संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३५ शौनक उवाच प्रवक्ष्यामि यथावत्ते शृणु देवपुरोहित ॥ ६ लक्षहोममहाभूमिं तद्विशुद्धिं विशेषतः। यज्ञकर्मणि शस्ताया भूमेर्लक्षणमुत्तमम् ॥ ७ सुसंस्कृतां समां स्निग्धां पूर्वपूर्वमथोत्तमाम्। ऊरुमात्रं खनित्वा च शोधयेत्तां विशेषतः ॥ ८ बहिरच्छतया तत्र मृदाच्छाद्य प्रलेपयेत्। प्रमाणं बाहुमात्रं तु सर्वतः कुण्डलक्षणम् ॥ ९ चतुरस्रं चतुष्कोणं तुल्यसूत्रेण कारयेत्। उपरि मेखलां कुर्याच्चतुरस्त्रां सुविस्तराम् ॥ १० चतुरङ्गुलमात्रं तु उच्छ्रितां सूत्रसूत्रिताम्। ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् ब्रह्मकर्मसमन्वितान् ॥ ११ आमन्त्रयेद् यथान्यायं यजमानो विशेषतः। ब्रह्मचर्यव्रतं कुर्युस्त्रिरात्रं ते द्विजातयः ॥ १२ अहोरात्रमुपोष्यथ गायत्रीमयुतं जपेत्। ते शुक्लवाससः स्नाता गन्धस्रक्पुष्पधारिणः ॥ १३ शुचयश्च निराहाराः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः। कौशमासनमासीना एकाग्रमनसः पुनः ॥ १४ आरभेयुश्च ते यत्नात्ततो होममतन्द्रिताः। भूमिमालिख्य चाभ्युक्ष्य यत्नादग्निं निधापयेत् ॥ १५ गृह्योक्तेन विधानेन होमं तत्र च होमयेत्। आघारावाज्यभागौ च जुहुयात्पूर्वमेव तु ॥ १६ यवधान्यतिलैर्मिश्रां गायत्र्या प्रथमाहुतिम्। जुहुयादेकचित्तेन स्वाहाकारान्वितां बुधः ॥ १७ गायत्री छन्दसां माता ब्रह्मयोनिः प्रतिष्ठिता। सविता देवता तस्या विश्वामित्रस्तथा ऋषिः ॥ १८
शौनकजी बोले—देवपुरोहित! मैं लक्षहोमके उपयुक्त विस्तृत भूमि और उसकी शुद्धिका विशेषरूपसे यथावत् वर्णन करूँगा, आप सुनें। यज्ञकर्मके लिये प्रशस्त भूमिका उत्तम लक्षण (संस्कार) इस प्रकार है ॥ ६-७ ॥ जो भूमि अच्छी तरह संस्कार की हुई हो, बराबर हो और चिकनी हो [ये सभी बातें हों तो परम उत्तम भूमि है; सभी बातें न संघटित हों तो] पूर्व-पूर्वकी भूमि उत्तम है। [अर्थात् चिकनीकी अपेक्षा बराबर भूमि अच्छी है और उससे भी सुसंस्कृत भूमि उत्तम है।] ऐसी उत्तम भूमिको ऊरु (कमर)-पर्यन्त खोदकर उसका विशेषरूपसे [गङ्गाजल एवं पञ्चगव्यादि छिड़ककर] शोधन करे और कुण्डके बाहर स्वच्छताके लिये मिट्टी [तथा गोबर] डालकर लिपाये। कुण्ड सब ओरसे एक हाथ लम्बा और उतना ही चौड़ा होना चाहिये—यही कुण्डका लक्षण है। एक हाथका सूत लेकर उसीसे माप करके चारों ओरसे बराबर और चौकोरा कुण्ड बनाना चाहिये। कुण्डके ऊपर सब ओरसे बराबर और खूब विस्तृत मेखला बनवाये। उसकी ऊँचाई भी चार अंगुलकी ही हो और वह सूतसे परिवेष्टित हो ॥ ८-१०१/२ ॥ इसके बाद यजमानको चाहिये कि वह ब्राह्मणोचित कर्मका पालन करनेवाले वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको शास्त्रोक्त रीतिसे आमन्त्रित करे। यजमान और उन ब्राह्मणोंको तीन रात्रितक विशेषरूपसे ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करना चाहिये ॥ ११-१२ ॥ यजमान एक दिन और एक रात्रि उपवास करके दस हजार गायत्रीका जप करे। [हवन आरम्भ होनेके दिन] विप्रगण भी स्नान करके शुद्ध एवं श्वेत वस्त्र धारण करें। फिर गन्ध, पुष्प और माला धारण करके पवित्र, संतुष्ट और जितेन्द्रिय होकर, भोजन किये बिना ही कुशके बने हुए आसनपर एकाग्रचित्तसे बैठें। तदनन्तर वे यत्नपूर्वक निरालस्यभावसे हवन आरम्भ करें। पहले गृह्यसूत्रोक्त विधिसे भूमिपर [कुशोंसे] रेखा करके उसे सींचे और वहाँ यत्नसे अग्नि-स्थापन करे। फिर उस अग्निमें हवनीय पदार्थोंका होम करे। सर्वप्रथम आघार और आज्यभाग—ये दो होम करने चाहिये। विद्वान् पुरुष जौ, चावल और तिल [एवं घृत आदिसे] मिश्रित प्रथम आहुतिका गायत्री-मन्त्रद्वारा [अन्तमें] स्वाहाके उच्चारणपूर्वक एकाग्रचित्तसे हवन करे। गायत्री छन्दोंकी माता और ब्रह्म (वेद)-की योनिरूपसे प्रतिष्ठित है। उसके देवता सविता हैं और ऋषि विश्वामित्रजी हैं। (इस प्रकार गायत्रीका विनियोग बताया गया।) ॥ १३-१८ ॥