भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

अध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ २७ सातवाँ अध्याय मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र' का पाठ और मृत्युपर विजय प्राप्त करना श्रीभरद्वाज उवाच │ श्रीभरद्वाजजी बोले—सूतजी! मार्कण्डेय मुनिने मार्कण्डेयेन मुनिना कथं मृत्युः पराजितः। │ मृत्युको कैसे पराजित किया? यह मुझे बताइये। आपने एतदाख्याहि मे सूत त्वयैतत् सूचितं पुरा॥ १ │ पहले यह सूचित किया था कि वे मृत्युपर विजयी │ हुए थे*॥ १॥ सूत उवाच │ सूतजी बोले—भरद्वाजजी! इस महान् पुरातन इदं तु महदाख्यानं भरद्वाज शृणुष्व मे। │ इतिहासको आप और ये सभी ऋषि सुनें; मैं कह रहा शृण्वन्तु ऋषयश्चेमे पुरावृत्तं ब्रवीम्यहम्॥ २ │ हूँ। अत्यन्त पवित्र कुरुक्षेत्रमें, व्यासपीठपर, एक सुन्दर कुरुक्षेत्रे महापुण्ये व्यासपीठे वराश्रमे। │ आश्रममें स्नान तथा जप आदि समाप्त करके व्यासासनपर तत्रासीनं मुनिवरं कृष्णद्वैपायनं मुनिम्॥ ३ │ बैठे हुए और शिष्यभूत मुनियोंसे घिरे हुए मुनिवर कृतस्नानं कृतजपं मुनिशिष्यैः समावृतम्। │ महर्षि कृष्णद्वैपायनसे, जो वेद और वेदार्थोंके तत्त्ववेत्ता वेदवेदार्थतत्त्वज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम्॥ ४ │ तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ थे, परम धर्मात्मा शुकदेवजीने प्रणिपत्य यथान्यायं शुकः परमधार्मिकः। │ हाथ जोड़ उन्हें यथोचितरूपसे प्रणाम कर इसी विषयको इममेवार्थमुद्दिश्य तं पप्रच्छ कृताञ्जलिः॥ ५ │ जाननेके लिये प्रश्न किया था, जिसके लिये कि इन यमुद्दिश्य वयं पृष्टास्त्वयात्र मुनिसंनिधौ। │ मुनियोंके निकट आप पुण्यतीर्थनिवासी नृसिंहभक्तने नरसिंहस्य भक्तेन कृततीर्थनिवासिना॥ ६ │ मुझसे पूछा है॥ २–६॥ श्रीशुक उवाच │ श्रीशुकदेवजी बोले—पिताजी! मार्कण्डेय मुनिने मार्कण्डेयेन मुनिना कथं मृत्युः पराजितः। │ मृत्युपर कैसे विजय पायी? यह कथा कहिये। इस एतदाख्याहि मे तात श्रोतुमिच्छामि तेऽधुना॥ ७ │ समय मैं आपसे यही सुनना चाहता हूँ॥ ७॥ व्यास उवाच │ व्यासजी बोले—महामते पुत्र! मार्कण्डेय मुनिने मार्कण्डेयेन मुनिना यथा मृत्युः पराजितः। │ जिस प्रकार मृत्युपर विजय पायी, वह तुमसे कहता तथा ते कथयिष्यामि शृणु वत्स महामते॥ ८ │ हूँ, सुनो। मुझसे कहे जानेवाले इस महान् एवं उत्तम शृण्वन्तु मुनयश्चेमे कथ्यमानं मयाधुना। │ उपाख्यानको ये सभी मुनि और मेरे शिष्यगण भी सुनें। मच्छिष्याश्चैव शृण्वन्तु महदाख्यानमुत्तमम्॥ ९ │

  • यद्यपि नरसिंहपुराणके गत अध्यायोंमें मार्कण्डेयजीका नाम कहीं नहीं आया है। अतः 'आपने पहले यह सूचित किया था— (त्वयैतत् सूचितं पुरा)' इत्यादि कथनकी कोई संगति नहीं प्रतीत होती, तथापि प्रथम अध्यायके पंद्रहवें श्लोकसे इस बातकी सूचना मिलती है कि भरद्वाजजीने सूतजीके मुखसे पहले 'वाराहीसंहिता' सुनी थी, उसके बाद उन्होंने 'नरसिंहसंहिता' सुननेकी इच्छा प्रकट की। तब सूतजीने 'नरसिंहसंहिता' सुनाना आरम्भ किया था। अतः यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वाराहीसंहिता-श्रवणके प्रसंगमें भरद्वाजजीको सूतजीके मुखसे मार्कण्डेयजीके मृत्युपर विजय पानेके इतिहासकी कोई सूचना प्राप्त हुई हो, जिसका स्मरण उन्होंने यहाँ दिलाया है।