भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

अध्याय ६ ] अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग २५ बहुगुल्मलताकीर्णो नानापक्षिनिषेवितः । जो बहुत-सी झाड़ियों और बेलोंसे आवृत है; अनेकानेक नानातरुवनच्छन्नो नलिन्या चोपशोभितः ॥ २४ पक्षी उसका सेवन करते हैं। वह भाँति-भाँतिके वृक्षसमूहोंसे आच्छन्न और कमलोंसे सुशोभित है। उस सरोवरकी पौण्डरीक इति ख्यातो मीनकच्छपसेवितः । 'पौण्डरीक' नामसे प्रसिद्धि है। उसमें बहुत-सी मछलियाँ ततस्तु मित्रावरुणौ भ्रातरौ वनचारिणौ । और कछुए निवास करते हैं। तप आरम्भ करनेके तं तु देशं गतौ देवौ विचरन्तौ यदृच्छया ॥ २५ पश्चात् वे दोनों भाई—मित्र और वरुणदेवता एक दिन वनमें विचरण करते और स्वेच्छानुसार घूमते हुए उस सरोवरकी ओर गये ॥ २०-२५ ॥ ताभ्यां तत्र तदा दृष्टा उर्वशी तु वराप्सराः । वहाँ उन दोनोंने उस समय श्रेष्ठ एवं सुन्दरी अप्सरा स्नायन्ती सहितान्याभिः सखीभिः सा वरानना । उर्वशीको देखा, जो अपनी अन्य सहेलियोंके साथ स्नान गायन्ती च हसन्ती च विश्वस्ता निर्जने वने ॥ २६ कर रही थी। वह सुमुखी अप्सरा उस निर्जन वनमें विश्वस्त होकर हँसती और गाती थी। उसका वर्ण गोरा था। कमलके गौरी कमलगर्भाभा स्निग्धकृष्णाशिरोरुहा । भीतरी भागके समान उसकी कान्ति थी। उसकी अलकें पद्मपत्रविशालाक्षी रक्तोष्ठी मृदुभाषिणी ॥ २७ काली-काली और चिकनी थीं, आँखें कमल-दलके समान बड़ी-बड़ी थीं, होठ लाल थे, उसका भाषण शङ्खकुन्देन्दुधवलैर्दन्तैरविरलैः समैः । बहुत ही मधुर था। उसके दाँत शङ्ख, कुन्द और चन्द्रमाके सुभ्रूः सुनासा सुमुखी सुललाटा मनस्विनी ॥ २८ समान श्वेत, परस्पर मिले हुए और बराबर थे। उस मनस्विनीकी भौंहें, नासिका, मुख और ललाट—सभी सिंहवत् सूक्ष्ममध्याङ्गी पीनोरुजघनस्तनी । सुन्दर थे। कटिभाग सिंहके कटिप्रदेशकी भाँति पतला मधुरालापचतुरा सुमध्‍या चारुहासिनी ॥ २९ था। उरोज, ऊरु और जघन—ये मोटे और घने थे। वह मधुर भाषण करनेमें चतुर थी। उसका मध्यभाग रक्तोत्पलकरा तन्वी सुपदी विनयान्विता । सुन्दर और मुस्कान मनोहर थी। दोनों हाथ लाल कमलके पूर्णचन्द्रनिभा बाला मत्तद्विरदगामिनी ॥ ३० समान सुन्दर एवं कोमल थे। शरीर पतला और पैर सुन्दर थे। वह बाला बड़ी ही विनीता थी। उसका मुख दृष्ट्वा तस्यास्तु तद्रूपं तौ देवौ विस्मयं गतौ । पूर्णचन्द्रके समान आह्लादजनक और गति मत्त गजराजके तस्या हास्येन लास्येन स्मितेन ललितेन च ॥ ३१ समान मन्द थी। उर्वशीके उस दिव्य रूपको देखकर वे दोनों देवता विस्मयमें पड़ गये। उसके लास्य (नृत्य), मृदुना वायुना चैव शीतानिलसुगन्धिना । हास्य, ललितभाव-मिश्रित मन्द मुस्कान और मधुर सुरीले मत्तभ्रमरगीतेन पुंस्कोकिलरुतेन च ॥ ३२ गानसे तथा शीतल-मन्द-सुगन्धित मलयानलके स्पर्शसे एवं मतवाले भौंरोंके संगीत और कोकिलोंके कलरवसे सुस्वरेण हि गीतेन उर्वश्या मधुरेण च । उन दोनोंका मन और भी मुग्ध हो गया। साथ ही ईक्षितो च कटाक्षेण स्कन्दतुस्तावूभावपि । उर्वशीकी तिरछी चितवनके शिकार होकर वे दोनों निमेः शापादथोत्क्रम्य स्वदेहान्मुनिसत्तम ॥ ३३ ही वहाँ स्खलित हो गये (उनके वीर्यका पतन हो गया)। मुनिसत्तम ! इसके बाद निमिके शापवश* वसिष्ठजीका वसिष्ठ मित्रावरुणात्मजोऽसी- जीवात्मा अपने शरीरसे पृथक् होकर (मित्रावरुणके त्यथोचुरागत्य हि विश्वदेवाः । वीर्यमें आविष्ट हुआ) ॥ २६-३३ ॥ रेतस्त्रिभागं कमलेऽचरत्तद् 'वसिष्ठ ! तुम मित्रावरुणके पुत्र होओगे'—इस प्रकार वसिष्ठ एवं तु पितामहोक्तेः ॥ ३४ विश्वेदेवोंने (निमिके शुक्रमें) आकर कहा था तथा ब्रह्माजीका भी यही कथन था; अतएव मित्रावरुणके तीन स्थानोंपर

  • एक बार राजा निमिने यज्ञ करनेकी इच्छासे अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे परामर्श किया। वसिष्ठजीने कहा—'मैं देवलोकमें एक यज्ञ आरम्भ करा चुका हूँ। उसके समाप्त होनेतक आप अपना यज्ञ रोके रहें। वहाँसे आकर हम आपका यज्ञ आरम्भ करायेंगे।' निमिने उनकी प्रतीक्षा नहीं की। वसिष्ठजीने लौटनेपर यज्ञ होता देख राजाको शाप दिया कि 'तुम विदेह हो जाओ।' तब राजाने भी शाप दिया कि 'आपका भी यह शरीर न रहे।'