संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २ तत्क्रमेण विवृद्धं तु जलबुद्बुद्वत् स्थितम्। भूतेभ्योऽण्डं महाबुद्धे बृहत्तदुदकेशयम्॥ ६१ प्राकृतं ब्रह्मरूपस्य विष्णोः स्थानमनुत्तमम्। तत्राव्यक्तस्वरूपोऽसौ विष्णुर्विश्वेश्वरः प्रभुः ॥ ६२ ब्रह्मस्वरूपमास्थाय स्वयमेव व्यवस्थितः। मेरुश्चोल्बमभूत्तस्य जरायुश्च महीधराः। गर्भोदकं समुद्राश्च तस्याभूवन् महात्मनः॥ ६३ अद्रिद्वीपसमुद्राश्च सज्योतिर्लोकसंग्रहः। तस्मिन्नण्डेऽभवत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ६४ रजोगुणयुतो देवः स्वयमेव हरिः परः। ब्रह्मरूपं समास्थाय जगत्सृष्टौ प्रवर्तते ॥ ६५ सृष्टं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना। नरसिंहादिरूपेण रुद्ररूपेण संहरेत् ॥ ६६ ब्राह्मेण रूपेण सृजत्यनन्तो जगत्समस्तं परिपातुमिच्छन्। रामादिरूपं स तु गृह्य पाति भूत्वाथ रुद्रः प्रकरोति नाशम् ॥ ६७ एक-दूसरेका आश्रय ले, सर्वथा एकरूपताको प्राप्त हो, प्रधानतत्त्वके अनुग्रहसे एक अण्डकी उत्पत्ति की। वह अण्ड क्रमशः बड़ा होकर जलके ऊपर बुलबुलेके समान स्थित हुआ। महाबुद्धे! समस्त भूतोंसे प्रकट हो जलपर स्थित हुआ। वह महान् प्राकृत अण्ड ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ)-रूप भगवान् विष्णुका अत्यन्त उत्तम आधार हुआ। उसमें वे अव्यक्तस्वरूप जगदीश्वर भगवान् विष्णु स्वयं ही हिरण्यगर्भरूपसे विराजमान हुए। उस समय सुमेरु पर्वत उन महात्मा भगवान् हिरण्यगर्भका उल्ब (गर्भको ढँकनेवाली झिल्ली) था। अन्यान्य पर्वत जरायुज (गर्भाशय) थे और समुद्र ही गर्भाशयके जल थे॥ ५७–६३॥ पर्वत, द्वीप, समुद्र और ग्रह-ताराओंसहित समस्त लोक तथा देवता, असुर और मनुष्यादि प्राणी सभी उस अण्डसे ही प्रकट हुए हैं। परमेश्वर भगवान् विष्णु स्वयं ही रजोगुणसे युक्त ब्रह्माका स्वरूप धारणकर संसारकी सृष्टिमें प्रवृत्त होते हैं। जबतक कल्पकी सृष्टि रहती है, तबतक वे ही नरसिंहादिरूपसे प्रत्येक युगमें अपने रचे हुए इस जगत्की रक्षा करते हैं और कल्पान्तमें रुद्ररूपसे इसका संहार कर लेते हैं। भगवान् अनन्त स्वयं ही ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं, फिर इसके पालनकी इच्छासे रामादि अवतार धारणकर इसकी रक्षा करते हैं और अन्तमें रुद्ररूप होकर समस्त जगत्का नाश कर देते हैं॥ ६४–६७॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे 'सर्गनिरूपणं' नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सर्गका निरूपण' विषयक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १ ॥ दूसरा अध्याय ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप सूत उवाच ब्रह्मा भूत्वा जगत्सृष्टौ नरसिंहः प्रवर्तते। यथा ते कथयिष्यामि भरद्वाज निबोध मे॥ १ नारायणाख्यो भगवान् ब्रह्मलोकपितामहः। उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वन् नित्योऽसावुपचारतः ॥ २ निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्। तत्पराख्यं तदर्धं च परार्धमभिधीयते॥ ३ सूतजी कहते हैं - भरद्वाज ! भगवान् नरसिंह जिस प्रकार ब्रह्मा होकर जगत्की सृष्टिके कार्यमें प्रवृत्त होते हैं, उसका मैं आपसे वर्णन करता हूँ, सुनिये। विद्वन्! 'नारायण' नामसे प्रसिद्ध लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा नित्य-सनातन पुरुष हैं, तथापि वे 'उत्पन्न हुए हैं'-ऐसा उपचारसे कहा जाता है। उनके अपने परिमाणसे उनकी आयु सौ वर्षकी बतायी जाती है। उस सौ वर्षका नाम 'पर' है। उसका आधा 'परार्ध' कहलाता है। निष्पाप In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth