संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 12, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न ९ देवादीनां कथं सृष्टिर्मनोर्मन्वन्तरस्य तु। देवताओंकी सृष्टि कैसे हुई? मनु, मन्वन्तर एवं विद्याधर तथा विद्याधरादीनां सृष्टिरादौ कथं भवेत्॥ २३ आदिकी सृष्टि किस प्रकार होती है? कौन-कौन राजा यज्ञ करनेवाले हुए हैं और किस-किसने परम उत्तम यज्वानः के च राजानः के च सिद्धिं परां गताः। सिद्धि प्राप्त की है?' महाभाग! ये सारी बातें आप एतत्सर्वं महाभाग कथयस्व यथाक्रमम्॥ २४ क्रमशः बताइये ॥ १५-२४॥ सूत उवाच सूतजी बोले-तपोधनो! मैं जिन गुरुदेव व्यासजीके व्यासप्रसादाज्जानामि पुराणानि तपोधनाः। प्रसादसे पुराणोंका ज्ञान प्राप्त कर सका हूँ, उनकी भक्तिपूर्वक वन्दना करके आपलोगोंसे नरसिंहपुराणकी तं प्रणम्य प्रवक्ष्यामि पुराणं नारसिंहकम्॥ २५ कथा कहना आरम्भ करता हूँ। जो समस्त देवताओंके पाराशर्यं परमपुरुषं विश्वदेवैकयोनिं एकमात्र कारण और वेदों तथा उनके छहों अङ्गोंद्वारा जाननेयोग्य परम पुरुष विष्णुके स्वरूप हैं; जो विद्यावान्, विद्यावन्तं विपुलमतिदं वेदवेदाङ्गवेद्यम्। विमल बुद्धिदाता, नित्य शान्त, विषयकामनाशून्य और शश्वच्छान्तं शमितविषयं शुद्धतेजो विशालं पापरहित हैं, उन विशुद्ध तेजोमय महात्मा पराशरनन्दन वेदव्यासं विगतशमलं सर्वदाहं नमामि॥ २६ वेदव्यासजीको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। उन अमित नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे। तेजस्वी भगवान् व्यासजीको नमस्कार है, जिनकी कृपासे मैं भगवान् वासुदेवकी इस कथाको कह सकूँगा। यस्य प्रसादाद्वक्ष्यामि वासुदेवकथामिमाम्॥ २७ मुनिगण! आपलोगोंने भलीभाँति विचार करके मुझसे सुनिर्णीतो महान् प्रश्नस्त्वया यः परिकीर्तितः। जो महान् प्रश्न पूछे हैं, उनका उत्तर भगवान् विष्णुकी विष्णुप्रसादेन विना वक्तुं केनापि शक्यते ॥ २८ कृपा हुए बिना कौन बतला सकता है? तथापि भरद्वाजजी! भगवान् नरसिंहकी कृपाके बलसे ही आपके प्रश्नोंके तथापि नरसिंहस्य प्रसादादेव तेऽधुना। उत्तरमें अत्यन्त पवित्र नरसिंहपुराणकी कथा आरम्भ प्रवक्ष्यामि महापुण्यं भारद्वाज शृणुष्व मे॥ २९ करता हूँ। आप ध्यानसे सुनें। अपने शिष्योंके साथ जो- जो मुनि यहाँ उपस्थित हैं, वे सब लोग भी सावधान शृण्वन्तु मुनयः सर्वे सशिश्यास्त्वत्र ये स्थिताः। होकर सुनें। मैं सभीको यथावत् रूपसे नरसिंहपुराणकी पुराणं नरसिंहस्य प्रवक्ष्यामि यथातथा॥ ३० कथा सुनाता हूँ॥ २५-३०॥ नारायणादिदं सर्वं समुत्पन्नं चराचरम्। यह समस्त चराचर जगत् भगवान् नारायणसे ही तेनैव पाल्यते सर्वं नरसिंहादिमूर्तिभिः ॥ ३१ उत्पन्न हुआ और वे ही नरसिंहादि रूपोंसे सबका पालन करते हैं। इसी प्रकार अन्तमें यह जगत् उन्हीं ज्योतिःस्वरूप तथैव लीयते चान्ते हरौ ज्योतिःस्वरूपिणि। भगवान् विष्णुमें लीन हो जाता है। भगवान् जिस प्रकार यथैव देवः सृजति तथा वक्ष्यामि तच्छृणु॥ ३२ सृष्टि करते हैं, उसे मैं बतलाता हूँ, आप सुनें। सृष्टिकी कथा पुराणोंमें ही विस्तारके साथ वर्णित है, अतः पुराणानां हि सर्वेषामयं साधारणः स्मृतः। पुराणोंका लक्षण बतानेके लिये यह एक श्लोक साधारणतया श्लोको यस्तं मुने श्रुत्वा निःशेषं त्वं ततः शृणु॥ ३३ सभी पुराणोंमें कहा गया है। मुने! इस श्लोकको पहले सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। सुनकर फिर सारी बातें सुनियेगा। यह श्लोक इस प्रकार है-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित- वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ ३४ इन्हीं पाँच लक्षणोंसे युक्त 'पुराण' होता है। आदिसर्ग, आदिसर्गोऽनुसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। अनुसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित-इन सबका वंशानुचरितं चैव वक्ष्याम्यनुसमासतः ॥ ३५ मैं क्रमशः संक्षेपस्वरूपसे वर्णन करता हूँ॥ ३१-३५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth