संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 17, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३ अष्टौ शतसहस्राणि दिव्याया संख्यया स्मृतः। काल है। इस प्रकार दिव्य वर्ष-गणनाके अनुसार द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु ॥ १९ यह मन्वन्तर आठ लाख बावन हजार वर्षोंका समय त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज। कहा गया है। महामुने! द्विजवर! मानवीय वर्ष-गणनाके सप्तषष्टिश्च तथान्यानि नियुतानि महामुने ॥ २० अनुसार पूरे तीस करोड़, सरसठ लाख, बीस हजार विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना। वर्षोंका काल एक मन्वन्तरका परिमाण है, इससे अधिक मन्वन्तरस्य संख्येयं मानुषैर्वत्सरैर्द्विज ॥ २१ नहीं ॥ १२–२१ ॥ चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्राह्मामहः स्मृतम्। इस कालका चौदह गुना ब्रह्माका एक दिन होता विश्वस्यादौ सुमनसा सृष्ट्वा देवांस्तथा पितॄन् ॥ २२ है। ब्रह्माजीने विश्व-सृष्टिके आदिकालमें प्रसन्न मनसे देवताओं गन्धर्वान् राक्षसान् यक्षान् पिशाचान् गुह्यकांस्तथा। तथा पितरोंकी सृष्टि करके गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, पिशाच, ऋषीन् विद्याधराँश्चैव मनुष्यांश्च पशूंस्तथा ॥ २३ गुह्यक, ऋषि, विद्याधर, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर (वृक्ष, पक्षिणः स्थावरांश्चैव पिपीलिकभुजंगमान् । पर्वत आदि), पिपीलिका (चींटी) और साँपोंकी रचना चातुर्वर्ण्यं तथा सृष्ट्वा नियुज्याध्वरकर्मणि ॥ २४ की है। फिर चारों वर्णोंकी सृष्टि करके वे उन्हें यज्ञकर्ममें पुनर्दिनान्ते त्रैलोक्यमुपसंहृत्य स प्रभुः । नियुक्त करते हैं। तत्पश्चात् दिन बीतनेपर वे अविनाशी शेते चानन्तशयने तावतीं रात्रिमव्ययः ॥ २५ प्रभु त्रिभुवनका उपसंहार करके दिनके ही बराबर तस्यान्तेऽभून्महाकल्पो ब्राह्म इत्यभिविश्रुतः । परिमाणवाली रात्रिमें शेषनागकी शय्यापर सोते हैं। उस यस्मिन् मत्स्यावतारोऽभून्मथनं च महोदधेः ॥ २६ रात्रिके बीतनेपर 'ब्राह्म' नामक विख्यात महाकल्प हुआ, तद्वद्वाराहकल्पश्च तृतीयः परिकल्पितः । जिसमें भगवान्का मत्स्यावतार और समुद्र-मन्थन हुआ। यत्र विष्णुः स्वयं प्रीत्या वाराहं वपुराश्रितः । इस ब्राह्म-कल्पके ही समान तीसरा 'वाराह-कल्प' हुआ, उद्धर्तुं वसुधां देवीं स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ २७ जिसमें कि भगवती वसुंधरा (पृथ्वी)-का उद्धार करनेके सृष्ट्वा जगद्व्योमचराप्रमेयः लिये साक्षात् भगवान् विष्णुने प्रसन्नतापूर्वक वाराहरूप प्रजाश्च सृष्ट्वा सकलास्तथेशः । धारण किया। उस समय महर्षिगण उनकी स्तुति करते नैमित्तिकाख्ये प्रलये समस्तं थे। स्थलचर और आकाशचारी जीवोंके द्वारा जिनकी इयत्ताको संहृत्य शेते हरिरादिदेवः ॥ २८ जान लेना नितान्त असम्भव है, वे आदिदेव भगवान् विष्णु समस्त प्रजाओंकी सृष्टि कर 'नैमित्तिक प्रलय' में सबका संहार करके शयन करते हैं ॥ २२–२८ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सर्गरचनायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सृष्टिरचनाविषयक' दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥ ────────────────────────── तीसरा अध्याय ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण सूत उवाच सूतजी बोले—महाभाग ! नैमित्तिक प्रलयकालमें तत्र सुप्तस्य देवस्य नाभौ पद्ममभून्महत् । सोये हुए भगवान् नारायणकी नाभिमें एक महान् कमल तस्मिन् पद्मे महाभाग वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १ उत्पन्न हुआ। उसीसे वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी ब्रह्माजीका ब्रह्मोत्पन्नः स तेनोक्तः प्रजां सृज महामते । प्रादुर्भाव हुआ। तब उनसे भगवान् नारायणने कहा— एवमुक्त्वा तिरोभावं गतो नारायणः प्रभुः ॥ २ 'महामते ! तुम प्रजाकी सृष्टि करो' और यह कहकर वे In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth