भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 14

अध्याय १ ] प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न ११ रसमात्राणि चाम्भांसि रूपमात्रं समावृणोत्। हुआ। रूप गुणवाले तेजने रस गुणवाले जलको आवृत विकुर्वाणानि चाम्भांसि गन्धमात्रं ससर्जिरे ॥ ४९ किया। तब जलने विकारको प्राप्त होकर गन्ध- तन्मात्राकी सृष्टि की। उससे यह पृथिवी उत्पन्न हुई तस्माज्जाता मही चेयं सर्वभूतगुणाधिका। जो आकाशादि सभी भूतोंके गुणोंसे युक्त होनेके कारण संघातो जायते तस्मात्तस्य गन्धगुणो मतः ॥ ५० उनसे अधिक गुणवाली है। गन्धतन्मात्रारूप पार्थिवतत्त्वसे ही स्थूल पिण्डकी उत्पत्ति होती है। पृथिवीका गुण तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रा तेन तन्मात्रता स्मृता। 'गन्ध' है। उन-उन आकाशादि भूतोंमें तन्मात्राएँ हैं तन्मात्राण्यविशेषाणि विशेषाः क्रमशोपराः ॥ ५१ अर्थात् केवल उनके गुण शब्द आदि ही हैं। इसलिये वे तन्मात्रा (गुण) रूप ही कहे गये हैं। तन्मात्राएँ भूततन्मात्रसर्गोऽयमहंकारात्तु तामसात्। अविशेष कही गयी हैं; क्योंकि उनमें 'अमुक तन्मात्रा कीर्तितस्ते समासेन भरद्वाज मया तव ॥ ५२ आकाशकी है और अमुक वायुकी' इसका ज्ञान करानेवाला कोई विशेष भेद (अन्तर) नहीं होता। किंतु तैजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवा वैकारिका दश। उन तन्मात्राओंसे प्रकट हुए आकाशादि भूत क्रमशः एकादशं मनश्चात्र कीर्तितं तत्र चिन्तकैः ॥ ५३ विशेष (भेद)-युक्त होते हैं। इसलिये उनकी 'विशेष' संज्ञा है। भरद्वाजजी ! तामस अहंकारसे होनेवाली यह बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चात्र पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च। पञ्चभूतों और तन्मात्राओंकी सृष्टि मैंने आपसे थोड़ेमें तानि वक्ष्यामि तेषां च कर्माणि कुलपावन ॥ ५४ कह दी ॥ ४१-५२ ॥ सृष्टि-तत्त्वपर विचार करनेवाले विद्वानोंने इन्द्रियोंको श्रवणे च दृशौ जिह्वा नासिका त्वक् च पञ्चमी। तैजस अहंकारसे उत्पन्न बतलाया है और उनके अभिमानी शब्दादिज्ञानसिद्ध्यर्थं बुद्धियुक्तानि पञ्च वै ॥ ५५ दस देवताओं तथा ग्यारहवें मनको वैकारिक अहंकारसे उत्पन्न कहा है। कुलको पवित्र करनेवाले भरद्वाजजी ! पायूपस्थे हस्तपादौ वाग् भरद्वाज पञ्चमी। इन इन्द्रियोंमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। विसर्गानन्दशिल्पी च गत्युक्ती कर्म तत्स्मृतम् ॥ ५६ अब मैं उन सम्पूर्ण इन्द्रियों तथा उनके कर्मोंका वर्णन कर रहा हूँ। कान, नेत्र, जिह्वा, नाक और पाँचवीं आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा। त्वचा-ये पाँच 'ज्ञानेन्द्रियाँ' कही गयी हैं, जो शब्द शब्दादिभिर्गुणैर्विप्र संयुक्तान्युत्तरोत्तरैः ॥ ५७ आदि विषयोंका ज्ञान करानेके लिये हैं। तथा पायु (गुदा), उपस्थ (लिङ्ग), हाथ, पाँव और वाक्-इन्द्रिय- नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहतिं विना। ये 'कर्मेन्द्रियाँ' कहलाती हैं। विसर्ग (मल-त्याग), नाशक्नुवन् प्रजां स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥ ५८ आनन्द (मैथुनजनित सुख), शिल्प (हाथकी कला), गमन और बोलना-ये ही क्रमशः इन कर्मेन्द्रियोंके समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्परसमाश्रयात्। पाँच कर्म कहे गये हैं ॥ ५३-५६ ॥ एकसंघातलक्ष्याश्च सम्प्राप्यैक्यमशेषतः ॥ ५९ विप्र ! आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी-ये पाँच भूत क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-इन पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च प्रधानानुग्रहेण च। गुणोंसे उत्तरोत्तर युक्त हैं, अर्थात् आकाशमें एकमात्र महदाद्या विशेषांखास्त्वण्डमुत्पादयन्ति ते ॥ ६० शब्द गुण है, वायुमें शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, तेजमें शब्द, स्पर्श और रूप तीन गुण हैं, इसी प्रकार जलमें चार और पृथिवीमें पाँच गुण हैं। ये पञ्चभूत अलग- अलग भिन्न-भिन्न प्रकारकी शक्तियोंसे युक्त हैं। अतः परस्पर पूर्णतया मिले बिना ये सृष्टि-रचना नहीं कर सके। तब एक ही संघातको उत्पन्न करना जिनका लक्ष्य है, उन महत्तत्त्वसे लेकर पञ्चभूतपर्यन्त सभी विकारोंने पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण परस्पर मिलकर In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth