भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

अध्याय ३५ ] लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि तथा फल १२७

नरेन्द्रैः सुकरं कर्तुं देवदेवस्य पूजनम्। | देवदेव नृसिंहका पूजन राजाओंके लिये तो बहुत ही सन्त्यरण्ये ह्यमूल्यानि पत्रपुष्पाणि शाखिनाम्॥ ५७ | सुकर है। परंतु जो अरण्यमें रहते हैं, उन्हें भी | भगवान्‌की पूजाके लिये वृक्षोंके पत्र-पुष्प बिना मूल्य तोयं नदीतडागेषु देवः साधारणः स्थितः। | प्राप्त हो सकते हैं। जल नदी और तडाग आदिमें सुलभ मनो नियमयेदेकं विद्यासाधनकर्मणि॥ ५८ | है ही और भगवान् नृसिंह भी सबके लिये समान हैं; | केवल उन उपासनाके साधनभूत कर्ममें मनकी एकाग्रता मनो नियमितं येन मुक्तिस्तस्य करे स्थिता॥ ५९ | चाहिये। जिसने मनका नियमन कर लिया है, मुक्ति | उसके हाथमें ही है॥ ५१—५९॥ मार्कण्डेय उवाच | इत्येवमुक्तं भृगुचोदितेन | मार्कण्डेयजी बोले—इस प्रकार भृगुजीकी आज्ञासे मया तवेहार्चनमच्युतस्य। | मैंने तुमसे यहाँ भगवान् विष्णुके पूजनका वर्णन किया दिने दिने त्वं कुरु विष्णुपूजां | है। तुम प्रतिदिन भगवान् विष्णुका पूजन करो और वदस्व चान्यत्कथयामि किं ते॥ ६० | बोलो, अब मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?॥ ६०॥

इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते श्रीविष्णोः पूजाविधिर्नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके प्रसङ्गमें 'श्रीविष्णुके पूजनकी विधि' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥

पैंतीसवाँ अध्याय लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि तथा फल

राजोवाच | राजा बोले—अहो! आपने श्रीविष्णुकी आराधनासे अहो महत्त्वया प्रोक्तं विष्ण्वाराधनजं फलम्। | होनेवाले बहुत बड़े फलका वर्णन किया। मुनिश्रेष्ठ! जो सुप्तास्ते मुनिशार्दूल ये विष्णुं नार्चयन्ति वै॥ १ | भगवान् विष्णुकी पूजा नहीं करते, वे अवश्य ही | [मोहनिद्रामें] सोये हुए हैं। मैंने आपकी कृपासे भगवान् त्वत्प्रसादाच्च्युतं ह्येतन्नरसिंहार्चनक्रमम्। | नृसिंहके पूजनका यह क्रम सुना; अब मैं भक्तिपूर्वक भक्त्या तं पूजयिष्यामि कोटिहोमफलं वद॥ २ | उनकी पूजा करूँगा। आप कृपा करके (लक्षहोम तथा) | कोटिहोमका फल बताइये॥ १-२॥ मार्कण्डेय उवाच | इममर्थं पुरा पृष्टः शौनको गुरुणा नृप। | मार्कण्डेयजी बोले—नृप! पूर्वकालमें इसी विषयको यत्तस्मै कथयामास शौनकस्तद्वदामि ते॥ ३ | बृहस्पतिजीने शौनक ऋषिसे पूछा था, इसके उत्तरमें | उनसे शौनकजीने जो कुछ बताया, वही मैं तुमसे कह शौनकं तु सुखासीनं पर्यपृच्छद् बृहस्पतिः। | रहा हूँ। सुखपूर्वक बैठे हुए शौनकजीसे बृहस्पतिजीने | इस प्रकार प्रश्न किया॥ ३½॥ बृहस्पतिरुवाच | लक्षहोमस्य या भूमिः कोटिहोमस्य या शुभा॥ ४ | बृहस्पतिजी बोले—विप्रेन्द्र! लक्षहोम और कोटिहोम- तां मे कथय विप्रेन्द्र होमस्य चरिते विधिम्। | के लिये जो भूमि प्रशस्त हो, उसको मुझे बताइये और | होमकर्मकी विधिका भी वर्णन कीजिये॥ ४½॥ मार्कण्डेय उवाच | इत्युक्तो गुरुणा सोऽथ लक्षहोमादिकं विधिम्॥ ५ | मार्कण्डेयजी बोले—नृपवर! बृहस्पतिजीके इस शौनको वक्तुमारेभे यथावन्नृपसत्तम। | प्रकार कहनेपर शौनकजीने लक्षहोम आदिकी विधिका | यथावत् वर्णन आरम्भ किया॥ ५½॥

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