (अनुसर्ग)-को भी मैं विस्तारके साथ बताऊँगा; आपलोग ध्यानसे सुनें। कल्पके आदिमें प्रभु ब्रह्माजी अपने ही समान शक्तिशाली पुत्र होनेका चिन्तन कर रहे थे। उस समय उनकी गोदमें एक नीललोहित वर्णका बालक प्रकट हुआ। उसका आधा शरीर स्त्रीका और आधा पुरुषका था। वह प्रचण्ड एवं विशालकाय था और अपने तेजसे दिशाओं तथा अवान्तर दिशाओंको प्रकाशित कर रहा था। उसे तेजसे देदीप्यमान देख प्रजापतिने कहा- 'महामते ! इस समय मेरे कहनेसे तुम अपने शरीरके दो भाग कर लो।' विप्र! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी रुद्रने अपने स्त्रीरूप और पुरुषरूपको अलग-अलग कर लिया। द्विजश्रेष्ठ ! फिर पुरुषरूपको उन्होंने ग्यारह स्वरूपोंमें विभक्त किया; मैं उन सबके नाम बतलाता हूँ, सुनें। अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य, कपाली, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी और रैवत-ये 'ग्यारह रुद्र' कहे गये हैं, जो तीनों