भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 318 में से

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पृष्ठ 22

अध्याय ५ ] रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार १९ स्त्रीत्वं चैव तथा रुद्रो बिभेद दशधैकधा। भुवनोंके स्वामी हैं। पुरुषकी भाँति स्त्रीरूपके भी रुद्रने उमैव बहुरूपेण पत्नी सैव व्यवस्थिता॥ ११ ग्यारह विभाग किये। भगवती उमा ही अनेक रूप धारण कर इन सबकी पत्नी हैं॥ ३—११॥ तपः कृत्वा जले घोरमुत्तीर्णः स यदा पुरा। विप्रेन्द्र! पूर्वकालमें प्रतापी रुद्रदेव जलमें घोर तपस्या तदा स सृष्टवान् देवो रुद्रस्तत्र प्रतापवान्॥ १२ करके जब बाहर निकले, तब अपने तपोबलसे उन्होंने तपोबलेन विप्रेन्द्र भूतानि विविधानि च। वहाँ नाना प्रकारके भूतोंकी सृष्टि की। सिंह, ऊँट और पिशाचान् राक्षसांश्चैव सिंहोष्ट्रमकराननान्॥ १३ मगरके समान मुँहवाले पिशाचों, राक्षसों तथा वेताल वेतालप्रमुखान् भूतानन्यांश्चैव सहस्रशः। आदि अन्य सहस्रों भूतोंको उत्पन्न किया। साढ़े तीस विनायकानामुग्राणां त्रिंशत्कोट्यर्थमेव च॥ १४ करोड़ उग्र स्वभाववाले विनायकगणोंकी सृष्टि की तथा अन्यकार्यं समुद्दिश्य सृष्टवान् स्कन्दमेव च। दूसरे कार्यके उद्देश्यसे स्कन्दको उत्पन्न किया। इस एवं प्रकारो रुद्रोऽसौ मया ते कीर्तितः प्रभुः॥ १५ प्रकार भगवान् रुद्र तथा उनके सर्गका मैंने आपसे वर्णन किया॥ १२—१५॥ अनुसर्गं मरीच्यादेः कथयामि निबोध मे। अब मरीचि आदि ऋषियोंके अनुसर्गका वर्णन देवादिस्यावरान्ताश्च प्रजाः सृष्टाः स्वयम्भुवा॥ १६ करता हूँ, आप सुनें। स्वयम्भू ब्रह्माजीने देवताओंसे यदास्य च प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः। लेकर स्थावरोंतक सारी प्रजाओंकी सृष्टि की। किंतु इन तदा मानसपुत्रान् स सदृशानात्मनोऽसृजत्॥ १७ बुद्धिमान् ब्रह्माजीकी ये सब प्रजाएँ जब वृद्धिको प्राप्त मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्। नहीं हुई, तब इन्होंने अपने ही समान मानस-पुत्रोंकी प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं चैव महामतिम्॥ १८ सृष्टि की। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः। प्रचेता, वसिष्ठ और महाबुद्धिमान् भृगुको उत्पन्न किया। अग्निश्च पितरश्चैव ब्रह्मपुत्रौ तु मानसौ॥ १९ ये लोग पुराणमें नौ ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। ब्रह्मन् ! सृष्टिकाले महाभागौ ब्रह्मन् स्वायम्भुवोद्गतौ। अग्नि और पितर भी ब्रह्माके ही मानस-पुत्र हैं। इन दोनों शतरूपां च सृष्ट्वा तु कन्यां स मनवे ददौ॥ २० महाभागोंको सृष्टिकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने उत्पन्न किया। फिर उन्होंने 'शतरूपा' नामक कन्याकी सृष्टि करके उसे मनुको दे दिया॥ १६—२०॥ तस्माच्च पुरुषाद्देवी शतरूपा व्यजायत। उन स्वायम्भुव मनुसे देवी शतरूपाने 'प्रियव्रत' प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूतिं चैव कन्यकाम्॥ २१ और 'उत्तानपाद' नामक दो पुत्र उत्पन्न किये और ददौ प्रसूतिं दक्षाय मनुः स्वायम्भुवः सुताम्। 'प्रसूति' नामवाली एक कन्याको जन्म दिया। स्वायम्भुव प्रसूत्यां च तदा दक्षश्चतुर्विंशतिकं तथा॥ २२ मनुने अपनी कन्या प्रसूति दक्षको ब्याह दी। दक्षने ससर्ज कन्यकास्तासां शृणु नामानि मेऽधुना। प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। अब मुझसे उन श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा तथा क्रिया॥ २३ कन्याओंके नाम सुनें—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी। मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और अपत्यार्थं प्रजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः॥ २४ तेरहवीं कीर्ति थी। भगवान् धर्मने संतानोत्पत्तिके लिये श्रद्धादीनां तु पत्नीनां जाताः कामादयः सुताः। इन तेरह कन्याओंका पाणिग्रहण किया। धर्मकी इन धर्मस्य पुत्रपौत्राद्यैर्धर्मवंशो विवर्धितः॥ २५ श्रद्धा आदि पत्नियोंके गर्भसे काम आदि पुत्र उत्पन्न हुए। अपने पुत्र और पौत्र आदिसे धर्मका वंश खूब बढ़ा॥ २१—२५॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth