संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 13, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१० श्रीमन्नरसिंहपुराण [ अध्याय १ आदिसर्गो महांस्तावत् कथयिष्यामि वै द्विजाः। द्विजगण! आदिसर्ग महान् है, अतः पहले मैं यस्मादारभ्य देवानां राज्ञां चरितमेव च॥ ३६ उसीका वर्णन करता हूँ। वहाँसे सृष्टिका वर्णन आरम्भ करनेपर देवताओं और राजाओंके चरित्रोंका तथा ज्ञायते सरहस्यं च परमात्मा सनातनः। सनातन परमात्माके तत्त्वका भी रहस्यसहित ज्ञान हो प्राक्सृष्टेः प्रलयादूर्ध्वं नासीत् किंचिद्द्विजोत्तम॥ ३७ जाता है। द्विजोत्तम! सृष्टिके पहले महाप्रलय होनेके बाद (परब्रह्मके सिवा) कुछ भी शेष नहीं था। उस ब्रह्मसंज्ञमभूदेकं ज्योतिष्मत्सर्वकारणम्। समय एकमात्र 'ब्रह्म' नामक तत्त्व ही विद्यमान था, नित्यं निरञ्जनं शान्तं निर्गुणं नित्यनिर्मलम्॥ ३८ जो परम प्रकाशमय और सबका कारण है। वह नित्य, निरञ्जन, शान्त, निर्गुण एवं सदा ही दोषरहित है। मुमुक्षु आनन्दसागरं स्वच्छं यं काङ्क्षन्ति मुमुक्षवः। पुरुष विशुद्ध आनन्द-महासागर परमेश्वरकी अभिलाषा सर्वज्ञं ज्ञानरूपत्वादनन्तमजमव्ययम्॥ ३९ किया करते हैं। वह ज्ञानस्वरूप होनेके कारण सर्वज्ञ, अनन्त, अजन्मा और अव्यय (अविकारी) है। सृष्टि- सर्गकाले तु सम्प्राप्ते ज्ञात्वाऽसौ ज्ञातृनायकः। रचनाका समय आनेपर उसी ज्ञानीश्वर परब्रह्मने जगत्को अन्तर्लीनं विकारं च तत्तत्स्रष्टुमुपचक्रमे॥ ४० अपनेमें लीन जानकर पुनः उसकी सृष्टि आरम्भ की॥ ३६—४०॥ तस्मात् प्रधानमुद्भूतं ततश्चापि महानभूत्। उस ब्रह्मसे प्रधान (मूलप्रकृति)-का आविर्भाव सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान्॥ ४१ हुआ। प्रधानसे महत्तत्त्व प्रकट हुआ। सात्त्विक, राजस और तामस-भेदसे महत्तत्त्व तीन प्रकारका है। महत्तत्त्वसे वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः। वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) और भूतादिरूप त्रिविधोऽयमहंकारो महत्तत्त्वादजायत॥ ४२ (तामस)—इन तीन भेदोंसे युक्त अहंकार उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार प्रधानसे महत्तत्त्व आवृत है, उसी प्रकार यथा प्रधानं हि महान् महता स तथाऽऽवृतः। महत्तत्त्वसे अहंकार भी व्याप्त है। तदनन्तर 'भूतादि' भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दतन्मात्रकं ततः॥ ४३ नामक तामस अहंकारने विकृत होकर शब्दतन्मात्राकी सृष्टि की और उससे 'शब्द' गुणवाला आकाश उत्पन्न ससर्ज शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दलक्षणम्। हुआ। तब उस भूतादिने शब्द गुणवाले आकाशको शब्दमात्रं तथाऽऽकाशं भूतादिः स समावृणोत्॥ ४४ आवृत किया। आकाशने भी विकृत होकर स्पर्शतन्मात्राकी सृष्टि की। उससे बलवान् वायुकी उत्पत्ति हुई। वायुका आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह। गुण स्पर्श माना गया है। फिर शब्द गुणवाले आकाशने बलवानभवद्वायुस्तस्य स्पर्शो गुणो मतः॥ ४५ 'स्पर्श' गुणवाले वायुको आवृत किया। तत्पश्चात् वायुने विकृत होकर रूपतन्मात्राकी सृष्टि की। उससे आकाशं शब्दतन्मात्रं स्पर्शमात्रं तथाऽऽवृणोत्। ज्योतिर्मय अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। ज्योतिका गुण 'रूप' ततो वायुर्विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह॥ ४६ कहा गया है। फिर स्पर्शतन्मात्रारूप वायुने रूपतन्मात्रावाले तेजको आवृत किया। तब तेजने विकृत होकर रस- ज्योतिरुत्पद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते। तन्मात्राकी सृष्टि की। उससे रस गुणवाला जल प्रकट स्पर्शमात्रं तु वै वायू रूपमात्रं समावृणोत्॥ ४७ ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह। सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि तु॥ ४८
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