भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 318 में से

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पृष्ठ 29

२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६ त्रिधा समभवद्रेतः कमलेऽथ स्थले जले। अरविन्दे वसिष्ठस्तु जातः स मुनिसत्तमः। स्थले त्वगस्त्यः सम्भूतो जले मत्स्यो महाद्युतिः ॥ ३५ स तत्र जातो मतिमान् वसिष्ठः कुम्भे त्वगस्त्यः सलिलेऽथ मत्स्यः। स्थानत्रये तत्पतितं समानं मित्रस्य यस्माद्वरुणस्य रेतः ॥ ३६ एतस्मिन्नेव काले तु गता सा उर्वशी दिवम्। उपेत्य तानृषीन् देवौ गतौ भूयः स्वमाश्रमम्। यमावपि तु तप्येते पुनरुग्रं परं तपः ॥ ३७ गिरे हुए वीर्यमेंसे जो भाग कमलपर गिरा था, उसीसे वसिष्ठजी हुए। उन दोनों देवताओंका वीर्य तीन भागोंमें विभक्त होकर कमल, जल और स्थलपर (घड़ेमें) गिरा। कमलपर गिरे हुए वीर्यसे मुनिवर वसिष्ठ उत्पन्न हुए, स्थलपर गिरे हुए रेतस्‌से अगस्त्य और जलमें गिरे हुए शुक्रसे अत्यन्त कान्तिमान् मत्स्यकी उत्पत्ति हुई। इस तरह उस कमलपर बुद्धिमान् वसिष्ठ, कुम्भमें अगस्त्य और जलमें मत्स्यका आविर्भाव हुआ; क्योंकि मित्रावरुणका वीर्य तीनों स्थानोंपर बराबर गिरा था। इसी समय उर्वशी स्वर्गलोकमें चली गयी। वसिष्ठ और अगस्त्य—इन दोनों ऋषियोंको साथ लेकर वे दोनों देवता पुनः अपने आश्रममें लौट आये और पुनः उन दोनोंने अत्यन्त उग्र तप आरम्भ किया ॥ ३४–३७ ॥ तपसा प्राप्तुकामौ तौ परं ज्योतिः सनातनम्। तपस्यन्तौ सुरश्रेष्ठौ ब्रह्माऽऽगत्येदमब्रवीत् ॥ ३८ मित्रावरुणकौ देवौ पुत्रवन्तौ महाद्युती। सिद्धिर्भविष्यति यथा युवयोर्वैष्णवी पुनः ॥ ३९ स्वाधिकारेण स्थीयेतामधुना लोकसाक्षिकौ। इत्युक्त्वान्तर्दधे ब्रह्मा तौ स्थितौ स्वाधिकारकौ ॥ ४० तपस्याके द्वारा सनातन परम ज्योति (ब्रह्मधाम)–को प्राप्त करनेकी इच्छावाले उन दोनों तपस्वी देवेश्वरोंसे ब्रह्माजीने आकर यह कहा—'महान् कान्तिमान् और पुत्रवान् मित्र तथा वरुण देवताओ! तुम दोनोंको पुनः वैष्णवी सिद्धि प्राप्त होगी। इस समय संसारके साक्षीरूपसे तुम लोग अपने अधिकारपर स्थित हो जाओ।' यों कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और वे दोनों देवता अपने अधिकृत पदपर स्थित हुए ॥ ३८–४० ॥ एवं ते कथितं विप्र वसिष्ठस्य महात्मनः। मित्रावरुणपुत्रत्वमगस्त्यस्य च धीमतः ॥ ४१ इदं पुंसीयमाख्यानं वारुणं पापनाशनम्। पुत्रकामास्तु ये केचिच्छृण्वन्तीदं शुचिव्रताः। अचिरादेव पुत्रांस्ते लभन्ते नात्र संशयः ॥ ४२ यश्चैतत्पठते नित्यं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः। देवाश्च पितरस्तस्य तृप्ता यान्ति परं सुखम् ॥ ४३ यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः। नन्दते स सुखं भूमौ विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ४४ इत्येतदाख्यानमिदं मयेरितं पुरातनं वेदविद्वैरुदीरितम्। पठिष्यते यस्तु शृणोति सर्वदा स याति शुद्धो हरिलोकमञ्जसा ॥ ४५ ब्राह्मण! इस प्रकार महात्मा वसिष्ठजी और बुद्धिमान् अगस्त्यजी जिस तरह मित्रावरुणके पुत्र हुए थे, वह सब प्रसङ्ग मैंने आपसे कह दिया। यह वरुणदेवता-सम्बन्धी पुंसवनाख्यान पाप नष्ट करनेवाला है। जो लोग पुत्रकी कामनासे शुद्ध व्रतका आचरण करते हुए इसका श्रवण करते हैं, वे शीघ्र ही अनेक पुत्र प्राप्त करते हैं—इसमें संदेह नहीं है। जो उत्तम ब्राह्मण हव्य (देवयाग) और कव्य (पितृयाग)-में इसका पाठ करता है, उसके देवता तथा पितर तृप्त होकर अत्यन्त सुख प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य नित्य प्रातःकाल उठकर इसका श्रवण करता है, वह पृथ्वीपर सुखपूर्वक प्रसन्नताके साथ रहता है और फिर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। वेदवेत्ताओंके द्वारा प्रतिपादित इस पुरातन उपाख्यानको, जिसे मैंने कहा है, जो लोग सादर पढ़ेंगे और सुनेंगे, वे शुद्ध होकर अनायास ही विष्णुलोकको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४१–४५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे पुंसवनाख्यानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पुंसवन' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

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